ग्लोबल वार्मिंग – एक झलक

आलेख:  लता वेंकटेश

आकाशवाणी, चेन्नई केंद्र में कार्यरत

चेन्नई में ही जन्मी, पली और पढ़ी

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष

“चेन्नई का मौसम कैसा होता है ?”

अगर ऐसा कोई प्रश्न किसी चेन्नई वासी  से पूछा जाए तो वह माजाक में यही कहेगा –

“गर्मी, बहुत गर्मी, बहुत ही ज्यादा गर्मी”

लगभग कई वर्षों से यहाँ वर्षा ऋतु केवल नाम मात्र के लिए रह गयी है. जून के महीने में दक्षिण पश्चिम मानसून के कारण केरल और मुंबई में बारिश के शुरू होने की खबर पाते ही चेन्नई में लोग आतुर होने लगते हैं. रेलवे स्टेशन या बस के अड्डे पर अक्सर कुछ ऐसी बातें सुनने को मिलेंगी –

“भैय्या केरल में सही समय पर मानसून ब्रेक हो गयी है. इस महीने  के अंत तक यहाँ भी बारिश हो ही जायेगी”
तो दूसरा कहता
“बरसात की बात  छोडो यार, गर्मी तो कम हो ही जायेगी. यही बड़ी बात है”
कोई और कहता
“बापरे!, पिछले  साल इतनी गर्मी नहीं थी. लगता है अगले महीने पानी की किल्लत होगी”

जून माह के अंत में थोड़ी सी बूंदा बांदी होती है. कभी कभी शाम आधे घंटे के लिए बारिश भी हो जाती है और लोग इसी से संतुष्ट हो जाते हैं. जुलाई आगस्त के महीने भी ऐसे ही बीत जाते है. उत्तर पूर्वी मानसून ‘सेट’  नहीं हो पाता. सितम्बर अक्टोबर में यदा कदा एक दो दिन बारिश हो जाती है तो चेन्नई के लोग खुश हो जाते हैं और बोल पड़ते है –
“हाँ हाँ इस बार तो पानी की समस्या नहीं होगी. बस वर्षा की इतनी कृपा हो जाए तो बहुत है”

ऐसी बात नहीं है कि चेन्नई में पावस की ऋतु नहीं होती. मेरे बचपन में चेन्नई में मैंने जो बारिश देखी है, उसकी कच्ची यादें अब भी मेरे मन में पर्याप्त हैं. लेकिन आजकल अन्य चेन्नई वासियों के जैसे मै भी कहती – “हाँ पिछले साल इतनी गर्मी नहीं थी”. इन दिनों में कभी कभी ऐसा महसूस होता है मानो किसी विशाल भट्टी में पूरे क्षेत्र को डाल दिया हो.

पत्र पत्रिकाओं में, विद्वानों के बीच में, मौसम में होने वाली ऐसी अनियमितता के लिए विभिन्न कारण बताये जाते हैं. उसमे प्रधानतः है पृथ्वी की ऊष्मता याने ग्लोबल वार्मिंग. वायुमंडल में प्रदूषण के कारण भू ऊष्मता में निरंतर वृद्धि होती है. इसके परिणाम स्वरुप पृथ्वी के विभिन्न भूभागों में क्षेत्रीय तौर पर मौसम में गड़बड़ी होती है.

भू-ऊष्मता के विषय  पर अक्सर चर्चा  होती है. वैज्ञानिक अपनी चिंता व्यक्त करते रहते हैं. पत्र पत्रिकाओं में तत्संबंधी लेख भी प्रकाशित होते रहते हैं. इस संकट कालीन परिस्थिति में भी अज्ञानतावश  आम जनता इस विषय को उतनी गंभीरता से नहीं लेती.

वैज्ञानिकों का मत है कि सन १८५० ईसवी के पहले करीब एक से दो हज़ार साल तक विश्व के तापमान में स्थिरता रही है. अर्थात उद्योग और तकनीकी के क्षेत्र में एक ओर मानव का विकास होता रहा तो दूसरी ओर पृथ्वी के संतुलन में बाधाएं बढती गयीं. भूमि की ऊष्मता में जो वृद्धि हो रही है उसके लिए प्रमुखतः चार कारण बताये जाते हैं.  वे हैं ग्रीन हाउस गैसों के घनत्व में परिवर्तन, सौर्य दीप्ति, ज्वालामुखीय विस्फोटन और पृथ्वी के ग्रह पथ में परिवर्तन. ग्रह पथ में परिवर्तन तो धीरे धीरे सदियों में होता है और निश्चित रूप से सन १९०० ईसवी से पृथ्वी के वायुमंडल की ऊष्मता में जो वृद्धि होती आई है, उसके लिए यह एक प्रमुख कारण बन नहीं सकता.

इस अचानक और त्वरित परिवर्तन के लिए ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव को मुख्य  कारक के रूप में माना जाता है. यह ग्रीन हाउस प्रभाव क्या होता है?

वास्तव में, सूर्य के प्रकाश में परा बैंगनी, प्रतक्ष प्रकाश अवरक्त किरण  आदि सम्मिलित हैं. वायुमंडल में विद्यमान ओजोन की सतह पराबैगनी किरणों को सोख लेती है और शेष विकिरण  वायुमंडल से गुजर कर पृथ्वी की ऊपरी सतह तक पहुँचती  हैं.  भूमि की सतह विकिरणों  को आंशिक रूप से वायुमंडल में परावर्तित कर देता  है. वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाई ऑक्साइड प्रतक्ष प्रकाश को अन्दर घुसने देता है लेकिन भूमि के द्वारा प्रतिबिंबित अवरक्त विकिरणों को सोख लेता है. इन सोखे गए अवरक्त विकिरणों के कारण वायुमंडल गर्म हो जाता है. इन रोके गए विकिरणों के कारण भूमि की सतह के गरम होने की प्रक्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव कह रहे हैं.

जल – वाष्प, कार्बन डाई ऑक्साइ, मीथेन, ओज़ोन आदि ग्रीन हाउस गैसों  में सम्मिलित हैं. इसमें वास्तविकता यह है कि इन ग्रीन हाउस गैसों की विकिरण शक्ति प्रकृति में हमेशा नियंत्रित और संतुलित रही है. लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के बाद , मानव के विभिन्न क्रियाकलापों के चलते कार्बन डाई आक्साइड, मीथेन, ट्रोपोस्फरिक  ओजोन आदि की विकिरण शक्ति कई गुनी बढ़ गयी है. आग में घी डालने वाली बात यह है कि क्लोरो फ्लूरो कार्बन, हाइड्रो फ्लूरो कार्बन, नाईट्रस  आक्साइड जैसे हानिकारक ग्रीन हाउस गेसों की मात्रा वायुमंडल में कई गुनी बढ़ गयी है तथा इनकी विकिरण शक्ति भी बढ़ गयी है. पेट्रोल , कोयला जैसे जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से पिछले बीस साल में वायुमंडल  में कार्बन डाई आक्साइड का घनत्व तीन चौथाई बढ़ गया है. शेष एक चौथाई के ह्रास का कारण है विश्व भर में हो रहे वनों का विनाश.

वायुमंडल को प्रदूषित करनेवाले अन्य प्रदूषक पदार्थों  में ‘एरोसोल्स’ भी घातक माने जाते हैं.  वायुमंडल में फैली हुई जहरीली धुंद में एरोसोल्स की बारीक कणे जमीं रहती हैं. ऐसे सल्फेट युक्त  ‘एरोसोल्स’, मेघों के सघणन में नाभिक की तरह कार्य करते हैं – अर्थात इन प्रदूषक पदार्थों की मौजूदगी के कारण मेघों का आकार बड़ा दिखता है, लेकिन मेघों में होने वाले जल वाष्पों के आकार छोटे हो जाते हैं. परिणाम स्वरुप पानी की बूंदों की उत्पत्ति  इनमें कम हो जाती है. अतः आसमान में काले काले मेघ तो छाए रहते हैं पर पानी बरसाने की क्षमता उनमें नहीं होती है. हलकी बूंदा बाँदी के साथ मेघ बिखर जाते हैं. ऐसी परिस्थिति आजकल विश्व के कई भागों में, क्षेत्रीय तौर पर होते हुए नज़र आती है. वायुमंडल में विद्यमान प्रदूषक पदार्थों में एरोसोल्स की तरह ‘सूट’ भी घातक सिद्ध हुई है. यह सूट अर्थात कालिख के कण, कारखानों की चिमनियों तथा वाहनों के सैलेंसर पाइप  के उत्सर्जन आदि में पाए जाते हैं. ऐसे कालिख के कण वायुमंडल में पहुंव कर काले बादल की तरह फैली रहती है. वायुमंडल में इनके घनत्व में वृद्धि होने पर वहां की ऊष्मता भी बढती है और बिलकुल ग्रीन हाउस गैसों के जैसे ये  भी प्रभाव डालते हैं.  आर्कटिक क्षेत्रों  में या हिम प्रदेशों में इन कालिख कणों की पर्त जमने से बर्फ की सतह में गर्मी बढती है और बर्फ अतिशीघ्र पिघलने लगती है. हिम खण्डों के पिघलने के कारण हिम आधारित नदियों में जल प्रवाह में वृद्धि अवश्य होती है. फलतः नदियों पर आश्रित प्रदेशों में पानी की कमी वर्त्तमान में नहीं होती है, लेकिन भविष्य में इन प्रदेशों के सूख जाने की और बंजर हो जाने की अत्यधिक संभावनाएं हैं.

पृथ्वी  के चार  में से तीन  तिहाई भाग सागर से भरा हुआ है और सागर पूरे धरती के तापमान को समंजित करता है. पृथ्वी के समस्त जीवों के संरक्षण में सागर की अहम् भूमिका है. वायुमंडल में उपलब्ध अतिरिक्त कार्बन डाई आक्साइडको सागर द्रवीभूत कर लेता है. इस द्रवीकरण के कारण सागर में कार्बोनेट पत्थरों की उत्पत्ति होती है. ग्रीन हाउस गैस होने पर भी इस कार्बन डाई आक्साइडकी महत्वपूर्ण भूमिका है. हरे पेड़ पौधों की प्रकाश संस्लेषण (फोटो सिंथेसिस) प्रक्रिया में कार्बन डाई आक्साइडकी अहम् भूमिका है. वायु मंडल; में इसकी उपलब्धता के कारण पेड़ पौधों का आहार और पेड़ पौधों के कारण अन्य जीवों का आहार बनता है. `पृथ्वी के जीव जंतुओं के जीवन का आधार होनेवाले सागर, वायुमंडल आदि का अस्तित्व ही आजू खतरे में पद गया है. मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनों का दोहन होता है और वनों के विनाश के कारण पद्फ्ने वाले कुप्रभाव से बचना अब दुष्कर जान पड़ता है.

बढती आबादी के कारण मानव की आवश्यकताएं बढती जाती हैं. मानव की मूल आवश्यकताओं जैसे आबदाना और आशियाने की पूर्ति के लिए विश्व को और उसमे जीवित अन्य जीव जंतुओं को बहुत कुछ चुकाना पड़ता है. हर व्यक्ति का उद्देश्य यही हो कि प्रकृति को नियंत्रित करने की चाह वह मन में  न पाले और प्रकृति पर अपना अधिपत्य जमाने की इच्छा भी मन में न रखे. प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाये रखते हुए मानव को अपनी आवश्कताओं की पूर्ति करनी होगी. अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गैर मानव जीवों की जिंदगी से छेड़ छाड़ करने या उनके सर्वनाश  का अधिकार मानव जाति को नहीं है.  इस तथ्य  को अगर प्रत्येक व्यक्ति अपने दिल में उतार ले तो मानव जन्य सारी प्राकृतिक समस्याओं के लिए समाधान मिलने लगेगा.

31 Responses to “ग्लोबल वार्मिंग – एक झलक”

  1. भारतीय नागरिक Says:

    निश्चित रूप से बहुत ज्ञानवर्धक… किन्तु भारत में सरकारी नीतियां इसके लिये जिम्मेदार हैं..

  2. puja Says:

    गर्मी का तांडव हर साल में भी देख रही हूँ. बंगलोर में जब रहने आई थी तब बहुत सुहाना मौसम था. दो साल के अंदर, मेट्रो का काम होने और बहुत से पेड़ों के काटे जाने के कारण, इस साल इधर बहुत गर्मी पड़ी है. ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए कदम उठाने बहुत जरूरी है और ये बिना कोई नियम लागू किये नहीं होगा…पर विश्व वाकई इस मुद्दे पर बस थोड़ी बहसबाजी कर के चुप बैठ जाता है.

  3. L.Goswami Says:

    अच्छी पोस्ट है.

  4. नरेश Says:

    आपकी चिंता बिलकुल जायज है | मोसम पर ग्लोबल वार्निंग का असर साफ़ साफ़ देखा जा रहा है |

  5. satish saxena Says:

    लता वेंकटेश को इतनी शुद्ध और साफ़ हिन्दी में पढना वाकई सुखद रहा है, एक समय वह भी था जब दक्षिण भारत में हिंदी को त्याज्य माना जाता था और आज हमारी दक्षिण की एक बेटी इतने महत्वपूर्ण विषय पर सारगर्भित लेख लिख रही है ! लता जैसी विदुषी का परिचय कराने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !
    लता वेंकटेश को इसी विषय पर अपनी लिखी कविता भेंट कर रहा हूँ …शायद उन्हें पसंद आयेगी !
    कितने कवियों ने मौसम की
    गाथा गायी कविताओं में

    अब मौसम पर कविता लिखते
    लेखनी ठहर क्यों जाती है
    बरसों बीते , दिखती न कहीं हर ओर छा रही हरियाली
    अब धुआं भरे इस मौसम में क्यों लोग मनाते दीवाली ?

    धरती की छाती से निकली
    सहमी सहमी कोंपलें दिखे
    काला गहराता धुआं देख
    कलियों में वह मुस्कान नहीं
    जलवायु प्रकृति को दूषित कर धरती लगती खाली खाली
    विध्वंस हाथ से अपना कर क्यों लोग मनाते दीवाली ?

    प्रकृति का चक्र बदलने को
    काटते पेड़ निर्दयता से
    बरसात घटी बादल ना दिखे
    ठंडी जलधार बहे कैसे
    कर रहीं नष्ट ख़ुद ही समाज, कालिदासों की संताने !
    आभूषण रहित धरा को कर क्यों लोग मनाते दीवाली ?

    अब नहीं नाचता मोर कहीं
    घनघोर मेघ का नाम नहीं
    अब नहीं दीखता इन्द्रधनुष
    सतरंगी आभा साथ लिए
    कर उपवन स्वयं तवाह अरे क्यों फूल ढूँढता है माली,
    जहरीली सांसे लेकर अब क्यों लोग मनाते दीवाली ?

  6. हरि जोशी Says:

    हर बार यही लगता है कि पिछली बार गर्मी कम थी..कहां रुकेगा ये सिलसिला…लेकिन फिर भी हम समझने को तैयार नहीं।
    इस सारगर्भित लेख के लिए लता जी का आभार। जय हो।

  7. राज भाटिया Says:

    एक जागरुक करने वाली पोस्ट जी

  8. shobhana Says:

    bahut gan vardhak aalekh .lataji ko bahut bahut badhai .

  9. अनुनाद सिंह Says:

    ये वैश्विक गर्मी बहुत खतरनाक है। इसे अनदेखा नहीं कर सकते।

    एक जागरूक लेखिका का जागरूकतापूर्ण सामयिक लेख।

  10. ali syed Says:

    अत्यंत ज्ञानवर्धक प्रविष्टि ! वैसे हमारे सुधरने की संभावना कम ही है ! इस मुद्दे पर द्विवेदी जी के ब्लॉग पर टिप्पणी की थी वही सम्भावना इधर भी रिपीट कर रहे हैं !

    आगामी कुछ दशकों में परग्रही जीव ब्रम्हांड में नये बिजनेस की शुरुवात करेंगे …सौर ताप से भुने हुए इंसान ( बतर्ज़ सींख कबाब ) मांसाहारी परग्रहियों के लिए विशिष्ट व्यंजन !

  11. vinay vaidya Says:

    खोजपरक और प्रासंगिक बहुत उपयोगी आलेख ।
    बधाई तथा धन्यवाद !
    Excellent Hindi-presentation ,
    Congratulations !

  12. Alpana Says:

    विश्व पर्यावरण दिवस पर बहुत ही अच्छी और सटीक चित्रमय पोस्ट है.
    बधाई.

  13. manoj kumar Says:

    बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 06.06.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

  14. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI Says:

    प्रकृति का प्रतिशोध !

    मानव के अतिक्रमण दमन पर कब तक आंसू प्रकृति बहाए ?
    नहीं करे यदि निज रक्षा तो न्याय प्रकृति को कौन दिलाये ???

  15. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI Says:

    …….और हाँ …..लेखिका को विशेष साधुवाद !

  16. yoginder moudgil Says:

    Behtreen Prastuti…….

  17. Asha Joglekar Says:

    ग्लोबल वार्मिंग पर आपकी ये पोस्ट बहुत ही सामयिक चेतावनी है । लेखिका का आभार इतने अच्छे लेख के लिये ।

  18. संजय बेंगाणी Says:

    जब हम कहते है नौ साल का रिकॉर्ड टूटा, इसका मतलब होता है नौ साल पहले ऐसी गर्मी पड़ी थी. तब वैश्वीक उष्णता का ऐसा मामला नहीं था. पिछले साल असम में कम वर्षा हुई. कहा वैश्वीक उष्णता रेगिस्तान बना देगी. इस साल ज्यादा वर्षा है. कहा जा रहा है वैश्वीक उष्णता से पानी बरस रहा है. हर बात के लिए अब एक ही दोषी है, वैश्वीक उष्णता.

    इसका अर्थ यह नहीं है कि वैश्वीक उष्णता कोई मुद्दा नहीं है. यह जीने-मरने जैसा विकट प्रश्न है. आपकी चिंताएं सही है.

  19. renu sharma Says:

    lata ji ,
    aapaka swagat hai,
    bahut hi rochak lekh humen padhne ko mila
    shukriya.
    renu

  20. kaushal kishor Says:

    It’s very good and Knowladgebil….kk

  21. prakash Says:

    It’s knowladge is good………p.p.

  22. prakash Says:

    good

  23. PAWAN KHATKAR Says:

    LATA JI HUME APKA LEKH BAHUT ACHA LAGA . AAJ KI DATE MEIN GLOBLE WARMING SABSE BADA KHATRA BAN GAYA HAI . JISE AAP NE LEKH MEIN BHALI BHANTI UJAGAR KIYA HAI . LEKH KO CHITRON SE AAP NE AUR BHI SAJEEV BANA DIYA HAI. AASHA HAI KI LOG ASE LEKHON KO PADKAR PRAKRITY KE PRATI UJAGER HON. MANY MANY THANKS…….!

  24. paridhi Says:

    this is a faltu website delet kar do isay stupid!!!!!!!!!!!!

  25. j.prasad Says:

    aapka lekh bahut pasand aaya ,maito kahta hu aagar sarkar bhi yehi soch rakhe to kuch kam bane, jankari ke liy bahut bahut dhanwad.

  26. chandrahas som Says:

    aap ke vichar mu ghe ache lage log priyavran ke bare me bhut kam sohate hai sab apni svarth ke bare me sochte hai ham abhi natuer ke bare me nahi soche ge natuer hamare bare me nahi soche ge

  27. manjeet singh Says:

    ph- 8882344575,09467308393

  28. manjeet singh Says:

    priyavaran aaj hamare samne ek badi chunoti le kar aa rha hai kayoki aaj ke samy me ped- podho ko kata ja raha hai jisse hamare samne aaksijan ki matra kam hogi aur jamin se pedo ko har roj log kat rahe hai jis karan varsa v pure priyavaran par poora-poora parbhav para hai.

  29. manjeet singh Says:

    pedo ke bin ham kese ji pay, varsha ke bin ham kesa rah pay |
    ped hamare jivan data,
    es bin ham ek mint bhi nahi ji pata |
    ped hamare hai jivan rakshak,
    aaj kayu kar rahe ho inko bhakshak |
    ham parikarti ke bare me bilkul nani sochate,
    phir baad me sans lene se bhi kosate |
    THANKS LATA JI AAPKA LEKH PADA
    I AM A HINDI POET AND HARYANVI POET
    MAI AAPKA SAWAGAT KARTA HUN AAP AAPKE LEKH MERI Email ID par dalte rahiye me aapka poora-poora sahyog karuga |

  30. omprakash Says:

    jal hi jeevan, vayu jeevan,
    jeevan jal aur vayu se,
    aao karen inka sangrakshan,
    jo param kartavya hamara hai,
    yeh aaj sankalp hamara hai-opbhuria jammu

  31. mamta bajwa Says:

    vry nice mam

    this is very helpful for my project also

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s


%d bloggers like this: