भुबनेश्वर का मुक्तेश्वर मंदिर

भुबनेश्वर मंदिरों का शहर है जहाँ हजारों मंदिर हुआ करते थे. अब भी लगभग ६०० मंदिर विद्यमान हैं और इनमे से सबसे पुराना और अच्छे हाल में संरक्षित मंदिर परसुरामेश्वर का है जो ७ वीं सदी में निर्मित किया गया था. पुराने शहर में मंदिर हैं तो नए में राजधानी है. भुबनेश्वर में अधिकतया शैव मंदिर हैं जबकि पुरी में  विष्णु के. उडीसा के महान मंदिरों में से आज  हम  केवल  एक मंदिर पर केन्द्रित हैं. यह मंदिर है “मुक्तेश्वर”  जिसे  कलिंग के स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नगीना कहा गया है. राजा रानी मंदिर के करीब ही  एक बड़े दायरे में कुछ अन्य छोटे बड़े मंदिरों के बीच मुक्तेश्वर मंदिर अपने अनोखे तोरण द्वार लिए आपका स्वागत कर रहा होता है. इस मंदिर का निर्माण सन ९५० के लगभग हुआ है और मात्र ३५ फीट ऊंचा है. अपने इस लघु रूप में यह प्राचीन और आधुनिक स्थापत्य की संधि बेला (संक्रमण काल) का प्रतिनिधित्व करता है.

विलियम हेनरी कॉर्निश द्वारा सन १८९२ में लिया गया चित्र

 

मंदिर के अन्दर प्रवेश करने के पूर्व हम लोगों ने मंदिर के आस पड़ोस का जायजा लिया. इस मंदिर के पूर्व में एक पवित्र बावड़ी है और दक्षिण पश्चिम में एक कुंवां (मरीची कुंड).  महिलाओं के बांझपन के लिए इस कुँवें के पानी से नहाना लाभदायक बताया जाता है. मुक्तेश्वर मंदिर के प्रांगण   में ही  अन्य छोटे छोटे मंदिर बने  हैं जिनमे  शिव लिंग  भी हैं. कदाचित इन्हें कुछ भक्तों द्वारा मनोकामना पूर्ति हेतु निर्मित कराया गया है (Votive Shrines). यहाँ हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्मों के स्थापत्य का गजब समन्वय मिलता है. यदि तोरण द्वार को ही लिया जावे तो यह बौद्ध स्थापत्य को इंगित करता है. वैसे यह कहा गया है कि इसी प्रकार का तोरण द्वार किसी खेत में मिला  था और वह अब संग्रहालय में प्रदर्शित है. निश्चित ही यह बौद्ध काल की रही होगी और मुक्तेश्वर मंदिर के स्थापतियों ने इसी से प्रेरणा ली होगी. इस मंदिर परिसर में और भी कुछ पुराने खंडित दीवारों के  अवशेष हैं. पूरी सम्भावना है कि यह पूर्व में कोई बौद्ध आराधना स्थल रहा होगा.

जैसा ऊपर कहा जा चुका है, इस मंदिर की एक बड़ी विशेषता यहाँ बना अलंकरण युक्त  तोरण द्वार है जो अपने आप में विलक्षण है. मंदिर के वाह्य दीवारों पर मानो इंच इंच पर नक्काशी है. छोटे छोटे आलों के अन्दर विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तिया लगी हैं. नायिकाएं तो मन मोहक भाव भंगिमा लिए अद्वितीय हैं. जातक कथाओं को भी प्रदर्शित किया गया है.

इसके जगमोहन (मंडप) में जाली का खूबसूरत काम किया गया है. जालीदार खिड़की पर बंदरों की क्रीडा बिलकुल सजीव लगती हैं.

Mukteshwar

उपरोक्त  चित्र में देखें कि बेचारा हाथी सिंह के सामने कितना नतमस्तक हुआ जा रहा है. हमें लगा कि यह रूपांकन संभवतः बौद्ध धर्म को सनातन धर्म के आगे झुकते हुए दर्शाया गया होगा. परन्तु हमारे इस यूरेका पर श्री राहुल सिंह जी ने पानी फेर दिया यह कह कर कि  “चित्र गज व्‍याल का है.  मंदिरों के  बाहिरी दीवार के प्रक्षेपों के बीच अधिकतर  देखा जा सकता है”.

अलंकरण हेतु पशु पक्षियों, मानवों आदि को  काल्पनिक रूप प्रदान कर प्रदर्शित किया जाता है. ऐसी कलाकृतियों को व्याल कहकर संबोधित किया जाता है. उदाहरण के लिए गज व्याल का एक रूप प्रस्तुत है.

बाहर चिलचिलाती धूप में दुपहर डेढ़ बजे भी मंदिर के अन्दर अँधेरा ही था. गर्भ गृह में सुसज्जित शिव लिंग है और कहते है कि यह लिंगराज के शिव लिंग से भी अधिक चमकीला है.

ॐ नमः शिवाय

जनवरी माह में प्रति वर्ष मुक्तेश्वर मंदिर एक और आकर्षण का केंद्र बनता है. वह है यहाँ आयोजित किया जाने वाला ओडीसी नृत्य समारोह जो २/३ दिन चलता है. यह समय भी भुबनेश्वर घूमने के लिए उपयुक्त रहेगा.


31 Responses to “भुबनेश्वर का मुक्तेश्वर मंदिर”

  1. ali syed Says:

    अत्यंत ज्ञानवर्धक आलेख ! आपके यूरेका और राहुल सिंह जी के गज व्याल पर थोड़ा विस्तार अपेक्षित है ! बढ़िया चित्र !

    …और इसमें से एक चित्र तो मध्य युगीन और आधुनिक स्थापत्य का शानदार नमूना है 🙂

  2. प्रवीण पाण्डेय Says:

    उस क्षेत्र में लगभग 2 वर्ष व्यतीत करने के बाद भी कई स्थान छूट गये। आपके माध्यम से दर्शन हुये जा रहे हैं।

  3. arvind mishra Says:

    हाथी सिंह के सामने कितना नतमस्तक हुआ जा रहा है. हमें लगा कि यह रूपांकन संभवतः बौद्ध धर्म को सनातन धर्म के आगे झुकते हुए दर्शाया गया होगा. परन्तु हमारे इस यूरेका पर श्री राहुल सिंह जी ने पानी फेर दिया यह कह कर कि “चित्र गज व्‍याल का है.
    splendid account with spectacular photography …
    I think you are right on your stand ..kindly elaborate gaj vyaal aspect! and pls send me an e mail also..

  4. nirmla.kapila Says:

    मैने आज तक भारत भ्रमन नही किया है इस लिये आपकी पोस्ट मेरे लिये किसी सौगात से कम नही होती। भारत की इस विशाल संस्कृ्ति और धार्मिक धरोहरों को देख कर कई बार हैरान होती हूँ। बहुत ग्यानवर्द्धक जानकारी होती है वो भी सचित्र। धन्यवाद और शुभकामनायें। आशा है अब आपकी श्रीमती जी स्वस्थ होंगी।

  5. भारतीय नागरिक Says:

    एक बार फिर एक अच्छे स्थल से परिचय कराने के लिये धन्यवाद..

  6. Dr. S.K.Tyagi Says:

    फोटो देख कर लगा, वाकई यह मंदिर नगीना ही है!! इस नगीने की झलक हम सबको दिखाने के लिए जौहरी का बारम्बार आभार।

  7. राज भाटिया Says:

    बहुत सुंदर लगा पुर विवरण साथ मै सुंदर चित्र बहुत लुभावने लगे, आप का पुरा ब्लांग ही एक अन्मोल खजाना है जी, जान्कारी से भरपुर

  8. rahulsingh Says:

    भागदौड़ में मुक्‍तेश्‍वर मंदिर देखा था, यहां देखना उस प्रत्‍यक्ष से अधिक तसल्‍ली देने वाला रहा. दुहरा रहा हूं, आपके ब्‍लॉग पर पर्यटन विभागों की नजर नहीं है क्‍या. स्‍थलों और स्‍मारकों को सहज दृष्टि से कैसे देखी और एप्रीशिएट की जा सकती हैं, मैं बातें तो करता हूं, लेकिन उसका आपके पोस्‍ट जैसा बढिया उदाहरण, कभी सोच नहीं सका.
    आपको याद दिलाना चाहूंगा रतनपुर-कटघोरा मार्ग के पाली का महादेव मंदिर का, जहां सिंह-व्‍याल, गज व्‍याल, नर व्‍याल, शुक व्‍याल, मेष व्‍याल जैसे उदाहरण हैं. व्‍याल प्रकारों की दृष्टि से यह छत्‍तीसगढ़ का तो सबसे महत्‍वपूर्ण स्‍मारक है.

  9. sanjay Says:

    सुब्रमणियन सर,
    आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद इन स्थानों को देखने का आनंद कुछ और ही होगा। सहेज कर रखने लायक हैं ये पोस्ट्स आपकी। सरकारी या निजी टूर एंड ट्रैवल्स के विज्ञापनों से आकर्षित होकर कही जाने के बजाय आपके और अल्पना वर्मा जी की पोस्ट्स के आधार पर पुरातत्व आधारित भ्रमण और नीरज और मनीष की पोस्ट्स के आधार पर मस्ती भरी घुमक्कड़ी करने का मन करता है।
    बहुत ही उम्दा पोस्ट लगी, आभार स्वीकार करें।

  10. Gagan Sharma Says:

    वर्षों पहले जाना हुआ था। याद ताजा करवा दी आपने।
    वैसे अब तो भुवनेश्वर में भी काफी बदलाव आ चुका होगा।

  11. जी.के. अवधिया Says:

    जानकारी बढ़ाने वाला अत्यन्त सुन्दर पोस्ट! मनभावन चित्रों ने तो पोस्ट में चार चाँद लगा दिया है। इस जानकारी के लिये आपको बहुत बहुत धन्यवाद सुब्रमणियम साहब!

  12. संजय बेंगाणी Says:

    उन्नीसवीं सदी की तुलना में मन्दीर का रखरखाव ठीक हुआ है. देख कर अच्छा लगा.

  13. seema gupta Says:

    मुक्तेश्वर मंदिर सच में उत्कृष्ट कला का एक नमूना है, सभी ने सत्य कहा की ये भारतीय संस्क्रती की अमूल्य धरोहर हैं…….ऐसी सुन्दर जगहों से परिचित करने का बेहद आभार….

  14. seema gupta Says:

    मुक्तेश्वर मंदिर सच में उत्कृष्ट कला का एक नमूना है, सभी ने सत्य कहा की ये भारतीय संस्क्रती की अमूल्य धरोहर हैं…….ऐसी सुन्दर जगहों से परिचित करने का बेहद आभार….
    regards

  15. shobhana Says:

    सचित्र वर्णन देखकर ऐसा लगा मनो हम आपके साथ ही विचरण कर रहे हो |
    आपका प्रस्तुतिकरण लाजवाब है |

  16. Ratan Singh Shekhawat Says:

    सुन्दर चित्रों के साथ बहुत बढिया जानकारी !
    लाजबाब !

  17. ताऊ रामपुरिया Says:

    अत्यंत रोचक और सुंदर जानकारी दी. इस जानकारी के साथ चित्र अत्यंत ही सुंदर हैं. बहुत आभार आपका.

    रामराम.

  18. Rekha Srivastava Says:

    आपका कहना सही था की कोई अस्थायी error थी. बहुत खूबसूरती से आपने मुक्तेश्वर मंदिर का चित्रण किया है. चित्रों से वहां की स्थापत्य कला और उसके इतिहास के बारे में जानकारी मिलनेसे भारत भ्रमण का सुख भी मिला .

  19. satish saxena Says:

    इतना सुंदर तोरण द्वार शायद मैंने पहली बार देखा है ! आपका लेखन और साथ में चित्र , आपकी हर रचना को अद्वितीय बना देते हैं !
    सादर नमस्कार

  20. sandhya gupta Says:

    Bhartiya sanskriti ki ek aur zeevant tasveer prastut karne ke liye badhai.

  21. हरि जोशी Says:

    आति सुंदर छायाचित्रों के साथ रोमांच भर देने वाले यात्रा वृतांत के लिए आपका आभार।

  22. निपुण पाण्डेय Says:

    बहुत सुन्दर मंदिर ! तोरण द्वार तो अनुपम है ! इतनी पुरानी सुन्दर नक्काशी और शिल्प अभी भी देखते ही बनता है ! व्याल की जानकारी बिलकुल नयी है मेरे लिए |

    यह उस समय की कला की खूबी थी की आज तक ज्यों की त्यों हैं |
    बहुत अच्छी जगह से परिचित कराया आपने और बहुत सुन्दर अंदाज़ में ! 🙂
    यूँ ही नयी नयी जगहें दिखाते रहिये | बहुत बहुत धन्यवाद !

  23. ghughutibasuti Says:

    सुन्दर फोटो व विवरण हैं। आभार।
    घुघूती बासूती

  24. अल्पना Says:

    बहुत ही सुन्दर चित्र और विवरण भी ज्ञानवर्धक लगा.
    १८९२ में लिया गया चित्र और आज के चित्र में द्वार में बहुत अधिक अंतर नहीं लगता है .
    [well maintained structure]
    आभार.

  25. vinay vaidya Says:

    Dear Sir,

    I remember having commented on your English version of this blog.
    writing here again.

    किसी जमाने (1992) में पुरी जाना हुआ था ।
    भुवनेश्वर नहीं जा पाया था ।
    आपके वर्णन को पढ़ते और देखते हुए वह अफ़सोस
    दूर हो गया ।
    धन्यवाद

  26. Lovely goswami Says:

    आप महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं …पर चित्र देते समय अपेक्षित व्याख्याएं देते चलें ..इससे पाठकों का ज्ञान वर्धन होगा ….इसे अनुरोध समझे …

  27. Pearl Maple Says:

    Fabulous collection of photos
    Nice to see the upclose details of the carvings.

  28. विष्‍णु बैरागी Says:

    निस्‍सन्‍देह, सदैव की तरह महत्‍वपूर्ण जानकारियों वाली उपयोगी पोस्‍ट। चित्रों ने ‘सोने पर सुहागा’ वाला काम किया है।
    बहुत देर से यह पोस्‍ट पढ पाया। देर आयद, दुरुस्‍त आयद।

  29. Atul Pradhan Says:

    Sir,the descriptions about Mukteswar is excellent proper photes.Every inch of the temple is highly decorated.so Fergusson rightly described this temple as The Gem of Orissan Temple Architecture.R.L.Mitra described it as The Handsomest a charming epitome of the perfection of Orissan temple Architecture.The temple really described as a dream realised in sand stone.
    This temple contains the both old and new features of orissan architecture.This temple is the tranisitional architectural monument of Orissa.
    New Features:
    1.First time Naga and Nagi columns are introduced(not found before that).But it did not continued for long period.
    2.Introduction of Vow motif.
    3.Saptamatrikas with their baby.
    4.It starts with Panchrath desigh(Before Tree rath found)
    5.Ganesh and Kartikeya with their vihecls.
    6.Introduction of unfinished Pidha temple.
    7.The ceiling portion of Jagamohan or Pidha temple is well decorated.
    8.The introduction of Nine Planets(Navagrah) with the addition of Ketu.(before the eight planets are found in the lentil).

  30. Rakesh Bhartiya Says:

    bahut sundar

    gyan vardhak lekh

    dhanyvad

  31. चलत मुसाफ़िर Says:

    जिसे गज व्याल बताया जा रहा है वह शार्दूल कहलाता है। सिंह सवार नर अतुलित पराक्रम एवं शक्ति का प्रतीक है तथा गज व्याल होता तो धड़ सिंह का होता और सिर गज का। वही गज व्याल कहलाता है। मंदिरों में इस तरह के पशुओं की प्रतिमाओं को जन कौतुहल की दृष्टि से उत्कीर्ण किया जाता था।

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