गड्ढे में हाथी

आज विश्व मित्रता दिवस है. चलिए प्रकृति के मित्र बने.
इस गर्मी में (अब क्या कहें गर्मी तो जस की तस है) हम केरल में थे, एक पारिवारिक समारोह में शरीक होने के लिए. वैसे केरल तो एकदम हरा भरा था और हमारे घर का परिवेश भी, लेकिन उफ़, केवल ४० डिग्री की वह गर्मी जानलेवा लग रही थी. अत्यधिक उमस के कारण शरीर पसीने से तर बतर हुआ जा रहा था. ऐसी गर्मी केरल में हमने कभी भी नहीं देखी है और न ही केरल वासियों ने. अब तो हमें लगने लगा है कि ग्लोबल वार्मिंग की बातों में खासा दम है.
एक दोपहर खाना खाने के बाद हम अपने ही घर के बागीचे में लोफरई कर रहे थे.  मुख्य गेट तक जाने के लिए बने रास्ते के अगल बगल हमें कुछ जाने पहचाने भू दृश्य दिखे. अचानक बचपन याद हो आया. अरे यही तो है  जहाँ हमारे हाथी रहा करते थे और उन्हें हम पकड़ भी लेते थे!. श्री अरविन्द मिश्र जी ने बताया कि इन्हें गुबरैला कहते हैं. बहर हाल हम बच्चों के लिए वे हाथी ही थे. मलयालम में भी उसे “कुज्ही आना” (गड्ढे का हाथी) कहा जाता है. वह  अपने द्वारा बनाये गए विशेष प्रकार के गड्ढे में छिपा रहता और प्रतीक्षा करता किसी चींटी या कीड़े की जो उसका मुख्य भोजन होता. उस के द्वारा बनाये गए गड्ढे की विशेषता यह है कि कोई भी छोटा प्राणी जो उसके पास आएगा वह फिसल कर गड्ढे में गिर जायेगा.  मुझे याद है, बचपन में,मैं और मेरी बहनें ऐसे गड्ढों से उन तथाकथित  हाथियों (Antlions) को पकड़ा करते और फिर जमीन पर एक लकीर खींच कर  एक साथ उन्हें उस खींची हुई लकीर पर छोड़ देते. फिर होती थी हम लोगों की हाथियों की दौड़. जैसे घुड दौड़ में लोग बेतहाशा चिल्लाते चीखते हैं, वैसे ही हम लोग भी अपनी अपनी हाथियों को प्रोत्साहित करने के लिए चिल्लाते थे. जो  हाथी  सबसे  अधिक  दूर  निकल  जाता  उसे  विजयी  मानते. उसके  लिए कोई  सीमा रेखा नहीं हुआ करती  थी.

चींटी को डालने के पहले

हम अपने बालकाल के अनुभवों को घर में इकट्ठे हुए बच्चों के साथ साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर सके. आवाज़ देकर सभी बच्चों को बुला लिया और एक केमेरा भी आ गया. बच्चों के सामने ही एक चींटी को पकड़ा गया और डाल दिया उस गड्ढे में. देखते ही देखते अन्दर से कुछ हलचल हुई और चींटी गायब हो गयी. पलक झपकते ही अन्दर बैठे गुबरैला ने चींटी को नीचे खींच लिया. बस गड्ढा कुछ और गहरा हो गया था. काश हमने वीडियो ली होती.

चींटी को डालने के बाद

इस चित्र को हमारे एक मित्र श्री बी.के. जोशी जी ने बनाया.पूँछ और लम्बी होनी थी.

यह जो कीट है (गुबरैला?) (Antlion)  यह उसका वास्तविक रूप नहीं है. इनका रूपांतरण (Metamorphosis) हो जाता है.यह मात्र  लार्वा है. इनका अपना एक जीवन चक्र है जिसे कोई प्राणी शास्त्री ही अच्छे से समझा पायेगा. कालांतर में इसकी पूँछ बनती है और पंख निकल आते है और फिर उड़ने लगती है. अंग्रेजी में उन्हें Dragon  Fly कहते हैं. गूगल बाबा ने हमें बताया कि वे “अजगर मक्खी” हैं. मजे की बात है कि वे भी हमारे मनोरंजन का साधन बनती थीं. उनकी पूँछ में धागा बाँध कर पकडे रहते. बेचारीं पतंग जैसे उडती रहतीं. तो फिर कभी उन्हें कंकडों पर बिठाते और उनसे वेट लिफ्टिंग करवाई जाती. जब वे थक जातीं तो उन्हें छोड़ दिया जाता. निश्चित ही अपने मनोरंजन के लिए उनके साथ किया गया अमानवीय व्यवहार ही था. इस पक्ष को हमने बच्चों से छुपाए रखा जिससे कि वे भी हमारा अनुकरण करने के लिए प्रेरित ना हों.

34 Responses to “गड्ढे में हाथी”

  1. ali syed Says:

    शीर्षक पढकर लगा कि ज़रूर कोई हाथी गड्ढे में गिर गया होगा🙂
    अतीत और वर्तमान को एक साथ जीता हुआ आलेख बहुत अच्छा लगा , कुछ शब्दों का इस्तेमाल अदभुत है ,तक़रीबन हर आलेख में यह प्रयोग आपकी विशिष्टता है , इस बार लोफराई पर खुश हूं !

  2. Ratan Singh Shekhawat Says:

    बढ़िया आलेख
    आज तो अतीत में ले गए आप🙂

  3. vinay vaidya Says:

    आदरणीय !
    १-लोफ़राई शब्द कुछ अटपटा लगा ।
    २-ड्रेगन-फ्लाय तो शायद पानी में अंडे देता है ।
    मै अपने घर की पानी की टंकी में अक्सर देखता हूँ ।
    ३-बचपन में कौतूहल होता था, तो एक दिन खोदकर
    देखा तो पाया कि यह वही कीड़ा था जिसे आप हाथी
    कह रहे हैं ।
    जानकारी भरा यह लेख मनोरंजक भी है,
    खेल-खेल में विज्नान जैसा ।
    धन्यवाद ।

  4. ताऊ रामपुरिया (मुदगल) Says:

    लगता है पूरा भारत एक है. आपके इसी हाथी (गुबरैला) को हमारे यहां हम घोंगा कहते थे. गर्मियों की छुट्टियों में खेतो की रेत में इन्हीं को बिल से निकाला करते थे. हम चींटी डालने की बजाये हल्की सी हल्चल इनके बिल में एक सीख डालकर करते थे और ये बाहर आजाते थे.

    बहरहाल बचपन याद दिलाने के लिये धन्यवाद. ऐसी इच्छा हो रही है कि अभी उडकर गांव पहुंच जायें और घोंगे पकडने लगे.

    रामराम

  5. sanjay Says:

    सुब्रमणियन साहब,
    एक बार तो लगा कि ’गुलीवर की यात्रा’ पढ़ने के मिलेगी, लेकिन जो भी मिला मजेदार रहा।
    हम तो साहब पत्थरों के जंगल में पैदा हुये, पले बढ़े। बहुत मिस करते हैं प्रकृति और प्राकृतिक माहौल को।
    आभार

  6. rahulsingh Says:

    जैव विविधता पर दृष्टि मानवता और सभ्‍यता, दोनों का लक्षण है.

  7. satish saxena Says:

    मैं तो गड्ढे से हाथी निकालने आया था, यह हाथी तो आप खुद ही निकाल लेते हमें क्यों आवाज दी ??

  8. arvind mishra Says:

    सर पकड़ कर बैठा हूँ -अब मैं अपने सीमित ज्ञान को कोसूं या क्या करूं -समझ में नहीं आ रहा है -चित्र जैसा एक प्राणी और है जिसे रीवां कहते हैं इधर -बहुत शोर करता है …लेकिन यही पाखी (ड्रैगन फ्लाई ) है कहना मुश्किल है -क्योकि ड्रैगन फ्लाई के लार्वे पानी में होते हैं ..हो सकता है कुछ समय के लिए थलचर भी होते हों मगर जो व्यवहार आपने देखा /दिखाया है वह तो एक वयस्क हो चुके प्राणी का लगता है -इधर राम का हाथी एक दुसरे कीट को कहते हैं जो मखमली लाल रंग का होता है बरसात में बहुत निकलता है ..वह भी लार्वा ही होगा किसी कीट का ….किसी कीट विज्ञानी की मदद लेनी होगी!

  9. arvind mishra Says:

    शायद लोफरई वर्तनी की दृष्टि से ज्यादा ठीक है -बिना निश्चित मकसद के इधर उधर भटकना ही शायद लोफरई है -ज्ञान विज्ञान साहित्य में इस वृत्ति का योगदान महनीय है 🙂 !

  10. नीरज जाट जी Says:

    मैने तो सोचा था कि कोई हाथी गिर गया होगा गड्ढे में। लेकिन यहां तो मामला ही दूसरा है।
    मजेदार।

  11. प्रवीण पाण्डेय Says:

    गुबरैला के बारे में प्रसिद्ध है कि उसको गुलाबजल का फाहा सुंघाया जाये तो उसे भाता नहीं है। उसे गोबर की गन्ध में आत्मिक सुख मिलता है।

  12. dhiru singh Says:

    रोचक रही जानकारी . बचपन के प्रयोग निश्चित ही हमेशा याद रहते है .

  13. राज भाटिया Says:

    पा.ना. सुब्रमणियन जी बहुत ही सुंदर लगी यह बचपन की य़ादे, हम सब भी ऎसा ही कुछ करते थे, कीकर एक पेड होता है, जब यह छोटा सा होता है तो एक झाडी सा लगता है इस पर एक जीव मिलता है,चने के दाने जितना… जिस के सर पर सींग से होते है, हम उसे पकड कर जोर से जमीन पत फ़ेंकते थे, ओर वो तडफ़ता हमे लगता था कि यह नाच रहा है, आप का हाथी बहुत प्यारा लगा. धन्यवाद

  14. नरेश सिंह Says:

    बहुत रोचक पोस्ट लिखी है आपने | एसी प्रकार का एक कीड़ा हमारे शेखावाटी में भी होता है | यह खेजडी के पेड के नीचे अपना बिल बनाता है | इसे बिल से बाहर निकालने के लिए चीटीं का प्रयोग करते थे | आपकी पोस्ट सीधे ही बचपन में ले गयी | आभार |

  15. नरेश सिंह Says:

    बहुत रोचक पोस्ट लिखी है आपने | एसी प्रकार का एक कीड़ा हमारे शेखावाटी में भी होता है | यह खेजडी के पेड के नीचे अपना बिल बनाता है | इसे बिल से बाहर निकालने के लिए चीटीं का प्रयोग करते थे | आपकी पोस्ट सीधे ही बचपन में ले गयी | धन्यवाद

  16. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ डा. अरविन्द जी
    लोफराई ही हमने सुन रखा है. अब आप कह रहें हैं तो वर्तनी सुधार दी. ज्ञान वर्धन के लिए आभार.

  17. Nitin Says:

    Kya kaha mere girne ke baare kuch hai kya….

  18. समीर लाल Says:

    रोचक दास्तान…बढ़िया संस्मरण.

  19. Shivam Misra Says:

    एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं!
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

  20. Alpana Says:

    सच में सोचा शायद कहीं हाथी गड्ढे में गिर गया होगा..लेकिन यह छोटा सा जीव हाथी..:)
    —-विवरण रोचक लगा लेकिन चींटियाँ पकड़ कर गड्ढे में डालना अमानवीय तो था ही.
    – इसी तरह बरसात में निकलने वाले लाल रंग के मखमली कीड़े को अरविन्द जी राम जी का हाथी बता रहे हैं मेरे ख्याल से उसे शायद सीता जी की सवारी भी कहते हैं.

  21. sanjay bengani Says:

    लोफराई अच्छा शब्द प्रयोग लगा.

    इस किड़े को शायद नहीं देखा, हाँ मखमली लाल किड़े जरूर देखे थे, उठा कर घर में ले आते थे. नाम पता नहीं था. सब रामकी बुढ़िया कहते थे. माने जो पता नहीं वह सब राम का🙂

    बाकि जीवों से ज्यादा छेड़ छाड़ न करने के लिए सिख मिली हुई थी, पाप लगता था. अतः पकड़ना-मजे लेना वगेरे ज्यादा हुआ नहीं😦

  22. पं.डी.के.शर्मा "वत्स" Says:

    बढिया रोचक पोस्ट्! कीडे मकोडों से तो बचपन में हमने भी बहुत शैतानियाँ की हैं…अपने मन के क्षणिक सुख के लिए बेचारे कीटों को बहुत तंग किया है. वैसे अरविन्द जी द्वारा बताए कीडे को हमारे यहाँ राम जी का घोडा कहा जाता है…अब राम जाने कि उनका घोडा है, हाथी है या क्या है🙂

  23. रंजन Says:

    हाथी कहाँ है..:)

  24. ghughutibasuti Says:

    आपका यह हाथी खूब पसन्द आया। ऐसे हाथी तो हमने भी खूब पकड़े हैं। इन्हें हम काली माई कहते थे और एक सींक से बाहर निकालते थे। चींटी का उपयोग हमने नहीं किया।
    क्षमा कीजिएगा यह गुबरेला नहीं है। गुबरेला गोबर खाता है गोबर के गोले में रहता है। यह लारवा है। लारवा एन्टलायन या डूडलबग कहलाता है। पूर्ण विकसित कीड़ा कुछ कुछ ड्रैगनफ्लाई जैसा होता है किन्तु ड्रैगनफ्लाई नहीं होता। यह Myrmeleontidae परिवार का सदस्य है। गुबरेला डंगबीटल कहलाता है।
    घुघूती बासूती

  25. shobhana Says:

    दर असल आपकी प्रविष्टि पहले ही पढ़ ली थी किन्तु छोटा निमांश(पोता )जो एक साल का है उसने काफी व्यस्त कर रखा है |और टिप्पणी में देर हो गई |
    छोटी सी चीटी कितना बड़ा कम कर जाती है |कितनी ही जगह ऐसे ढेर देखे है कितु आपने इस प्रक्रिया को बहुत ही बारीकी से चित्रित किया है धन्यवाद |
    गड्ढे में हाथी शीर्षक सार्थक करता है इस पोस्ट को |

  26. रंजना सिंह Says:

    सचमुच शीर्षक ने दिग्भ्रमित कर दिया था…लगा कोई हाथी गड्ढे में गिर गया है…
    इस प्राणी का यह नाम हमें ज्ञात न था…सो ज्ञानवर्धन हुआ…
    रोचक मजेदार इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार.

  27. अमर Says:

    रोचक!

  28. मिहिरभोज Says:

    मैणैं तो सोच्या था कि अपणैं समीर लाल मिलेंगे गड्ढे मैं……खैर इसका भी रंग कुछ वैसा ही था

  29. हरि जोशी Says:

    दिलचस्‍प पोस्‍ट है। आनंद आ गया। नई जानकारी मिलती है हमें हमेशा आपसे।

  30. ASha Joglekar Says:

    बहुत बढिया पोस्ट जानकारी भरी पर इस गुबरैले को हाथी……क्यूं कहते थे । लोफराईशब्द आपकी ईजाद है पर अच्छा है भाषा ऐसे ही बढती है । घुगुती बासूती जी का स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है ।

  31. jc joshi Says:

    बचपन में पढने को मिला था कि जंगली हाथी को घास-फूस से ढके गड्ढे में किसी पालतू हाथी की सहायता से गिरा कर फिर साधा जाता था…. शायद इसकी प्रेरणा, विशेषकर केरल में, इसी प्राणी से मिली होगी… और इस कारण हाथी के नाम से अब भी इसे याद किया जाता हो (?)…

  32. Gagan Sharma Says:

    सुब्रमनियन जी,
    आपने तो ड़रा ही दिया था। एक तो गढ्ढे मे हाथी फिर उपकृत भी करना था, किसे 🙂

  33. mamta Says:

    गड्ढे मे हाथी देखने आये थे पर यहां तो उससे भी रोचक संस्मरण पढने को मिला।

  34. Erick Says:

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