Archive for सितम्बर, 2010

कुत्तों को भी सिद्धि मिलती है

सितम्बर 20, 2010

कुछ ही दिन पहले गिरिजेश जी को कुत्ते के काटने और उसपर मलाई लगाने सतीश सक्सेना जी की पोस्ट पढ़ी थी. तभी अचानक हमें भी कुत्ते के बारे में एक बात याद आ गयी. ऐसे ही तो पोस्ट बन जाते हैं.!

तामिलनाडू में चेन्नई के दक्षिण में  १९० किलोमीटर की दूरी पर एक जिला मुख्यालय है तिरुवन्नामलई. यहाँ १० वीं सदी का एक प्रख्यात शिव मंदिर है. यहाँ शिवजी अग्नि रूप में पाए जाते हैं. यह भी प्रख्यात है कि इस बस्ती में सिद्धि प्राप्त लोगों (योगियों) का वास है. वैसे रमण महर्षि, जिन्हें सिद्ध पुरुष माना जाता है, वे भी यहाँ रहे हैं और उनका आश्रम भी है.

हमारा एक छोटा भाई चेन्नई में पदस्थ है. उनके कार्यालय के कुछ लोगों ने तिरुवान्नामलई जाने का कार्यक्रम बनाया. पौर्णमि की रात   अरुणाचल की पहाड़ी के १४ किलोमीटर लम्बी परिक्रमा का विधान हैं.  अर्धरात्रि मंदिर में दर्शन के बाद परिक्रमा प्रारंभ होती है. जब वे लोग निकलने ही वाले थे, तो एक कुत्ता उनके सामने आकर खड़ा हो गया. हमारे भाई ने कुत्ते से कहा, आ जा तू भी पुण्य कमाले. तेरा जीवन सफल हो जाएगा. भाई के मित्र ने टोका भी कि क्यों कुत्ते के मुह लग रहे हो. बात वहीँ ख़त्म हो गयी थी.

थोड़ी देर में ही पाया गया कि कुत्ता आगे बढ़ कर इस ग्रुप का इंतज़ार कर रहा है. कुत्ता इनके साथ साथ चलता रहा. बीच में कई अड़चने आयीं जैसे दूसरे कुत्ते का क्षेत्र जिसमे हमारे कुत्ते को जूझना पड़ा परन्तु उसने विजय हासिल कर ली. ऐसे ही कई पाडाव आये और वह कुत्ता अपनी यात्रा पर कायम रहा. बीच में किसी चाय की दूकान में इस समूह ने चाय भी पी , उस समय  कुत्ता काफी दूर इंतज़ार में लगा रहा, मानो उसे खाने पीने में कोई रूचि न हो. फिर आगे बढे. दूसरे कुत्तों के कई इलाके आये और सब से जूझता हुआ यह कुत्ता साथ देता गया. सबसे बुरी बात तो यह थी कि इन लोगों ने उस कुत्ते को पूरे रास्ते भर खाने के लिए कुछ भी नहीं दिया जब की वह उनकी सुरक्षा के लिए स्वयमेव आ खड़ा हुआ था.

उस पहाड़ का चक्कर लगाने के बाद यात्रा मंदिर जाकर ही समाप्त होती है. वह कुत्ता पूरे राह में उस ग्रुप के साथ ही चलता रहा और अंत में मंदिर के मुख्य गोपुरम के आगे दंडवत  हो गया. वह अन्दर नहीं गया. संभवतः  उसे मालूम था कि उसका अन्दर जाना वर्जित है. संभवतः वह कुत्ता भी सिद्ध ही था.


कभी कभी लगता है कि आदमी से कुत्ता ही ज्यादा समझदार है.

चित्र धुन्दले हैं क्योंकि मोबाइल फोन से उतारे गए थे परन्तु संवाद के लिए उन्हें सक्षम समझें.

मेरे घर पनाह लेने आया एक वाइपर

सितम्बर 15, 2010


हम एक पोस्ट बना ही रहे थे  “हमारे अंगने में”  और उसे  भविष्य में प्रकाशित होने के लिए सेव करने ही वाले थे.  रात १०.३० बजे  जब घर के दरवाज़े को बंद करना था तो हमारे सुपुत्र ने देखा कि एक सांप घर के खुले दरवाज़े और दीवार के बीच  बैठा हुआ है. वह जोर से चिल्लाया. हम दौड़े दौड़े नीचे उतरे. हमने उसे शांत किया और कहा जा केमरा ले आ. उसने भी खीजते हुए कहा यहाँ घर में सांप घुसा हुआ है और आपको फोटो की पड़ी है. हमने दो चार फोटो उतारे. वह गरीब भीगी बिल्ली की तरह चुप चाप पड़ा  रहा. प्रथम दृष्टया हमें वह खतरनाक वाइपर लगा.   बीच  बीच में अपनी जीभ लपलपाकर मुह चिढ़ा रहा था मानो कह रहा हो कि तुम्हारे अंगने को तो पार कर बैठक तक पहुच गया हूँ. तुम्हीं ने तो कहा था कि एक शार्क चाहिए, हम तो उसके बाप हैं.  बहुत बारीकी से देखने पर हमें भ्रम होने लगा था कि यह एक निरापद अजगर का बच्चा है और इसे पकड़ कर झोले में भर लेते हैं. तभी एक विचार आया कि हमेशा हमें अजगर और वाइपर को समझ पाने में परेशानी होती रही है. कहीं यह वाइपर ही हुआ तो?

इस  बीच आस पड़ोस के लोग भी इकठ्ठा हो गए. कुछ युवा डंडे लिए हुए थे.   उन्होंने कमान अपने हाथ ले ली. हम ने आग्रह किया कि इस शरणागत को सुरक्षित निकलने का मौका दें. आम सहमती बनी कि किसी सांप पकड़ने वाले को बुला लिया जाए. वैसे भी आजकल कई लोगों ने इस तरह घरों में घुस आने वाले सांपों को पकड़ने का व्यवसाय बना लिया है. लोगों ने मोबाइल द्वारा किसी एक मुन्ना बाबा को बुलवा लिया. आधे घंटे में कह कर दो या ढाई घंटे बाद मुन्ना बाबा का पदार्पण हुआ. उसने देखते ही कह दिया, यह तो खतरनाक वाइपर ही है. हम हाथ नहीं लगायेंगे. जहर की पिचकारी चलाता है. ढक्कन वाले किसी बड़े डब्बे की मांग की और मजबूरन हमें अपने आटे वाले डब्बे को खाली कर देना पड़ा. मजे की बात यह रही कि वाइपर को वाइपर (जमीन में पोछा लगाने वाला) से ही डब्बे के अन्दर जाने के लिए उकसाया गया. वह निरीह शामत आ गयी समझ कर अन्दर की तरफ बढ़ने लगा. उसके सामने जब रुकावट रक्खा गया तो  हार कर  डब्बे में चला गया और ढक्कन बंद. सबने राहत की सांस ली. एक सज्जन हमारी जानकारी के बिना ही  इनाम बतौर ३०० रुपये मुन्ना बाबा को दे दिए परन्तु इतने से वह संतुष्ट न हुआ. एक महिला ने हमसे २०० रुपये देने को कहा और हम झट मान भी गए. मुन्ना बाबा संतुष्ट हुए और उन्होंने अपने द्वारा पकडे गए एक दूसरे नाग को डब्बे से बाहर निकाल लोगों पर अपनी धाक जमा ली.

मुन्ना बाबा का कहना था कि वे पकडे गए सांपों को जंगल में ले जाकर छोड़ देते हैं. हमें लगा कि भले ही ५०० रुपये लग गए, कम से कम उस निरीह प्राणी की जान तो बच गयी. परन्तु देर रात तक नींद नहीं आई. कहीं मुन्ना बाबा पकडे गए सांपों से जहर उगलवाने का काम तो नहीं करता? बाज़ार में एक ग्राम जहर की कीमत हज़ारों रुपये है.

इस प्रजाति को रसल्स वाइपर के नाम से जाना जाता है और अत्यधिक जहरीला होता है. इसके काटे जाने पर मानव का रक्त जमने लगता है जिससे मृत्यु हो जाती है. वैसे यह अजगर की तरह आलसी और धीमी चाल वाला प्राणी है परन्तु विपत्ति के समय यह अत्यधिक फुर्तीला और आक्रामक बन सकता है.
यह आलेख सर्प संसार में प्रकाशित हुआ था.