पुरातत्व से मुठभेड़

मलवा सफाई में जेठानी मंदिर, ताला से प्राप्त

बात बहुत पुरानी हो गयी फिर भी लगा कि अपने कुछ पुरातत्व से जुड़े संस्मरण साझा कर लूँ.

हमारी नौकरी भी ऐसी थी कि ग्रामीण अंचलों में नियमित दौरे पर  जाना होता था. एक बार बिलासपुर से दक्षिण में बिल्हा के आगे अमेरी नाम के गाँव के लिए जा रहे थे. वह रास्ता तालागांव के पास से जाता था. हमारे ड्राईवर ने कहा, सर जी, यहीं पास बहुत पुराने मंदिरों का खँडहर है. अपने जोगलेकर जी ने वहां एक नाटक का मंचन किया था. देखते चलते हैं. हमने भी हामी भर दी.  खंडहरों के पास पहुँचने पर वहीँ एक निर्जन स्थल पर हम निवृत्त हो रहे थे. बगल में किसी मूर्ती का कटा हुआ आकर्षक हाथ पड़ा था. हमने उसे  उठा लिया. खंडहरों को सतही तौर पर देख लौट आये थे.

घर वापसी पर उस पाषाण खंड का निरीक्षण किया और लगा कि इसे टेबल पर रखा जा सकता है. हमने उसके नीचे घिसाई भी कर दी ताकि वह ठीक से स्थिर खड़ा रह सके.

हमें थोडा सा अपराध बोध भी हो रहा था कि हम  उस स्थल से पुरावस्तु उठा लाये. रात हमने पुनः उस हाथ के टुकड़े का निरीक्षण  किया. हाथ में कंगन भी था. निश्चित ही वह किसी महिला का हाथ था जो पुष्प गुच्छ  जैसे किसी वस्तु को अपनी हाथों में  पकड़ रखी थी.  हमें आश्चर्य तब हुआ जब हमने देखा कि उसकी हथेलियों में स्पष्ट हस्त रेखाएं बनी हुई थीं. हमारा कौतूहल जागा. हमने पाया कि उस हाथ में विवाह की रेखा नहीं बनी है. अब तक तो हम केवल   चेकों, ड्राफ्टों जैसे परक्राम्य लिखतों में ही डूबे रहते थे. यह नयी समस्या बन गयी. फिर ख़याल आया कि शिल्पी ने गलती नहीं की होगी क्योंकि हर चीज को बड़े बारीकी से बताया गया है. हो न हो यह कोई देवदासी का हाथ है या किसी देवी का जिसके लिए विवाह कोई मायने न रखता हो. हमें तो लग रहा था कि हम बुद्धत्व की और अग्रसर हो रहें है.

दूसरे ही दिन हमने दफ्तर में श्री रामू शुक्ला, अपने कार्मिक अधिकारी से अपने इस खोज की चर्चा की. उन्होंने भी हमारी बातों को बड़े ध्यान से सुना और उत्साहित होकर हमें बताया कि स्थानीय पुरातत्व कार्यालय में जगदलपुर के सर्वश्री  गिरधारीलाल रैकवार और अकलतरा के राहुल सिंह बहुत ही ज्ञानी और मिलनसार लोग हैं. उनसे मिल लें. वे बहुत प्रसन्न होंगे. आपको सर पे उठा लेंगे आदि आदि.

शनिवार को हमारा  कार्यालयीन समय आधे दिन का ही होता था. शाम चार बजे के लगभग हमने अपनी स्कूटर उठाई और टाउन  हाल के एक हिस्से में स्थित संग्रहालय पहुँच गए. वहां बाहर ही देखा कि बहुत सारे भीमकाय खंडित मूर्तियाँ कतार से रखी थीं. उनके सामने दो व्यक्ति कुछ अध्ययन करते भी दिखे. एक मूर्ती का धड किसी स्त्री का लग रहा था और हमने कल्पना कर ली कि हमारे पास जो हाथ का टुकड़ा है, वह शायद उस मूर्ती का ही हिस्सा है क्योंकि प्राप्ति स्थल वहां ताला लिखा हुआ था. हम आगे बढे और उन सज्जनों से परिचित होने का प्रयास किया. पता चला कि   वे दोनों ही पुरावेत्ता हैं और जैसा अनुमान था, श्री रैकवार  एवं श्री राहुल हैं. हमने श्री रामू शुक्ला का हवाला देते हुए अपना परिचय दिया. बड़ी आत्मीयता से उन्होंने हमारा अभिनन्दन किया और हमारे आने का प्रयोजन जानना चाहा.

हमने सामने ही रखे नारी के खंडित मूर्ती की ओर इशारा करते हुए उनसे पूछा  कि क्या इसका ऊपर का हिस्सा ताला से मिला है?  उनके इनकार किये जाने पर हमने उनसे कह दिया कि इसका एक हाथ का टुकड़ा तो हमारे पास है. इतना कह कर हम चुप नहीं रहे. हमने  यह भी जोड़ दिया कि यह कोई देवदासी की मूर्ती होगी. उन्हें भी आश्चर्य हुआ होगा कि यह व्यक्ति इतने आत्म विश्वास से यह कैसे कह रहा है. उन्होंने पूछ ही लिया और हमने बड़े दंभ से कहा कि उस महिला की हथेली में हस्त रेखाएं तो हैं परन्तु विवाह की रेखा नहीं है. लगता है कि हमारी बातें उन्हें बड़ी रुचिकर लगी होंगी, उन्होंने हमें अपने कार्यालय में आने के लिए आमंत्रित किया और हम लौट आये थे.

उसी दिन शाम ६ बजे के लगभग हम उनके कार्यालय में गए और अपने साथ ले गए उस हाथ को. उनको उसे सुपुर्द कर बड़ी शान्ति मिली थी. हमें श्री रैकवार और श्री राहुल सिंह ने उनके संग्रह की सभी बहुमूल्य सामग्रियों का अवलोकन कराया जैसे प्राचीन सिक्के, ताम्र पात्र और उत्खनन में प्राप्त अन्य सामग्री. उनके दफ्तर में जाने का सिलसिला यों ही बना रहा और हमने महसूस किया कि  इस तरह पुरातत्व को समर्पित अधिकारी पुरातत्व विभाग में बिरले ही मिलेंगे. भले ही  उम्र में ये दोनों  हमसे छोटे हों, हमारे लिए तो गुरु तुल्य हैं. हमारी यात्रा यहीं से प्रारंभ हुई.

प्रसन्नता इस बात की है कि श्री राहुल सिंह जी ने भी ब्लॉग्गिंग की दुनिया में अपनी पहचान उनके सिंहावलोकन के माध्यम से बना ली है.

47 Responses to “पुरातत्व से मुठभेड़”

  1. मनोज Says:

    अच्छा संस्मरण है. आपने बहुत ध्यान से उस मूर्ति के हाथ को देखा और फिर अपनी जिज्ञासा के चलते डॉ गुणी लोगों से भी मुलाक़ात हो गयी, बधाई.

    मनोज खत्री

  2. satish saxena Says:

    बढ़िया और रुचिकर लगा यह संस्मरण भाई जी !

  3. Akshita (Pakhi) Says:

    यह तो बहुत अच्छा लगा….शानदार संस्मरण.

    ________________

    ‘पाखी की दुनिया’ में अंडमान के टेस्टी-टेस्टी केले .

  4. संजय बेंगाणी Says:

    वाह!

    उत्सुकता से पढ़ा की आखिर उस हाथ का हुआ क्या. वह अपनी सही जगह पहुँच गया, संतोष की बात है. वैसे वह मूर्ति क्या सचमुच किसी देवदासी की थी? आगे कुछ पता चला?

  5. विष्‍णु बैरागी Says:

    रोचक संस्‍मरण है। ऐसे और संस्‍मरण पढना चाहूँगा।

  6. Bharat Bhushan Says:

    बहुत ही सुंदर आलेख-सह-संस्मरण. भाई साहब आप को बधाई. आपने कहाँ-कहाँ जा कर कार्य किया पढ़ कर अच्छा लग रहा है.

  7. सुनीता शानू Says:

    बहुत सुन्दर। अच्छा लगा संस्मरण पढ़कर कर।
    सादर।

  8. puja upadhyay Says:

    very interesting…
    kuch pratimaon mein wakai behtarin detailing hoti hai. jis pratima ke haath ka jikr hai uski photo kahan hai?

  9. zeal [Divya] Says:

    रोचक संस्‍मरण

  10. rashmi ravija Says:

    बहुत ही रोचक एवं ज्ञानवर्द्धक संस्मरण

  11. nirmla.kapila Says:

    बहुत रुचिकर है आपकी पोस्ट। तो आप हस्त रेखा विग्यान के भी माहिर है
    बहुत खूब। बधाई।

  12. RAJ SINH Says:

    आपतो जानते ही हैं की आप के लिखे का इंतज़ार रहता है .और क्या कह सकता हूँ .
    बस ऐसे ही आनंदित ‘ मल्हार ‘ बनी रहे .

  13. vinay vaidya Says:

    वाह !
    बहुत अच्छे तरीके से आपने संस्मरण साझा किया ।
    लगता है यह ’बिलहा’ या ’बेलहा’ एक छोटा सा
    रेल्वे-स्टेशन भी है । १९९८ के आस्पास जब बिलासपुर
    के रेल्वे-स्टेशन पर तोड़-फोड़ हुई थी तो मैं राउरकेला
    से बिलास्पुर आया था और फिर भोपाल के लिये इसी
    स्टेशन से गाड़ी में बैठा था।
    पुरातत्त्व एक नित्य वर्धमान संपदा होती है ।
    ब्रह्म की भांति !!
    धन्यवाद ।
    सादर,

  14. ali syed Says:

    आपके जैसी कुछ मुठभेडें काश हम भी कर पायें ! आपका संस्मरण पढकर कई उम्मीदें पाल ली हैं !
    देखें आप तीनों विद्वानों से हमारी भेंट कब हो पायेगी !

  15. नरेश सिंह Says:

    आपका संस्मरण रोचक एवं ज्ञानवर्द्धक हैं !

  16. Gagan Sharma Says:

    रोचक हस्त कथा।

  17. प्रवीण पाण्डेय Says:

    रोचक संस्मरण, अच्छा लगा जानकर भारत की पुरातत्वीय विरासत।

  18. arvind mishra Says:

    और सब छोडिये हाथ के बारे में ही बताईये न -क्या माजरा था पूरा !

  19. राज भटिया Says:

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति। धन्यवाद

  20. yoginder moudgil Says:

    wah….dada wah….

  21. mahendra verma Says:

    आपका अनुभव तो बहुत ही रोचक रहा, पढ़कर अच्छा लगा। आगे और भी पढ़न्ज्ञ चाहूंगा।

  22. राहुल कुमार सिंह Says:

    अपनी पुरातत्‍व सेवा के दौरान सबसे अविस्‍मरणीय ‘मुठभेड़’ में से एक की याद आपने दिला दी, इसके साथ जुड़ी और भी ढेरों-ढेर साझा अनुभव की यादें. लेकिन फिलहाल यह जरूर जोड़ूंगा कि अगर हम यानि मैं और आदरणीय रायकवार जी, वाकई गुरु थे तो कई मामलों में मैं तो आपकी तुलना में गुड़ ही रह गया.

  23. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ राहुल:
    आयुर्वेद में गुड का ही प्रयोग होता है, क्योंकि उसे शुद्ध और पवित्र माना गया है.

  24. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI Says:

    रोचक !!
    यह आप और आप की रूचि ही है ……जो इस रूप में आप मुठभेड़ कर सके !!!
    थैंक यू सर!!

  25. shikha varshney Says:

    बेहद रोचक और रोमांचक संस्मरण ..आपने हाथ सही हाथों में सौंप कर अच्छा ही किया ..वैसे आपकी हस्त रेखा वाली खोज भी कम रोचक नहीं है.

  26. sanjay Says:

    सर,
    पारखी लोगों की नजर ऐसी ही होती है। कोई और होता तो बहुत ज्यादा कलाप्रेमी भी होता तो उस कटे हाथ को पेपरवेट की तरह इस्तेमाल कर लेता।
    बहुत अच्छा लगा संस्मरण।
    आभार स्वीकार करें।।

  27. Sanjeeva Tiwari Says:

    आपकी पारखी पुरातात्विक नजर और राहुल भईया की ब्‍लॉग युगलबंदी निरंतर बनी रहे और हमें महत्‍वपूर्ण जानकारी मिलती रहे।

    आदरणीय आपको, रायकवार जी एवं राहुल भईया को मेरा प्रणाम.

  28. Gyandutt Pandey Says:

    आप लोग – राहुल जी, रायकवार जी और आप पुरातत्व पर खुर्दबीन सटाने वाले लोग हैं, और हम पुरातत्व की अपनी लेखनी की स्पैलिंग के प्रति भी शंकित रहने वाले हैं।

    आप लोगों के प्रति एक आदर भाव मन में आना सहज है।

    धन्यवाद।

  29. हितेन्द्र पटेल Says:

    Unable to read this

  30. समीर लाल Says:

    बहुत बढ़िया लगा संस्मरण पढ़कर.

  31. Alpana Says:

    रोचक संस्मरण .
    इस घटना ने आप को राहुल सिंह जी से मिलवाया .
    राहुल जी के ब्लॉग पर ही ससुराल गेंदा फ़ूल वाला मूल लोक गीत पहली बार सुनने को मिला था.मैं तो उन्हें इसी बात से याद रखती हूँ.

    -पहले के शिल्पी कितनी कुशलता और सूक्ष्मता से हर मूर्ति बनाते रहे होंगे यह इस घटना से मालूम हुआ.आश्चर्य भी हुआ कि हथेली की रेखाओं की डिटेल उस मूर्ति की पहचान बता गयी.

  32. यूसुफ किरमानी Says:

    आपके बयान करने का अंदाज अच्छा लगा। राहुल सिंह के ब्लॉग पर भी जा चुका हूं,लेकिन यहां आपने उनके बारे में जो कुछ बताया वह काफी रोचक है।

  33. आशा जोगळेकर Says:

    अरे वाह बडा दिलचस्प रहा ये संस्मरण तो । और आपकी बारीक नजर जिसने हाथ की रेखाएं भी पढ लीं और जान लिया कि इसमें विवाह रेखा नही है । फिर वह हाथ अपनी सही जगह पहुंचा या नही । आपके पुरातत्व वेत्ताओं नें पहुंचा ही दियाहोगा । आप किस्मत वाले हैं जो जानकार लोग मिल गये । और जो यह मूर्ती है वह किस की है ।

  34. rajesh utsahi Says:

    मल्‍हार पर यह जुगलबंदी अच्‍छी लगी।

  35. जी.के. अवधिया Says:

    आदरणीय सुब्रमणियन साहब,

    बहुत ही सुन्दर संस्मरण लिखा है आपने, पढ़कर बहुत आनन्द आया और उन दिनों की याद भी आ गई जब हम आपके नीचे काम करते थे तथा इस बात का दुःख भी हुआ कि आपके नीचे काम करने के बाद भी आपके साथ काम करने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हो पाया।

  36. काजल कुमार Says:

    सुंदर अनुभव रहा यह पढ़ना भी कि किसी कलाकार को यहां तक ध्यान रहा कि हथेली में रखाएं भी किस प्रकार की होनी चाहिये. अद्भुत.

  37. jc joshi Says:

    सुब्रमणियन जी, जब वो छोटी थी तो मेरी बड़ी लड़की को मुझसे शिकायत रहती थी कि मैं हर बात में भगवान् को क्यूँ ले आता हूँ? शायद – हस्तरेखा समान – मेरे मस्तिष्क की रेखाएं ही इसके लिए उत्तरदायी हों!

    आपके ब्लॉगर मित्र श्री कोकास जी भी समझाते हैं कि कैसे कोई एक शब्द, राम जैसे, भी आपके मन में कोई तस्वीर उजागर कर देता है,,, ऐसे ही ‘संग्रहालय’, जहां विभिन्न काल से सम्बंधित विभिन्न सुंदर रचनाओं को उनके जन्मतिथि अथवा काल के अनुसार प्रदर्शित किया जाता है,,, यह शब्द मुझे इस ब्रह्माण्ड में उपस्थित विभिन्न काल (शून्य से अनंत) से सम्बंधित तारे, ग्रह, पृथ्वी आदि और उस पर आधारित विभिन्न जीव आदि को देख इस निर्णय पर पहुंचाता है कि हमारा ब्रह्माण्ड भी एक संग्रहालय ही तो है – किसी अनदेखे और अदृश्य जीव का जिसे हम भगवान् कहते हैं!

  38. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    अच्छी जानकारी दी. धन्यवाद.

  39. हरि जोशी Says:

    संस्‍मरण बेहद रुचिकर और प्रभावशाली है।

  40. ATUL PRADHAN Says:

    Thank you sir for your good description about this forgotten heritage. Really your keen interest in archaeology leads others about our rich cultural heritage.And so far as Rahul Singh sir is concerned no doubt first of all he is good person.He has a loving personalty,kind hearted and soft spoken nature.He has depth knowledge in Chhattisgarh culture and archaeology.

  41. Braj Kishore Says:

    इस पोस्ट से लगभग चकित हूँ ,कल्पना भी नहीं कर पाया था कभी ,सुना भी नहीं था ,और यहाँ तो वर्णन पा गया कि हस्तरेखा पत्थर पर उतारी जा सकती है एवं उसे पढ़ा भी जा सकता है .शायद आयु का भी अंदाजा लगाया जका सकता है . . .आगी के पोस्ट में हमन इंतजार करबोन सर जी .

  42. Braj Kishore Says:

    इस पोस्ट से लगभग चकित हूँ ,कल्पना भी नहीं कर पाया था कभी ,सुना भी नहीं था ,और यहाँ तो वर्णन पा गया कि हस्तरेखा पत्थर पर उतारी जा सकती है एवं उसे पढ़ा भी जा सकता है .शायद आयु का भी अंदाजा लगाया ज! सकता है . . .आगी के पोस्ट में हमन इंतजार करबोन सर जी .

  43. राहुल कुमार सिंह Says:

    इस पोस्‍ट के साथ यह जोड़ना चाहूंगा कि आपकी बातों को शुरू में मजाकिया ढंग से लेने के बाद फिर विचार करने पर इससे मुझे पहली बार यह ध्‍यान में आया कि ताला की कला में हस्‍त रेखाओं के साथ, आंख की पुतलियों की गोलाई-रेखाएं और nail depressions भी हैं, जो तत्‍कालीन भारतीय कला में दुर्लभ है. आप जैसों ने ही मेरे लिए यह सीखने का रास्‍ता खोला कि विशेषज्ञता के अभिमान में किस तरह हम सहज अवलोकन की अपनी क्षमता पर खुद अंजाने कुठाराघात कर डालते हैं.

  44. Zakir Ali Rajnish Says:

    शानदार रही यह मुठभेड़, इसी बहाने काफी कुछ जानने को भी मिला। शुक्रिया, इस संस्मरण को हमारे साथ साझा करने का।

  45. anjana Says:

    दिलचस्प संस्मरण लगा। धन्यवाद.

    नवरात्रि की आप को बहुत बहुत शुभकामनाएँ ।जय माता दी ।

  46. भारतीय नागरिक Says:

    सुन्दर आलेख. राहुल जी के ब्लाग पर मैं भी जा चुका हूं.

  47. loksangharsha Says:

    nice

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