बोम्मई कोलु – गुडियों का प्रदर्शन

इस वर्ष नवरात्रि का पर्व ८ अक्टोबर को प्रारंभ हो चुका है. इस पर्व को मनाने की अलग अलग प्रदेशों में बहुत कुछ साम्यता पायी जाती है परन्तु फिर भी विभिन्नताएं हैं. यही तो भारत की पहचान भी है. कहीं यह श्री राम के द्वारा रावण के वध अथवा कहीं दुर्गा जी के द्वारा महिषासुर के वध के उपलक्ष में मनाया जाता है.  आजकल हम बंगाल की तरह पाते हैं कि उत्तर भारत में हर जगह दुर्गा मैय्या की स्थापना  होती है और साथ में विभिन्न प्रकार के झांकियों की बहार भी. महिषासुर के वध के बाद ही  उनका विसर्जन विजय दशमी  के दिन किया जाता है. यही दशहरा भी है. हिमांचल में दशहरा अलग तरीके से मनाई जाती है वहीँ मैसूर तथा जगदलपुर में रथ यात्राएं होती हैं.  यह एक सार्वजनिक उत्सव बन गया है. दक्षिण भारत में यह सार्वजनिक भी है और घर घर की बात भी.

नवरात्रि पर घरों में गुडियों की प्रदर्शिनी रखी जाती हैं जिसे “बोम्मई कोलु/गोलु” कहते हैं .यह एक बहुत ही पुरानी परंपरा है.  यह पूरे दक्षिण में (महाराष्ट्र सहित) मनाया जाता है. आज हम केवल तामिलनाडू पर केन्द्रित रहेंगे.

नवरात्रि के पूर्व ही घरों में अलमारियों, डिब्बों आदि में रखे गए, गुड्डे गुडिए, मूर्तियाँ, आदि को बाहर निकाल लिया जाता है और उनकी सफाई होती है. एक सीढ़ीनुमा रेक बनाया जाता है जिनमें सीढ़ियों की संख्या का निर्धारण घर में उपलब्ध प्रदर्शन सामग्री की उपलब्धता होती है हालाकि स्त्रियाँ वर्ष भर इनका संग्रह करती रहती हैं. आजकल तो रेडी मेड सेट्स भी मिलते हैं. वैसे ३, ५, ७, अथवा ९ सीढ़ियों का रिवाज़ है. पहली तीन सीढ़ियों में दुर्गाजी, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी एवं अन्य देवी देवताओं को स्थान मिलता है, बाद के कुछ सीढ़ियों में महापुरुषों, संतों, धर्म गुरुओं को रखा जाता है. सातवीं सीढ़ी में सामाजिक क्रियाकलाप, उत्सव, विवाह आदि को प्रदर्शित किया जाता है. छोटी छोटी झांकियां. यहीं गृह स्वामिनी अपने  स्वयं द्वारा रचित कलाकृतियों को भी रखती है. अंतिम सीढ़ी घर के बच्चों के खिलोनों को रखने अथवा उनके सृजनात्मकता को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है. इस प्रदर्शनी के कई अन्य अध्यात्मिक पहलू हैं परन्तु प्रमुखतया यह ब्रह्मा की सृष्टि का बोधक है.

क्योंकि यह परंपरा बहुत प्राचीन है, सम्भावना इस बात की है कि उन दिनों काष्ट निर्मित एवं धातु की कलात्मक मूर्तियों का प्रयोग होता रहा होगा. आज भी यह अनिवार्य है कि लकड़ी से निर्मित युगल मूर्तियों को प्रमुखता दी जावे. ऐसी मूर्तियों को “मरपाच्ची” कहते हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे लकड़ी से बने मूर्ति विरासत में मिलते रहे हैं. यहाँ हम एक मूर्ति का  चित्र दे रहे हैं जो कम से कम २०० वर्ष पुरानी है और एक परिवार ने इसे कूड़ेदान में डाल रखा था क्योंकि हाथ टूट गए थे. एक और खूबी  यह भी थी कि ये सभी “मरपाच्ची” लाल चन्दन के बने होते थे.  नवरात्रि पौर्णमि (पूर्णिमा) से  प्रारंभ होती है और यह दिन पूर्वजों पर भी केन्द्रित है.  संभव है, विरासत में प्राप्त काष्ट मूर्ति का प्रयुक्त किया जाना पूर्वजों की पूजा का बोधक हो.

नवरात्रि के प्रथम तीन दिन माँ दुर्गा की आराधना होती है, फिर तीन दिन लक्ष्मी जी की और अंतिम तीन दिन बुद्धि प्रदायिनी माँ सरस्वती के लिए होता है. हर रोज सुबह शाम कलश के सामने  दीप प्रज्वलित कर विधिवत पूजा का विधान है जो स्त्रियों द्वारा संपन्न किया जाता है. सामूहिक भजन गायन के पश्चात प्रसाद वितरित किया जाता है और कुछ संपन्न घरानों में उपहार भी. बच्चों के लिए तो यह पूरे नौ दिन उल्लास और उत्साह का पर्व है. टोली बनाके बच्चे हर शाम अपने आस पड़ोस के घरों में जाते हैं जहाँ से उन्हें प्रसाद के रूप में विभिन्न पकवान खाने मिलता है.

नौवें दिन देवी सरस्वती की विशेष पूजा होती है. इस दिन कलम किताब, औजार, हथियार आदि देवी के चरणों में रख दिए जाते हैं और दूसरे दिन अर्थात विजय दशमी को पूजा के उपरांत अपनी किताब कापी का प्रयोग करते हैं. एक दिन पढाई लिखाई सब बंद रहती है.

अंत में गुड्डे गुडिया, देवी देवता आदि को सोने के लिए आलों, अलमारियों आदि में रख दिया जाता है.

चेन्नई से हमारी भांजी शरण्या ने इस वर्ष अपने घर के बोम्मई कोलु के कुछ चित्र भेजे जो इस पोस्ट का कारक बना.

35 Responses to “बोम्मई कोलु – गुडियों का प्रदर्शन”

  1. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI Says:

    धन्यवाद! बिलकुल नयी जानकारी !

  2. विष्‍णु बैरागी Says:

    सरस्‍वती की पूजा पूरे चार दिनों तक चलनेवाले किसी भी उत्‍सव ही यह पहली जानकारी है। अच्‍छा लगा। चित्र तो सदैव की तरह शानदार हैं ही।

  3. Bharat Bhushan Says:

    भई वाह. आपके द्वारा दिए गए विवरण और विस्तृत ब्यौरे का जवाब नहीं. वाह. परंतु भाई साहब एक बात शायद आप से मालूम हो सके कि भारत में सबसे अधिक पूजे जाने वाले महादेव के स्थान पर अब गणेश जी को अधिक मान्यता देने का क्या कारण हो सकता है. आप प्रकाश डालेंगे तो बड़ी कृपा होगी.

  4. ASHISH Says:

    Beautiful pics!
    Ashish

  5. seema gupta Says:

    नवरात्री पर्व पर “बोम्मई कोलु/गोलु की परम्परा से परिचय हुआ बेहद अच्छा लगा, कितनी सुन्दर मूर्तियाँ है ये छोटी छोटी
    regards

  6. राहुल कुमार सिंह Says:

    पहली बार तो देख कर ही मन मगन है, प्रतिक्रिया फिर से आकर लिखूंगा.

  7. vinay vaidya Says:

    काफ़ी रोचक जानकारी पढ़ने को मिली !
    शरण्या के गणेशजी भी दर्शनीय लगे !
    सादर,

  8. Sadhana Says:

    Very nice post!! After reading it, I would’nt dare comment on it with my ‘apun bolta’ type of hindi🙂.

    Incidentally, one of the other highlights of bommai golu is the visits by the women of the house to each other, collecting chundal, vethalai pakku and so on. This way it also becomes an occasion for the women to socialise and get together.

  9. cg swar Says:

    नवरात्र का अवसर इस वर्ष तब सफल हुआ जब आपके द्वारा उपलब्‍ध ये नई जानकारियां हमें मिलीं. वर्ना हर वर्ष उन्‍हीं पुरानी जानकारियों को नए अंदाज में प्रस्‍तुत किया जाता है्. धन्‍यवाद, बधई व शुभकामनाएं.

  10. rashmi ravija Says:

    बहुत ही बढ़िया जानकारी….तस्वीरें बहुत ख़ूबसूरत हैं.

  11. संजय बेंगाणी Says:

    हर पोस्ट भारतीयपन की नई जानकारी दे जाती है.

    कृष्णाष्ठमी पर खिलौने सजाए जाने की प्रथा है. यह भी कुछ कुछ ऐसा ही लगा.

  12. shikha varshney Says:

    इस उत्सव का नाम सुना था .आपकी पोस्ट से बहुत सी जानकारी प्राप्त हुई .और चित्र तो बहुत ही सुन्दर हैं .आभार यह उत्सव दिखाने का.

  13. प्रवीण पाण्डेय Says:

    उपयोगी जानकारी, खिलौनों के बारे में पढ़कर बचपन याद आ गया।

  14. Asha joglekar Says:

    Navratri utsaw ka ye wiwaran bahut achcha laga maharashtra men. Chaitra mas me poore mahina bhar haldi kumkum ka utsaw hot a hai tab aisee seedheeyon wali zankee banayee jatee hai. Durga Lksmi aur saraswati teeno kee pooja 3- 3 hotee hai ye naee bat pata chalee. humare yanha bhee Vijaya dashmi ke awasar par shastra pooja aur kitab kalam kee pooja hotee hai. is wistrut jankaree ka abhar.

  15. arvind mishra Says:

    तमिलनाडु में दशहरा आयोजन की रोचक जानकारी

  16. राज भटिया Says:

    आप ने तो हमे ध्न्य कर दिया, इतनी सारी जानकारी ओर वो भी चित्रो के संग, आप का धन्यवाद

  17. nirmla.kapila Says:

    बहुत अच्छी जानकारी है मैने तो पहली बार इस परंपरा के बारे मे सुना है। बहुत बढिया। धन्यवाद।

  18. Dr.S.K.Tyagi Says:

    रोचक जानकारी!!

  19. मनोज खत्री Says:

    एक नयी रीत से तारुफ्फ़ करवाने के लिए शुक्रिया..

    मनोज

  20. Kajal Kumar Says:

    मेरे लिए तो कई नई जानकारी हैं

  21. अशोक पाण्‍डेय Says:

    दक्षिण भारत में दशहरा मनाने के तरीके के बारे में जानकर बहुत अच्‍छा लगा। निश्चित तौर पर यह रिवाज भी हमारी संस्‍कृति का सकारात्‍मक पक्ष ही है। धर्म के साथ हमारी कलात्‍मकता भी जीवित रहती है।

  22. अल्पना Says:

    एक नयी जानकारी मिली .
    पूजा के लिए तैयार की गयी सीढ़ियों के अंक की/स्थान की भी विशेषता होती है ,सच में यह जानकारी अद्भुत है.
    कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि भारत के दक्षिण में आज भी हिंदू अपनी परम्पराओं को बखूबी निभा रहे हैं.

  23. Zakir Ali Rajnish Says:

    बहुत सुंदर। गु‍डियों का एक संग्रहालय दिल्ली में भी है। कभी उसके बारे में भी बताइएगा।
    …………….
    वर्धा सम्मेलन: कुछ खट्टा, कुछ मीठा।
    ….अब आप अल्पना जी से विज्ञान समाचार सुनिए।

  24. Puja Upadhyay Says:

    दशहरा के बारे में नयी जानकारी मिली. एक ही त्यौहार देश के अलग अलग हिस्सों में कितने तरीके से मनाया जाता है. दशहरा बचपन से हमारा भी पसंदीदा त्यौहार होता था. हम नानीघर जाते थे जहाँ कलश स्थापना होती थी. और नवमी को हमारा पसंदीदा दिन होता था…हालाँकि हम पूरे दशहरा बहुत कम पढाई करते थे.
    धन्यवाद इस अद्भुत जानकारी के लिए.

  25. ali syed Says:

    आप हमेशा नई जानकारी पोस्ट करते हैं ! यहां मौलिकता का कोई संकट नहीं !

  26. jc joshi Says:

    मैंने नवरात्रि में तमिलनाडु में गुड़ियों के सजाये जाने के बारे में ब्लॉगर कविता के माध्यम से कुछ वर्ष पूर्व जाना था http://indiatemple.blogspot.com/…इसके पीछे मेरे विचार से यह धारणा रही होगी की जैसे हम गुड़ियों से दिल बहलाने के लिए खेलते हैं, ‘माँ’ जगदम्बा भी अपने बच्चों से उसी प्रकार खेलती हैं! इस कारण हमें जीवन दृष्टा-भाव से ही जीना चाहिए!

  27. Gagan Sharma Says:

    सदा की तरह अनोखी जानकारी।
    गुड़ियां तो नहीं पर मिट्टी के दीप-दान या खिलौनों का चलन कयी जगह है।

    कल बहुत कोशिश के बावजूद खुल नहीं पाया था ब्लाग।

  28. भारतीय नागरिक Says:

    अरे वाह. बहुत सुन्दर तरीके से सजाया जाता है..

  29. Manish Kumar Says:

    शुक्रिया इस बेहतरीन जानकारी के लिए !

  30. राहुल कुमार सिंह Says:

    नवरात्रि के इस स्‍वरूप की ढेरों व्‍याख्‍या हो सकती है, किंतु श्री जेसी जोशी जी की सारगर्भित टिप्‍पणी से काफी बातें निकल सकती हैं. प्रदर्शिनी की वर्तनी पर एक बार विचार कर लें, उपयुक्‍त प्रतीत हो तो ‘प्रदर्शन’ संशोधन प्रस्‍ताव है.

  31. Sampath, Kochi Says:

    Dear PNS,

    Nice Post. Thanks for the information mainly on MARAPACHI. I have seen this and looks black in color but never knew that this is made of Red Sandalwood.

    In Kerala, Vijaya Dashami is mainly celebrated as Vidya Arambham (beginning learning of any art). On Dashami day, Children (elders too) write Shree Ganesh in RICE grain provided to them in a plate. Probably this will reply Shri Bharat Bhushan’s comment.

    Congrats to Sharanya for her contribution.

  32. Smart Indian - अनुराग शर्मा Says:

    अति सुन्दर!

  33. नरेश सिंह Says:

    is naveen aur rochak jankaaree hetu apkaa bahut abhaar

  34. sanjay aneja Says:

    सर, एक दम नई जानकारी मिली। हमने ऐसी सज्जा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर ही देखी है। अपने ही देश के दूसरे हिस्सों की परंपरायें, रस्में, रीति रिवाज आपके ब्लॉग से जानने को मिलते हैं, बहुत आभारी हैं आप के। आज की इस पोस्ट का श्रेय लेकिन आपको शरण्या जी से शेयर करना होगा, हमारा धन्यवाद उनतक जरूर पहुंचाइयेगा।

  35. ashu Says:

    i like it very much… in this site i am able to access a lot of untouched unknown things of our culture

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