Archive for दिसम्बर, 2010

तिरुकुरल के प्रणेता तिरुवल्लुवर

दिसम्बर 10, 2010

महान आत्माएं या जितने भी महान लोग धरती पर अवतरित हुए है, वे धर्म, जाति आदि, मानव द्वारा बनाये गए बंधनों से पूर्णतः मुक्त होते हैं. कोई ठोस प्रमाण तो नहीं हैं परन्तु भाषाई आधार पर एक महान कवि तिरुवल्लुवर, के काल का अनुमान  ईसापूर्व ३० से २०० वर्षों के बीच माना जाता है. उनकी रचना “तिरुकुरल” के नाम से जानी जाती है. यह एक ऐसा ग्रन्थ है जो नैतिकता का पाठ पढाता है. किसी धर्म विशेष से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है. गीता के बाद विश्व के सभी प्रमुख भाषाओँ में सबसे अधिक अनूदित ग्रन्थ है. तिरुकुरल तीन खण्डों में बंटा है. “अरम” (आचरण/सदाचार),  “परुल” (संसारिकता/संवृद्धि) तथा “इन्बम”(प्रेम/आनंद). कुल १३३ अध्याय हैं और हर अध्याय में १० दोहे हैं. संयोग की बात है कि वाल्मीकि की तरह इनका  जन्म भी एक दलित परिवार में ही हुआ था. मान्यता है  कि वे चेन्नई के मयिलापुर से थे परन्तु उनका अधिकाँश जीवन मदुरै में बीता क्योंकि वहां पांड्य राजाओं के द्वारा तामिल साहित्य को पोषित किया जाता रहा है और उनके दरबार में सभी जाने माने विद्वानों को प्राश्रय दिया जाता था. वहीँ के दरबार में तिरुकुरल को एक महान ग्रन्थ के रूप में मान्यता  मिली.

प्रस्तुत हैं इसीके दो छंद.

” जैसे पानी जिस मिटटी में वो बहता है उसके अनुसार बदलता है , इसी प्रकार व्यक्ति अपने मिलने वालों के चरित्र को आत्मसात करता है.” ” यहाँ तक कि उत्तम पुरुष जो मन की पूरी अच्छाई रखता है वह भी पवित्र संग से और मजबूत होता है.”

शैव, वैष्णव, बौद्ध तथा जैन सभी तिरुवल्लुवर को अपना मतावलंबी मानते हैं, जबकि उनकी रचनाओं से ऐसा कोई आभास नहीं मिलता. यह अवश्य है कि वे उस परम पिता में विश्वास रखते थे. उनका विचार था कि मनुष्य गृहस्थ रहते हुए भी परमेश्वर में आस्था के साथ एक पवित्र जीवन व्यतीत कर सकता है. सन्यास उन्हें निरर्थक लगा था.

तिरुकुरल के १३३ अध्यायों को ध्यान में रखते हुए कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक के पास के एक छोटे चट्टानी द्वीप पर इस महान कवि की १३३ फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गयी है. यह  आजकल वहां का प्रमुख आकर्षण बन गया है. प्रतिमा की वास्तविक ऊँचाई तो केवल ९५ फीट है परन्तु वह एक ३८ फीट ऊंचे मंच पर खड़ा है. यह आधार उनके कृति तिरुकुरल के प्रथम  खंड सदाचार का बोधक है. यही आधार मनुष्य के लिए संवृद्धि तथा आनंद प्राप्त करने के लिए आवश्यक है. १९७९ में इस स्मारक के लिए तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई द्वारा आधारशिला रखी गयी थी परन्तु कार्य प्रारंभ न हो सका. सन २००० में जाकर यह स्मारक जनता के लिए खोला गया था.

कहा  जाता है कि इस प्रतिमा के कमर  में जो झुकाव  (नटराज जैसा) दर्शाया गया है, उसके लिए मूर्तिकार को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी. प्रतिमा की भव्यता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि केवल चेहरा ही १९ फीट ऊंचा है.  इस प्रतिमा के निर्माण से सम्बंधित अधिक जानकारी यहाँ उपलब्ध है.

वन्य प्राणी सप्ताह

दिसम्बर 1, 2010

उन दिनों हम कक्षा ९ वीं के क्षात्र थे. वन्य प्राणी सप्ताह मनाया जा रहा था. स्कूली  क्षात्रों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं  का आयोजन वन विभाग के द्वारा कराया जा रहा था. निबंध, कवितायेँ, छाया चित्र, पेंटिंग आदि की. हमारे पास तो नया नया डब्बा कैमरा था ही. सोचा हमें भी इस अवसर पर कुछ करना चाहिए. अब जंगली जानवर की तस्वीर कैसे खींच पाते. तभी ख्याल आया की जगदलपुर के राज महल के अन्दर एक बाड़े में बहुत सारे हिरन पल रहे थे. पास के बड़े हौज़ में रंगीन मछलियाँ भी थीं. निकल पड़े राज महल की ओर अपना डब्बा लिए. अन्दर जाने पर बड़ी निराशा हुई. हिरन तो थे पर ऊंची  जालियां व्यवधान डाल रही थीं.  चित्र लिए जरूर थे परन्तु बात नहीं बनी.

धुन तो सवार था ही. दो दिन बाद  किसी ने बताया कि महल में एक तेंदुआ लाया गया है.  भागे फिर राज महल की ओर.  महल के मुख्य  दरवाज़े से घुसने पर पहले दंतेश्वरी मंदिर पड़ता है उसके बाद बायीं ओर ही एक बड़ा लकड़ी का दरवाज़ा था. उसके अन्दर बहुत से मकान आदि बने थे.  हमें उसी रास्ते से अन्दर जाना पड़ा. एक जगह राजा के गाड़ियों के लिए गिराज बने थे. वहीँ पिंजड़े में तेंदुआ था. उसकी देख रेख के लिए एक आदिवासी युवा भी तैनात था. वास्तव में वह तेंदुवे का बच्चा था. अब तस्वीर कैसे लें. पिंजड़े की सलाखें सब चौपट कर रही थी. अगल बगल देखा तो एक बाड़ा  दिखा जो ऊंची दीवार से घिरा था. उसके प्रवेश द्वार से झाँकने पर अन्दर भुट्टे के पौधे लगे थे. ऊंचे भी हो गए थे. हमने उस युवा आदिवासी को फुसलाया. एक दुवन्नी उसे पकडाई. वह सहयोग करने के लिए तैयार हो गया. तेंदुवे के बच्चे के गले में सांकल बंधी थी. हमारे साथ एक दोस्त भी था. हम लोग उस बाड़े में घुस गए और फोटो खींचने के लिए अपनी पोजीशन ले ली. सांकल थामे आदिवासी तेंदुवे को बाड़े  में ले आया. फोटो खींचने पर सांकल भी दिख पड़ेगी यह सोच उस आदिवासी से आग्रह किया कि उसे छोड़ दे. वह नहीं माना तब हमने कहा तू एक किनारे बैठ जा और सांकल को जमीन पर रख दे. बड़ी मशक्कत के बाद तीन तस्वीरें खींच ही ली.  और उनमें दो तो आउट ऑफ़ फोकस हो गयीं परन्तु सौभाग्यवश एक ठीक ठाक थी. उसे ही हमने प्रतियोगिता में प्रविष्टि के रूप में जमा करवा दिया था.  पूरे जिले में हमें तृतीय स्थान ही मिल पाया, जिसका हमें अफ़सोस रहा. अब निर्णायकों ने तस्वीर की गुणवत्ता देखी होगी परन्तु उसके पीछे जो हमारी दौडधूप रही उसका तो उन्हें अंदाज़ नहीं रहा होगा. खैर पुरस्कार में एक बड़ा सा बण्डल मिला. वन विभाग एवं प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ढेर सारी पुस्तकें.

नीचे एक और फोटो है. काश यह जंगली जानवर कहला सकता. इस तस्वीर को लेने के लिए हमने सबसे पहले फ्लेश गन का प्रयोग किया था. हर बार एक बल्ब लगाना पड़ता था जो सस्ती नहीं हुआ करतीं थी.