Archive for जनवरी, 2011

पद्मनाभपुरम

जनवरी 31, 2011

ब्रिटिश शासन काल में केरल का वर्त्तमान भूभाग तीन हिस्सों में बंटा हुआ था. उत्तरी हिस्सा जो मलाबार कहलाता था वह कभी केलिकट के ज़मोरिन (सामूदिरी) के आधीन था. टीपू सुलतान की सेना का सामना नहीं कर सका था अतः अपने स्वजनों को सुरक्षित जगह भेज अपने महल में आग लगा कर आत्म हत्या कर ली थी. अंग्रेजों ने टीपू को हराकर मालाबार को मद्रास प्रान्त का हिस्सा बना लिया. अतः उन दिनों मालाबार में सीधे अंग्रेजों का ही प्रशासन था. मालाबार को छोड़ दें तो केरल में अंग्रेजों के आधीन दो स्वतंत्र रियासतें थीं. मध्य भाग में कोचीन स्टेट जिसकी राजधानी कोचीन के निकट तिरुपुन्नीतरा में थी. दक्षिणी केरल  त्रावनकोर (तिरुविदान्गूर) कहलाता था जिसकी राजधानी तिरुवनन्थपुरम  रही. सन १५९२ से १६०९ तक इरविपिल्लई इरविवर्मा  कुलशेखर पेरुमाल नामक राजा  त्रावनकोर का शसक था. उसी के शासनकाल में पद्मनाभपुरम के किले के अन्दर एक राज प्रसाद बनवाया गया था. १४ वीं सदी के भी वहां कुछ निर्माण रहे हैं. एक आवासीय परिसर, जिसका प्रयोग पूर्ववर्ती राजाओं के द्वारा किया जाता रहा. यह किला ग्रेनाईट पत्थर का बना हुआ है जो लगभग ४ किलोमीटर लम्बा है. पश्चिमी घाट पर्वत श्रंखला के वेळी नामक पहाड़ के वृष्टिछाया  में तथा वल्ली नामकी नदी के किनारे बने होने के कारण  चारों तरफ का प्राकृतिक सौन्दर्य भी जबरदस्त है.    उन दिनों त्रावनकोर की राजधानी यहीं पर थी जो सन १७९५ में तिरुवनन्थपुरम स्थानांतरित हो गयी.

यह घडी पिछले ३०० साल से चल रही है

मजे की बात है कि यह कवेलू वाला महल तामिलनाडू में है और  तुक्काले नामक नगर से लगा हुआ है हालाकि राजप्रसाद का स्वामित्व और प्रशासन केरल शासन के ही आधीन है. राज्यों के पुनर्गठन  में केरल का कुछ हिस्सा तामिलनाडू को आबंटित कर दिया गया था और इसमें कन्याकुमारी भी शामिल है. कवेलू वाला महल कह कर हमने अपनी पहली प्रतिक्रिया दी थी.जब हम किसी अनदेखी जगह जाते हैं और हमें वहां एक महल की प्रतीक्षा रहती है तो मानस पटल पर एक पूर्वाग्रह सा बन जाता है. रन्तु इस महल को केरल के पारंपरिक स्थापत्य एवं वास्तुकला  का एक अनुपम उदाहरण माना जाता है. अन्दर से उसके विशाल क्षेत्र का तथा वहां के संग्रहालय का अवलोकन करने पर बात समझ में आती है. शीशम के लकड़ी का बना है और उस पर की गयी कारीगरी तो अप्रतिम है. फर्श एकदम चिकनी और चका चक. किसी विशेष विधि से निर्मित, जिसको दोहराया नहीं जा सका है.

यह मंत्रशाला है. यहाँ राजा मंत्रणाएं किया करते थे

यह भोजनशाला है. यहाँ १००० लोगों को एक साथ भोजन करने की सुविधा है

कटहल के एक ही  तने से बना कलात्मक स्तम्भ

कई औषधीय वृक्षों के काष्ट से बनी पलंग

पद्मनाभपुरम, तिरुवनन्थपुरम से राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच  ४७  पर ५५ किलोमीटर की दूरी पर कन्याकुमारी जाने वाले रस्ते पर ही पड़ता है. पद्मनाभपुरम जाने वाले रास्ते में एक और आकर्षण भी है. एक सुन्दर जलप्रपात. नाम है “तिर्पारप्पू” जो कुलशेखर नामक गाँव से लगा है. यहाँ जाने के लिए तिरुवनन्थपुरम से राष्ट्रीय राजमार्ग पर ४० किलोमीटर की दूरी पर “मार्तान्डम” पड़ता है. यहाँ से मुख मार्ग को छोड़ कर बायीं ओर १० किलोमीटर की दूरी पर यह प्रपात है.

यहाँ सैलानी स्नान का आनंद उठाते हैं. बच्चों के लिए एक स्विम्मिंग पूल बनायीं गयी है (अभी अभी). वहां के उद्यान भी बड़े मनमोहक हैं. यहाँ कुछ समय बिताना, परिवार के आनंद को द्विगुणित कर देगा. अब यहाँ से सीधे चलकर पद्मनाभपुरम में ही रुकेंगे. जलप्रपात का आनंद उठाने के लिए २० किलोमीटर का अतिरिक्त भार पड़ेगा.

कुछ उपयोगी लिनक्स:
१. केरल पर्यटन विकास निगम
२. गूगल का नक्शा

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जयपुर (उडीसा) – “बचपन के दिन भी क्या दिन थे”

जनवरी 21, 2011

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से लगभग ७५ किलोमीटर पूर्व में एक शहर है जयपुर  (Jeypore). वहां के स्थानीय लोग जोयोपुर कहते हैं. वैसे उड़िया भाषियों को “ओ” से बड़ी आत्मीयता है.  यह है तो उडीसा के  कोरापुट जिले में,  परन्तु यह कोरापुट से काफी बड़ा है. दक्षिणी उडीस का यह एक महत्वपूर्ण  व्यापारिक केंद्र भी है. समुद्र की सतह से २१६५ फीट की ऊँचाई पर, पूर्वी घाट श्रृखला के  हरे भरे पहाड़ों से, घोड़े की नाल की तरह तीन ओर से  घिरा यह एक सुन्दर शहर है. यहाँ एक बहुत ही बड़ा तालाब है जिसे जगन्नाथ सागर कहा जाता है.

जगन्नाथ सागर

आज़ादी के पूर्व यह एक देसी रियासत की राजधानी भी रही. यहाँ पुराने किले के खँडहर तथा रजवाड़ा इस बात के  द्योतक हैं  कि इस शहर का इतिहास भी संपन्न  रहा है.इस शहर को राजा विनायक देव द्वारा  सन १४५० में बसाये जाने का उल्लेख मिलता है जब कि वास्तव में यह उससे कहीं अधिक प्राचीन है.

रजवाड़े का सिंहद्वार


८ वर्ष की अवस्था में हमें यहाँ आना पड़ा था और यहाँ की स्थानीय भाषाओँ को सीखना पड़ा. वैसे उडीसा में होने के कारण यहाँ ज्यादातर लोग उड़िया बोलते हैं परन्तु तेलुगु बोलने वालों की भी बहुत बड़ी आबादी है. हिंदी बोलने वाले भी कम नहीं हैं. अतः इस नगर को कास्मोपोलिटन कह सकते हैं. यहाँ हर व्यक्ति तीनों भाषाओँ में वार्तालाप करने में सक्षम है.

इस शहर से भी मेरे बाल काल के बहुतेरे अनुभव जुड़े हैं. इस शहर के पूर्व में  एक बड़ा पहाड़ है. शीर्ष पर एक लोहे का खम्बा भी था, किसी राजा के द्वारा लगाया गया, परन्तु अब दिख नहीं रहा.   हम अपने कुछ साथियों के साथ दुपहर में निकल पड़े थे उसी पहाड़ की तरफ. चाह रहे थे कि उस खम्बे को छू आयें. रास्ते में खाने के लिए अंग्रेजी इमली (गंगा इमली) के कंटीले पेड़ भी बहुत सारे थे. तो पत्थर  या किसी डंडे को फ़ेंक फ़ेंक कर बहुत सारी इमलियाँ तोड़ ली थीं. बहुत चलने के बाद हम उस पहाड़ की तलहटी में थे. चढ़ाई भी शुरू कर दी.  कुछ ऊपर जाने के बाद  समतल सी जमीन भी मिली.  वहां खजूर के पेड़ों का झुरमुट  भी था. पेड़ भी पुराने और बहुत सारों के तने तो खोखले हो गए थे. मटरगश्ती करते आगे बढ़ ही रहे थे.  जमीन में  मानव के अस्ति  पंजर बिखरे पड़े थे.   कई  खोपड़ियाँ भी दिखीं. अचानक एक खजूर के खोखले तने पर नज़र पड़ी. हमारी पेंट गीली हो गयी. पेड़ के खोल में एक मानव था. लाश ही रही होगी. हम सब वहां से दौड़ पड़े और पहाड़ के दाहिनी ओर से सोमरतोटा के शिव मंदिर जा पहुंचे. देर शाम घर भी आ गए थे. ज्वर से पीड़ित. दो दिनों तक बुखार नहीं उतरा था.

यकीनन वह स्थल  वहां के आदिवासियों  का श्मशान ही था. अब समझ में आया है कि यह Tree Burial ही था परन्तु वहां के आदिवासियों में ऐसे किसी परंपरा की जानकारी नहीं है. वह कोई अपवाद स्वरुप किसी विशेष परिस्थिति में किया गया होगा.

एक बार अस्पताल जाते हुए पुलिस थाने के ठीक सामने सड़क के उस पार कुछ पुलिस वाले कबूतर को थामे हुए थे. एक कबूतरखाना खम्बे पर बना हुआ था. मेरे लिए तो यह कौतूहल का विषय था ही, सो हम भी उस कम्पौंड में घुस गए परन्तु हमें भगा दिया गया. वहां कबूतरों के माध्यम से जिला मुख्यालय कोरापुट तक सन्देश पहुंचाए और प्राप्त किये जाते थे. मैंने कई बार उनकी प्रक्रिया को जानने की कोशिश की थी. कबूतर के पाँव में कुछ बाँधा जाता था और दो कबूतर एक  साथ उड़ जाते थे. कबूतरों के माध्यम से संदेशों के आदान प्रदान को देखने का  यह मेरा पहला और अंतिम अवसर रहा है.

जीवन में सबसे पहले इसी शहर में मुझे कुत्ते ने काटा था. गिरिजेश जी यदि पढेंगे तो बड़े प्रसन्न होंगे. संयुक्त परिवार था. घर में किसी की बीमारी के लिए मुझे अस्पताल से दवा लाने के लिए कहा गया. पर्ची तो पहले से बनी थी. मुझे केवल वहां दिखाना भर था और कॉमपाउंडर द्वारा  दवा दी जाती थी. हुआ यों कि रस्ते में पुलिस थाने के पास बड़े इमलियों के पेड़  के नीचे कुछ सोडा बेचने वाले खड़े थे. एक दो पहिये वाली गाडी जिसमे अनेकों बोतल रखने के खांचे बने होते थे. उसमें हत्ता बना होता था जिसे पकड़ कर वे कहीं भी ठेलते हुए जा सकते थे. एक कुत्ता ठेले के पास आकर बोतलों को सूंघने लगा. मैं पास से गुजर रहा था. ठेले वाले ने कुत्ते को भगाने की बहुत कोशिश की और अंत में नीचे पड़े एक ईंट के टुकड़े से कुत्ते को दे मारा. ईंट का टुकड़ा कुत्ते को जम कर लगा और मेरे पास ही आ गिरा. मैं अपने आप को बचाने के लिए कुछ भागा इतने में कुत्ते ने मेरी टांग दबोच ली. मांस का  एक बड़ा टुकड़ा उसने बेरहमी से उखाड़ दिया. मैंने हाथ में पकडे हुए बोतल से उसके सर पर कई प्रहार किये तब कही उसने मुझे छोड़ा लेकिन तुरंत ही फिर जांघ  पर हमला कर दिया. इस बीच लोग आ गए. मैं  सड़क पर गिर पड़ा था, लहू लुहान. अस्पताल पास ही था तो लोगोंने मुझे वहां पहुंचा दिया. प्राथमिक चिकित्सा से काम नहीं बना तो मुझे अन्दर टेबल पर उलटे लिटा कर कटे फटे हिस्से की सिलाई कर दी. सुई में घोड़े के बाल का प्रयोग हुआ था. अब १४ इंजेक्शन का सवाल था. वह दवा जयपुर में उपलब्ध नहीं थी. हमारे एक मामाजी हमें बस में बिठा कर कोरापुट ले गए,  वहां के जिला अस्पताल में. उनके सुई के आकार को देखकर ही मेरे होश उड़ गए. हम लंगडाते हुए भाग खड़े हुए लेकिन सफल नहीं हो सके. पहली सुई तो पेट में नाभि के पास लगी परन्तु जैसा हम सोच रहे थे उतना दर्द नहीं हुआ. यह सिलसिला हर रोज चला. केवल १३ इंजेक्शन ही लग पाए. दवा ख़त्म हो गयी. क्योंकि एक लगना रह गया था, कभी कभी अपना असर दिखा देता है.