भारत में प्राचीनतम मस्जिद

स्नेही पाठकों के लिए नव वर्ष की ढेरों शुभकामनाएं

बात १९५६/५७  की है. उस समय हमारी उम्र कोई १५ वर्ष की रही होगी. हम गर्मी की छुट्टियों में केरल में अपने घर पालियाकरा  गए हुए थे. दुपहर खाने के बाद बरामदे  में आराम कुर्सी में बैठ अंग्रेजी अखबार “इंडियन एक्सप्रेस” पढ़ रहे थे. रविवार के परिशिष्ट में दो जगहों का विस्तृत विवरण दिया था. कोडुनगल्लूर (Cranganore)  (यही मुज़रिस नामका प्राचीन बंदरगाह था)  के चेरमान मस्जिद के बारे में कहा गया था कि यही एक ऐसी मस्जिद है जहाँ लोग पूर्व दिशा की ओर रुख कर नमाज़ अदा करते है और यह भी कि यह भारत की सबसे पुरानी मस्जिद है.  यहाँ एक बहुत बड़ा कांसे का दिया भी है जिसे प्रज्वलित रखा जाता है. दूस्ररा लेख सबसे पुराने यूरोपीय भवन के बारे में था जो डच लोगों के द्वारा बनवाया गया था. यह एक छै  भुजाओं वाला    बुर्ज था जिसपर से समुद्र पर निगरानी रखी जाती थी. हमने दोनों आलेख अपने पिताश्री को दिखाए. उन्हें उनकी जानकारी थी. उन्होंने कहा यहाँ से नजदीक ही है, जाकर देख आवो . आवश्यक हिदायते भी दीं.

मई /जून के महीने थे, परन्तु  बारिश होती थी. हम एक छाता  ले निकल पड़े थे. बस स्टॉप पर बस भी मिल गयी. एक जगह बस बदलनी पड़ी क्योंकि सीधी बस सेवा हमारे घर से नहीं थी. कोडुनगल्लूर पहुँच कर हमने पूछ ताछ किया. हमारी मात्रुभाषा तामिल है जिसे हम अच्छे से जानते थे परन्तु स्थानीय भाषा मलयालम में काम भर चला पाते थे. हमारी वेश भूषा और भाषा से लोग समझ जाते थे कि यह परदेसी है. वेश भूषा की बात आई तो बता ही दूं कि फुल पेंट  पहनने वाला मैं अकेला ही था. किसी और को हमने नहीं देखा था. मदद करने के मामले में लोग मुझे भले लगे. लोगोंने बताया कि वह मस्जिद कोटपुरम  वाले रस्ते में पड़ता है. कोटपुरम अर्थात वह स्थल जहाँ एक किला है. यह सुन हमें और भी अच्छा लगा कि चलो एक किला भी देख लेंगे. उस मार्ग पर बसों का संचालन कम ही था और दूरी ३ किलोमीटर. हम तो पैदल ही चल पड़े. ३०/४० मिनटों में हमारी तलाश पूरी हुई. सड़क की दाहिनी ओर  ही एक जर्जर मकान सा था. गेट पर ही लिखा था “चेरमान पेरुमाल मोस्क – सन ६२९ में निर्मित”  बगल में ही एक छोटा कब्रस्तान भी था. अन्दर घुसते ही हमें एक दाढ़ी वाला मिला. हम समझ गए कि यह यहाँ का रखवाला ही होगा. उसने कोई रोक टोक नहीं की और हमने उस मस्जिद के अन्दर पूरी छान बीन की.  काजी के लिए सुन्दर सा पुल्पित बना था और फर्श पर कालीन डली थी. मस्जिद के अन्दर भी कब्रें थी.  अन्दर के एक छोटे कमरे में एक मोटे बीम से विशालकाय कांसे का दिया लटक रहा था जिसमें कोई बाती नहीं थी. जैसा केरल के मंदिरों का रिवाज़ था, वैसे ही यहाँ भी हमने एक छोटा तालाब या बड़ी बावड़ी देखी  जिसका पानी गन्दा सा लग रहा था. वैसे इस जगह को “मेथला” गाँव कहा जाता है परन्तु यह चेर राजाओं की राजधानी तिरुवंचिकुलम से लगा हुआ है. इस जगह का नाम कभी महोदयपुरम भी था.

अब क्योंकि मस्जिद को देख ही लिया था तो आगे बढ़ गए, कोटपुरम  की तरफ चलते चलते हम पहुँच गए समुद्र के पास. वास्तव में वह बेक वाटर्स ही था. वहां बायीं तरफ ही एक पुराने किले के खँडहर दिखे. यही डच लोगों का कभी किला था और कृष्णमकोटा   भी कहलाता है. सामने एक द्वीप सा था और जाने के लिए नावें भी थीं, सो हम नाव में  चढ़ बैठे और केवल जाने और आने का आनंद ही लिया. वह द्वीप “परवूर” थी जहाँ यहूदियों के पद छाप मिलते हैं. हमें क्या मालूम था.  डच लोगों द्वारा बनाया गया बुर्ज  एक और द्वीप में है जिसे वैपिन कहा जाता है. अब क्योंकि समय की कमी थी सो वापस चल पड़े.

कोडुनगल्लूर के तिगड्डे पर ही हमें एक छोटा होटल दिख पड़ा. बड़ी भूक लगी थी. वहां खाए गए डोसा और चटनी का स्वाद अब तक भुलाया नहीं जा सका है. यहीं से बस भी मिल गयी और वापस  घर  आ गये थे. पिताश्री को पूरा विस्तार से बताया. चेरमान  पेरुमाल मस्जिद के बारे में मेरी बातों को सुनकर उन्होंने सहज ही कह दिया था कि उस मस्जिद के बारे में जो बातें कही जाती हैं वह सही भी है और स्वाभाविक भी. उन्होंने ही बताया था कि यवनों के अतिरिक्त कोडुनगल्लूर में मसालों के व्यापार से जुड़े अरबी लोगों का भी डेरा था. उन्होंने राजा से आग्रह किया कि प्रार्थना के लिए उन्हें कोई जगह दी जाए. राजा ने एक प्रार्थना स्थल (अरतली) खाली कराकर उन्हें दे दिया. उस समय तो इस्लाम भी नहीं था. वे उस भवन में अपने तरीके से पूजा पाठ करते थे. बाद में जब इस्लाम आया तो वही जगह मस्जिद कहलाई. वहां के लोगोंने अपनी कुछ परम्पराओं को जीवित रखा. प्रति वर्ष इस मस्जिद में बच्चों के विद्याभ्यासके (‘ओड़ा-मासी-ढम‘)  आयोजन का रिवाज़ भी है.

एक किंवदंती के अनुसार, अंतिम चेर राजा चेरमान पेरुमाल (यह उपाधि है, नाम नहीं) जब एक चांदनी रात को अपने महल के छत पर टहल रहा था तो उसे आसमान पर चन्द्रमा दो टुकड़ों में दिखाई दिया. एक दूसरी जगह बताया गया है कि उसे यह सपना आया था. सपने वाली बात जच रही है क्योंकि केरल में छत नहीं हुआ करते थे. खपरैल होती थी. अब राजा को चाँद के दो टुकड़ों में दिखने  का कारण समझ में नहीं आया. राज दरबार में भी कोई समाधान पूर्वक उत्तर नहीं दे सका. एक अरब व्यापारियों का प्रतिनिधि मंडल राजा से मिलने आया था और राजा ने दो टुकड़ों में चाँद के देखे जाने के बारे में अपनी बात रखी. उन अरबों ने बताया कि यह पैगम्बर मुहम्मद का कमाल था. राजा ने मन ही मन पैगम्बर से मिलने की ठानी. अपने राज्य को अपने ही सामंतों में विभाजित कर दिया और मक्का के लिए रवाना हो गया. वहां जाकर पैगम्बर मुहम्मद से मुलाकात की और इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया. अब वो ताजुद्दीन  कहलाये परन्तु उन्होंने अपने आप को अब्दुल्ला सामूदिरी कहलाना पसंद किया था. जद्दा के शासक की बहन से निकाह भी किया. घर वापसी के दौरान गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तो उन्होंने पैगम्बर मुहम्मद के एक अनुयायी मलिक बिन दीनार को एक ख़त देकर कोडुनगल्लूर भिजवा दिया. ओमन  सल्तनत के तहत अरब सागर के किनारे सलाला में राजा स्वर्गवासी हुआ. इधर मलिक बिन दीनार जब कोडुनगल्लूर पहुंचा तो उसकी अच्छी आवभगत हुई और उसने ही वहां सन ६२९ में प्रथम मस्जिद की स्थापना की. वही वहां का पहला क़ाज़ी भी बना. इसके बाद मलिक बिन दीनार केरल में अन्यत्र इस्लाम की स्थापना में लग गया और अपने पुत्र हबीब बिन दीनार को चेरमन पेरुमाल मस्जिद का क़ाज़ी बना दिया. वहां परिसर में ही जो दो पुरानी कब्रें हैं उन्हें हबीब बिन दीनार और उसकी पत्नी ख़ुमरिया बी का माना जाता है.

इस किंवदंती का उल्लेख १६ वीं सदी में शेख जैनुद्दीन द्वारा लिखे तुहाफत-उल-मुजाहिदीन में मिलता है परन्तु उन्होंने भी उस कहानी की ऐतिहासिकता पर विश्वास नहीं किया था.

जिस चेर वंश के अंतिम शासक के इर्द गिर्द  ऊपर की  किंवदंती है, वह राम वर्मा कुलशेखर था और इस राजा का शासन काल १०९० से ११०२ तक रहा.

नोट: लगता है कुछ गड़बड़ी हुई है. जिस लटके हुए दिए को हमने देखा था वह एक अलग कमरे में थी न की हाल में. उस दिए में इतना अलंकरण भी नहीं था. इससे बड़ी भी थी. यह मेरा भ्रम नहीं है क्योंकि वर्त्तमान दिए में आधुनिक मलयालम में लिखा है “तूकविलक्कु  (लटकाने वाला दिया) कोडुनगल्लूर किज्हकेपुरा (पूर्व दिशा की बस्ती)”.
अदला बदली निश्चित रूप से हुई है.

 

35 Responses to “भारत में प्राचीनतम मस्जिद”

  1. राहुल सिंह Says:

    मंदिर, मस्जिद, गिरजा की चर्चा बिना सौहार्द्र के नारों के किस तरह की जा सकती है और ब्‍लॉगिंग अगर निजी डायरी है तो यह पोस्‍ट डायरी लिखने का सलीका भी बता रही है. स्‍थायी महत्‍व की पोस्‍ट.

  2. विष्‍णु बैरागी Says:

    अनूठी जानकारी दी है आपने। ऐसी मस्जिद तो कल्‍पनातीत है।

  3. Dr.ManojMishra Says:

    बेहतरीन जानकारी दी आपनें.
    नव वर्ष शुभ हो.

  4. vinay vaidya Says:

    वाह सुब्रमणियन्‌ साहब,
    इतने पुराने समय की प्रामाणिक जानकारी के लिये
    कितना श्रम और धन खर्च करना ज़रूरी होता, फ़िर
    भी वह कितनी विश्वसनीय होती ।
    मित्रों को आपसे अनायास प्राप्त होनेवाली इस रोचक
    जानकारी के लिये आभार,
    सादर,

  5. Satish Chandra satyarthi Says:

    आपका ब्लॉग अपने आप में एक संग्रहालय है… ह्रदय से धन्यवाद..

  6. नरेश सिंह राठौड़ Says:

    संकलन हेतु बढ़िया पोस्ट | नव वर्ष आपके लिए मंगलमय हो |

  7. राज भाटिया Says:

    वाह जी आप की यह जानकारी बहुत अच्छी लगी, ब्लागिगं का यही तो लाभ हे, लगता हे अब तो केरला देखना ही पडेगा, धन्यवाद,
    आप सब को नये वर्ष की ढेरो शुभकामनऎं

  8. rekha srivastava Says:

    संस्कृति के प्राचीन स्तंभों से परिचित करने के लिए आप बधाई के पत्र हैं. इससे हम अपने देश के हर कोने से और उसमें संरक्षित हर ऐतिहासिक स्तम्भ से परिचित हो रहे हैं. बहुत बहुत धन्यवाद .
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.

  9. संजय @ मो सम कौन? Says:

    राहुल सिंह जी के कमेंट से अक्षरश: सहमत। आपके ब्लॉग पर विभिन्न धर्मों से संबंधित जानकारी प्राप्त करना अच्छा भी लगता है, सहज भी। ऐसा लगता है कि अपने देश की वैविध्य लिये संस्कृति को ही जान रहे हैं, वहीं अनावश्यक रूप से झंडा-डंडा उठाये टोली जब हम जैसों के मेलबाक्स में भी अपने मेल भेज देते हैं तो उन्हें पढ़े बिना डिलीट करने में दूसरा पल नहीं लगता।
    एक बार फ़िर से उम्दा जानकारी, आभार स्वीकार करें। इस ब्लॉग को जानने के बाद, ब्लॉगिंगक्या है, स्पष्ट हो जाता है।

  10. Indranil Bhattacharjee Says:

    मंगलमय नववर्ष और सुख-समृद्धिमय जीवन के लिए आपको और आपके परिवार को अनेक शुभकामनायें !
    बेहतरीन जानकारी दी आपनें !

  11. प्रवीण पाण्डेय Says:

    केरल में प्राचीनतम वैदिक धर्म, प्राचीनतम मस्जिद और प्राचीनतम गिरजाघर स्थित हैं, साथ ही साम्यवाद की गहरी पैठ। सच में ऐसा तो भगवान के अपने ही घर में ही हो सकता है।

  12. RAJ SINH Says:

    Happy New Year PNS jee !

  13. अभिषेक मिश्र Says:

    एक बार फिर महत्वपूर्ण जानकारी, देश की एक विरासत के बारे में. धन्यवाद.

  14. भारतीय नागरिक Says:

    बहुत सुन्दर व्रर्णन. बाकी सबकुछ राहुल जी ने कह ही दिया..

  15. अल्पना Says:

    आप के इस लेख में इस स्थान के बारे में कुछ और नयी जानकारियाँ मिलीं.
    राजा के छत पर टहलने वाली किवदंती रोचक लगी.
    पिछले साल इसके बारे में मैं ने भी पढ़ा और लिखा था.

    वहाँ रखा कांसे का दीपक …कहते हैं हज़ार साल से जल रहा है.

    सुन्दर चित्र.

    आभार.

  16. अल्पना Says:

    आप के इस लेख में इस स्थान के बारे में कुछ और नयी जानकारियाँ मिलीं.
    राजा के छत पर टहलने वाली किवदंती रोचक लगी.
    पिछले साल इसके बारे में मैं ने भी पढ़ा और लिखा था.

    वहाँ रखा कांसे का दीपक …कहते हैं हज़ार साल से जल रहा है.

    सुन्दर चित्र.

    आप को भी सपरिवार नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    आभार.

  17. jc joshi Says:

    केरल के सेकुलर वातावरण की एक झलक को सत्तर के दशक में देखा था (जब हम कुछ भारतीय भूटान में एक परियोजना के निर्माण से सम्बंधित कार्य हेतु एकत्रित हुए थे): वहाँ से इदुक्की परियोजना में काम किये हिन्दू, क्रिस्तान, और मुस्लिम इंजीनियर भी आये हुए थे …

    नव वर्ष ब्लॉग संसार, आपके और आपके परिवार के सभी सदस्यों के लिए मंगलमय हो!

  18. Gyandutt Pandey Says:

    बहुत अच्छा लगा जानना। यह भी समझ आया कि ब्लॉगर अपने बचपन से जो समेटे रहता है, वह अब इस अनूठे माध्यम से परिमार्जित अवस्था में नेट पर आता है।
    आपके प्रति बहुत इज्जत है मन में!

  19. हरि जोशी Says:

    रोचक। नववर्ष आपको और आपके परिवार के सभी सदस्‍यों को शुभ और मंगलमय हो

  20. Bharat Bhushan Says:

    मैं आपको मलयालम भाषी समझता था. भूल सुधार हुई. हमेशा की तरह आपने बहुत बढ़िया शब्दचित्र खींचा है मस्जिद का. ज्ञानवर्धक पोस्ट.

  21. Alpana Says:

    वहाँ रखा कांसे का दीपक …कहते हैं हज़ार साल से जल रहा है.

    सभी चित्र बहुत अच्छे हैं.

    राजा के छत पर टहलने वाली किवदंती रोचक लगी.
    इस लेख में इस स्थान के बारे में कुछ और नयी जानकारियाँ मिलीं.

    [पिछले साल इसके बारे में मैं ने भी पढ़ा और लिखा था.

    कई बार पोस्ट करने की कोशिश की परन्तु टिप्पणी पोस्ट नहीं हो रही है.]

  22. nirmla.kapila Says:

    आप कहाँ से लाते हैं ऐसी अच्छी जानकारियाँ?। सुन्दर पोस्ट। आपको सपरिवार नये साल की हार्दिक शुभकामनायें।

  23. PN Subramanian Says:

    @प्रतिष्ठा में: ज्ञानदत्त जी,
    आज अपने ब्लॉग पर आपकी टिपण्णी देख मेरी तो लाइफ स्पान बढ़ गयी. आप बहुत भावुक व्यक्ति हो. ऐसा कहते मुझे अच्छा लग रहा है कि चलो कोई तो मिला साथी संगी . इसके pitfalls पर आपका ध्यान अभी हाल में ही गया भी था. मै साहित्यकार नहीं हूँ और न ही मुझे साहित्य या फिर कविताओं में कोई रूचि है. मैंने बहुत सारी भाषाएँ सीखी हैं, या यों कहें कि मजबूर था और अपने सीमित शब्द ज्ञान के सहारे एक अनोखी जवानी जीने की कोशिश में लगा हूँ. बुढ़ापा काट रहा हूँ कहना बड़ा negative लगता है.
    नव वर्ष आपके स्वास्थ्य में अमूल परिवर्तन कर आपको तरो ताजा बनाये, यही कामना है.
    पुनः आपका ह्रदय से आभार.
    सस्नेह,
    सुब्रमनियन

  24. rashmi ravija Says:

    सुन्दर तस्वीरों से सजी बहुत ही जानकारीपूर्ण पोस्ट…
    हमेशा की तरह एक संग्रहणीय आलेख

  25. रंजना Says:

    इस रोचक और अनूठी जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत आभार..बिलकुल नया है यह हमारे लिए..

  26. ali syed Says:

    ये तो पता था कि केरल में इस्लाम तलवार नहीं व्यापार के साथ आया था , चेरमान मस्जिद की निर्मिति के लिए उल्लिखित काल संभवतः पूरे देश में इस्लाम के आगमन का प्रथम अवसर है ! राजा की कथा पहले भी पढ़ी थी पर मस्जिद का चित्र पहली बार देखा ! कवेलू वाली मस्जिद देख कर आश्चर्य नहीं हुआ , इबादत गाहें घास फूस की छतों वाली भी देखी हैं भले ही उनकी उम्र चेरमान मस्जिद जितनी नहीं थी ! कहने का आशय यह है कि जीवन शैली का प्रभाव इबादतगाहों पर भी पड़ता है , इस्लामिक इबादत गाहों में भव्यता की दौड काफी बाद में शुरू हुई !
    आपने मस्जिद के अंदर कब्रों का जिक्र किया है पर मुझे लगता है कि कब्रें मस्जिद परिसर में होंगी मस्जिद के अंदर नहीं ! बाकी पक्का आप बताइये !

  27. Zakir Ali Rajnish Says:

    पहली बार जाना यह सब। शुक्रिया।

    ———
    मिल गया खुशियों का ठिकाना।

  28. sanjay vyas Says:

    कम से कम ये बात तो अब निर्विवाद ही है कि दक्षिण भारत में इस्लाम मुख्यतः अरब व्यापारियों के ज़रिये आया था.
    बहुत ही उम्दा आलेख. और वाकई एक सच्चे वृत्तान्तकार की तरह आपने दिए की अदला बदली के बारे में अपनी बात रखी है.
    क्या ये माने कि दिए का मतलब इस्लाम पूर्व के अरबों की बची रही परम्पराओं से है?

  29. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ अली:
    जी परिसर में ही हैं.

  30. shikha varshney Says:

    यही खासियत है ब्लॉग की ,कि दुर्लभ और रोचक जानकारी बहुत ही सहज मिल जाती है .बहुत अच्छा लिखा है आपने आभार इस उत्कृष्ट पोस्ट और जानकारी का.

  31. स्वार्थ Says:

    बहुत अच्छी सचित्र जानकारी देने के लिये आभार एवम धन्यवाद

  32. zeal ( Divya) Says:

    बढ़िया जानकारी – आभार।

  33. ghughutibasuti Says:

    जानकारी भरी पोस्ट है.राजा मक्का गया. यदि यह बात वहां के पैगम्बर के समय कि है तो निम्न बात क्या उसी संदर्भ में है?
    जिस चेर वंश के अंतिम शासक के इर्द गिर्द ऊपर की किंवदंती है, वह राम वर्मा कुलशेखर था और इस राजा का शासन काल १०९० से ११०२ तक रहा.
    घुघूती बासूती

  34. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @घुघूती बासूती जी:
    वैसे आपने ठीक पकड़ा. मेरा आशय इस विसंगति की ओर ध्यान दिलाना ही था.

  35. arvind mishra Says:

    राजा को मोतिया बिन्द रहा होगा🙂
    बढियां रिपोर्ट !

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