मुन्नार – देख धरती से आकाश है कितनी दूर!

एक बात का श्रेय  तो अंग्रेजों को दिया जाना चाहिए. उन्होंने भारत में रहने के दौरान यहाँ की गर्मी से बचने के लिए पहाड़ियों की ऊंचाइयों पर जाकर रहने की व्यवस्था बना दी. केरल में इस प्रकार के कई स्थल हैं परन्तु एक हिल स्टेशन होने का दर्जा केवल “मुन्नार” को दिया गया है. यह एर्नाकुलम (कोच्ची) से १३० किलोमीटर पूर्व की तरफ पश्चिमी घाट श्रंखला पर बसा है. मुन्नार और आसपास के क्षेत्र समुद्र तल से ६५०० और ८५०० फीट की ऊँचाई पर होने से  वहां साल भर मौसम सुहावना रहता है. मुन्नार का शाब्दिक अर्थ है तीन नदियाँ.

इस पूरे क्षेत्र का  स्वामित्व पून्जार राज परिवार का माना जाता है. वास्तव में यह मदुरै का पांड्य परिवार है जो चोलो के आक्रमण से बच निकल कर केरल में भटकते हुए पहुंचा था. जॉन दानिएल मुनरो जो ट्रावन्कोर का कमिशनर था, सन १८७७ में पून्जार राज परिवार से मुन्नार का १,३६,००० एकड़ से अधिक भूभाग कॉफ़ी की खेती के लिए पट्टे पर लिया था. फिर शर्तों में ढिलाई बरतते हुए हर प्रकार के बागानों के लिए अलग से करार किया गया था. मुनरो ने पहले एक कृषि समिति और बाद में कन्नन देवन के नाम से एक कंपनी की स्थापना की थी १९७६ में टाटा फिनले ने मुनरो के बागानों का अधिग्रहण किया. इसी कंपनी का नाम बदल कर टाटा टी कर दिया गया. अब पून्जार राज परिवार, अपनी भूमि को वापस प्राप्त करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहा है.

क्योंकि हमारे यहाँ की एक बहू मुन्नार में ही पढ़ी लिखी  है, इसलिए मालूम है कि यह एक छोटी जगह थी और पिछले दो दशकों में ही मुन्नार एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हुआ है और इस विकास  के लिए वहां के पर्यावरण को भी काफी कीमत चुकानी पड़ी है. वहां कुकुरमुत्तों की तरह रेसोर्ट्स का निर्माण हुआ जिसके लिए हज़ारों पेड़ धराशायी हुए. केरल सरकार की नींद अभी कुछ वर्षों पूर्व ही टूटी और बड़े पैमाने पर अवैध/अनाधिकृत निर्माणों को हटाया गया.

जैसा ऊपर बताया गया है, मूलतः इस क्षेत्र को कॉफ़ी और चाय की खेती के लिए ही उपयुक्त पाकर चुना गया  था. यहाँ मुख्यतः चाय एवं कॉफ़ी बागानों की भरमार है. इसके अतिरिक्त मुन्नार और आस पड़ोस के ग्रामीण क्षेत्रों में इलाईची, दालचीनी, जायफल, अदरख, लहसून और  कालीमिर्च भी खूब उत्पन्न होती है. मुन्नार के २० किलोमीटर की परिधि में ही बहुत से झील, झरने, बाँध, राष्ट्रीय उद्यान आदि हैं जहाँ की जैव विविधता से आकृष्ट होकर हज़ारों देसी, विदेशी सैलानी यहाँ का रुख कर रहे हैं.यहाँ की एक और विशेषता है. ऊटी, कोडैकनाल की तरह यहाँ भी १२ वर्षों में (कभी कभी ७ वर्षों में) पूरी  पहाड़ियों और घाटियाँ नीलाकुरिंजी (Strobilanthus) नामक पुष्पों से पट जाती हैं. चारों तरफ नीला ही नीला. वैसे यह नीला नहीं है. बैगन के फूल के रंग का या कहें हल्का बैंगनी. यह फूल औशधीय गुणों से भरा है जिसे पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग किया जाता है.

मुन्नार से लगभग १५ किलोमीटर की दूरी पर ही एर्विकुलम राष्ट्रीय उद्यान है. यह विलुप्त प्रायः या विलुती के कगार पर पहाड़ी बकरे/बकरियों की सरक्षण स्थली है. तस्लीम में एक चित्र पहेली में इस प्राणी का उल्लेख है परन्तु वहां हमारी पहचान काम नहीं आई थी. उन्हें तो वह nilgiri Tahr के नाम से ही मालूम है. तामिलनाडू में एवं केरल में भी इसे पहाड़ी बकरी ही संबोधित करते है. यह जानवर केवल नीलगिरी (ऊटी) में नहीं पाया जाता बल्कि पूरे पश्चिमी घाट की ऊंची चोटियों में रहता है. इनकी वैसे तीन प्रजातियाँ हैं. पहला तो नीलगिरी तार (थार), दूसरा हिमालयन तार और तीसरा है अरबी तार जो संयुक्त अरब अमीरात के हज़ार पहाड़ियों एवं ओमान में पाए जाते हैं. इनकी भारत में कुल आबादी २००० के लगभग है और सबसे अधिक संख्या ८००, इनकी एर्विकुलम में ही है.  ये बड़े बलिष्ट होते हैं और इनका वजन १०० किलो के लगभग हो सकता है. इन्हें पर्यटकों से कोई भय नहीं है. सामने आकर खड़े हो जाते है मानो कह रहे हो कि मेरी फोटो खींच लो.

आपको उसे पुचकारने का भी मौका दे सकता है. वैसे ये झुण्ड में ही रहना पसंद करते हैं परन्तु हमें तो इकलौता ही मिला था. इनके संकटग्रस्त होने का प्रमुख कारण तो इनका शिकार है इसके अतिरिक्त एक कारण  जो बताया जाता है वह इनके समूहों में आपसी मेल का न होना. जहाँ ये निवास करते हैं उसके चारों तरफ मानव आबादी निर्मित हो गयी है अतः वे अपने दूसरे समूहों, जो अन्यत्र पहाड़ियों पर हैं, के संपर्क में नहीं आ पाते. . अतः  इन्ब्रीडिंग के कारण भी इनकी आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.

क्योंकि इसी वर्ष जनवरी में मनीष भाई साहब ने अपने मुसाफिर हूँ  यारों पर मुन्नार की खूब चर्चा की है और ढेर सारी जानकारियाँ दीं हैं, इसलिए हमने अपनी  बात सक्षिप्त में ही रखी है. अधिक जानकारी के लिए ऊपर के लिंक पर चटका लगाएं.

40 Responses to “मुन्नार – देख धरती से आकाश है कितनी दूर!”

  1. राहुल सिंह Says:

    यहां अकेले तार को अच्‍छा साथी मिला और आपको भी. तस्‍वीर उतरवाने को तो वह प्रस्‍तुत है ही और इस गंभीर भाव से मानों किसी सीनियर एक्‍जीक्‍यूटिव पद के लिए आवेदन करना हो.

  2. राहुल सिंह Says:

    ‘तार’ की तस्‍वीर देख कर यहीं अटक गया. प्रस्‍तुति अच्‍छी और शीर्षक तो मानों कविता.

  3. shekhawat Says:

    सुन्दर चित्रों के साथ ज्ञान वर्धक लेख |
    ऊँचे पहाड़ों पर रहने की व्यवस्था भारत में अंग्रेजों से पूर्व की है भारत के अधिकांश किले ऊँचे पहाड़ों पर ही बनाये गए है , सुरक्षा व सामरिक दृष्टि से |

  4. Ratan Singh Shekhawat Says:

    सुन्दर चित्रों के साथ ज्ञान वर्धक लेख |
    ऊँचे पहाड़ों पर रहने की व्यवस्था भारत में अंग्रेजों से पूर्व की है भारत के अधिकांश किले ऊँचे पहाड़ों पर ही बनाये गए है , सुरक्षा व सामरिक दृष्टि से |

  5. Bharat Bhushan Says:

    बहुत थोड़े में बहुत आकर्षक जानकारी दी है आपने.

  6. RAJ SINH Says:

    सुरम्य ,सुन्दर और फिर आपकी बयानी .
    हम तो तर तर हो गए ……………और तार तार भी🙂 .

  7. amar Says:

    सदैव की तरह रोचक वर्णन.
    परन्तु वहां पहुँचने और ठहरने के साधनों के बारे
    में भी जानकारी होती तो बेहतर होता.

  8. vinay vaidya Says:

    वाह साहब,
    क्या नई-नई और ताज़ा जानकारी जुटाई है आपने !
    बिल्कुल ताज़ा गर्म चाय और कॉफ़ी के फ़्लेवर वाली ।
    धन्यवाद और आभार,

    सादर,

  9. प्रवीण पाण्डेय Says:

    कॉफी के इन बागानों को देखने की इच्छा है।

  10. अनुनाद सिंह Says:

    सदा की भांति उत्तम जानकारी एवं मनमोहक छबियाँ !

  11. jayantijain Says:

    beautiful place, i would like to visit

  12. arvind mishra Says:

    यह मुन्नार परिशिष्ट पसंद आया !

  13. सोमेश सक्सेना Says:

    सुंदर, सजीव चित्रों और जानकारी से भरी पोस्ट।

    मैं कभी दक्षिण भारत नहीं गया। जाने की हार्दिक अच्छा है पर इतना अवकाश ही नहीं मिल पा रहा है। और केरल तो कहलाता ही है- GOD’S OWN COUNTRY.

  14. राज भाटिया Says:

    सुंदर चित्र से सजी ओर सवरी आप की जानकरी बहुत अच्छी लगी, धन्यवाद

  15. jc joshi Says:

    सुन्दर जानकारी के लिए धन्यवाद! नीलगिरी नाम शायद ‘नीलकंठ’ शिव के नाम पर रखा गया हो …
    मेरे ख्याल से आप यह कह सकते हैं कि अंग्रेजों ने सड़कें बना पुराने पहाड़ी कस्बों तक गाड़ियों आदि में पहुंचना सरल कर दिया,,,और पहाड़ों पर जहाँ पहले ‘सत्य’ को जानने की इच्छा से जोगी आदि एकांत में रहते थे वहाँ भोगियों के भी पहुँचने की सुविधा उपलब्ध कर दी!… पहले छोटे छोटे पगडंडियों से यात्री एक गाँव से दूसरे गाँव आया जाया करते थे,,,और जिस कारण जड़ी बूटी आदि का प्रचलन भी बढ़ा होगा – परोपकारी जोगियों आदि के अनुसंधान के पश्चात – चाय भी पहले औषधि के समान उपयोग में लाई जाती थी!…

  16. भारतीय नागरिक Says:

    चित्र तो बहुत अच्छे लग रहे हैं…

  17. काजल कुमार Says:

    मुन्नार की जानकारी जितनी जीवंत है चित्र भी उतने ही मनभावन हैं. धन्यवाद.

  18. Manish Kumar Says:

    Munnar ki yadein abhi bhu smritiyon mein basi hain. aaj phir se wahi drishya aapki post ke madhyam se phir se ubhar aaye.

  19. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    अच्छी जानकारी. उम्दा छवियां. बधाई.
    मकर संक्रांति की शुभकामनाएं.

  20. mahendra verma Says:

    चित्र और विवरण दोनों अति सुंदर।
    शुभकामनाएं।

  21. रवि कुमार Says:

    बेहतर…

  22. Dr.ManojMishra Says:

    कैसा संयोग है,आज ही मेरे एक मित्र मन्नार से लौटे हैं,वहीं का सौंदर्य वर्णन हो रहा था की आप की पोस्ट भी पढनें को मिल गयी.
    अच्छी जानकारी,धन्यवाद.

  23. ali syed Says:

    १३६००० एकड़ ज़मीन मुनरो साहब को ? मुझे तो ३६० वर्ग फुट भी मिल जाती तो मैं एक झोपड़ी डाल के वहीं बस जाता !

    ये पोस्ट पढके समझ में आया कि आपकी पोस्ट लिखने में बहु भी आपकी मदद करती हैं🙂

  24. विष्‍णु बैरागी Says:

    पोस्‍ट का शीर्षक, पोस्‍ट पढने का ‘उत्‍तेजक-आमन्‍त्रण’ है। सब कुछ सुन्‍दर। गागर में सागर की तरह। न्‍यौता देने वाला – बोरीया बिस्‍तर बॉंधे और सीधे पहुँचों मन्‍नार।

  25. zeal ( Divya) Says:

    सुन्दर चित्रों से सजा , जानकारी युक्त लेख । जो खूबसूरती अपने देश की धरती पर है , वो कहीं नहीं है।

  26. Gyandutt Pandey Says:

    आपकी इस सुन्दर पोस्ट के माध्यम से मुनीश जी क अच्छे ट्रेवलॉग का पता चला। बहुत धन्यवाद!

  27. Gagan Sharma Says:

    सदा ही की तरह उत्तम जानकारी

  28. संजय @ मो सम कौन? Says:

    विभागीय पत्र-व्यवहार के दौरान पहली बार मुन्नार नामक जगह का नाम जाना, और यकीन मानिये बिना किसी जानकारी के ही ऐसा लगा था कि यह एक बहुत खूबसूरत जगह होगी। कालांतर में इस जगह के बारे में जानकारी प्राप्त हुई भी।
    हमेशा की तरह आपकी पोस्ट बेहद खूबसूरत, रोचक, सहज, ज्ञानवर्धक, उकसाऊ(पर्यटन के लिये:))

    आभार स्वीकार करें।

  29. PN Subramanian Says:

    @श्री जे.सी.जोशी जी:
    आभार. मैंने कहीं पढ़ा है कि उस नीले रंग वाले कुरिंजी के फूलों के कारण ऊटी की पहाड़ियों को नीलगिरी कहा जाता है. सर, जोगी भी तो अपने तरीके से उस परम सत्य को भोग ही रहे थे.

  30. mamta Says:

    अच्छी और सुन्दर लगी आपकी ये पोस्ट।

  31. पूनम मिश्रा Says:

    लगता है जैसे खुद ही मुन्नार घूम आये . बहुत खूब्सूरत तस्वीरैं !

  32. स्वार्थ Says:

    रमणीय स्थल।
    चित्र लेख की महत्ता को कई गुना बढ़ा गये हैं।
    धन्यवाद

  33. abhishek mishra Says:

    एक नए स्थल के बारे में एक बार फिर महत्त्वपूर्ण जानकारी दी आपने. धन्यवाद.

  34. nirmla.kapila Says:

    सचित्र सुन्दर जानकारी दी है। धन्यवाद।

  35. JC Joshi Says:

    श्री सुब्रमनिअन जी, किसी उपनिषद में पढ़ा था कि पहले मानव को देख कर ही तृप्ति हो जाती थी, किन्तु राक्षशों ने इसे बिगाड़ दिया और अब उनको केवल देख कर ही तृप्ति होनी समाप्त हो गयी,,,और इसी तरह उन्होंने सारी इन्द्रियों के एक-एक कर नाम ले उनको समय के साथ दूषित होते दर्शाया…और गौर करने वाली चीज है की समय को सतयुग से कलियुग की ओर जाते माना जाता है, यानी समय के साथ बद से बदतर मानव कार्य क्षमता, जबकि श्रृष्टि की उत्पत्ति विष से (कलियुग से) आरंभ हो अमृत प्राप्ति (सतयुग के अंत में) सागर मंथन की कहानी द्वारा हर कोई सुनता आता है…(यह ऐसा ही समझा जा सकता है जैसे हम एक खेत का विडियो बनाएं सूखी धरती से आरंभ कर लहलहाते खेत बनने तक, और फिर रील को उल्टा चला फिल्म को देखें, लहलहाते खेत को बंजर भूमि में परिवर्तित होते!)…

  36. hempandey Says:

    कोवलम तो सुना था अब मुन्नार भी |

  37. Gyanchand Marmagya Says:

    आद.सुब्रमनियम जी,

    मनोरम दृश्यों के साथ इतनी जानकारी से भरा लेख पढ़कर मुन्नार देखने की इच्छा प्रबल हो गयी !

  38. Zakir Ali Rajnish Says:

    मुन्‍नार सचमुच किसी स्‍वर्ग की तरह प्रतीत होता है। शुक्रिया, उससे परिचित कराने का।

    ———
    ज्‍योतिष,अंकविद्या,हस्‍तरेख,टोना-टोटका।
    सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है ?

  39. renusharma Says:

    bahut khoob hai

  40. JATDEVTA Says:

    जाट देवता की राम-राम,
    चित्र अति सुंदर लगे,
    जितनी प्रशंसा की जाये कम ही रहेगी।

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