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हमारा लालू

फ़रवरी 6, 2011


हमारे परिसर में एक कुकुर है, शुद्ध देसी परन्तु सफ़ेद और भूरे रंग के कारण अच्छा ही दीखता है परन्तु उसकी आँखें कुछ डरावनी सी हैं. वैसे सीधा है. घरों में बची रोटियों पर उसका एकाधिकार   बन गया है. किसी दूसरे कुत्तों को घुसने भी नहीं देता. अभी करीब छह महीने पहले वह एक नाबालिग कुतिया को भगा लाया. शायद कुतिया को भी सरक्षण की आवश्यकता रही होगी. अजीब बात यह रही की हमारा लालू हर घर में अपनी उस कुतिया को लाकर खड़ा कर देता मानो कह रहा हो देखो, मेरी दुल्हन को. फिर याचना का भाव लिए खड़ा रहता, शायद मुह दिखाई में कुछ मिले.

एक महीने के बाद ही उनकी प्रेम क्रीडा प्रारंभ हो गयी. परिसर वालों ने खूब मजे लिए. तीन माह के अन्दर ही कुतिया प्रसव के लिए तैयार थी. परिसर में ही एक वर्मा जी रहते हैं. उनका घर और आँगन दूसरों की अपेक्षा बड़ा है. आँगन के सामने और किनारे गमलों के अलावा जमीन पे ही पेड़ पौधे भी लगे थे. किनारे कोने में एक बोगनविलिया पेड़ बन चला था. एक सुबह जब वर्मा जी ने उठ कर जब अपने आँगन में देखा तो वह बोगनविलिया का पेड़ धराशायी हो गया था. जहाँ उसके जड़ें थी वहा एक गड्ढा बना था और वह कुतिया अपने चार बच्चों के साथ विश्राम कर रही थी. वर्मा जी की आहत सुनकर कुतिया ने भोंकना शुरू कर दिया. स्थल निरीक्षण से पता चलता था की रात में ही कुतिया घर में घुस आई थी और अपने पंजों के बल पेड़ के चरों तरफ की मिटटी खोद डाली और पेड़ को जड़ सहित उखाड़ दिया ताकि उसके प्रसव के लिए अनुकूल स्थल बन सके.

अब वर्मा जी परेशान की क्या किया जाए. उन्होंने परिसर के स्वीपर की सहायता से कुत्ते के पिल्लों को अपने घर से हटवा कर परिसर के बागीचे के एक कोने में रखवा दिया. ठण्ड का प्रकोप बढ़ गया था और बर्दाश्त न कर सकने के कारण दो पिल्लै अल्लाह को प्यारे हो गए. बागीचे के सामने एक भट्टाचार्यजी रहते हैं. वे बड़े ही पशु प्रेमी हैं. उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ. वे मेरे घर आये और हमारे यहाँ पड़े  एक पुराने एक्वेरियम को उठा ले गए. हमने पुछा था की इसका क्या करोगे तो उन्होंने कहा की बचे हुए दोनों पिल्लों को उसमें रख देंगे और रात को उढ़ा दिया करेंगे. फिर हमने पुछा की कुतिया दूध कैसे पिलाएगी तो उन्होंने मुस्कुराके कहा आप देखते जाईये. हुआ यों की कुतिया भी एक्वेरियम में घुस गयी और अपने लिए जगह बना ली. हमारा लालू भी बाकायदा पहरेदारी किया करता. अब पिल्लै कुछ बड़े हो गए हैं और शैतान भी. कारों के नीचे बैठे रहते हैं और कोई भी बगल से गुजरा तो दौड़ कर बाहर आ जाते हैं. पीछे से पेंट पकड़ कर खींचते हैं. उनका स्तनपान भी अभी नहीं रुका है.

नोच   कर  दूध  के  स्तनों को,
क़त्ल  माँ  का किये जा रहे हो!

इस परिवार को देख कर ऐसा नहीं लगता की वे कुत्ते हैं. उनमे दिखने वाला लगाव और समर्पण  भाव परिसर के लोगों के लिए कौतूहल का विषय  बन गया है.

उधर दूसरी तरफ परिसर में ही एक पंडितजी भी रहते हैं जिन्हें किसी भी प्रकार की ध्वनि से ही परहेज है. उनके घर में बिजली की घंटी भी निकाल दी गयी है और रात को यदा कदा कुत्तों का भौकना बड़ा नागवार गुजरता है. हर किसी से शिकायत करते रहते हैं. उन्होंने भी इन पिल्लों को ठिकाने लगवाने की योजना बना ली है परन्तु परिसर के उस पशु प्रेमी के रहते वे शायद ही सफल हों.

हमारे ब्लोग्गर बंधुओं में बहुतेरे कुकुरों के प्रति अति संवेदनशील दिखे थे अतः एक पोस्ट ठेल दी. अब उनकी टिप्पणियां भी मिल ही जायेंगी. एक पंथ दो काज.

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