निठल्लों की पुष्कर यात्रा

आलेख:प्रीतम अय्यर,
कोलाररोड, भोपाल.

अभी कुछ ही दिन हुए एक परीक्षा देने अजमेर जाना हुआ था. भोपाल से अजमेर के लिए सीधी ट्रेन सेवा है. यहाँ गाडी शाम ४.५० को छूटती है और सुबह अजमेर पहुँच जाती है. पहले से रिसर्वेशन करवा रखा था. बर्थ तो मिल गयी. कुछ देर बाद गाडी के अन्दर ही कुछ और साथी मिले जो कोचिंग में मेरे साथ रहे हैं. उनमें से कई लोग वेट लिस्टेड थे. इन सभी बेरोजगारों को देख कुछ अपनापन लगा. हमने अपनी ओर से प्रस्ताव दिया कि कोई एक हमारे साथ ऊपर की बर्थ पर आ जाए. सब ने ऐसा ही किया. फिर गपशप शुरू हुई. अजमेर कभी   जाना नहीं  हुआ था. सब का यही हाल था. हमने तय किया कि इकट्ठे रुकेंगे. गाड़ी के रवाना होने के बाद पता चला कि उसमें पेंट्री नहीं है. गाडी जब उज्जैन पहुंची तो जान में जान आई. वहां पुड़ी सब्जी मिल रही थी. टमाटर का सूप भी सब ने पिया. यहाँ गाडी बहुत देर रुकी रही क्योंकि एक गाडी इंदौर से भी अजमेर  के लिए  चलती  है और  उसके  डिब्बे  हमारी गाडी से जोड़े  गए.

हम लोग अजमेर तो शनिवार तडके पहुँच गए थे परन्तु होटल ढूँढने में २ घंटे लग गए. होटल तो बहुत सारे थे लेकिन किराया बहुत ज्यादा लगा. आखिर एक होटल में डोर्मीटरी   मिली जहाँ ८ बिस्तर लगे थे. प्रति व्यक्ति किराया १५० रुपये प्रति दिन था. क्योंकि हम सात लोग थे इसलिए यह हमें जंच गयी. फ्रेश होकर नाश्ता किया और पैदल निकल पड़े थे. पूरा दिन भर था, परीक्षा इतवार को थी तो सबने सोचा क्यों न पुष्कर घूम आयें. लेकिन बस अड्डे तक ३/४ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था. पुष्कर वहां से १२ किलोमीटर ही था बस भी आराम से मिल गयी थी.

पुष्कर पहाड़ियों से घिरी एक घाटी है और यहाँ के झील का नाम ही पुष्कर है. पुष्कर की झील में नहाना ज़िन्दगी भर के पापों से मुक्ति देता है. बहुत पवित्र मानते हैं. बनारस जैसे यहाँ भी बहुत सारे घाट हैं और नहाने के लिए अच्छी व्यवस्था भी. लगता है कि यहाँ सर मुंड़ाने का रिवाज़ भी है.

हम लोगोंने भी बरफ की तरह उस ठन्डे पानी में डुबकी लगायी. झील तो मंदिरों से घिरा है लेकिन यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण मंदिर ब्रह्मा जी का है. इंडिया में यह अकेला भ्रह्मा का मंदिर बताते  हैं जहाँ रेगुलर पूजा होती है.  इसके बाद लोगों के बताये रस्ते से मंदिर के लिए निकल पड़े. रास्ते में फूलों की माला खरीदी और मंदिर पहुँच कर ब्रह्मा जी के दर्शन किये.

भ्रह्मा जी से निपटकर वहां की छोटी छोटी दूकानों से छुटपुट खरीददारी की. सबको भूक सता रही थी और कहीं ढंग का होटल नहीं दिख रहा था.  सड़क के किनारे एक जगह खाना परोसा जा रहा था. हम सब ने वहीँ खा लेने की सोची और बेंच पर बैठ गए. सबसे कम दर ५० रुपये थाली थी और वह भी लिमिटेड खाना. हमारी मजबूरी थी. खाने के बाद बस अड्डे पहुंचे और वहां से बस भी मिल गयी. इस बार किराया केवल ७ रुपये प्रति व्यक्ति पड़ा था जब कि अजमेर से आते समय हम से ३० रुपये येंठे गए. लेकिन बस वोल्वो जैसी थी बगैर ए.सी. बस ने हमें बस अड्डे पर उतार दिया और फिर वहां से एक टेम्पो में बैठ कर सब वापस अपने होटल पहुंचे. ५.३० बजे शाम फिर बाहर निकलना हुआ. गरीब नवाज़ का प्रसिद्द मज़ार हमारे होटल के पास ही था. सबने सोचा वहां जाकर भी हम बेरोजगारों की डिमांड रखते हैं. हो सकता है हम सब की झोली भी भर जाए. इलाहाबाद के पंडों की तरह वहां भी लूट खसोट दिखी. हमारे एक दोस्त से तो वहां १०० रुपये झटक लिए. खैर अपना पेटीशन देकर लौट आये. रास्ते में एक ठेले में गोलगप्पे मिल रहे थे. ६ रुपये के दस. सब ने हल्ला किया, ज्यादा क्यों ले रहे हैं. ५ की दस दो. ठेले वाला मान गया. गोलगप्पे स्वादिष्ट थे ऊपर से उसने सबको दही पुड़ी बनाकर खिलाई. उसके पैसे नहीं लिए.

इसके बाद हम लोगोंने मार्केट घूमलिया और कुछ कुछ घरवालों के लिए खरीद भी लिया.  अजमेर में एक ख़ास बात देखने में आई. सभी दूकान ९ बजे रात तक बंद हो जाते थे. अब हमें रात के खाने की फिकर हुई. फिर ढूँढ़ते रहे. एक होटल दिखी “रसना रेस्टोरेंट” वहीँ चले गए. रेट पूछा तो ८० रुपये थाली था.  सबने डटके खाया क्योंकि हर चीज बड़ी लाजवाब बनी थी. खाकर वापस अपने होटल पहुंचे और एक दो घंटे कुछ किताबें पलट कर सोने चले गए.

दुसरे दिन सुबह सुबह ही उठना पड़ा था. इतवार का वो दिन बड़ा हेक्टिक रहा. ब्रेकफास्ट निपटाकर अपने अपने सेण्टर टेम्पो में बैठ पहुँच गए. आदर्शनगर के मेरे सेण्टर में हमारे साथियों से केवल एक ही था. औरों के सेण्टर अलग अलग थे.

परीक्षा १२ बजे के लगभग ख़त्म हुई. हम सब रेलवे स्टेशन में इकट्ठे हुए. जब हम लोग शनिवार की सुबह स्टेशन से बहार निकले थे तो उतना ध्यान नहीं दिया था लेकिन इतवार शाम स्टेशन को जब देखा तो बड़ा आलीशान लगा. वहां एक कचौड़ियों की दूकान थी. वह! क्या गजब के थे. बड़े बड़े, ऊपर से दाल डाल कर बनाकर दिया था.  एक से ही पेट भर गया. हम लोगों की वापासी गाडी रात ९ बजे थी सो टेम्पो में बैठ कर १० किलोमीटर दूर बजरंग

गढ़ चले गए. वहां एक झील “अन्सागर” था जो बहुत सुन्दर लगी. पार्क भी बने थे. ऊपर पहाड़ी पर बजरंगबली का मंदिर था. सोचा मेहनत कर चढ़ लेते हैं. थोडा और पुण्य मिल सकता है. थकान मिटाने शाम होते होते अपने होटल वापस आ गए. मैं तो एक घंटे सो ही गया. देर शाम एक बार फिर शौपिंग की गयी और अंत में अपना बोरिया बिस्तर लेकर स्टेशन आ गए. वहीँ बाहर ४० रुपये थाली वाला खाना भी खा  लिया. ट्रेन का आने का समय हो चुका था लेकिन बार बार प्लेटफोर्म बदलने की सूचना  दी जा रही थी. आखिरकार ट्रेन आई और हम सब चढ़ गए. दूसरे  दिन सुबह ११.३० को वापस भोपाल.

देखने के लिए तो अजमेर ही बहुत कुछ था. पुराने जमाने के बिल्डिंग वगैरह लेकिन टाइम कम था और उतनी जानकारी भी नहीं थी. नवम्बर में गए होते तो दुनिया के सबसे बड़े ऊंटों के मेले को भी देख पाते. बोलते हैं वहां बहुत सारे फोरेनेर्स भी आते हैं.

पुष्कर के पवित्र झील में डुबकी, ब्रह्मा के दर्शन, गरीब नवाज़ के दरगाह में मन्नत और अंत में बजरंगबली के दर्शन हमलोगों की कमाई रही.

नोट: २/३ चित्र विकी मीडिया कामंस  से जुगाड़ा है बाकी मेरे मोबाइल से लिए गए है. मेमोरी ख़त्म हो गयी थी.

28 Responses to “निठल्लों की पुष्कर यात्रा”

  1. राहुल सिंह Says:

    तीरथ पूरा हुआ, फल भी मिलेगा.

  2. प्रवीण पाण्डेय Says:

    पूरा पुण्य प्राप्त करके निकले हैं आप।

  3. भारतीय नागरिक Says:

    अब इतने में से कोई न कोई तो फरियाद सुनेगा ही..

  4. काजल कुमार Says:

    और कुछ हो या न हो पर 5 रूपये के 10 गोलगप्पे !… लगता है कि पाइरेटिड रहे होंगे🙂
    मैंने सुना है कि दिल्ली में तो 10 रूपये के 4 या कुछ तो इससे भी कम देते हैं…

  5. राज भाटिया Says:

    वाह वाह जी आप के साथ साथ हम भी घुम लिये पुरा अजमेर, खाना खाने का मजा भी साथ मे लिया, गोलगप्पे तो सच मे बहुत स्वाद लगे, बस पानी थोडा तीखा था, लेकिन बहुत सस्ते, ओर यह कचोडी तो सच मे स्वादिष थी, पेट भर गया लेकिन नियत नही भरी…:) धन्यवाद

  6. सतीश सक्सेना Says:

    आज आपने पुष्कर स्नान करवा दिया ….आभार आपका !

  7. नीरज जाट जी Says:

    मैंने पढना शुरू करते समय लेखक का नाम नहीं पढा था, सोचा कि आपने ही लिखा होगा। लेकिन जरा सा पढते ही दिमाग में आने लगा कि यह आपका स्टाइल नहीं है। हर लेखक का अपना स्टाइल होता है।
    कुल मिलाकर यात्रा मस्त रही।

  8. arvind mishra Says:

    अजमेर में पुष्कर का ब्रह्मा का मंदिर अनूठा है क्योकि ब्रह्मा एक पुराण कथा के चलते कहीं और नहीं पूजे जाते –
    मुझे लगता है पुष्कर झील किसी उल्का के गिरने के कारण बनी -स्थानीय जन श्रुति है कि ब्रह्मा जी ने पना कमल यहाँ फेंका था –
    और यही विस्मय लोगों को यहाँ ब्रह्मा की पूजा के लिए विवश किया होगा और परिपाटी बनती गयी !
    इस ब्लॉग पर लम्बे अरसे के बाद यह पोस्ट देख बहुत अच्छ लगा -कब से नियमित हो रहे हैं ?

  9. Bhopale Says:

    Welcome back sir. Hope you are doing well – mentally and physically. Good wishes always

  10. J C Joshi Says:

    सुब्रमनियन जी, अच्छा लगा आपकी फिर से ब्लॉग जगत में वापसी देख, भले ही परोक्ष रूप में ही सही…

    सांकेतिक भाषा में, इस पृष्ठभूमि में कि प्राचीन योगियों ने मानव को ब्रह्माण्ड का प्रतिरूप जाना, और उसके सार समान हमारे सौर-मंडल के ९ सदस्यों (नवग्रह) के सार से बना, “ब्रह्मा जी” को सौर-मंडल के राजा, प्राचीन हिन्दुओं के ‘सूर्य देव’ अथवा सुरों के राजा, वर्षा के देवता, ‘इंद्र’ समझा जा सकता है,,, जो ‘आकाश’ में रहते हुए भी ‘पृथ्वी’ से जुड़े हैं (“विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुवे कमल पर विराजमान हैं”) ! और जैसा श्री अरविन्द मिश्रा जी ने पुष्कर ताल के बनने का कारण उल्का-पात, ब्रह्मा जी के ‘कमल फैकने’ को बताया, उस से भी सौर-मंडल का ही हाथ होने की पुष्टि होती है… और ब्रह्मा के नाम से नहीं किन्तु सूर्य का मंदिर कोणार्क, उडीसा में अवश्य है…वैसे भी पृथ्वी पर उपलब्ध होने वाली प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में शक्ति का स्रोत होने के कारण सूर्य को हिन्दू ही अनादी काल से नहीं नमस्कार करते आ रहे हैं अपितु आधुनिक वैज्ञानिक भी उस से प्राप्त शक्ति को कई रूप में पाने के तरीके निरंतर ढूंढते चले आ रहे हैं…

  11. manoj k Says:

    यह कौनसी परीक्षा थी अजमेर में ?!

    वैसे पुष्कर के चित्र सुन्दर हैं.

  12. shikha varshney Says:

    वाह जी घूमना भी हो गया ,खान पीन भी ,परीक्षा भी और तीरथ भी .ये तो एक पन्त ४ काज हो गए.
    बढ़िया रहा वृतांत.

  13. shobhana Says:

    bahut dino bad padhne ko mila apka blog
    pushkar yatra achhi lgi

  14. समीर लाल Says:

    चारों पुण्य स्थल १००% वाले हैं, एक भी प्रसन्न हो गया होगा तो काम बन ही जाना है.🙂

    बहुत रोचक वृतांत रहा.

  15. vinay vaidya Says:

    स्वागत ! पी.एन. साहब,…!!

  16. vinay vaidya Says:

    Swagat, P.N. Subrahmanian Sahab,…!

  17. rashmi ravija Says:

    बहुत ही बढ़िया लगा पूरा विवरण
    तस्वीरें बहुत ही सुन्दर लगीं.

  18. Rekha Srivastava Says:

    एक अन्तराल के बाद पुनः यात्रा वृतांत पुष्कर की यात्रा भी सचित्र आपके साथ करके आ गए. पुष्कर का अपने आप में अलग महत्व है.

  19. nirmla.kapila Says:

    बहुत देर बाद इतना सुन्दर यात्रा विवरन पढने को मिला। तस्वीरें भी बहुत अच्छी हैं। आपकी यात्रा का व्रतांत पडः कर शायद एक कतरा पुन्य का हमे भी मिल जाये। शुभकामनायें।

  20. Gagan Sharma Says:

    नीरज की तरह कुछ अनजानी सी भाषा लगी। तब फिर नाम देखा।
    होनी पर तो वश नहीं है पर इस तरह थोड़ा मन तो बहलेगा।

  21. RAJ SINH Says:

    AAP AAYE BAHAR AAYEE ! ITANE SASTE GOLGAPPON KE LIYE TO BAITHE THALE NITHALLE KAM NAHEEN CHALEGA……………..DARSHAN KA PUNYA BHEE LENA HOGA 🙂 .

  22. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन Says:

    5 रूपये के 10 गोलगप्पे देने वाला वाकई दिलदार था। राजस्थान के खान-पान का स्वाद सारी दुनिया से अलग ही होता है सो कचौडी भी अच्छी ही होगी। भगवान बेरोज़गारों की पुकार जल्दी सुने।

  23. mamta Says:

    सुन्दर चित्रों के साथ पुष्कर की यात्रा अच्छी लगी ।

  24. आशा जोगळेकर Says:

    सुब्रमनियन जी आपकी वापसी पर आपका स्वागत । आपके साथी की अजमेर पुष्कर के सचित्र यात्रा वर्णन से हमारी अजमेर पुष्कर की यादें ताज़ा हो गईं । उन्हें उनकी परिक्षा मे सफलता के लिये शुभ कामनाएँ ।

  25. रंजना Says:

    अभी पिछले महीने ही अजमेर पुष्कर यात्रा का सौभाग्य मिला है…

    हम ठहरे पुष्कर में ही थे और वहीँ से जाकर अजमेर शरीफ हो आये थे…

    उस आनंद का स्मरण हो आया पाकी पोस्ट पढ़कर…

    बहुत बहुत आभार.

  26. ranjan Says:

    सुन्दर..

  27. संजय बेंगाणी Says:

    अजमेर जाना हुआ है, मगर रेल्वे स्टेशन से होते हुए सड़क मार्ग से निकल गए, कभी शहर देखा नहीं. यहाँ हमारी भी यात्रा हो गई.

  28. sandeep Says:

    निठठले नहीं किस्मत वाले कहो ज्यादा अच्छा है,
    अच्छा लेख लगा,

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