वेदान्तंगल पक्षी विहार/अभयारण्य

चेन्नई में अपने छोटे भाई  के घर इस अप्रेल में १५ दिन रुकना हुआ था. चेन्नई में ही मेरी एक बहन और भांजी  रहती है जो आकाशवाणी में कार्यरत है. मुझे पूरा यकीन है कि उसने अपने बेटे को उकसाया होगा. एकदिन  उस भांजी के बेटे “सिद्धार्थ” का फोन आया. वह मुश्किल से पांच साल का है लेकिन बातें  तो गौतम बुद्ध जैसी करता है. उसने कहा “ग्रांड मामा” चिड़ियों को देखना पसंद करोगे?. हमने पूछा कहाँ से लेकर आये हो और कौन सी चिड़िया है. उसने कहा नहीं एक बहुत पुरानी झील है, वहां हज़ारों  हैं.  हमने कहा इस अप्रेल के माह में वहां कुछ नहीं होगा. उसने कहा नहीं, वह पेरेनियल लेक है. जितने भी बाहर के पक्षी हैं न, वे सब मई में चले जाते है.हमें भी उसे उकसाने की मूड बन गयी और पूछा यह पेरेनियल क्या होता है. उसका तत्काल जवाब था, केला  एक फ्रूट है न. हमने कहा हाँ. उसने पूछा साल भर मिलता है न. हमने कहा हाँ. फिर उसने पूछा आम साल भर मिलता है क्या. हमने कहा नहीं. हमें सिद्धार्थ ने समझाया कि केला पेरेनियल फ्रूट है, जबकि आम नहीं है. वैसे ही जिस लेक में पानी हमेशा  बना रहता है वह पेरेनियल कहलायेगा न. हमने कहा ओके समझ गया, चलने की सहमति दे दी और सिद्धार्थ से कह दिया कि वह दूरबीन का इंतज़ाम कर के रखे. सिद्धार्थ ने  अपने नाना को फोन पकड़ा दिया और उन्होंने “वेदान्तंगल” नामके  झील की चर्चा की. हमारे लिए तो यह अनजानी जगह थी और पक्षियों का कभी भी सूक्ष्म अध्ययन नहीं किया था. हमें इस प्रस्ताव में एक अवसर दिखा जिसे भुनाना ही था.अगले ही दिन निजी वाहन से सिद्धार्थ के साथ निकल पड़े. उसके दादा दादी (हमारी बहन) भी थे.

हमने “वेदान्तंगल पक्षी विहार” की दूरी का पता लगा लिया था. राष्ट्रीय राजमार्ग ४५ पर चेंगलपट्टू (Chengelpet) (५९ किलोमीटर) तक चलकर वेदान्तंगल के लिए रास्ता मुड़ता है. वहां से २३ किलोमीटर  और जाना है. चेन्नई से कुल मिलाकर ८२ किलोमीटर रास्ता तय करना है. गर्मी तो जानलेवा लग रही थी. पारा तो ४० से कम ही था परन्तु  वह हमारे  (उत्तर भारत) के ४८  के ऊपर सा लग  रहा था. यह शायद हवा में नमी की वजह से है. पसीने से तर बतर हुवे जा रहे थे. अब निकल ही पड़े हैं तो झेलना भी है.

लगभग दो घंटे में हम लोग वेदान्तंगल पहुँच गए और वहां लगा हुआ सूचना फलक  हमारा स्वागत कर रहा था. कुछ सीढ़ियों को चढ़ सामने जो दृश्य था उसे देख ही मन प्रसन्न हो गया. चौड़े मेड पर पैदल चलने के लिए आकर्षक सीमेंट के ब्लोक्स बिछाए गए थे  और पर्यटकों की सुविधा के लिए भी जगह जगह प्रसाधन गृह बने थे. वहां प्रवास पर आने वाली पक्षियों के बारे में भी जानकारी होर्डिंग्स में उपलब्ध थी. उन्हें पढने में ही अच्छा खासा समय निकल गया. पता चला कि मेंग्रोव पेड़ों से आच्छादित यह झील ७० एकड़ में फैला है और यह भारत का प्राचीनतम संरक्षित पक्षी विहार है. कहा जाता है कि  उस क्षेत्र की जनता इन पक्षियों के कारण सदियों से लाभान्वित हो रही है. पक्षियों के मलयुक्त पानी की  उर्वरकता से पूरे क्षेत्र में सस्ते में बहुत अच्छी फसल होती है. वहां रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं करना पड़ता. ३०० वर्ष पहले कभी अंग्रेजी सैनिकों द्वारा वहां शिकार किये जाने का जनता ने जमकर विरोध किया था और तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने वेदान्तंगल को १७९८ में सरक्षित झील का दर्जा दिया था. उस क्षेत्र में दिवाली के समय फटाके भी नहीं फोड़े जाते, इस डर से कि पक्षी फटाकों की आवाज़ से भयभीत  न हो जावें.

खान पान की सामग्री तो हमारी बहना लेकर ही आई थी, सो उन्हें उदरस्थ करने की जगह भी मिल गयी. फिर एकबार दूसरे सिरे तक का रास्ता तय किया. दृश्य तो वही था.  हमें तो हजारों बगुले दिख रहे थे, हाँ उनमे बहुतेरे काले भी थे लेकिन बगुले काले तो नहीं होते. क्योंकि ज्ञान नहीं है और कभी प्रयास  भी नहीं किया कि इनके बारे में भी कुछ जानू. अब कौन उसमे पिनटेल है या गार्गेनी. हमारे लिए तो सब एक ही प्रजाति के लगे. वास्तव में यह हमारा पहला अवसर था. इसके पहले कभी कोई पक्षी विहार अथवा अभयारण्य देखा ही नहीं. हमारे साथ आया छोटा सलीम अली “सिद्धार्थ” दूरबीन आँखों से गडाए बड़े मजे ले रहा था. एक दो बार उससे आग्रह किया कि भाई हमें भी देख लेने दो, तो एक दो मिनटों के लिए दे देता और वापस छीन लेता.

जब सबका मन भर गया तो शाम लगभग ४ बजे वापसी  की योजना बनी. मुझे वास्तव में चेन्नई  संध्या ७.३० तक पहुंचना था जिससे मै छोटे भाई को आफिस से घर लाने गाडी भिजवा सकूँ. जब नीचे उतरे तो ताड़  के फलों के स्वादिष्ट हिस्से को काट काट कर बेचता एक आदमी दिख गया. बहुत सालों से मुझे इसकी तलाश रही है. हर फल में तीन अंडाकार (अंडे ही कह लेते हैं) सफ़ेद पारदर्शक पदार्थ होता है. उसके अन्दर भी मीठा सा रसीला तत्व रहता है. रसगुल्ले जैसे पूरा साबूत खाया जा सकता है, लेकिन अंडे जैसा ही उसका भी छिलका उतारना पड़ता है. देखा जाए तो अंडा ही तो है. सब ने खूब खायी  और उसके पास जितना भी बचा था सब खरीद लिया.

“उतीरामेरूर” होते हुवे हम वापस चेन्नई आ गए थे. एक छोटा सा क़स्बा “उतीरामेरूर” जिसका उल्लेख हमने अपने एक आलेख “१००० वर्ष पूर्व के प्रजातंत्र का संविधान”  में किया था, वहीँ पास  ही है.

नोट: चित्रों पर चटका लगायें तो वे बड़े दिखेंगे

18 Responses to “वेदान्तंगल पक्षी विहार/अभयारण्य”

  1. भारत भूषण Says:

    खूबसूरत वर्णन शब्दों में और उतने ही सुंदर चित्र. यह पूरी तस्वीर आपके यहाँ देखने को मिल जाती है.

  2. सतीश चन्द्र सत्यार्थी Says:

    क्या मनोरम जगह है!!! चित्र जीवंत हैं… सिद्धार्थ जी तो बड़े ज्ञानी हैं🙂

  3. Gyandutt Pandey Says:

    बहुत खूब।
    मेरे घर के पीछे ताड़ के वृक्ष हैं। उनसे बद्द बद्द फल गिरते हैं। आवाज आती है जैसे कोई व्यक्ति छत से कूदा हो। अगर फल इतने सुस्वादु हैं तो हम नाहक उनको यूं ही जाने देते रहे!😦

  4. Vinay Vaidya Says:

    वास्तव में पर्यावरण-दिवस के अवसर पर एकदम उपयुक्त
    सामग्री प्रस्तुत की आपने ! अगर ऎसे ही सबका ध्यान
    हमरी धरोहरों की ओर आकृष्ट किया जा सके, तो क़ाफ़ी-
    कुछ किया जा सकता है, खोई हुई पर्यावरण-संपदा को
    पुनः प्राप्त करने की दिशा में ! सादर,

  5. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन Says:

    आज तो दोहरी ट्रीट हो गयी। वेदांतंगल की जानकारी से और सिद्धार्थ से मिलकर मज़ा आ गया।

  6. समीर लाल Says:

    बहुत उम्दा विवरण एवं चित्र…नारियल की ढाब जैसा ही लगा देखकर…

  7. ghughutibasuti Says:

    वाह मजा आ गया. आपका सिद्धार्थ बहुत पसंद आया. अब जो भी बात समझ न आए उसी से पूछ लिया करना. क्या गजब का शिक्षक बन सकता है, अरे है ही वह!
    ताड़ के फल तो बहुत स्वाद होते हैं. कुछ स्वाद अभिजात्य टाइप के होते हैं कुछ भदेस. यह भदेस है और मुझे बहुत भाता है.
    घुघूती बासूती

  8. arvind mishra Says:

    मुझे आशंका थी कि सब कुछ दिखेगा मगर पक्षी ही नहीं -आशंका सच हुयी🙂

  9. SANDEEP PANWAR Says:

    फ़ोटो भी शानदार है, जानकारी के साथ।

    लगता है, यहाँ भी जाना ही होगा?

  10. राहुल सिंह Says:

    काले बगुले यानि बहुत संभव है कि पनकौए हों, कारमोरेन्‍ट और डॉर्टर.
    मजेदार है सिद्धार्थ का बुद्धत्‍व.
    पक्षियों की वजह से उर्वरकता और दीवाली पर भी पटाखे न चलाए जाने की बात रोचक लगी.
    ताड़ी का कांच जैसा glassy कोआ हमने भी खूब खाया है, पिछले सालों चेन्‍नई में और पहले-पहल बचपन में भभुआं में.
    अंततः ऐसी पोस्‍ट के मामले में पेरेनियल है आपका ब्‍लॉग भी.

  11. भारतीय नागरिक Says:

    यह तो स्वर्ग है..

  12. प्रवीण पाण्डेय Says:

    पक्षियों के लिये सर्वाधिक उपयुक्त स्थान।

  13. sktyagi Says:

    बढ़िया रही झील , और उससे भी बढ़िया थी सिद्धार्थ द्वारा पेरेनियल की सोदाहरण व्याख्या!!

  14. Zakir Ali Rajnish Says:

    अद्भुत है यह सब।

    ———
    बाबूजी, न लो इतने मज़े…
    भ्रष्‍टाचार के इस सवाल की उपेक्षा क्‍यों?

  15. GAGAN SHARMA Says:

    Simpaly Suparb

  16. J C Joshi Says:

    वर्णन पढ़ आनंद आया…अभयारण्य के नाम से शायद प्राचीन भारत में मान्यता की झलक प्रतीत हुई…

    जब हम छोटे बच्चे थे तो हमने पाया था कि समाज सीढ़ी के पायदान समान, अथवा पहाड़ों पर बने सीढ़ीनुमा खेतों समान, बंटा हुआ था – बड़े, बुजुर्ग, सबसे ऊपर (पूज्य) और अन्य आयु के अनुसार अलग अलग झुण्ड में… यदि हमारे बड़े बूढ़े पूजा कर रहे होते थे तो कोई उनसे यह नहीं पूछ सकता था कि आप यह क्यूँ कर रहे हो ? क्या ढूंढ रहे हो आँख बंद कर ? किन्तु वर्तमान में सब समतल मैदान समान हो गया है (शायद हिमालय के उत्पन्न होने से पहले का ‘भारत’ यानि ‘जम्बूद्वीप’ की झलक दर्शाते),, , जैसे पांच वर्षीय सिद्धार्थ भी तर्क के आधार पर आपसे चर्चा करता है और किस्वी दिन आप से पूछेगा आप मंदिर से मंदिर क्यूँ भटकते हैं ? किसे ढूंढ रहे हैं ? पत्थर की मूर्ती पर पानी, फूल, पत्ते आदि क्यूँ चढाते हैं? आदि आदि…

  17. zeal ( Divya) Says:

    बहुत सुन्दर चित्रों के साथ उपयोगी जानकारी मिली। एक बार चेन्नई गए थे हम लोग लेकिन इस अभ्यारण्य को देखने का अवसर नहीं मिला था। आज आपके माध्यम से एन्जॉय किया। भतीजे को भी अर्थ समझाने के लिए आभार।

  18. J C Joshi Says:

    मानव मस्तिष्क की कार्य विधि अद्भुत है, एक शब्द अथवा छवि आपके मन को वर्तमान से भूत की ओर उड़ा ले जाता है, जैसे मुझे जम्बुद्वीप ले गया और सिद्धार्थ समान मेरी भांजी की तब ४-५ वर्षीय लड़की से मेरी फोन पर बात…

    एक सुबह घंटी बजने पर फ़ोन का रिसीवर उठाया तो किसी बच्चे की आवाज सुनाई दी, तो सोचा कोई गलत नंबर होगा… मैंने पूछा, “कौन बोल रहे हो” ? तो उसने नाम बता कहा, “और कौन”! (दीदी ने बाद में बताया कि उसने उनसे नंबर ले अपनी डायरी में लिख लिया था)…

    मैंने उससे पूछा उसने क्या क्या किया था उस दिन, तो उसने जवाब दिया दादा जी को स्मॉल और बिग अक्षर सिखाये थे और पूजा की थी…
    मैंने पूछा पूजा कैसे की? तो उसने कहा “वैसे ही, तस्वीरों के सामने लाईट घुमाके” !
    इस पर मैंने पूछा भगवान् कहाँ रहते हैं? तो उसने कहा जो मर जाते हैं वो आकाश में चले जाते हैं, किन्तु भगवान् कहाँ गये पता नहीं!
    मैंने कहा वो तो सभी के भीतर हैं! तो उसका प्रश्न था कि यदि वो मेरे भीतर भी हैं तो दिखाई क्यूँ नहीं देते ?
    मैंने कहा आँख बंद कर उसे प्रकाश के रूप में देख सकते हैं !… तुरंत वो खुश हो बोली हाँ मुझे लाईट दिख रही है, किन्तु फिर वो मेरी विश क्यूँ नहीं पूरी करता?
    मैंने कहा केवल तुम ही तो नहीं हो जिसका उसने ख्याल करना है – आदमी ही नहीं, पशुओं, कीड़े-मकौडों, चाँद-तारों का भी…

    तब से उसने मुझसे प्रश्न नहीं पूछे हैं, या कहिये मेरी बात ही नहीं हुई है उससे, क्यूंकि तभी से वो बंगलूरू में रह रही है…

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