बिलिम्बी (Averrhoa bilimbi)

केरल में हमारे घर के सामने एक घर है. वह पहले एक छोटा सा मकान था जहाँ एक लुहार दम्पति रह रहे  हैं. अब वह दुमंजिला मकान बन रहा है.

दाहिनी तरफ हमारा घर है और बायीं तरफ लता का

लता, हाँ वही नाम है उस महिला का परन्तु लतिका कहलाना उसे अच्छा लगता है.  पूरा काम अपनी देख रेख में करवा रही थी. पति तो दुबई में है. एक ६ वर्ष की प्यारी  बिटिया भी है.  लतिका ने अपनी सुरक्षा के लिए एक कुत्ता और एक बिल्ली पाल रखा था. मेरी माँ ने एक अलग सन्दर्भ में बताया था कि उसके पास रात को कोई फटक भी नहीं सकता. मुझे बताया गया था कि उनकी पालतू बिल्ली ने इस बार चार बच्चे जने और एक एक कर सब को खुद ही खा गयी. बड़ा कौतूहल हुआ. कहीं माँ भी अपने ही बच्चों को खा सकती है. बिल्ला खा जाता है यह तो सुन रखा था.

प्रसव के बाद मेरे भांजी द्वारा लिया गया चित्र

हमने सोचा यह बिल्ली तो मीडिया में नहीं आ पाएगी, क्यों न अपने ब्लॉग रुपी मीडिया में ही उसे धिक्कारा जाए. अब उसकी तस्वीर चाहिए थी. लतिका,  उसकी बेटी और बिल्ली तीनों का हमारे घर आना जाना बना रहता है क्योंकि हमारे ही घर उनकी निर्माण सामग्री का ढेर पिछले डेढ़ साल से बना हुआ है.  इस कारण उसके घर बे झिझक चले गए थे. वैसे बिल्ली का स्वभाव तो सौम्य लगा.

कैमरे में उसकी तस्वीर कैद कर जब निकल ही रहा था तो उनके आँगन में एक पेड़ दिखा जिसमे गुच्छे में परवल जैसे फल तने में ही लटके हुए थे. पहले  इस फलसे हमारी मुलाक़ात नहीं हुई थी. अब हमारे लिए यह फल उस बिल्ली से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गयी.

पूछे जाने पर लतिका ने हमें बहुत शर्माते हुए बताया कि यह “इरुम्बनपुली” है और हम लोग इसे झींगा और मछली पकाने में प्रयोग करते हैं. उसे मालूम था कि हम लोगों के लिए मांस मछली वर्जित है और पारंपरिक रूप से ऐसे खाने वालों के घरों से  दूर ही रहते हैं.

घर आकर अपने माताजी से बातचीत की. उन्होंने भी बताया कि यह एक प्रकार की इमली है और इसका प्रयोग नीची जाति के लोग करते हैं. हमने तर्क दिया यह तो एक वनस्पति है और उसका प्रयोग कोई भी कर सकता है. ऊंची  या नीची जाति में क्यों बाँध रहे हो. उनका जवाब था हमारे घरों में प्रयुक्त नहीं होता क्योंकि उसका इस्तेमाल  मछली पकाने के लिए किया जाता है. हमने सोचा कैसी विडम्बना है. मछली पकाने के लिए नून, मिर्ची, तेल, हल्दी ये सब भी तो प्रयुक्त होते हैं. उनका फिर बहिष्कार क्यों नहीं करते.

हमने फिर अपनी जानकारी बढ़ाने की कोशिश की तो पता चला कि इसे केरल में भी कई नामों से जाना जाता है. इरुम्बन पुली, इरिम्बी, चेम्मीन पुली, कीरिचक्का आदि. परन्तु सार्वभौमिक रूप में यह बिलिम्बी (Averrhoa bilimbi) है. प्रधानतया यह दुनिया भर में  उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में होता है. इसके अतिरिक्त यह फ्रांस में भी पाया जाता है. इसका अचार, शरबत भी बनता है. चर्म रोगों में इसके गूदे का लेप लाभदायक बताया गया है.

http://en.wikipedia.org/wiki/Averrhoa_bilimbi

18 Responses to “बिलिम्बी (Averrhoa bilimbi)”

  1. राहुल सिंह Says:

    बिल्‍ली के इस व्‍यवहार पर विशेषज्ञों के राय की प्रतीक्षा रहेगी. बिलिम्बी का नाम, गुण-धर्म सब नया और रोचक है मेरे लिए.

  2. Bharat Bhushan Says:

    हमेशा की भाँति एक नया विषय और सुंदर विवरण. केरल में प्रवास के दौरान चेम्मीन पुली सुना था. कभी इसका प्रयोग तो नहीं किया. बिल्ली की कथा भली सुनाई आपने. जानवरों में अपने बच्चे खाने की प्रवृत्ति देखा जाती है लेकिन सभी में नहीं. हो सकता है यह selective eating होती हो. अन्यथा इनकी प्रजातियाँ समाप्त हो गई होतीं.

  3. समीर लाल Says:

    बताईये…फल और मसाले भी जाति की ऊँच नीच का द्योतक हो चले….अजब विडंबना है मगर मैने भी देखा है यह तेवर गांवों में…

    बिल्ली का बच्चे खा जाना सुना सुना ही था मगर आप तो ब्रेकिंग न्यूज फोटो सहित लाय आभार.

  4. प्रवीण पाण्डेय Says:

    बिल्ली का यह व्यवहार अजीब लगा। हम तो इस वनस्पति का शरबत ही पीना चाहेंगे।

  5. Alpana Says:

    बिल्ला ही नहीं बिल्ली के बारे में भी ऐसा पहले सुना था .लेकिन कभी यकीन नहीं होता था . आज एक उदाहरण तस्वीर में देख लिया.

    इरुम्बन पुली के बारे में आज जाना और चित्रों में इस नए फ़ल को देखा.
    जानकारी बढ़ी .
    वनस्पति के उपयोग पर भी भेद भाव !

    चर्चा चलेगी तो शायद और भी किसी वनस्पति या खाध्य पदार्थ के बारे में जानकारी मिलेगी जिन्हें नीचे या उच्च वर्ग के लिए वर्जित किया गया है या कभी किया गया था.

  6. sanjay Says:

    नून, तेल, हल्दी वाला तर्क निरूत्तर रहा होगा। ये कोई सी भी पुली हो, अचार तो हम भी खाना चाहेंगे इसका:) चित्र लाजवाब हैं।

    संतति भक्षण पर सुना था कि सांपिन अगर अपने बच्चो<(संपोलों) को न खाये तो धरती पर कदम रखने की जगह भी न बचे, नहीं जानता सच है या झूठ, लेकिन प्रकृति के अपने नियम कायदे हैं और इन्हें देखकर आश्चर्य कर सकते हैं, इन्हें चैलेंज नहीं कर सकते।

  7. arvind mishra Says:

    ये बिलिम्बी के बारे में तो जाना मगर मेरी रुच बिल्ली में ज्यादा बढ़ गयी है -क्या बिल्लियों में कैनाबिलीजम है ? ज़रा आप भी ढूढिये और मैं भी? कुछ जानवर अकाल की स्थति में ऐसा करते हैं -जब आहार में प्रोटीन की बहुत कमी होने लगती है -क्या इस बिल्ली को उसकी मालकिन प्रेटीनस डाईट नहीं दे रहीं ?

  8. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    डा. अरविन्द मिश्रा:
    मेरी बिटिया ने मुझे बताया कि दुर्बल बच्चों को माँ खा जाती है. दूसरी स्थिति का भी उसने उल्लेख किया कि जब माँ प्रसव के बाद अपने आपको दुर्बल महसूस करे तब भी अपने बच्चों को खा कर सशक्त होती है. आपकी बात सही लग रही है.

  9. Brij Mohan Shrivastava Says:

    बिल्ली के सम्बंध में जाना । और इमली वाबत भी।बहुत अच्छी बात लिखी है आपने कि फिर लोग तेल हल्दी का बहिष्कार क्यों नहीं करते । नई जानकारी । धन्यवाद

  10. सतीश सक्सेना Says:

    दोनों सूचनाएं नयी हैं …शुभकामनायें आपको !

  11. Gyandutt Pandey Says:

    क्या शानदार हरा भरा घर है। ऐसी जगह रहने को मिलना सौभाग्य है!

  12. J C Joshi Says:

    सुब्रमणियन जी, हमारे पूर्वज, योगी, ऋषि, मुनि, सिद्ध पुरुष आदि, हिमालय की ओर कई कारणों से आकर्षित होते रहे हैं, और जैसा आयुर्वेद के चलन से वर्तमान में भी संकेत मिलते हैं, उन्होंने गहराई में जा पेड़ पौधों आदि पर अनुसंधान किये और उनके विशेष गुणों आदि का ज्ञान प्राप्त किया… और परोपकारी होने के नाते उनका प्रसार भी किया होगा, जिस कारण घरेलू उपचार आदि सभी गृहणी तक को पता था, नानी के घरेलु नुस्खे समान…

    मैं सोचता हूँ वो ही आधार रहा होगा हरेक भोज्य पदार्थ की उपयोगिता के अनुसार हर वर्ण के अपने निर्धारित कार्य के अनुसार भोजन के रूप में ग्रहण करने का उनका सुझाव…

    अपने परिवार में भी हमने बचपन में दिल्ली में देखा था कि पहाड़ी ब्राह्मण यदि चावल, और गेहूं कि रोटी आदि खाते थे तो सुनते थे कि पहाड़ों में गरीब मडुआ, बाजरा, आदि खाते थे…

    बिल्ली के अपने बच्चों को खाने के बारे में सुन अजीब लगा, किन्तु शायद ऐसे ही अफ्रीका आदि में, जैसे सुनने को और टीवी आदि में देखने को भी मिलता है, शायद आदि मानव ने भी पशुओं से ही सीख मानव को ही खाना आरम्भ कर दिया होगा…

  13. sanjay bengani Says:

    जब गाँव में रहते थे तब सुना करते थे कि कुतिया प्रसव के बाद एक बच्चे को खा जाती है, हालांकि कोई प्रमाण कभी नहीं मिला. बिल्ली के बारे में आज पढ़ा.

    हमारे यहाँ कुछ लोग बेंगन, कद्दू जैसी सब्जियों को “नीच-जाति” की सब्जी मानते है!!! लेकिन बहु-संख्यक इससे सहमत नहीं है🙂

  14. Asha Joglekar Says:

    हमने सोचा कैसी विडम्बना है. मछली पकाने के लिए नून, मिर्ची, तेल, हल्दी ये सब भी तो प्रयुक्त होते हैं. उनका फिर बहिष्कार क्यों नहीं करते. yah to pehali bar suna . Ek naye fal ki jankari ke liye aapka shukriya . Chitr itane sunder hain ki kahne ko man lalcha gaya.

  15. Zakir Ali Rajnish Says:

    सचमुच, बिलिम्‍बी अदभुत है।
    ———
    विलुप्‍त हो जाएगा इंसान?
    कहाँ ले जाएगी, ये लड़कों की चाहत?

  16. incitizen Says:

    ऊंच-नीच में बंधकर ही भारत का भाग्य ऐसा हो गया और इसी थ्योरी का लाभ आज के राजनीतिबाज उठा रहे हैं.

  17. Amar Kumar Says:

    बिलम्बी के विषय में जान कर आश्चर्य हुआ..
    यहाँ भी यही हाल है.. कई खाद्य पदार्थ कुलीन और शूद्रों में बँटे हुये हैं ।

  18. सुमंत मिश्र Says:

    सुब्रह्मण्यमजी, कई माह पूर्व आपकी एक पोस्ट पद्मनाभपुर पर पढ़ी थी। अद्‌भुद्‌ जानकारी प्राप्त हुई थी। मेरा आग्रह पूर्वक निवेदन है कि अभी पद्मनाभस्वामी देवस्थान से प्राप्त सम्पत्ति और उसके भविष्य में होंने वाले प्रभावों पर एक पोस्ट लिखॆगे तो कृपा होगी।

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