Archive for जून, 2011

मगरमच्छ संरक्षण केंद्र,चेन्नई (Madras Crocodile Bank)

जून 15, 2011

इसी वर्ष चेन्नई प्रवास के वक्त  वहां से महाबलीपुरम जाते समय, ४५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित मगरमच्छ संरक्षण केंद्र (Madras Crocodile Bank) पर रुकना हुआ था क्योंकि यह हमारे द्वारा अनदेखा रहा है. मजे की बात यह है कि यह कोई सरकारी उपक्रम नहीं है. सन १९७६ में इसकी स्थापना कुछ अन्य मित्रों के साथ रोमुलस व्हिटेकर दम्पति ने की थी. प्रारंभ में यहाँ केवल ३० मगरमच्छ ही थे जो वहां प्राप्त संरक्षण के कारण बढ़कर २६०० के लगभग हो गए हैं.

दावा किया जाता है कि यह केंद्र विश्व भर में सरीसृपों (रेंगनेवाले जीव जंतुओं) का  सबसे बड़ा चिड़िया घर है. यहाँ अब न केवल भारतीय मूल के मगरमच्छ, घड़ियाल पनप रहे है अपितु विश्व भर से लायी गयी विभिन्न प्रजातियों के भी दर्शन होते हैं.  हमें एक बात खल रही थी,  भारतीय प्रजातियों को बड़ी संख्या में छोटे बाड़े और गंदे बदबूदार पानी में गुजारा करना पड़ता है जबकि इन्हीं के विदेशी बंधू सानंद अच्छे बड़े बाड़े में रखे गए हैं. संभवतः भारतीयों की यही नियति है.

बदबूदार  माहौल और पानी का कारण भी समझ में आ रहा था. पूरा क्षेत्र घने ऊंचे पेड़ों से आच्छादित है जिनपर हज़ारों की संख्या में बगुले विराजमान थे. उनका मल विसर्जन प्रदूषण उत्पन्न कर रहा था. यहाँ भ्रमण करते समय टोपी या रूमाल से सर ढांक रखना आवश्यक लगता है.

तामिलनाडू की एक जनजाति “ईरुला” सर्पों को पकड़ने के कौशल के लिए प्रख्यात है. उनके कौशल के सदुपयोग के लिए एक अलग से सहकारी समिति बनायी गयी है जो इसी केंद्र के अन्दर अपना अड्डा स्थापित किये हुए है. सर्पों को मटकों में रखा गया था.

यहाँ सर्प विष संग्रहित किया जाता है. सर्प विष की कीमत हज़ारों रुपये प्रति ग्राम है. यही उस सहकारी समिति के आय का स्रोत भी है.

दर्शकों को उस प्रक्रिया से अवगत भी किया जाता है. सर्पों के प्रदर्शन दौरान एक ईरुला जनजाति के व्यक्ति ने एक वाइपर के बारे में बड़ी रोचक जानकारी दी. उसने कहा, “यूं टच”, “स्प्रिंग जम्प” एंड “बाईट”. “नो टच” “नो बाईट”. सब को बात समझ में आ गयी. प्रसंगवश चेन्नई के गिंडी क्षेत्र में एक स्नेक पार्क है जहाँ सर्पों का अधिक अच्छा अध्ययन हो सकता है.

एक उपयोगी लिंक: http://www.madrascrocodilebank.org/cms/

वेदान्तंगल पक्षी विहार/अभयारण्य

जून 6, 2011

चेन्नई में अपने छोटे भाई  के घर इस अप्रेल में १५ दिन रुकना हुआ था. चेन्नई में ही मेरी एक बहन और भांजी  रहती है जो आकाशवाणी में कार्यरत है. मुझे पूरा यकीन है कि उसने अपने बेटे को उकसाया होगा. एकदिन  उस भांजी के बेटे “सिद्धार्थ” का फोन आया. वह मुश्किल से पांच साल का है लेकिन बातें  तो गौतम बुद्ध जैसी करता है. उसने कहा “ग्रांड मामा” चिड़ियों को देखना पसंद करोगे?. हमने पूछा कहाँ से लेकर आये हो और कौन सी चिड़िया है. उसने कहा नहीं एक बहुत पुरानी झील है, वहां हज़ारों  हैं.  हमने कहा इस अप्रेल के माह में वहां कुछ नहीं होगा. उसने कहा नहीं, वह पेरेनियल लेक है. जितने भी बाहर के पक्षी हैं न, वे सब मई में चले जाते है.हमें भी उसे उकसाने की मूड बन गयी और पूछा यह पेरेनियल क्या होता है. उसका तत्काल जवाब था, केला  एक फ्रूट है न. हमने कहा हाँ. उसने पूछा साल भर मिलता है न. हमने कहा हाँ. फिर उसने पूछा आम साल भर मिलता है क्या. हमने कहा नहीं. हमें सिद्धार्थ ने समझाया कि केला पेरेनियल फ्रूट है, जबकि आम नहीं है. वैसे ही जिस लेक में पानी हमेशा  बना रहता है वह पेरेनियल कहलायेगा न. हमने कहा ओके समझ गया, चलने की सहमति दे दी और सिद्धार्थ से कह दिया कि वह दूरबीन का इंतज़ाम कर के रखे. सिद्धार्थ ने  अपने नाना को फोन पकड़ा दिया और उन्होंने “वेदान्तंगल” नामके  झील की चर्चा की. हमारे लिए तो यह अनजानी जगह थी और पक्षियों का कभी भी सूक्ष्म अध्ययन नहीं किया था. हमें इस प्रस्ताव में एक अवसर दिखा जिसे भुनाना ही था.अगले ही दिन निजी वाहन से सिद्धार्थ के साथ निकल पड़े. उसके दादा दादी (हमारी बहन) भी थे.

हमने “वेदान्तंगल पक्षी विहार” की दूरी का पता लगा लिया था. राष्ट्रीय राजमार्ग ४५ पर चेंगलपट्टू (Chengelpet) (५९ किलोमीटर) तक चलकर वेदान्तंगल के लिए रास्ता मुड़ता है. वहां से २३ किलोमीटर  और जाना है. चेन्नई से कुल मिलाकर ८२ किलोमीटर रास्ता तय करना है. गर्मी तो जानलेवा लग रही थी. पारा तो ४० से कम ही था परन्तु  वह हमारे  (उत्तर भारत) के ४८  के ऊपर सा लग  रहा था. यह शायद हवा में नमी की वजह से है. पसीने से तर बतर हुवे जा रहे थे. अब निकल ही पड़े हैं तो झेलना भी है.

लगभग दो घंटे में हम लोग वेदान्तंगल पहुँच गए और वहां लगा हुआ सूचना फलक  हमारा स्वागत कर रहा था. कुछ सीढ़ियों को चढ़ सामने जो दृश्य था उसे देख ही मन प्रसन्न हो गया. चौड़े मेड पर पैदल चलने के लिए आकर्षक सीमेंट के ब्लोक्स बिछाए गए थे  और पर्यटकों की सुविधा के लिए भी जगह जगह प्रसाधन गृह बने थे. वहां प्रवास पर आने वाली पक्षियों के बारे में भी जानकारी होर्डिंग्स में उपलब्ध थी. उन्हें पढने में ही अच्छा खासा समय निकल गया. पता चला कि मेंग्रोव पेड़ों से आच्छादित यह झील ७० एकड़ में फैला है और यह भारत का प्राचीनतम संरक्षित पक्षी विहार है. कहा जाता है कि  उस क्षेत्र की जनता इन पक्षियों के कारण सदियों से लाभान्वित हो रही है. पक्षियों के मलयुक्त पानी की  उर्वरकता से पूरे क्षेत्र में सस्ते में बहुत अच्छी फसल होती है. वहां रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं करना पड़ता. ३०० वर्ष पहले कभी अंग्रेजी सैनिकों द्वारा वहां शिकार किये जाने का जनता ने जमकर विरोध किया था और तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने वेदान्तंगल को १७९८ में सरक्षित झील का दर्जा दिया था. उस क्षेत्र में दिवाली के समय फटाके भी नहीं फोड़े जाते, इस डर से कि पक्षी फटाकों की आवाज़ से भयभीत  न हो जावें.

खान पान की सामग्री तो हमारी बहना लेकर ही आई थी, सो उन्हें उदरस्थ करने की जगह भी मिल गयी. फिर एकबार दूसरे सिरे तक का रास्ता तय किया. दृश्य तो वही था.  हमें तो हजारों बगुले दिख रहे थे, हाँ उनमे बहुतेरे काले भी थे लेकिन बगुले काले तो नहीं होते. क्योंकि ज्ञान नहीं है और कभी प्रयास  भी नहीं किया कि इनके बारे में भी कुछ जानू. अब कौन उसमे पिनटेल है या गार्गेनी. हमारे लिए तो सब एक ही प्रजाति के लगे. वास्तव में यह हमारा पहला अवसर था. इसके पहले कभी कोई पक्षी विहार अथवा अभयारण्य देखा ही नहीं. हमारे साथ आया छोटा सलीम अली “सिद्धार्थ” दूरबीन आँखों से गडाए बड़े मजे ले रहा था. एक दो बार उससे आग्रह किया कि भाई हमें भी देख लेने दो, तो एक दो मिनटों के लिए दे देता और वापस छीन लेता.

जब सबका मन भर गया तो शाम लगभग ४ बजे वापसी  की योजना बनी. मुझे वास्तव में चेन्नई  संध्या ७.३० तक पहुंचना था जिससे मै छोटे भाई को आफिस से घर लाने गाडी भिजवा सकूँ. जब नीचे उतरे तो ताड़  के फलों के स्वादिष्ट हिस्से को काट काट कर बेचता एक आदमी दिख गया. बहुत सालों से मुझे इसकी तलाश रही है. हर फल में तीन अंडाकार (अंडे ही कह लेते हैं) सफ़ेद पारदर्शक पदार्थ होता है. उसके अन्दर भी मीठा सा रसीला तत्व रहता है. रसगुल्ले जैसे पूरा साबूत खाया जा सकता है, लेकिन अंडे जैसा ही उसका भी छिलका उतारना पड़ता है. देखा जाए तो अंडा ही तो है. सब ने खूब खायी  और उसके पास जितना भी बचा था सब खरीद लिया.

“उतीरामेरूर” होते हुवे हम वापस चेन्नई आ गए थे. एक छोटा सा क़स्बा “उतीरामेरूर” जिसका उल्लेख हमने अपने एक आलेख “१००० वर्ष पूर्व के प्रजातंत्र का संविधान”  में किया था, वहीँ पास  ही है.

नोट: चित्रों पर चटका लगायें तो वे बड़े दिखेंगे