Archive for अगस्त, 2011

विन्ध्य पर्वत श्रृंखला के जीवाश्म

अगस्त 26, 2011

कई वर्षों पहले मेरे एक मित्र ने बताया था कि उनके पास विरासत में मिली हुई एक ठोस शंख है. हम उत्सुक हुए और एक दिन चाय पीने उनके घर पहुँच गए. बातों ही बातों में हम ने उस शंख को देखने की इच्छा प्रकट की और उन्होंने दिखाया भी था. उसे देख समझ में आ गया था कि वह शंख का ही जीवाश्म है, लाखों/करोड़ों वर्ष पुरानी. पुनः एक बार जब मध्य  प्रदेश के मंडला जिले  के शाहपुरा इलाके से गुजर रहे थे तो हमें बताया गया था कि यहाँ एक बहुत बड़े इलाके में पेड़ पौधों के जीवाश्म बिखरे पड़े हैं. अब वह डिनडोरी जिले में है और राष्ट्रीय जीवाश्म उद्यान के रूप में संरक्षित किया जा चुका है. यह विध्याचल/सतपुड़ा पर्वत श्रृखला से घिरा है.

एक और बार जब उन्हीं सब इलाकों में जाना हुआ था तो एक युवा से हमने पुछा था कि यहाँ क्या जीव जंतुओं के जीवाश्म नहीं  पाए जाते  वह युवा बड़ा प्रसन्न हुआ और हमें “करपा” नाम के कसबे की पहाड़ी पर ले गया. वहां का हाल तो गजब का था. वहां की चट्टानों में हजारों की संख्या में शंख, जीवाश्म बने फंसे पड़े थे. वे चट्टानें हलकी चोट से ही टूट पड़ती थीं और शंख बाहर निकल आते थे. हमने भी ढेरों इकट्ठे कर लिये थे. चट्टान के एक छोटे टुकड़े को भी उठा लिया था जिसमे जीवाश्म फँसे थे. चट्टानों की भंजन शीलता और अपने थोड़े बहुत सामान्य ज्ञान से हम तो इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ये लावा से निर्मित हैं.  करोड़ों वर्ष पूर्व वहां समुद्र रहा होगा और किसी भूगर्भीय दुर्घटना/ ज्वालामुखी के फट पड़ने से पर्वत का रूप ले लिया और अपने साथ उन समुद्री जीवों को भी ऊपर उठा ले गया.

हिन्दू मिथकों में वर्णित अगत्स्य ऋषि इसी रास्ते सपरिवार दक्षिण के लिए निकल पड़े थे. कहा जाता कि यह पर्वत निरंतर ऊंचा ही उठा जा रहा था और सूर्य देव के मार्ग में बाधक बनने की सम्भावना बलवती हुई जा रही थी. समस्या के समाधान के लिए अगस्त्य जी को चुना गया. उन्हें पर्वत  से आग्रह करना पड़ा कि वह कुछ झुक जाए और उन्हें दक्षिण की ओर जाने के लिए मार्ग दे. पर्वत ने भी उनका सम्मान करते हुए उनकी  बात रख ली थी और कहा था कि उनकी वापसी तक वह झुका ही रहेगा. लेकिन यह बात विन्ध्य पर्वत श्रंखला के लिए कही गयी है.

शंख के इन जीवाश्ममों को  हमने अपने तरीके से उपयोग किया. जब भी हमारे संस्थान का कोई ऊंचा पीर आता और हमसे मिलता (ऐसा भी होता था)  तो हम एक शंख (जीवाश्म) को चांदी के वर्क में लपेटकर गिफ्ट रेप  कर उन्हें पकड़ा देते इस अनुरोध के साथ कि वे उसे अपने पूजा स्थल में रखें. घर में शान्ति बनी रहेगी. बड़ी श्रद्धा के साथ हमारी भेंट स्वीकार की जाती रही. भविष्य में और किसी को ये विरासत में मिलेंगे और फिर यही कहानी दुहराई जायेगी.

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अग्रहार (अग्रहारम)

अगस्त 20, 2011

अलग अलग समुदायों यथा यहूदी, पारसी, सौराष्ट्री, बिश्नोई,  ईसाई, माप्पिला आदि के बाद अब बारी है उन तामिल भाषी ब्राह्मणों की जो केरल में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं.बस केवल इतना कि वे कहा से आए और कहाँ कहाँ गये. “कुत्ते भटक रहे हैं अपनी दुम  की तलाश मे”, यह आपने कभी सुना है? पता नहीं अपनी वैदिक मंत्रों की तर्ज पर किस ने यह पेरोडी बनाई. मेरी बिटिया का तो कहना है क़ि यह तो आप की ईज़ाद है. पता नहीं.

दिल्ली सुलतान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मालिक कफूर (चाँद राम) ने १४ वीं सदी के प्रारंभ में मदुरै पर आक्रमण किया और इस शहर पर कब्ज़ा कर लिया था.  इतिहास में संभवतः यही वह समय है जब उस अंचल के ब्राह्मण, जो अग्रहारमों में रहा करते थे,  भयभीत हो गए और हिन्दू राज्यों में जाकर शरण लेने की सोची होगी. तमिलनाडु से सामूहिक पलायन कर जिन   लोगों का केरल आना हुआ था उन्हें  राजाश्रय प्राप्त हुआ और उन्हें शहर या गाँव के एक अलग भाग में बसाया गया. ऐसी बसावट को भी अग्रहारम या ग्रामं कहा गया. एक छोर पर या बीच में शिव का मंदिर और अगल बगल उत्तर से दक्षिण की ओर कतारों में बने लगभग १०० घर,  एक दूसरे से जुड़े हुए, आजकल के रो हौसेस की तरह. दूसरी तरफ ऐसे भी लोग थे जो तामिलनाडू में ही रह गए परन्तु कालांतर में इक्के दुक्के परिवार केरल में  अपनी किस्मत आजमाने के लिए चले आये और अलग अलग गाँवों  में बसते गए. उनके घरों को मठं कहा जाता है. इस तरह का विस्थापन लगभग २५० वर्ष पहले ही हुआ था.  इस दूसरे प्रकार के लोग अधिक खुले विचारों के हैं क्योंकि स्थानीय लोगों के वे अधिक करीब हैं जिसके कारण वे  स्थानीय संस्कृति और परम्पराओं में  रच बस गए.       चेन्नई के करीब दक्षिण चित्रा अग्रहारम (संरक्षित नमूना) (विकिमीडिया कामंस)

अग्रहार या अग्रहारम की बात चली है. विशुद्ध रूप से यह ब्राह्मणों की ही बस्ती हुआ करती थी और इसका उल्लेख ३री सदी संगम काल के साहित्य में भी पर्याप्त मिलता है. इन्हें चतुर्वेदिमंगलम भी कहा गया है. अग्रहार का तात्पर्य ही है  फूलों की तरह  माला में पिरोये हुए घरों की श्रृंखला. वे प्राचीन नगर नियोजन  के उत्कृष्ट उदाहरण माने जा सकते हैं. इन ग्रामों (अग्रहारम) में रहने वालों की दिनचर्या पूरी तरह वहां के मंदिर के इर्द गिर्द और उससे जुडी हुई होती थी. यहाँ तक कि उनकी अर्थ व्यवस्था भी मंदिर के द्वारा प्रभावित हुआ करती थी. प्रातःकाल सूर्योदय के बहुत पहले ही दिनचर्या  प्रारंभ हो जाती थी. जैसे महिलाओं और पुरुषों का तालाब या बावड़ी जाकर स्नान करना, घरों के सामने गोबर से लीपकर सादा रंगोली डालना, भगवान् के दर्शन के लिए मंदिर जाना और वहां से वापस आकर ही अपने दूसरे कार्यों में लग जाना.            कलपाथी अग्रहारम, पालक्काड (एक धरोहर ग्राम) चित्र: रामकृष्णन

Ramanathapuramयह रामनाथपुरम अग्रहारम पालक्काड में है

एक बालिका अपने घर के सामने चांवल  के सूखे आटे से रंगोली  डालते हुए

प्रति माह मंदिर में कोई न कोई उत्सव होता जब  मंदिर के उत्सव मूर्ती को रथ में लेकर घरों के सामने लाया जाता जहाँ लोग जाकर नैवेद्य के लिए कुछ न कुछ पकवान चढाते,  माथा टेकते और प्रसाद ग्रहण करते. दुपहर को पूरे ग्राम वासियों के लिए मंदिर की ओर से भोज (भंडारा) की व्यवस्था रहती. मंदिर के पास इफरात जमीन हुआ करती थी जिसके आमदनी से उनका खर्चा चला करता था.

                            परवूर (कोच्ची) का एक अग्रहारम

                  परवूर (कोच्ची), अग्रहारम के अन्दर सामुदायिक भवन

अग्रहारम के चारों तरफ दूसरे जाति के लोग भी बसते थे. जैसे बढई, कुम्हार, बसोड, लोहार, सुनार, वैद्य, व्यापारी   और खेतिहर मजदूर आदि. मंदिर को  और वहां के ब्राह्मणों को भी उनकी सेवाओं की आवश्यकता जो रहती. ब्राह्मणों के स्वयं की कृषि भूमि भी हुआ करती थी या फिर वे पट्टे पर मंदिर से प्राप्त करते थे.मंदिर की संपत्ति (मालगुजारी) की देख रेख और अन्य क्रिया कलापों के लिए पर्याप्त कर्मी भी हुआ करते थे जिन्हें नकद या वस्तु (धान/चावल) रूप में वेतन दिया जाता था. मंदिर के प्रशासन  के लिए एक न्यास भी हुआ करता था. कुल मिलाकर मंदिर को केंद्र में रखते हुए एक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था.     मट्टानचेरी (कोच्ची) के अग्रहारम का प्रवेश द्वार (इन्होने तो किलेबंदी कर रखी है!)

                            मट्टानचेरी (कोच्ची) का अग्रहारम

मूलतः तामिलनाडु के कुम्बकोनम , तंजावूर तथा तिरुनेलवेली से भयभीत ब्राह्मणों का पलायन हुआ था.  बड़ी संख्या में वे लोग पालक्काड़ में बसे और कुछ कोच्चि के राजा के शरणागत हुए. तिरुनेलवेली से पलायन करने वालों ने त्रावन्कोर में शरण ली और बस गये. उन्हें  राज कार्य, शिक्षण आदि के लिए उपयुक्त समझा गया और लगभग सभी को कृषि भूमि भी उपलब्ध हुई. केरल आकर उन्होने अपने अग्रहारम बना लिए और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को संजोये रखा. हाँ उनके आग्रहाराम में शिव मंदिर के अतिरिक्त विष्णु के लिए भी दूसरे छोर पर मंदिर बने. अधिकतर विष्णु की कृष्ण के रूप में पूजा होती है.

अब जमाना बदल गया है. आधुनिकता के चक्कर में कई घरों को तोड़कर नया रूप दे दिया गया है. इन ग्रामों की आबादी भी घटती जा रही क्योंकि घरों के युवा रोज़ी रोटी के चक्कर मे देश में ही अन्यत्र या विदेशों में जा बसे हैं और यह प्रक्रिया जारी है. अतः कई मकान स्थानीय लोगों ने खरीद लिए हैं. जो ब्राह्मण परिवार बचे हैं उनमे अधिकतर वृद्ध ही रह गये हैं. पालक्काड के आसपास अब भी बहुत से अग्रहारम हैं जहाँ  उत्सव आदि आधुनिकता के आगोश में रहते हुए भी परंपरागत रूप में मनाये जाते हैं. दीपावली  के बाद नवम्बर/दिसंबर में एक तमिल त्यौहार पड़ता है जिसे कार्थिकई  कहते हैं. यह कुछ कुछ भाईदूज जैसा है. हर घर के सामने रंगोली तो बनती ही है परन्तु शाम को उनपर नाना प्रकार के पीतल के दिए जलाकर रखे जाते हैं. यही एक अवसर है जब लोगों के घरों के बाहर दिए जलते हों. ऐसा दीपावली में भी नहीं होता.

                मट्टानचेरी (कोच्ची)  अग्रहारम में कार्थिकई के उपलक्ष में दीप जलाये गए हैं

                                      समाचार पत्र “हिन्दू” के मेट्रो प्लस से साभार