माप्पिला लामायण (रामायण)

रमजान के उपलक्ष में رمزان مبارك

इस्लाम के उदय के सैकड़ों वर्षों पूर्व से ही अरब के सौदागर अपनी अपनी जहाज़ लिए केरल पहुंच कर लगभग एक वर्ष (अगले  मानसून) तक डेरा डाले रहते थे. मुख्यतः वे यहाँ से काली मिर्च तथा अन्य मसाले ढो  कर ले जाते. (देखें भारत में प्राचीनतम मस्जिद). उनके साथ उनके नाविक, हमाल आदि भी होते थे. उन दिनों समूचे केरल को ही मलाबार कहा जाता था जब कि अब केवल केरल का उत्तरी हिस्सा ही मलाबार कहलाता है. उन दिनों केरल में मातृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था थी. स्त्री को किसी भी पुरुष से अंशकालिक या पूर्णकालिक सम्बन्ध स्थापित करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी. पुरुष से सम्बन्ध विच्छेद भी वह अपनी मर्जी से कर सकती थी. यह अरब से आये हुए सौदागरों, नाविकों आदि के लिए बड़ी अनुकूल स्थिति थी. स्थानीय महिलाओं के साथ शारीरिक सम्बन्ध बन जाया करता था.

“माप्पिला” का शाब्दिक अर्थ ही है “दामाद”. घर के बुजुर्ग उन अरब वासियों को “माप्पिला” कह कर संबोधित करते. कालांतर में इस्लाम के उद्भव के पश्चात सभी लोग जिन्होने इस्लाम स्वीकार किया या मजबूर किया गया मापिल्ल ही कहलाये. आज भी मलयालम भाषी मुसलामानों को माप्पिला अथवा मोपला कहा जाता है. अधिकतर वे गौर वर्ण के होते हैं जो उनके अरब से ताल्लुकात की ओर ही इशारा करते हैं.अरबी सीखना उनकी मजबूरी रही और उनकी बोलचाल की भाषा में भी इसका असर पड़ा. अब वे अरबी-मलयालम का प्रयोग करते हैं. दूसरे धर्म के स्थानीय लोगों से किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं था क्योंकि सबकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक ही थी जिसका वे आदर करते थे. सामाजिक सौहार्द्य की एक मिसाल कायम थी.

साहिब्दीन द्वारा १७ वीं सदी की एक पेंटिंग जिसमे लंका युद्ध दर्शाया गया है.
विकिमीडिया कामंस से

इनके यहाँ गायन की एक विशिष्ट शैली विकसित हुई जिसे “माप्पिला पाटुगल” (गाने) कहा जाता है चाहे विषय भक्ति हो, प्यार मोहब्बत अथवा विरह हो. रात सोने के पहले घर की महिलाएँ और लड़कियाँ उसी विशिष्ट शैली में गाती भी हैं. आज से सौ साल पहले इसी समुदाय का एक दाढ़ीवाला घुमक्कड़ फकीर भी हुआ करता था  जिसका नाम था पिरंतन हस्सन कुट्टी (पागल हुसैन). वह एक डंडे का सहारा लिए और पीठ में कपडे का झोला लटकाए जगह जगह जाया करता. माप्पिला पाटु की तर्ज पर वह भीड़ इकट्ठी कर रामायण सुनाता. कुछ गड़बड़ रामायण जैसा. उसके गीतों में हास परिहास और दोनों समुदायों की व्यंगात्मक शैली में खिंचाई की गयी होती. लोग सुन कर मजे लेते और उसकी भी खिल्ली उड़ाते. वह जमाना आजकल की तरह न होकर कुछ भिन्न था जब धर्म या आस्थाओं को भुलाकर भी लोग आनंद प्राप्त कर लेते थे.

इसे यों समझा जा सकता है. “शूर्पनखा  श्री राम से शादी करने की मांग करती है तो श्री राम कहते हैं नहीं एक आदमी एक ही स्त्री से सम्बन्ध बना सकता है. दो तो खतरनाक है. इसपर शूर्पनखा जवाब देती है, ये क्या बात हुई शरीयत में तो आदमी चार चार औरतों को रख सकता है. बेचारी औरत को यह इजाजत नहीं है”  इस तरह रामायण के अंशों का कुअरान से तुलना करते हुए दोनों ही तरफ कटाक्ष किये गए हैं.

हस्सन कुट्टी  के मृत्यु के बाद उनकी व्यंगात्मक गाथा को माप्पिला पाटुगल  में समाहित कर उन्हें गाने की एक मौखिक परंपरा चली आई है. अभी कुछ वर्षों पहले ही इस रामायण (लामायण) के ७०० पंक्तियों की शिनाख्त कर दस्तावेजीकरण /प्रकाशित किया गया जिसका विरोध दोनों ही समुदायों ने किया. संचयकर्ता कुन्हीरामन नम्बियार ने लोगों को समझाया कि यह दोनों समुदायों में सद्भावना का एक अद्भुत उदहारण है और लोगों को शांत कर दिया.

इस रामायण में कहानी एक सुल्तान की है और कई जगह राम को लाम कहा गया है. अन्य सभी पत्रों के नाम तो यथावत ही हैं.अब बात उठती है कि “र” के बदले “ल” का प्रयोग क्योंकर हुआ. अरबी की वर्णमाला में भी “र” की ध्वनि  है और मलयालम में भी. अतः अरबी सीखा हुआ कोई “र” को “ल” नहीं कहेगा. चीनी प्रभाव के कारण दक्षिण पूर्व एशिया में अलबत्ता “र” को “ल” उच्चारित किया जाता है. इंडोनेसिया, मलाया, कम्बोडिया, थाईलैंड आदि देशों में भी रामायण के भिन्न भिन्न रूप पाए जाते हैं और इसकी कथाओं का मंचन होता है. संभवतः माप्पिला लामायण का स्रोत भी वहीँ कहीं है.

इंडोनेसिया में रामायण बेले का मंचन जिसमे अधिकतर कलाकार मुसलमान हैं.

30 Responses to “माप्पिला लामायण (रामायण)”

  1. JATDEVTA SANDEEP Says:

    कितनी तरह से, कितने तरीकों से, कितने इलाकों में बहुत कुछ दिखाया जाता है।

    वो तो शुक्र है कि शरीयत वाली बात राम ने नहीं मानी

  2. राहुल सिंह Says:

    शास्‍त्र, परम्‍परा, इतिहास और लोक पर समन्वित दृष्टि का अनुपम उदाहरण.

  3. J C Joshi Says:

    पूर्वोत्तर में, भूटान में, सत्तर के दशक में सौभाग्य प्राप्त हुआ भारत के विभिन्न प्रदेशों से आये इंजिनियरों के साथ काम करने का… केरल से इदुक्की बाँध परियोजना के काम में अनुभवी कुछ, देखने में एक समान दिखने वाले, हिन्दू, मुस्लिम, और इसाई इंजीनियर्स से भी जान पहचान हुई…

    आपके माध्यम से आज अधिक जानकारी प्राप्त हुई… इतिहास भी बताता है कि व्यापार पहले ‘सिल्क रूट’ के माध्यम से सम्पूर्ण संसार में किसी समय प्रगतिशील सभ्यताओं के बीच आरंभ हो कुछेक सदियों से (?) चला आ रहा है… और आवश्यकतानुसार विभिन्न देशों में मानव ने भी स्थान और काल के अनुसार, भिन्न भिन्न कारणों से, कुछ व्यवस्था विशेष अपना लीं…

  4. Bharat Bhushan Says:

    ऊपर राहुल सिंह जी की टिप्पणी अपने आपमें संपूर्ण है. ‘रामायण’ के ‘लामायण’ बन जाने पर भाषा विज्ञान की दृष्टि से कुछ कहना चाहता हूँ.
    यदि दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रभाव के कारण ऐसा हुआ है तो इस उच्चारण प्रवृत्ति के एक हज़ार अन्य उदाहरण दोने होंगे ताकि इसे स्थापित प्रवृत्ति के तौर पर देखा जा सके. ऐसा संभव भी है क्योंकि पुराने मालाबार के लोग वहाँ जाते रहे हैं और बाली द्वीप तो यहाँ के लोगों ने ही बसाया हुआ है. परंतु यहाँ इसे अरब से आए लोगों से जोड़ कर देखने की आवश्यकता है.

    अगर द्रविड़ियन भाषा भाषिओं की बात करें तो ‘मापिल्ल रामायण’ बोलने में उन्हें कठिनाई नहीं होगी. लेकिन अरब भाषी को हो सकती है. ‘ल’ के बाद ‘र’ बोलने में स्पष्टतः एक कठिनाई होती है. ‘मापिल्ल’ में तो ‘ल्ल’ पर जिह्वा अटकेगी. मुख सुख की दृष्टि से संभवतः यही कारण रहा होगा कि ‘रामायण’ का ‘लामायण’ हुआ होगा. ‘ल’ के बाद ‘र’ की अपेक्षा ‘ल’ बोलना आसान हुआ होगा. भारतीय बच्चे भी स्वभावतः पहले ‘ल’ बोलना सीखते हैं और बाद में ‘र’. संक्षेप में इतना ही कि किसी वर्ण के उच्चारण पर उसके पहले और बाद में आने वाले वर्ण का प्रभाव पड़ता है.

    एक गाना था- ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िंदगी में आए तो बात बन जाए’. ‘बात बन जाए’ शब्द ‘बाप बन जाए’ सुनाई देता था.

    लोगों लोगों

  5. arvind mishra Says:

    केरल भारतीय संस्कृति का उदगम स्थल है -ऐसी मेरी मान्यता है .सबसे पहले मनुष्य का पदार्पण अफ्रीका से यहीं हुआ -कालांतर में उत्तर पश्चिम या अन्य मार्गों से भी मानव जत्थे यहाँ आये -केरल में भारतीयता की मूलावस्था को जानने समझने में ऐसे लेख एक दस्तावेज हैं -मातृ सत्ता का उल्लेख वेदों में अकारण नहीं है!

  6. Dr.ManojMishra Says:

    आपकी पोस्ट से ज्ञानार्जन होता है,बहुत जानकारी भरी पोस्ट,आभार.

  7. arunesh c dave Says:

    अभुत ही अद्भुत रचना ऐतिहासिक और धार्मिक सामजस्य दोनो ही रूप मे सहेजने लायक । इसे ही रचनात्मक लेखन कहते हैं । ज्ञान वृद्धी करने के लिये आभार इस रआमाय्ण को मै अवश्य पढ़ना चाहूंगा अगर आपके पास इस्का लिंक हो तो अवश्य प्रदान करें ।
    आभार

  8. प्रवीण पाण्डेय Says:

    इतिहास के अनजाने तथ्य, न जाने कितनी सांस्कृतिक सहृदयता लिये हैं।

  9. vinay vaidya Says:

    पी.एन.साहब,
    भाषा-विज्ञान की दृष्टि, विशेष-रूप से संस्कृत व्याकरण
    के अनुसार ’लृ’ तथा ’ऋ’ का ’र’ से सावर्ण्य होने के
    कारण जहाँ भी ये क्रमिक रूप से संधि से जुड़ते हैं,
    ’र’, ’ल’ में परिवर्तित हो जाता है, हाँ इसके अपवाद
    भी हैं, लेकिन वे विशेष स्थितियों के अनुसार होते हैं ।
    सादर,

  10. satish saxena Says:

    बेहद रुचिकर और नया विषय है मेरे लिए ! आपका आभार भाई जी !

  11. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    श्री विनय वैद्य का तर्क अनुकूल है. ‘र’ के ‘ल’ होने के ऐसे कई दूसरे उदाहरण भी हैं. आपने अच्छी जानकारी दी है. बेहतर होगा कि इस विस्तार से कुछ और प्रकाश डालें.

  12. Gyandutt Pandey Says:

    वाह! मापिल्ल लामायण का तो हिन्दी पद्यानुवाद होना चाहिये! मजा आयेगा!

  13. alpana Says:

    आश्चर्यजनक बातें पता चलीं. !
    मापिल्ल पाठ’ यहाँ अक्सर सुना करती थी..येही समझती थी कि मुस्लिमो द्वारा ईश्वर की भक्ति में गाया जाना वाला गीत है.

  14. स्वप्नेश चौहान Says:

    barhiya jaankari….

  15. ali syed Says:

    मातृवंशियों के रूप में मापेला ( मापिल्ल ) से पुराना परिचय रहा है पर पिरंतन हस्सन कुट्टी और कुन्हीरामन नम्बियार को जानना अद्भुत रहा !

  16. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ प्रतिष्टा में: ज्ञानदत्त जी:
    यह गाथा पूरा का पूरा अरबी मलयालम में है और मेरी पकड़ उस भाषा में अनुवाद करने योग्य नहीं है. प्रयासरत हूँ, कहीं से अंग्रेजी अनुवाद ही मिल जाए.

  17. sktyagi Says:

    अले लाम! क्या-क्या खोज ले आते हैं आप भी!! इसीलिए आपकी पोस्ट से सदा नयी- नयी और रोचक बातें जानने को मिलती हैं.

  18. ताऊ रामपुरिया Says:

    अत्यंत ही जानकारी भरा आलेख, पढकर एक बहुत ही ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त हुई, बहुत आभार आपका.

    रामराम.

  19. समीर लाल Says:

    वाकई, है तो ब्लॉगर की नजर….ये भी एक और तथ्य जाना…

  20. अभिषेक मिश्र Says:

    इतिहास और ज्ञान का अनोखा मेल होती हैं आपकी पोस्ट्स.
    लोक संस्कृति अक्सर उदार और तटस्थ होती है जिसके खुलेपन को शास्त्रीय मत स्वीकार करने में हिचकता ही है.

  21. विष्‍णु बैरागी Says:

    रोचक है। यद्यपि आप अपनी विवशता आप जता चुके हैं फिर तदपि कहने से नहीं रुका जा रहा कि इसका हिन्‍दी अनुवाद मिल सके तो उपलब्‍ध कराने की कृपा कीजिएगा।

  22. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन Says:

    माप्पिला लामायण की जानकारी रोचक है

  23. J C Joshi Says:

    मेरे ख्याल में रामायण के स्थान पर ‘लामायण’ के पीछे राम का नाम लेने से ‘काफिर’ कहे जाने का भय रहा हो सकता है,,, मैंने किसी को बोलते तो नहीं सुना किन्तु ‘माप्पिला’ के उच्चारण करने में ‘प्’ पर जोर दिए जाने से ‘ला’ आराम से आता होगा, इस कारण उसके बाद ‘रा’ का उच्चारण कठिन नहीं होना चाहिए था…

  24. ghughutibasuti Says:

    बढिया.
    घुघूती बासूती

  25. Lavanya Shah Says:

    most unusual post – thanx for bring such rare aspects of culture and history to light on internet .

  26. Asha Joglekar Says:

    आपके ब्लॉग पर आने से शही माने में ज्ञानार्जन हो जाता है मोपलाओं के बारे में सिर्फ इतना ही जानते ते कि ये केरला के मुस्लिम धर्मानुयायी हैं जो अरबों के वंशज हैं । आपने तो केरल की मिलीजुली संस्कृति के दर्शन करा दिये ।

  27. Zakir Ali Rajnish Says:

    बहुत ही रोचक जानकारी उपलबध कराई आपने, आभार।

    ——
    कम्‍प्‍यूटर से तेज़!
    इस दर्द की दवा क्‍या है….

  28. sanjaybengani Says:

    रोचक

  29. अजित वडनेरकर Says:

    ज्ञानवर्धक पोस्ट…

  30. Gagan Sharma Says:

    अनोखी जानकारी के लिए आभार

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