विन्ध्य पर्वत श्रृंखला के जीवाश्म

कई वर्षों पहले मेरे एक मित्र ने बताया था कि उनके पास विरासत में मिली हुई एक ठोस शंख है. हम उत्सुक हुए और एक दिन चाय पीने उनके घर पहुँच गए. बातों ही बातों में हम ने उस शंख को देखने की इच्छा प्रकट की और उन्होंने दिखाया भी था. उसे देख समझ में आ गया था कि वह शंख का ही जीवाश्म है, लाखों/करोड़ों वर्ष पुरानी. पुनः एक बार जब मध्य  प्रदेश के मंडला जिले  के शाहपुरा इलाके से गुजर रहे थे तो हमें बताया गया था कि यहाँ एक बहुत बड़े इलाके में पेड़ पौधों के जीवाश्म बिखरे पड़े हैं. अब वह डिनडोरी जिले में है और राष्ट्रीय जीवाश्म उद्यान के रूप में संरक्षित किया जा चुका है. यह विध्याचल/सतपुड़ा पर्वत श्रृखला से घिरा है.

एक और बार जब उन्हीं सब इलाकों में जाना हुआ था तो एक युवा से हमने पुछा था कि यहाँ क्या जीव जंतुओं के जीवाश्म नहीं  पाए जाते  वह युवा बड़ा प्रसन्न हुआ और हमें “करपा” नाम के कसबे की पहाड़ी पर ले गया. वहां का हाल तो गजब का था. वहां की चट्टानों में हजारों की संख्या में शंख, जीवाश्म बने फंसे पड़े थे. वे चट्टानें हलकी चोट से ही टूट पड़ती थीं और शंख बाहर निकल आते थे. हमने भी ढेरों इकट्ठे कर लिये थे. चट्टान के एक छोटे टुकड़े को भी उठा लिया था जिसमे जीवाश्म फँसे थे. चट्टानों की भंजन शीलता और अपने थोड़े बहुत सामान्य ज्ञान से हम तो इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ये लावा से निर्मित हैं.  करोड़ों वर्ष पूर्व वहां समुद्र रहा होगा और किसी भूगर्भीय दुर्घटना/ ज्वालामुखी के फट पड़ने से पर्वत का रूप ले लिया और अपने साथ उन समुद्री जीवों को भी ऊपर उठा ले गया.

हिन्दू मिथकों में वर्णित अगत्स्य ऋषि इसी रास्ते सपरिवार दक्षिण के लिए निकल पड़े थे. कहा जाता कि यह पर्वत निरंतर ऊंचा ही उठा जा रहा था और सूर्य देव के मार्ग में बाधक बनने की सम्भावना बलवती हुई जा रही थी. समस्या के समाधान के लिए अगस्त्य जी को चुना गया. उन्हें पर्वत  से आग्रह करना पड़ा कि वह कुछ झुक जाए और उन्हें दक्षिण की ओर जाने के लिए मार्ग दे. पर्वत ने भी उनका सम्मान करते हुए उनकी  बात रख ली थी और कहा था कि उनकी वापसी तक वह झुका ही रहेगा. लेकिन यह बात विन्ध्य पर्वत श्रंखला के लिए कही गयी है.

शंख के इन जीवाश्ममों को  हमने अपने तरीके से उपयोग किया. जब भी हमारे संस्थान का कोई ऊंचा पीर आता और हमसे मिलता (ऐसा भी होता था)  तो हम एक शंख (जीवाश्म) को चांदी के वर्क में लपेटकर गिफ्ट रेप  कर उन्हें पकड़ा देते इस अनुरोध के साथ कि वे उसे अपने पूजा स्थल में रखें. घर में शान्ति बनी रहेगी. बड़ी श्रद्धा के साथ हमारी भेंट स्वीकार की जाती रही. भविष्य में और किसी को ये विरासत में मिलेंगे और फिर यही कहानी दुहराई जायेगी.

24 Responses to “विन्ध्य पर्वत श्रृंखला के जीवाश्म”

  1. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन Says:

    आपने तो खज़ाने की कुंजी ही पकडा दी, धन्यवाद!

  2. jyotimishra Says:

    Nice read…. very informative🙂
    History n fossils always fascinate us !!

  3. Bharat Bhushan Says:

    युवावस्था में चंडीगढ़ के पास वाली शिवालिक पहाड़ियों पर यूँ ही घूमने गए थे और वहाँ सीपियाँ आदि दिखी थीं. बाद में पढ़ा कि यहाँ कभी समुद्र था. सुंदर जानकारी देता आपका आलेख और ऊँचे पीरों प्रसाद देता आलेख बढ़िया है.
    मेरे ब्लॉग पर एक आलेख समाचार-पत्र सा बन गया है. फुर्सत में देखिएगा. MEGHnet

  4. udantashtari Says:

    वाह बहुत उम्दा जानकारी…आनन्द आ गया.

  5. satish saxena Says:

    ऐसे स्थलों पर घंटो भटकते रहने का दिल करता है , जैसलमेर में भी एक पार्क है जहाँ यह खजाना बिखरा पड़ा है !
    आभार आपका !

  6. indian citizen Says:

    बहुत अच्छा लगा इस स्थान के बारे में जानकर. भौगोलिक परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन में सहायक रहे होंगे.

  7. arvind mishra Says:

    ..लेकिन मुझे तो आपने यह उपहार दिया नहीं बस दिखया भर!अब एक ब्लागर का कहाँ यह सौभाग्य ?:)

    कितनी अचम्भित करने वाली बात है जहां इस समय पहाड़ियां हैं कभी समुद्र ठाठें मारता था …धरती पर आये बड़े परिवर्तनों और काल निर्धारण आदि पुराशस्त्रीय गतिविधियों में इनका बड़ा महत्व है ….प्रोफ़ेसर जे बी एस हाल्डेन की इनमें बड़ी रूचि थी मगर खेद है वे भरात में इस के सरंक्षण, ज्ञान को विस्तार न दे सके ….

    सोचिये अगत्स्य मुनि अगर उत्तरायण को उन्मुख हो जायं तब क्या होगा ?

  8. J C Joshi Says:

    संक्षिप्त में कहूँगा कि ‘भारत’ पहले ‘जम्बुद्वीप’ था जब तक हिमालय इस द्वीप के उत्तर में सागर के गर्भ से उत्पन्न नहीं हो गया, और अन्य, विन्ध्य आदि पर्वत श्रंखलायें भी, कद में बढ़ गयीं होंगी… उत्तरी भाग का सागर जल धकेल दिया होगा दक्षिण की ओर, और जा मिला होगा ‘भारत के चरण पखारते’ वर्तमान सागर में (जिसे सांकेतिक भाषा में अगस्त्य मुनि की कहानी से दर्शाया गया जो, विष्णु द्वारा राक्षशों के संहार हेतु, सम्पूर्ण सागरजल ही पी गए!)… दक्षिण भारत ज्वालामुखी द्वारा बनी चट्टानों के कारण भूकंप आदि की दृष्टि से सुरक्षित माना जाता था, जब तक महाराष्ट्र में कोयना बाँध परियोजना बनाने के पश्चात हुए भूकंप के कारण हुए हानि के कारण दक्षिण क्षेत्र को भी भूचाल के नक़्शे में शामिल कर लिया गया…

  9. वर्षा Says:

    शंख तो मुझे कुदरत की अदभुत रचना लगते हैं। ध्यान से देखो तो कितनी लकीरें सिमटी रहती है, शंख के अंदर रहनेवाला जीव कितना मुलायम लगता है। शंख के ये जीवाश्म शंख से भी ज्यादा अदभुत। आश्चर्य जनक लगता है कभी वहां सागर रहा होगा जहां पर्वत उठ आए…

  10. poonam misra Says:

    अपने भौगोलिक इतिहास को समझने जानने मैन यह जीवशम कितने उपयोगी होते हैं .

  11. sanjay Says:

    ..और अगस्त्य मुनि दक्षिण से लौटे ही नहीं और विन्ध्य नतमस्तक रहकर वादा निभाता रहा। है न, सर?
    पांच छह बरस पहले लगभग एक सप्ताह के लिये पचमढ़ी गये थे। भ्रमण के दौरान पहाड़ों पर जो निशान थे, उनके बारे में गाईड ने यही बताया था कि ये समुद्र के जल के विभिन्न स्तर दिखाता है। बच्चे हैरान हो रहे थे कि यहाँ समुद्र कहाँ से आ गया? फ़िर उन्हें बताया कि समुद्र यहाँ आया नहीं, किसी भूकंप जैसी प्राकृतिक उथल पुथल के चलते यहाँ से छिटक गया था।
    अंतिम पैरा…….. स्वसंस्थान\ऊंचा पीर🙂

  12. डॉ. रामकुमार सिंह Says:

    आपके शोधात्‍मक कार्य के लिए साधुवाद, विन्‍ध्‍याचल के हम जन आपके ऋणी है
    सर्जना पर पढिये – फिर दिल्‍ली में बात चली है सारा सिस्‍टम बदलेगा। और एक ऐसे महान शिक्षक की कहानी जिसने सारा जीवन विद्यार्थियों के नाम लिख दिया ।

  13. sktyagi Says:

    वाह, सुब्रमनियन साहब…कहाँ कहाँ से क्या क्या नायाब खोज लातें हैं आप भी!!

  14. ताऊ रामपुरिया Says:

    अत्यंत रोचक जानकारी मिली, आपकी सभी पोस्टे संग्रहणीय होती हैं.

    रामराम.

  15. braj kishor Says:

    ऊँचे पीर ,तकदीर से फकीर और अकल से पैदल लगभग हर जगह होते हैं .
    तस्वीरों में लाल रंग से लगा कि ज्वालामुखी के लावा ने समुद्र के निर्दोष जीव जंतुओं को अभी अभी अपने चपेट में लिया है.
    समरथ को नहीं दोष गुसाई …

  16. Dr.ManojMishra Says:

    बढ़िया जानकारी,आज भी सोनभद्र (उत्तर-प्रदेश)में पहाड़ियों पर शैल चित्रों और जीवाश्मों की बहुतायत है.

  17. राहुल सिंह Says:

    श्रद्धा सहित आपकी यह नायाब भेंट स्‍वीकार.

  18. J C Joshi Says:

    क्या अगस्त्य मुनि अपना विन्ध्य पर्वत को दिया वादा निभाएंगे?
    वैसे देवताओं के राज्य में वर्तमान के समान लीखित संविशान नहीं चलता, वहां तो मान्यता है “प्राण जाएँ पर वचन न जाई”…

    जम्बुद्वीप को ‘राक्षश’ विहीन करने हेतु विष्णु जी यदि उसके उत्तरी भाग के सम्पूर्ण सागर जल को दक्षिण भेज सफाया कर सकते हैं तो यदि उन्होंने अपना वादा निभाया तो अनुमान लगाया जा एकता है कि क्या होगा यदि अगस्त्य मुनि उत्तर दिशा की ओर चल पड़ें – राक्षश अर्थात स्वार्थी तो आज सभी भारतवासी भी हो चुके हैं🙂

  19. प्रवीण पाण्डेय Says:

    अद्भुत, भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण।

  20. Bharat Bhushan Says:

    जन लोकपाल के पहले चरण की सफलता पर बधाई.

  21. alpana Says:

    अद्भुत जानकारी.रोचक कथा भी.
    संग्रह करने योग्य लगी यह पोस्ट .

  22. विष्‍णु बैरागी Says:

    यह डिण्‍डारीे जिले की निवास तहसील की सामग्री है। यहीं से प्राप्‍त, वृक्ष के तने का एक जीवाष्‍म मेरे पास भी है।

  23. Asha Joglekar Says:

    आपने तो बडी नायाब जानकारी निकाली है खोज कर । बिल्कुल उसी टक्कर की जो हमें बताती है कि हिमालय पर्वत के स्थान पर पहले टीथिस सागर हुआ करता था और हिमालय मे भी समुद्री जीवों के जीवाश्म पाये जाते हैं । आपके पास तो ये जीवाश्म भी हैं वाकई बडे भाग्यशाली शोधकर्ता हैं आप । इस जानकारी को और तस्वीरों को हमारे साथ साझा करने का धन्यवाद ।

  24. Zakir Ali Rajnish Says:

    हम तो सिर्फ इतना ही कह पाएंगे….आभार।

    ——
    नमक इश्‍क का हो या..
    पैसे बरसाने वाला भूत…

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