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पश्चिमी श्रीलंका – सुरम्य समुद्र तट

सितम्बर 24, 2011

श्री पी.एन. संपत कुमार, कोचिन शिपयार्ड, कोच्ची
के आलेख का हिंदी रूपांतर

कोलम्बो में हमारे ठैरने की व्यवस्था कोलम्बो डॉकयार्ड ने कर रखी थी. वहां के अतिथि गृह के संपर्क अधिकारी ने हमें अपने कार्यक्रम को निर्धारित करने में अत्यधिक सहयोग दिया था.

                                        कोलम्बो – भीगी भीगी सी

                                               कोलम्बो का रेलवे स्टेशन

१९ वीं सदी से २० वीं सदी तक कोलम्बो परंपरागत रूप से उपमहाद्वीप में एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक केंद्र रहा है जिसके कारण उसने भारत सहित कई अन्य राष्ट्रों के पेशेवरों को आकर्षित किया है. कोलम्बो की एक उन्नत समुद्री परंपरा भी रही है. पूरे विश्व में श्रीलंका की चाय, इलायची और अन्य मसालों की मांग अब भी बनी हुई है. आज का कोलम्बो एक आधुनिक महानगर है जो अपने गौरवशाली अतीत को पुनर्स्थापित  करने की कोशिश कर रहा है. वहां के आतंरिक संघर्ष के ख़त्म हो जाने से लोगों ने राहत महसूस किया है. अंततोगत्वा शांति स्थापित हो रही है. एक अच्छा नेतृत्व रहे तो शीघ्र ही सिंगापूर को भी पीछे छोड़ने की संभावनाएं बनती हैं.

बहमूल्य रत्नों (नीलम का खनन रत्नपुरा  में किया जाता है) एवं सिले सिलाये वस्त्रों की खरीदी के लिए कोलम्बो सबसे अच्छी जगह है. श्रीलंका की चाय,  रंगीन  मुखौटे, बुटिक कारीगरी आदि की अच्छी मांग है. नारियल वहां का स्थानीय उत्पादन है फिर भी वह प्रति नग ४० रुपयों (स्थानीय) में (भारतीय मुद्रा में लगभग २० रुपये) बिकती है. हमारे मानकों के लिहाज़ से यह कीमत अत्यधिक है. यही हाल वहां शाक सब्जी, चावल और दालों का भी है.

                                              बाज़ार में नारियल

                                                 दूकान में मुखौटे

                                            गोले (Galle ) फेस होटल

                                         स्लेव आईलेंड का इलाका

“पेटा” यहाँ का मुख्य बाज़ार है जहाँ हर चीज मिलती है और आप मोल भाव कर सकते हैं. बहुत अच्छे शौपिंग माल्स भी हैं जो अपेक्षाकृत महंगे हैं. गोले (Galle) फेस रोड यहाँ का व्यावसायिक केंद्र है और सड़क के उस पार का समुद्री तट सप्ताहांत में परिवारों के लिए छुट्टी मानाने की जगह है. यहाँ राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है. इसी सड़क पर सभी प्रमुख होटल (हमारे ‘ताज समुद्र’ सहित) भी हैं. इसी इलाके में उग्रवादियों द्वारा बारम्बार बम विस्फोट आदि किये जाते रहे हैं. लगा हुआ ही “सिन्नेमम गार्डेन” वहां का पॉश आवासीय क्षेत्र है. स्लेव आइलैंड में शासकीय एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के कार्यालय हैं.

                                   बौद्धों के लिए भी गणेश जी पूजनीय हैं

                                                 गंगा रामाया बौद्ध विहार

                                        मुरुगन अथवा कार्तिकेय का मंदिर

                                                     मस्जिद

धार्मिक स्थलों में यहाँ गंगा रामैय्या  बौद्ध विहार, एक बौद्ध मठ, हिन्दुओं का कार्तिकेय तथा शिव मंदिर ख्याति प्राप्त हैं. इनके अलावा एक मस्जिद और पुर्तगाली चर्च भी है.

श्रीलंका के कई समुद्री तट (बीच) विश्व स्तरीय हैं. इनकी संख्या इतनी है कि चुनाव करना बड़ा मुश्किल हो जाता है.  श्रीलंका के दक्षिणी छोर में स्थित “गोले” (Galle) तक जाने के लिए हम लोगों ने पश्चिमी समुद्र तटीय मार्ग को चुना. सड़क के साथ साथ ही रेलवे लाइन भी जाती है और पूरी यात्रा के दौरान अपने दाहिनी तरफ के समुद्र को निहारते रहना एक सुन्दर अनुभूति रही.

रास्ते में (समुद्री किनारे) लकड़ी के कारीगरों (बढई) की एक बस्ती दिखी जो श्रीलंकाई फर्नीचर बनाने में निपुण थे. वे आज भी लकड़ी की आराम कुर्सियां, डोलने वाली (कमानीदार) कुर्सियां बनाते हैं जिनका  विश्व में बड़ा व्यापक बाज़ार है. यहाँ के बढई बहुत ही ऊंचे दर्जे की कारीगरी के लिए प्रसिद्द हैं. बड़े बेहतरीन मुखौटे बनाते हैं और उनका शिल्प कर्म उच्च कोटि का है. इन कारीगरों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बने एक संग्रहालय में भी हम लोग गए थे जो आगे हिक्कादुवा (Hikkaduwa) बीच के पास ही है.

                                           मुखौटों का संग्रहालय

                                         हिक्कादुवा का बीच (समुद्र तट)

कोलम्बो से ६० मील दक्षिण में हिक्कादुवा (Hikkaduwa) का प्रसिद्द बीच पर्यटकों के लिए एक पसंदीदा जगह है. उस समय सुबह के १० बजे थे. किसी बीच में जाने के लिए एकदम ही अनुपयुक्त. अचानक हुई बारिश ने तो सत्यानाश ही कर दिया. आश्चर्य नहीं हुआ जब हमने बीच को वीरान पाया.

एक भवन के ऊपर लिखा था “Hikkaduwa Diving School”. यह देख कर समझ में आया कि वहां समुद्र में गोते लगाने का प्रशिक्षण दिया जाता है. उस भवन में हम लोगों ने प्रवेश किया. वहां उपस्थित सज्जनों ने हम लोगों को समुद्र में ले जाकर मूंगो की चट्टानों/बागों और वहां की निराली दुनिया को दिखलाने की पेशकश की. स्थानीय १५०० रुपयों में वहां चले चलने के प्रस्ताव को हम लोगों ने ख़ुशी ख़ुशी मान लिया. हामारे चालक महोदय ने इस सौदे का यह कह समर्थन किया कि यह एकदम जायज़ है.

समुद्र में कुछ किलोमीटर जाने के बाद पानी के नीचे के जीवन के अद्भुत नज़ारे देखने मिलते हैं. हामारी नांव  में नीचे कांच लगी हुई थी और यही सहायक हो रहा था. फूलों की तरह अलग अलग रूपों में भांति भांति के मूँगों की संरचनाये (कुछ तो पत्ता गोभी के आकर के भी थे) और समूह में तैरतीं रंगीन मछलियाँ  बड़ी लुभावनी लगीं. समुद्र कुछ अशांत सा था और हमें अपने आपको संतुलित रखने में बड़ी कठिनाई हो रही थी. यह एक कारण था कि हम चाह कर भी तस्वीरें नहीं ले सके, जिसका हमें अफ़सोस है. नांव खिवैय्ये ने कुछ और आगे चल कर डोल्फिनों को दिखा लाने की पेशकश की थी परन्तु हमने ठुकरा दिया. 

खतरनाक सुनामी का असर और भी अधिक भयावह होता यदि वहां मूंगे की चट्टानों का अवरोध न होता. विदित हो कि `हिक्कादुवा (Hikkaduwa) में ही उस विध्वंसकारक सुनामी की चपेट में  एक यात्री ट्रेन आ गयी थी और १००० से अधिक लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी.

हिक्कादुवा से आधे घंटे के सफ़र के बाद हम लोग गोले (Galle) पहुंचे. यह शहर भी उस विध्वंशकारी सुनामी का शिकार बना. यहाँ हजारों की संख्या में लोग काल कलवित हुए थे. यह रेलवे स्टेशन से युक्त एक सुन्दर शहर है. एक अच्छा क्रिकेट का मैदान भी है जहाँ अन्तराष्ट्रीय स्पर्धाएं होती हैं. पुर्तगालियों और बाद में डच लोगों ने यहाँ एक किला बनवाया और अपना नियंत्रण रखा. किले के खँडहर और कार्यरत लाईट हाउस यहाँ के प्रमुख आकर्षण हैं. शहर और वहां की पुरावस्तुओं (एंटीक) की दूकानों को देख कर लगा कि हम कोच्ची के फोर्ट इलाके में हैं. क्यों न हो, आखिर दोनों में ऐतिहासिक समानताएं भी तो हैं. गोले (Galle) एक प्राचीन बंदरगाह था. श्रीलंका से इलाईची का निर्यात ईसापूर्व १४०० सालों से किया जा रहा है.

                                                 किले का प्रवेश द्वार

                                                                   किले के अन्दर एक पुराना भवन

                                        किले के अन्दर का एक भाग

                                          किले के अन्दर की एक गली

                                     दक्षिणी छोर पर स्थित प्रकाश स्तम्भ

गोले (Galle) का आधुनिक इतिहास सन १५०५ से प्रारंभ होता है जब एक पुर्तगाली जहाज़ तूफ़ान में फंसकर यहाँ किनारे आ लगा था. वहां के लोगों ने पुर्तगालियों को प्रवेश करने नहीं दिया तब बलपूर्वक पुर्तगालियों ने  गोल पर कब्ज़ा जमा लिया. सन १६४० में पुर्तगालियों को डच (होल्लेंड/निदरलेंड) लोगों के समक्ष समर्पण करना पड़ा. गोल पर अब डच लोगों का कब्ज़ा हो गया. वर्त्तमान किले का निर्माण डच लोगों ने ही १६६३ में किया था. सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र नाम से तीन बुर्ज बनाये गए. श्रीलंका पर कालांतर में अंग्रेजों का अधिपत्य हो गया. उन्होंने किले को बिना कोई परिवर्तन किये यथावत रहने दिया और गोल के लिए प्रशासनिक केंद्र के रूप में उपयोग किया.

                                               उनवतुना बीच
दक्षिण पश्चिम की ओर ३ मील और आगे है विश्व के १२ सुन्दरतम बीचों में एक “उनवतुना” (ऐसा ही उनका दावा है). किनारे नारियल के पेड़ों से आच्छादित चार किलोमीटर लम्बे रेत का फैलाव समुद्र की शान्ति का आनंद लेने वालों के लिए मानो स्वर्ग ही है. यहाँ गोताखोरी के लिए अनुकूल परिस्थितियां है. समुद्र में आगे मूँगों की चट्टानें हैं ओर उथला होने की वजह से डुबकी लेकर नहाना,तैरना सभी एकदम सुरक्षित है.

स्कूबा जैसे रोमांचक जल क्रीडा के लिए तो यह जगह सर्वोत्तम है हालाकि हम लोग  ऐसी गति विधियों से दूर ही रहे. लगभग ३ घंटे समुद्र तट में तैरते,नहाते गुजार दिए. हमारा पुत्र तो पानी से बाहर आने से इनकार ही करता रहा और बड़ी मुश्किल से वह अनमने से होकर लौटने के लिए तैयार हुआ. जीवन में मैंने भी इस से अच्छी बीच नहीं देखी है जहाँ मैंने नहाया हो.

                                            उनवतुना में समुद्र                                                                          उनवतुना में समुद्र
सुनामी के बाद जो यहाँ से पलायन कर गए थे वे कई वर्षों तक यहाँ वापस लौटने के लिए राजी नहीं थे. कई लोग मध्य  श्रीलंका में जाकर बस गए थे. अभी कुछ ही वर्षों से शासकीय प्रयासों और अन्तराष्ट्रीय पर्यटकों क वापसी से पर्यटन व्यवसाय ने जोर पकड़ा है.

भारत घर वापसी के एक पखवाड़े बाद हम लोगों ने यह जानने की कोशिश की कि श्रीलंका में और क्या देखना बाकी रह गया था. उनकी सूची भी बना ली. त्रिंकोमाली (तिरुकोन्नामलई) का मशहूर ब्रिटिश बंदरगाह जहाँ रामेश्वरम या अन्य ज्योतिर्लिंगों  के समकक्ष महत्त्व रखने वाला शिव मंदिर, कातिरकमा (कटरगमा), ऐतिहासिक महत्त्व का स्कन्द कुमार (कार्तिकेय) का मंदिर जो दक्षिणी श्रीलंका में है, पूर्वी तट पर के कुछ अच्छे बीच,यल्ले राष्ट्रीय उद्यान, आदम की चोटी और उत्तर का अशांत क्षेत्र बचा हुआ है. अब क्योंकि तूतीकोरिन (तूतुकुडी) और कोलम्बो के बीच समुद्री यातायात प्रारंभ हो चला है और उत्तरी श्री लंका के लिए भी ऐसी सेवायें प्रारंभ होने वाली है, एक बार और श्री लंका की यात्रा के बारे में सोचा जा सकता है. कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहाँ बारम्बार जाने की इक्षा होती है, अपने गृह नगर जैसा.

 

हाय मेरा लालू नहीं रहा

सितम्बर 22, 2011

आज मन अवसाद से भरा है. कुछ माह पूर्व खुश होकर अपने (मोहल्ले के) लालू (श्वान) पर एक पोस्ट लिखी थी क्योंकि वह अपने लिए एक वधू लेकर आया था. कालांतर में ४ बच्चे भी हुए थे. इस बारिश के मौसम के आरम्भ में न मालूम क्या हुआ, उसकी वधू ने कहीं और रिश्ता बना लिया. कुक्कुरों के लिए यह तो सहज ही माना जाएगा परन्तु उस दिन से हमारा लालू एकाकी हो गया और वियोग में इधर उधर भटकता रहता. दुखी रहने के बावजूद वह लोगों को पहचानता था और दुम हिलाकर पोसिटिव  स्ट्रोक्स भी दिया करता. जब मैं घर के बाहर आता तो वह भी पास आ जाता. हम दोनों में मूक संवाद का दौर चलता क्योंकि हमारी मनःस्थिति  भी कुछ कुछ उससे मिलती जुलती रही. हमने भी तो अपने   जीवन साथी को खो दिया. कुछ मिनटों के संवाद से हमारा मन भी हल्का हो जाता और शायद उसका भी.

परिसर में विभिन्न लोगों के घर के बासी रोटियों पर ही उसकी ज़िन्दगी चल रही थी. न केवल परिसर के प्रति वह पूर्ण निष्ठावान था अपितु परिसर के हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से पहचानता भी था. किसी भी अपरिचित के परिसर में घुसने पर वह अपनी अप्रसन्नता प्रकट करते हुए जोर जोर से भौंक कर लोगों को आगाह कर देता, चाहे दिन हो रात.परन्तु उसने कभी भी किसी को काटा  नहीं है. मजाल है कोई दूसरा जानवर अन्दर आ जाए.

आज सुबह १० बजे उसके रोने की आवाज आई. बाहर जाकर देखा तो पता चला कि बगल जो महाशब्दे जी रहते हैं, उनकी कार के नीचे बैठा हुआ था. उन्होंने कार चालू की परन्तु वह नहीं हटा. नीचे उतर कर जब उसे भगाने का प्रयास किया तो और जोर जोर से रोने लगा. गाडी को निकाल पाना मुश्किल था क्योंकि लालू के दबने का खतरा था. लगभग एक घंटे तक की कोशिश के बाद वह कराहते हुए बाहर निकला तो हम लोगों ने पाया कि वह अपने पुट्ठों को उठाने में अक्षम हो गया है. इस लिए कोशिश के बावजूद अपनी जगह से इधर उधर सरक नहीं पा  रहा है. यही बात समझ में आई कि या तो किसी ने उसके पृष्ट भाग पर निर्दयता से प्रहार किया है या फिर कोई गाडी उस पर चढ़ गयी थी. हम लोग कुछ कर नहीं पा  रहे थे और उसकी दयनीय स्थिति देखी भी नहीं जा रही थी.लोग कितने निष्ठुर हो चले हैं. एक बेजुबान के साथ ऐसी निर्दयता.

आज शाम (20-9-2011) जब ऊपर की बालकनी से बाहर झाँका तो हमारा लालू सड़क पर निष्प्राण पड़ा था. कुछ सहृदय लोगोंने उसके शरीर पर कुछ फूल अर्पित किये थे. शायद यही उसकी नियति रही.

श्रद्धांजलि….