तिरुपुनितुरा वृश्चिकोत्सव

कोच्ची (केरल) का  एक इलाका “तिरुपुनितुरा” मध्ययुग से ही कोचीन रियासत के राजाओं का आवास  रहा है और राजधानि भी. उनके आराध्य देव महाविष्णु का एक भव्य मंदिर भी है जिसे   “पूर्णत्रयेसा” मंदिर कह कर संबोधित किया जाता है. केरल के मंदिरों में इस मंदिर की एक अलग पहचान है. यहाँ श्री विष्णु भगवान् शेषनाग के फन के नीचे बैठी हुई मुद्रा में हैं. इन्हें सन्तानगोपाल भी कहते हैं. मंदिर का गर्भगृह गोलाकार है और विष्णु की  प्रतिमा के अतिरिक्त उनके दसों अवतारों की भी कांस्य प्रतिमाएं रखी हुईं हैं. ऐसी मान्यता है कि यहाँ आने पर निस्संतान दम्पतियों को संतान प्राप्ति का योग बनता है. इस मंदिर में वैसे तो कई समारोह होते रहते हैं परन्तु सबसे अधिक महत्वपूर्ण उत्सव वृश्चिकोत्सव कहलाता है जो नवम्बर/दिसंबर में पड़ता है. इस वर्ष यह ८ दिनों का उत्सव २३ नवम्बर को ध्वजारोहण के बाद प्रारंभ हुआ था. २६ तारीख को “त्रीकेटई” के दिन सभी हाथियों के मस्तक पर स्वर्णपत्र  युक्त कवच पहनाया जाता है और एक अनुष्ठान होता है. तदुपरांत स्वर्ण कलश में जनता द्वारा भेंट राशि (कनिक्या) डाली जाती है. इसके लिए हजारों की भीड़ जमा थी और कतार भी गजब की लम्बी. हम भी शामिल हो गए थे परन्तु कतार रेंगने की बजाय बड़ी तेजी से आगे बढती गयी. उस भीड़ में कुछ विदेशी भी दिखे जब कि गैर  हिन्दुओं का मंदिर में प्रवेश यहाँ प्रतिबंधित है. पर्यटन की व्यवस्था करने वालों ने  इसका भी तोड़ निकाल लिया है. विदेशियों को आर्य समाज के मंदिर में ले जाया जाता है और वे तात्कालिक सुविधा के लिए हिन्दू बन जाते हैं. अब उनके पास हिन्दू होने  का प्रमाण पत्र जो है.

Tayambaka

उत्सवों के समय लगभग सभी मंदिरों में वहां के देवता के प्रतिरूप को हाथी पे रख कर गाजे बाजे के साथ घुमाया (शोभा यात्रा) जाता है. इसके लिए हर मंदिर के पास कम से एक हाथी रहता है.”पूर्णत्रयेसा” मंदिर में १५ हाथियों  का समूह रहता है और बीच वाले हाथी पर ही श्री विष्णु जी की सवारी होती है. हाथी के मस्तक पर एक चैत्य (स्तूप) के आकार की पट्टिका (कोलम) एक व्यक्ति थामे रहता है जिसके नीचे बीचों बीच देव प्रतिमा (उत्सव मूर्ती/तिडम्बू) रखी होती है. यह गर्भ गृह के मूर्ती से अलग परन्तु प्राण प्रतिष्ठा कर  (अहवान) बाहर लाया गया होता है.

अलग अलग दिनों में, अलग अलग वाद्यों के साथ [यथा चेंड़ा (विशेष प्रकार की ढोल), मंजीरा, शहनाई, दुन्दुभी आदि], अलग अलग ख्याति प्राप्त समूहों द्वारा ,विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के समय, एक विशिष्ट शास्त्रीय शैली में, वादन की विभिन्न विधाओं की प्रस्तुतियां दी जाती हैं. वाद्य शैलियों के भी अलग अलग नाम हैं जैसे तायम्बका, मेलम, पञ्चवाद्यम आदि. हमने पाया कि दर्शक समूह में हजारों लोग इस वादन में तल्लीन हो जाते हैं और लगता है वे उसकी बारीकियों को भी जानते हैं. प्रारंभ में गति धीमी रहती है जो शनै शनै  तीव्र होती जाती है जिसके कारण एक प्रकार का उन्माद निर्मित होता है. इस अवस्था में पहुँचने के लिए ३/४  घंटे  लग जाते  हैं.चेंड़ा” ताल वाद्यों में सबसे प्रमुख होता है. इस वर्ष का “मेलम” पद्मश्री कुट्टन मारार के द्वारा संचालित था.

जैसा कि सर्वविदित है, मंदिरों के इर्दगिर्द मिथकों का मकडजाल बना होता है. यहाँ भी बहुतेरे हैं और सबों को संकलित करें तो  एक बड़ा ग्रन्थ बन जाए.  इस मंदिर के विभिन्न उत्सवों में एक दिन उस “मूसारी” (मूर्ती गढ़ने वाला) को भी श्रद्धा पूर्वक याद किया जाता है जिसने गर्भगृह में रखे विष्णु की प्रतिमा गढ़ी थी. मूर्ति को गढ़ने के लिए कई धातुओं को मिश्रित किया गया था जिसका अपना एक गणित होता है. सांचे से निकालने के बाद मूर्तिकार ने देखा कि एक हिस्से के धातु का एक अंश मूल मूर्ति से अलग होने को है. उसने अंगारे जैसे लाल मूर्ति को अपने आगोश में ले लिया और अपने प्राणों की आहुति दे दी. कहते हैं, वह मूर्ति के साथ ही विलीन हो गया था.

केरल के राजाओं और ख़ास कर कोच्ची के राजघराने द्वारा क्षेत्रीय कलाओं को पाला पोसा गया है. पारंपरिक नृत्य, शास्त्रीय गायन, वादन आदि सिखाये जाने के लिए महाविद्यालय लम्बे समय से विद्यमान हैं. संस्कृत और आयुर्वेद के भी महाविद्यालय हैं. मध्य केरल के लिए तिरुपुनितुरा सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र है. उत्सव के दिनों में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन मंदिर परिसर में होता रहता है.

२६ नवम्बर विशेष रहा. पता चला था कि शास्त्रीय गायन की समाप्ति के बाद केरल की पारंपरिक नृत्य नाटिका “कथकली” का मंचन होने वाला है. जैसा पाठक जानते ही होंगे इस नृत्य शैली में गायन पार्श्व में होता है और विभिन्न पात्रों द्वारा मुद्राओं  तथा भाव भंगिमा के द्वारा ही कथानक की अभिव्यक्ति होती है. उस दिन “कंस वध” का मंचन होने वाला था. ऊपर एक जगह कथकली के कलाकारों का ग्रीन रूम था जहाँ उनका  मेक अप किया जा रहा था. उस समय मेक अप अपने प्रारंभिक अवस्था में थी और पूरा होने में २/३ घंटे और लगने वाले थे. कुछ चित्र लिए और तभी देखा कि एक बालिका (१२ वर्ष) का भी मेक अप किया जा रहा है.

यह मेरे लिए तो आश्चर्य जनक रही क्योंकि कथकली में महिला पात्रों को पुरुषों द्वारा ही निभाया जाता है. पूछ ताछ करने पर पता चला कि अब वैसा नहीं है. इसी शहर में ५० सदस्यों वाली एक महिला मंडली भी है जो कथकली का मंचन करती है. केरल के राजघराने (वर्त्तमान वंशज) ने ही यह कर दिखाया.

३० तारीख को उत्सव का अंतिम दिन था. कार्यक्रम मंदिर के सामने बने मंडप में हुआ. हाथियों की संख्या घट कर पांच हो गयी और ३ घंटे तक पारंपरिक  वाद्य “पञ्चवाद्यम” बजाय गया. इसके बाद मंदिर के मुख्य पुजारी के द्वारा पवित्र ध्वज को उतार लिया गया. हाथी पर विराजमान महाविष्णु  मंदिर के बाहर लाये गए और पांच हाथियों का समूह निकल पड़ा “चक्कंकुलंगरा” शिव मंदिर की तरफ. इस यात्रा को ही “आराट” कहते है. वहां के बावड़ी में उत्सव मूर्ती को नहलाया जाएगा और वापस आकर उसे गर्भ गृह में रख दिया जावेगा. अब तक देव (महाविष्णु) बाहर थे, जनता के बीच, परन्तु इसके बाद अपने अन्तःपुर में रहेंगे.

“मेलम” का एक अंश इस विडियो में देख सकते हैं:



28 Responses to “तिरुपुनितुरा वृश्चिकोत्सव”

  1. J C Joshi Says:

    अति सुन्दर सचित्र जानकारी ! मुझे भी यही पता था कि कथकली नृत्य केवल पुरुष ही करते हैं!

  2. समीर लाल Says:

    मजा आ गया..बेहतरीन विवरण.

  3. संजय @ मो सम कौन? Says:

    तात्कालिक सुविधा के लिये धर्म परिवर्तन – कितनी ही सेलिब्रिटीज़ द्वारा अपनी पसंद का विवाह करने के लिये ऐसे शार्टकट अपनाये जाते रहे हैं।
    कथकली की ही तरह उत्तर भारत में होने वाली रामलीला, रासलीला आदि नाट्यों में और फ़िल्मों के शुरुआती दौर में पुरुष ही स्त्री पात्राभिनय करते रहे हैं, अब हर तरफ़ बदलाव आ रहा है बल्कि आ चुका है।
    सामूहिक प्रार्थना की तरह सामूहिक गायन का हिस्सा बनना भी इन्वोल्वमेंट को बढ़ा देता है। हरिवंश राय बच्चन ने ’आल्हा’ गाये जाने के दौरान इस इन्वोल्वमेंट को अपनी आत्मकथा में भी लिखा है।
    उत्सव का नाम ’वृश्चिकोत्सव’ रखने के पीछे भी कुछ मंतव्य जरूर रहा होगा।
    हमेशा की तरह रोचक सचित्र पोस्ट के लिये हमेशा की तरह आभार।

  4. प्रवीण पाण्डेय Says:

    हमारे मंदिरों की सांस्कृतिक परम्परायें अपनी भव्यता से हम सबको अभिभूत करती हैं।

  5. sktyagi Says:

    वाह! मज़ा आ गया पढ़-देख कर…काश हम भी वहाँ होते, साक्षात!!

  6. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ संजय:
    वृश्चिक, राशि आधारित मलयालम का महीना है. वृश्चिक माह में पड़ने वाला उत्सव = ’वृश्चिकोत्सव’

  7. kalptaru Says:

    its an ultimate post and great information.

  8. पूनम मिश्रा Says:

    आपके उत्कृष्ट विवरण और चित्रों ने इस उत्सव को हमारे लिये सजीव कर दिया.आभार !

  9. sanjaybengani Says:

    मन मोह लिया जी इस पोस्ट ने.

  10. संजय @ मो सम कौन? Says:

    शुक्रिया सुब्रमणियन सर, मैं वृश्चिक का अर्थ बिच्छु होने और उत्सव में गजयूथ की उपस्थिति में कोई संबंध तलाश रहा था।

  11. arvind mishra Says:

    ज्ञानवर्धक और नयनाभिराम -वृश्चिकोत्सव क्यों कहते है ? क्या इसका कोई सम्बन्ध वृश्चिक राशि से है ? जैसे सूर्य का वृश्चिक राशि में प्रवेश ?

  12. Divya Says:

    Something new to me. Thanks for this informative post.

  13. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    पर्यटन की व्यवस्था करने वालों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है. विदेशियों को आर्य समाज के मंदिर में ले जाया जाता है और वे तात्कालिक सुविधा के लिए हिन्दू बन जाते हैं. अब उनके पास हिन्दू होने का प्रमाण पत्र जो है.

    अच्छा तरीक़ा है. इस तरह फटाफट हिन्दू, मुसलमान, ईसाई… कुछ भी बना जा सकता है.

  14. Gyandutt Pandey Says:

    यह अच्छा लगा जानकर कि कथकलि में महिला कलाकारों का भी प्रवेश हो रहा है!
    और यह विदेशी भी जमे जो सुविधानुसार धर्म परिवर्तन कर ले रहे हैं!

  15. राहुल सिंह Says:

    भव्‍य और रोचक. तिरुपुनितुरा में तिरु तो श्री है, पुनितुरा का मतलब क्‍या होता है.

  16. tanu Says:

    rich & beautifull🙂

  17. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ डा. अरविन्द मिश्रा:
    मलयालम केलंडर के वृश्चिक माह का उत्सव होने के कारण वृश्चिकोत्सव कहलाया, यह बात तो समझ में आती है परन्तु मेरा स्वयं का प्रश्न भी है की यह इस महीने में ही क्यों मनाया जाता है. संभवतः आपकी धारणा सही हो. इस अवसर पर प्रकाशित पुस्तिका में भी इस बाबत कुछ नहीं लिखा है. खोजबीन जारी है.

  18. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ श्री राहुल सिंह :
    प्राचीन नाम पूनितुरा मिलता है. जनश्रुतियों में तो द्वापर युग में ले जा रहे हैं. पूनी का एक अर्थ तरकश भी होता है. “तुरा” वह जगह है जहाँ समुद्र या बेक वाटर से/के लिए नदी रुपी जलमार्ग होता है. मुहाने जैसा. कुछ इलाके में नाव को पूनी भी कहते हैं. भौगोलिक स्थितियां भी इस प्रकार अर्थ लगाने के लिए अनुकूल लग रही हैं.

  19. विष्‍णु बैरागी Says:

    सदैव की तरह जानकारियों से समृध्‍द, नयनाभिराम चित्रों वाली पोस्‍ट। देख-पढ कर आनन्‍द आया।

  20. J C Joshi Says:

    पा.ना जी आपने लिखा है, “केरल के मंदिरों में इस मंदिर की एक अलग पहचान है. यहाँ श्री विष्णु भगवान् शेषनाग के फन के नीचे बैठी हुई मुद्रा में हैं. इन्हें सन्तानगोपाल भी कहते हैं,,,”….

    और, ‘हिन्दू’ मान्यता है कि सभी के प्रिय नंदलाल गोपाल कृष्ण विष्णु के अष्टम अवतार हैं…
    इस पृष्ठभूमि आदि से संभवतः अनुमान लगाया जा सकता है इस स्थान पर वृशिकोत्सव क्यूँ मनाया जाता है, क्यूंकि प्राचीन पंडित वृश्चिक (आठवीं) राशि, अर्थात जन्म-कुंडली में चंद्रमा का अष्टम गृह में होना, उस राशि के जातक दोनों पुरुष और स्त्री को जननेद्रिय से सम्बंधित मानते हैं…और सूर्य, वर्ष के १२ माह में से. वृश्चिक राशि में अक्तूबर-नवम्बर के दौरान होता है और नौवीं जीवन दायिनी सूर्य-किरणों से सम्बंधित ‘धनु राशि’ में २१ नवम्बर के लगभग प्रवेश करता है, शायद इस लिए इस दौरान समय को ‘भारत; में शुभ माना जाता है…

  21. Smart Indian - अनुराग शर्मा Says:

    रोचक जानकारी व चित्र। त्वरित धर्मांतरण का फ़ॉर्मूला पसन्द आया। क्या इस प्रमाणपत्र का कोई वैलिडिटी पीरियड है या फिर मन्दिर देखने के लिये ये पर्यटक जीवन भर के लिये कानूनन हिन्दू हो जाते हैं?
    मेरे ख्याल से यह सब काफ़ी कानूनी पेचिदगियों को जन्म दे सकता है।

  22. राहुल सिंह Says:

    कितना भोला होता होगा वह कानून बनाने वाला, जो उसके तोड़ की संभावना न भांप सके.

  23. संजय @ मो सम कौन? Says:

    @ राहुल सिंह जी:
    सरजी, मैं तो ऐसे कहूँगा कि कितने चतुर होते हैं कानून बनाने वाले, जो अमल में लाने से पहले उसमें जानबूझकर ऐसे छिद्र छोड़ते हैं जिनसे हाथी निकल जायें लेकिन मच्छर फ़ँसे रहें।

  24. Bharat Bhushan Says:

    लगता है वह दिन दूर नहीं जब मंदिर से जुड़ी कथाओं के संकलन भी बाज़ार में आ जाएँगे. कथकली के मेकअप की लंबी प्रक्रिया मैंने स्वयं देखी है. पूरे आयोजन के बारे में आपने सुंदर जानकारी दी है. चित्रों की क्या बात है सुब्रमणियन जी, जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है.

  25. vidha Says:

    पोस्ट के माध्यम से अद्भुत दृश्यांकन

  26. Asha Joglekar Says:

    बहुत ही रोचक पोस्ट और यह जानकारी भी कि मलयालम में वृश्चिक मास भी होता है । चित्र भी बहुत मनोरम ।

  27. Kerala Holidays Says:

    Kerala Holidays…

    […]तिरुपुनितुरा वृश्चिकोत्सव « मल्हार Malhar[…]…

  28. अगस्त्य आश्रम/मंदिर, तिरुप्पुनितुरा (कोच्ची) « मल्हार Malhar Says:

    […] से काफ़ी दूर था परंतु उनकी एक क्लिनिक तिरुपुनितुरा में भी है जहाँ साप्ताह में दो तीन दिन […]

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