कोच्ची में कुछ भ्रमण

कोच्ची के ब्रोडवे में गाडी पार्क कर पैदल ही फूटपाथ पर निकल पड़े. कुछ ही दूर गए कि सड़क पर एक तंदरुस्त व्यक्ति भीक मांग रहा था, कह रहा था, मैं आँखों और पैर दोनों से लाचार हूँ. इस बात की पुष्टि हो रही थी कि वह एक पैर गवां चुका था. परन्तु उसके पास आधुनिक बैसाखी भी थी. कुछ शंका हुई और  केमरा  निकाल उसकी तस्वीर लेने लगा इतने में वह चिल्ला उठा. ये.. फोटो मत खींचना. मतलब यह कि वह देख सकता था. हमने कहा ठीक है, परन्तु उसकी तस्वीर तो केमरे में कैद हो चली थी. ऐसे नाटककार  भिकारी पर  दया तो आनी नहीं थी. यहाँ शहरी रोजगार ग्यारंटी योजना के तहत वर्ष में तीन महीने हर बेरोजगार को सरकार प्रति  दिन १८० रुपये देती है. मकान बनाने के लिए १ लाख का अनुदान है और सहकारी समिति २ लाख का कर्ज भी देती है जिसे कोई वापस नहीं लौटाता. यह व्यक्ति तो १० वीं पास था. यहाँ अकुशल श्रमिक भी ४०० रुपये प्रति दिन मांगता है. उसे भी प्रयास करने पर सरकारी नौकरी मिल सकती थी. परन्तु भीक मांगने से शायद उसे बगैर काम किये ही अच्छी आमदनी हो रही थी.

केरल अब एक संपन्न राज्य हो चला है. गरीबी दिखाई  नहीं देती. गरीब तो वो हैं जो यहाँ जीविका की तलाश में बड़ी संख्या में आ रहे हैं. बिहारी, ओडिया, बंगाली, राजस्थानी ऐसे कितने ही हैं. उनके श्रम का शोषण भी हो रहा है. बमुश्किल प्रति  दिन उन्हें काम के १०० रुपये पकड़ा दिए जाते हैं.

घूमते घामते पता नहीं चला, कब हम गलियों में घुस गए. भाई ने बताया यहाँ एक महाराज का भोजनालय है. कौतूहल हुआ और वहीँ खाने की सोची. परतु उसके पहले नजदीक ही एक गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के बहुत पुराने बालाजी (विष्णु) मंदिर को देखना चाहा तो भाई ने कहा वह तो बंद होगा. हमने कहा ठीक है बाहर से ही देख आते हैं.

मंदिर अच्छी स्थिति में थी और एक न्यास द्वारा संचालित था. बगल में ही नाग और यक्षिओं के लिए अलग पूजा स्थल था जो आधुनिक लगा परन्तु उसके सामने के दीप स्तंभ पुराने थे. वहां एक पेड़ दिखा जिसके फूलों को देखने से ऐसा लगता है मानो शिव लिंग पर नाग देवता का फन हो. साबूत फूल तो नहीं दिखे. वे काफी ऊँचाई पर थे. कुछ कलियाँ जरूर नजदीक थीं. पेड़ पर  बड़ी गेंद  नुमा फल भी लगे थे.  पेड़ के नाम का पता नहीं चला.

मंदिर से लौट कर “महादेव भोजनालय” पहुँच गए. यह एक भवन के दूसरी मंजिल पर है. आधुनिक होटलों जैसा ताम झाम नहीं है.  कभी केवल पहले से बताये जाने पर खाना मिलता था पर अब व्यवसाय बढ़ गया है. उत्तर भारतीय, गुजराती एवं राजस्थानी थाली मिलती है. हमने राजस्थानी थाली मंगवाई. तीन प्रकार की सब्जियां, दाल, विशेष प्रकार की कढ़ी, चूरमा के लड्डू, दाल बाटी, दही/छाछ और गरम गरम शुद्ध घी लगे फुल्के. और क्या चाहिए था. हम तो संतुष्टि के चरम में पहुँच गए. भोजनालय का मालिक श्री नारायण लाल दवे स्वयं सबका ख्याल रख रहा था. उसने बताया कि वह ३० वर्षों से इस धंदे में है. मूलतः राजस्थान – पकिस्तान सीमावर्ती क्षेत्र का है. भोजनालय में करीब ६ कर्मचारी हैं जो सभी उत्तर भारत से हैं.

खाने के बाद वापस ब्रोडवे पहुंचे. वहां कुछ बड़े माल थे. एक में तफरी के लिए घुस पड़े. भतीजे के लिए एक कोयन एल्बम खरीदा और पीछे के दरवाजे से निकल आये.

सामने समुद्र था और पैदल चलने के लिए लम्बी सड़क जिसे मरीन ड्राइव कहते हैं. यहाँ से नावों में जाने की व्यवस्था थी. दर असल हम जिस भाग में थे वह एर्नाकुलम कहलाती है जो मुख्य भूमि पर है परन्तु कोच्ची महानगर का हिस्सा भी. कोच्ची वास्तव में एक द्वीप समूह है परन्तु पुलों के द्वारा आपस में जुडी हुई.

घूमते फिरते कार पार्किंग पर लौट आये और घर चल पड़े.

19 Responses to “कोच्ची में कुछ भ्रमण”

  1. Ratan Singh Shekhawat Says:

    बहुत बढ़िया जानकारी |
    भीख मांगना एक व्यवसाय बन चूका है इसलिए मैं भी किसी भिखारी पर कभी दया नहीं करता | खुंदक तो तब आती है जब हट्टे कट्टे लोग भीख मांगते नजर आते है |
    Gyan Darpan
    .

  2. vidha Says:

    ओ! हम तो कोच्ची का एक छोटा चक्कर मार आए.

  3. राहुल सिंह Says:

    काश आप थोड़ा और समय निकाल पाते, आपके वापसी की जल्‍दी पोस्‍ट में भी झलक रही है.

  4. प्रवीण पाण्डेय Says:

    आपका घूमना बड़ा ही रोचक लगा, मेहनत कर पैसा कमाना बड़ी संतुष्टि का कार्य है, अभी भी।

  5. ghughutibasuti Says:

    बहुत सुंदर! फोटो खूब पसंद आईं. भिखारी का भंडा फोड भी.
    घुघूतीबासूती

  6. arvind mishra Says:

    मसालों की मंडी नहीं पहुंचे !?

  7. sktyagi Says:

    भीख मांगना भी एक धंधा हो गया है। कई भिखारियों के लखपति होने की बातें भी सुनी गयी है। इसे अब इंडस्ट्री का दर्ज़ा दे ही देना चाहिए…

  8. संजय @ मो सम कौन? Says:

    दवे जी का चेहरा बहुत फ़ोटोजेनिक लगा, किसी पौराणिक फ़िल्म के चरित्र की तरह भव्यता लिये हुये। आपकी तफ़रीह और पिछले दरवाजे से निकल लेने का स्टाईल मस्त है। ’बिहाईंड द लेंस’ और ’बियोंड द लेंस’ दोनों विधाओं में आप माहिर हैं। कोच्ची दर्शन करवाने के लिये आभार।

  9. JC Joshi Says:

    भारत में शहर अब एक से हो गए – ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं, गाडी, आदि… किन्तु दक्षिण की लुंगी, और भव्य मंदिर आदि शून्य से अनंत की उत्पत्ति को प्रतिबिंबित करते हैं… हिन्दुओं ने ‘सत्य’ उसे माना जो काल के साथ बदलता नहीं है… हमारे विष्णु जी अनादिकाल से शेष-शैय्या पर योगनिद्रा में लेटे दर्शाए जाते आ रहे हैं… और एक दन्त-कथानुसार, लक्ष्मी जी विष्णु जी से कहतीं हैं कि संसार तो वे चला रही हैं, जबकि विष्णु जी तो आराम से लेटे ही रहते हैं🙂 (काम चोर हैं ?!) …

  10. समीर लाल Says:

    तस्वीरें शानदार है..इस बहाने घूम लिया आपके साथ….भिखारी का हाल तो क्या कहें..

  11. ali syed Says:

    मुझे लगता है कि , भिखारी का चेहरा उसके नशे में होने की चुगली कर रहा है !
    बाकी सत्य क्या है पता नहीं !

    कर्ज लेने वालों की बड़ी ठाठ है वहां 🙂 …नहीं लौटाते सो एक गीत ( भले ही अलग मकसद के लिए बना पर इस प्रवृत्ति पर भी फिट है ) याद आ रहा है …

    ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का… 🙂

  12. विष्‍णु बैरागी Says:

    सुन्‍दर चित्र और रोचक वर्णन। मानो, खुद कोच्चि में घूम रहे हों।

  13. indian citizen Says:

    आपके चित्र भी बड़े मनमोहक होते हैं.

  14. पूनम मिश्रा Says:

    भिखारी पर गुस्सा,महाराज के भोजनालय का स्वाद,कोच्ची का अपनाअ मरीन द्राइव सब कुछ देख लिया ,आपके चिट्ठे के सौजन्य से.आभार !

  15. Jyoti Mishra Says:

    enjoyed ur travelogue🙂
    with snaps and awesome narration, its great to read u…

    ## ऐसे भिकारी पर कोई दया नहीं आई ## I too hate fake beggars, instead of sympathy, disgust takes over.

  16. Bharat Bhushan Says:

    आपके आलेख ने कोच्ची के बहाने केरल राज्य की ‘मुख्य विशेषताओं’ का वर्णन कर दिया है :)) बढ़िया रहा यह सफर.

  17. Gyandutt Pandey Says:

    वाह! मेरी बिटिया भी अभी कोच्ची से तिरुअनंतपुरम तक घूम कर आयी है। मेरे लिये एक Suttu Mundu भी ले कर आई है। साथ में अनेक चित्र!
    काश उसे भी अपना ब्लॉग बनाना पोस्ट करना आता!

  18. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @डा. अरविन्द मिश्र:
    मसालों की मंडी तो रास्ते में पड़ी थी. एक दो जगह लौंग और काली मिर्च का भाव पूछा और लगा की वहां तो लूट मची है. मसाले उत्तरी केरल के किसी छोटे कसबे में अच्छे और सस्ते मिलते हैं.

  19. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @राहुल जी:
    हाँ गतिशील रहते हुए पोस्ट लिखने का यह पहला अनुभव है. कोयम्बतूर में रहते हुए भी कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ, बन जाए तो अच्छा है.

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