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बुखार का समाधान ज्वरहरेश्वर के पास है

फ़रवरी 26, 2012

रोगग्रस्त  हो जाने की स्थिति में आम आदमी किसी ऐसे डाक्टर के पास जाता है जिस पर उसकी आस्था हो और जो सर्वगुण संपन्न हो अर्थात एक जनरल प्रेक्टिशनर . यदि बीमारी उसके बूते के बाहर का हो तो किसी विशेषज्ञ को निर्दिष्ट कर दिया जाता है. शहरी व्यक्ति के पास बड़े विकल्प होते हैं. नाना प्रकार के विशेषज्ञ तो होते ही हैं ऊपर से “मालों” की तर्ज पर   बहु विशेषता लिए (Multi Speciality) अस्पतालों की भी कोई कमी नहीं है. गाँव गवई का आदमी किसी स्थानीय पारंपरिक चिकित्सक से इलाज कराता है या फिर झाड फूंक का सहारा लेता है. कहीं कोई काम न बने तो फिर अपने देवी/देवता के पास जाता है. शहरी व्यक्ति भी लाचार हो जाने पर  देवी/देवता के ही पास माथा टेकने पहुँचता है. देवी/देवताओं के पास ऐसे अनगिनत पीड़ितों की कतार लगती है जिन सबका निदान उस अकेले को ही करना होता है. बीमारियों को तो छोडिये, समस्याएं भी तो लोगों की अनगिनत होती हैं. एक ही समय में देवी/देवता को किसम किसम की बीमारियों,  व्यक्तिगत (जाती) समस्याओं जैसे पुत्र प्राप्ति, संतान प्राप्ति, विवाह, शिक्षा, ऋण ग्रस्तता और न जाने किन किन के लिए उसे अपना माथा फोड़ना होता है.

जैसे डाक्टर अनेक होते हैं वैसे ही अपने यहाँ भी कई देवता थे और हैं भी. सब के सब GP (जनरल प्रेक्टिशनर). एक ही देवी/देवता की कई दूकाने भी हैं. अब जैसे शिव जी को ही लें. शहर में या आसपास उनके कई मंदिर मिलेंगे. हमारे पूर्वजों ने देवताओं और जनता जनार्दन  की समस्या को लम्बे समय तक के चिंतन के बाद समझा और हल निकालने की कोशिश भी की.  देवताओं के कार्य को सुव्यवस्थित करते हुए  विभिन्न समस्याओं के निदान के लिए अलग अलग मंदिरों को चिन्हित कर दिया,  जो अब समाधान केंद्र बने हुए हैं.  अपने यहाँ ऐसी मान्यता है कि जितने भी कष्ट, अनिष्ट होते हैं वे या तो ग्रह  दोष के कारण होते हैं या फिर  किसी देवता का कोप या पूर्व जन्म में किये गए पापों का परिणाम; प्रायश्चित  तो अपरिहार्य है. ग्रह दोष से मुक्ति के लिए उन सब के  अलग अलग मंदिर मिलेंगे. चेचक या छोटी माता है तो शीतला माता  के पास जाओ. कुष्ट रोग है तो सूर्य मंदिर में जाओ, शनि से पीड़ित हो तो उनके मंदिर में जाओ या फिर बजरंगबली तो हैं ही.  कहीं कहीं डिपार्टमेंटल स्टोर की तर्ज पर सभी देवता एक ही मंदिर में सहूलियत को दृष्टि से स्थापित मिल जाते हैं. सम्बंधित देवता के मंदिर अपने यहाँ नहीं है तो जहाँ कहीं भी हो वहां तक की यात्रा कर लो.

कांचीपुरम रुपी मंदिरों के सबसे बड़े माल में भटकते हुए एक ऐसे मंदिर में पहुंचना हुआ जहाँ  हमारा बुखार उतर गया. लगा कि सैकड़ों एकड़ भूभाग में फैले एकाम्बरनाथ /एकाम्बरेश्वर, जो यहाँ के मंदिरों का दादा है, की तुलना में “ज्वरहरेश्वर” का यह मंदिर कितना अलग है.

एकाम्बर्नाथ से कुछ ही दूरी पर सड़क के दाहिने  तरफ  एक मंदिर दिख रहा था. जैसा पढ़ रखा था उसके हिसाब से  ज्वरहरेश्वर का मंदिर यही कहीं बताया गया था. हमने पहले से ही मालूम कर रखा था कि यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (संघठन) के आधीन है और यहाँ का अभिरक्षक एक अरुमुगम नाम का व्यक्ति है. जब पुष्टि हुई कि यहीं  ज्वरहरेश्वर है तो हमने अरुमुगम को तलाशा. एक निजी वाहन से आये अनजान व्यक्ति से अपना नाम सुनकर वह कुछ भौंचक्का सा हो गया था और संभवतः उसका शारीरिक ताप भी बढ़ गया होगा. परन्तु तत्काल संभलते हुए हमें पूरी निष्ठा से मंदिर के वाह्य भाग का अवलोकन करवाया.

ग्रेनाईट पत्थरों से बना और मजबूती से खड़ा, बाहर से ही मंदिर गजब का लग रहा था. बच्चों की भाषा में बेहद क्यूट. पृष्ठ भाग गोलाई लिए हुए था (गज पृष्ठ) जो इस बात का द्योतक था कि गर्भगृह भी गोलाकार होगा. गर्भगृह के ऊपर शिखर वाला हिस्सा ईंटों का बना है और स्पष्टतः चोल वंशीय हस्ताक्षर युक्त है. गर्भगृह में पहली बार खिड़कियाँ देख रहा था जिनमें पत्थर की ही जालियां बनी थीं.  कुल मिलाकर कला पक्ष लालित्यपूर्ण है इसलिए मनभावन भी.   ‘चोल’ या उसके पूर्व के ‘पल्लवों’ का कोई शिलालेख  या तो नहीं था या फिर हम नहीं देख पाए. एक जगह तामिल में कुछ लिखा हुआ था और अरुमुगम के अनुसार “कांचीपुरम के बुनकरों को भूमि दान तथा करों में विशेष छूट दिए जाने तथा इसके एवज में उनके द्वारा मंदिर में पूजा अर्चना किये जाने के लिए  नित्य व्यवस्था का उल्लेख है. यह भी कि बुनकरों के द्वारा अपनी आय से अंशदान न दिए जाने पर उनकी १० पीढियां पाप की भागी रहेंगी”. अबतक तो १० पीढियां कब की खप गयी होंगी.

बाहरी  हिस्सों को देखने के बाद अब अन्दर जाना था. इस मंदिर में नित्य पूजा का प्रावधान है और पंडितजी का इंतज़ार था. अरुमुगम ने कहीं से गर्भगृह की चाबी हासिल की और हम लोग अन्दर प्रवेश कर गए (साधारणतया पूजित मंदिरों में इस बात की अनुमति नहीं होती). अन्दर एक छोटा सा शिव लिंग था जो टेढ़ा मेढ़ा बेडौल सा दिख रहा था. वास्तव में शिव के ६४ स्वरूपों में एक निराकार भी होता है और इस मंदिर में उन्हें निराकार होने की मान्यता है. अन्दर नजर दौड़ाने पर गर्भ गृह का गोलाकार होने की पुष्टि हो रही थी जो तामिलनाडू में कुछ असामान्य सा है. गणपति और कार्तिकेय तो अन्दर हैं ही परन्तु एक और विशेष बात वहां कुबेर का होना भी है. गर्भ गृह के अन्दर तस्वीरें ली  तो जा सकती थीं परन्तु प्रचलित मर्यादा का पालन करते हुए अपने आपको अनुशासित रखा.

मंदिर की संरचना बिलकुल जानी पहचानी सी ही है. सामने नंदी मंडप उसके बाद भक्तों के लिए आयताकार मंडप फिर गोल गर्भ गृह. मंदिर के सामने दाहिनी तरफ एक और निर्माण दिख रहा था जो मूलतः पार्वती जी के लिए था (अब भंडार गृह) परन्तु कांचीपुरम में कामाक्षी (पार्वती) के लिए एक स्वतंत्र  भव्य मंदिर के रहने से, अन्य शिव मंदिरों में पार्वती की प्रतिष्ठा वर्जित मानी गयी है.  अन्य सभी मंदिरों की तरह यहाँ भी एक बावड़ी (तीर्थं) है जिसका नाम हम नहीं जान पाए. (जान कर क्या करते, सूखा जो पड़ा है).

ज्वरहरेश्वर जी के मंदिर के बारे कहा जाता है कि यहीं पर भगवान् शिव ने जुरहा या ज्वर्हा नामके किसी दैत्य का वध किया था. इस जगह प्रार्थना किये जाने पर देवगणों को किसी समय शारीरिक ताप के वृद्धि से जनित बीमारियों से मुक्ति मिली थी अतः मान्यता है कि यहाँ पूजा किये जाने पर लोगों का शारीरिक तापमान सामान्य हो जाता है.

संदर्भवश, ज्वरहरेश्वर जी का एक मंदिर वाराणसी में भी है, स्कंदमाता मंदिर जाने वाले रस्ते पर जैतपुरा में. इसके अतिरिक्त दक्षिण में ही पुदुकोट्टई के पास “नरतामलाई” में भी एक है. यहीं विजयालय चोलेस्वरम का एक मंदिर है (विजयालय चोल वंश का संस्थापक माना जाता है) जिसका गर्भगृह गोलाई लिए है परन्तु वाह्य स्वरुप आयताकार है. नरतामलाई नाम की जगह किसी समय जैनियों का केंद्र था (जो प्रमाणित है). यहाँ के गुफा मंदिर के दीवारों  में जैन तीर्थंकरों को छील कर विष्णु प्रतिमाएं उकेरी गयी हैं.  मंदिरों का गोलाई लिया हुआ गर्भ गृह संभवतः उनके बौद्ध मूल की तरफ इशारा करता है. कांचीपुरम में भी बौद्ध धर्म का अस्तित्व रहा है.

नोट: इतिहास, पुरातातत्व आदि विषय कुछ मित्रों के लिए रसहीन होते है. अतः रोचकता बनाये रखने के लिए कुछ हास परिहास को समेटे बातें कह दी गयी हैं जिन्हें ईश निंदा कतई न समझा जाए.

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अर्मेनियाई

फ़रवरी 20, 2012

३८ लाख की आबादी वाला एक छोटा सा देश आर्मेनिया परन्तु किसी समय उसका भी जलवा था. सोवियत रूस के विघठन के बाद  अब एक स्वतत्र गणराज्य है. भारत से अर्मेनियायियों का सम्बन्ध  बहुत पुराना कहा जा सकता है.  ८/९ वीं सदी में “थोमस ऑफ़ काना” नामके  एक व्यापारी के  भारत आने  की बात कही जाती है. इस बात पर मतभेद है कि क्या वह एक बिशप था या महज व्यापारी. उसके साथ में कई अन्य परिवारों के आने की बात भी कही गयी है. दक्षिण का एक ईसाई समुदाय अपने आप को उनका वंशज भी मानता है. संयोग से विश्व में आर्मेनिया पहला देश था जिसने ४ थी सदी में ही ईसाई धर्म को अपना राज धर्म घोषित किया था.

मध्य युग में, यहूदी या पारसियों की तरह भारत में, अर्मेनियाई पनाह लेने के लिए नहीं आये थे. उनका आना तो कुछ धन प्राप्ति की लालसा लिए रहा. १६ वीं सदी के आसपास अकबर बादशाह ने अर्मेनियायियों (तत्कालीन फारस के) को आगरे में बसने के लिए आमंत्रित किया और धीरे धीरे वहां उनकी एक बड़ी आबादी हो चली थी.  सूरत में भी इनका आगमन हुआ और वहां के बड़े व्यापारियों में शुमार हुए. इसी प्रकार गवालियर सहित अन्य कई नगरों में भी ये बस गए थे.  मुखतः वे हीरे जवाहरात, रेशम, मसाले आदि का व्यापार करते थे.

चेन्नई (मद्रास) से भी अर्मेनियायियों का सम्बन्ध १६ वीं सदी से रहा है. उनके नाम से एक सड़क ही  नहीं वरन उनके द्वारा बनवाया हुआ एक पुल भी है जो क्रमशः आर्मेनियन स्ट्रीट और आर्मेनियन ब्रिड्ज कहलाती हैं परन्तु दुर्भाग्य से अब यहाँ अर्मेनियायियों का नामों निशान नहीं है.  उसी सड़क पर एक प्राचीन चर्च है जो चेन्नई की धरोहरों में गिनी जाती है.  अंग्रेजों द्वारा बनाये गए सेंट जोर्ज के किले के अन्दर सन १६६८ में उन्होंने अपने लिए एक लकड़ी का काम चलाऊ चर्च बना लिया था. १७१२ में उसे पक्का बनाया गया परन्तु इस बीच मद्रास पर कुछ समय के लिए फ्रांसीसियों का अधिकार हो गया जिन्होंने उस चर्च को तुडवा दिया. कुछ दूसरे स्रोतों से पता चलता है कि उस चर्च को अंग्रेजों ने ही गिरवा दिया था.  अंततोगत्वा १७७२ में आर्मेनियन स्ट्रीट पर ही शामियर नामक एक अर्मेनियाई रहीस परिवार के निजी कब्रगाह में पुनः एक चर्च बनाया गया जो आज उस समाज के नगर से जुड़े इतिहास को जीवित रखे हुए है. संदर्भवश पूरे भारत में आज उनकी आबादी लगभग ३५० की  है.

                                                                      यह आर्मेनियन स्ट्रीट है. चेन्नई में अंग्रेजी का एक नमूना – बायीं तरफ के सूचना पटल पर

क्योंकि हमने भी इस चर्च के बारे में सुन रखा था इसलिए देख आने की इच्छा जागृत हुई.  मद्रास उच्च न्यालय से लगी  (उच्च  न्यायालय ने  अपना नाम परिवर्तित नहीं किया है) सड़क पे जाकर ढूँढने  पर चर्च तो नहीं दिखी परन्तु  एक जगह दरवाजे के ऊपर लिखा दिख गया. दरवाजे के सामने हाकरों ने कब्ज़ा जमा रखा है. शाम ४.३० बज चुके थे और दरवाजा बंद ही था. आस पास पूछने पर पता चला कि वह ५ बजे खुलता है. तभी अचानक एक चौकीदार दरवाज़ा खोल  बाहर आया, हम खुश हुए और अन्दर जाने लगे. चौकीदार ने रोकते हुए  अंग्रेजी में बताया की सुबह ९.३० से दुपहर २.३० तक ही पर्यटकों को अन्दर जाने दिया जाता है. मिन्नतों का कोई  असर नहीं हुआ. हम उल्टे पैर वापस लौट आये थे. एक सप्ताह बाद पुनः सुबह १० बजे ही पहुँच गए तब वहां बैठे एक सज्जन ने स्वागत करते हुए अन्दर आने को कहा. उसने बताया कि वह उस चर्च का अभिरक्षक है. अपना नाम उसने टी. अलेक्सांडर बताया और यह भी कि वह एंग्लो इंडियन समाज का है. चर्च से सम्बंधित दीगर जानकारियाँ भी उसी सज्जन से प्राप्त हुईं.

दरवाजे के अन्दर घुसते ही जो सामने दिखाई देता है वह घंटाघर है और आर्मेनियन चर्च के रूप में मैंने इसी की तस्वीर देखी थी. बगल में एक लम्बे बरामदे  से लगा चर्च का प्रार्थना कक्ष है. सामने आले में माता मरियम शिशु ईशु को लिए खड़ी है.  नीचे ईशु के जीवन से संबंधित सुन्दर छोटे छोटे चित्र बने हैं. मोमबत्ती जलाई रखी गयी  थी और असीम शांति का अनुभव भी हो रहा था. घंटाघर रुपी मीनार पर चढ़ने के लिए लकड़ी की सीढ़ी थी परन्तु ऊपर चढ़ना वर्जित था. सीढ़ियों की जर्जर अवस्था एवं दुर्घटना की सम्भावना को मद्दे नज़र यह व्यवस्था बताई गयी.

ऊपर चढ़ने की बड़ी लालसा थी क्योंकि वहां छै बड़ी बड़ी घंटियाँ टंगी हैं. प्रत्येक का वजन १५० से २०० किलो  तक का है. उनका निर्माण लन्दन के बिग बेन को बनाने वाली कम्पनी द्वारा सन १७७५ के आसपास किया गया था. एक इनमें सबसे पुराना सन १७५४ का है जिसे सन १८०८ में मद्रास में ही पुनः ढाला गया था. उस पर तामिल में लेख भी अंकित है.

बाहर की तरफ चारों ओर उद्यान हैं. पूरे क्षेत्र में चंपा (Frangipani/Plumeria) के कई पेड़ लगे हैं जिनमें लगे फूलों का आकार  देखकर प्रसन्नता हुई थी. वे काफी बड़े बड़े थे गोयाकि  परिसर में दफ़न ३७० अर्मेनियायियों के अवशेषों से उन्हें उर्वरकता प्राप्त हो रही है. सभी कब्रें समतल हैं और कब्र होने का एहसास  केवल उनपर बिछी फर्शी पत्थरों के लेखों से ही हो पाती है. अपवाद स्वरुप एक कब्र है जो अलग थलग है. यह कब्र फादर हरुत्युम श्मवोनियाँ (Harutyum Shmavonian) की है जिनका निधन सन १८२४  में हो गया था.

आर्मेनिया के इतिहास में उनकी भाषा में सबसे पहले सन १७९४ में एक मासिक पत्रिका “अज़दरा ” का प्रकाशन इसी शक्शियत के द्वारा किया गया था. पत्रिका का मुद्रण भी इसी चर्च में हुआ था. हमने उस पत्रिका के दर्शन लाभ करवाने के लिए अलेक्सेंडर जी से निवेदन किया था परन्तु उसकी कोई भी प्रति वहां उपलब्ध नहीं थी. अलेक्सेंडर जी का मानना है कि संभवतः उन्हें सुरक्षित रखने की बात सोची भी नहीं गयी. इसी चर्च में  तत्कालीन अर्मेनियायियों ने अपने  एक स्वतंत्र  देश के लिए संविधान की रूपरेखा सन  १७८१  में तैयार की थी. विडम्बना ही कहा जा सकता है कि आर्मेनिया को स्वतंत्रता  १९९१  में सोवियत गणराज्य के विघठन के पश्चात ही मिल पायी.

अर्मेनियायियों के बारे में एक रोचक पहलु यह भी है कि वे क्रिसमस २५ दिसंबर की बजाय ६ जनवरी को मनाते हैं. वे अपने आप को Eastern Orthodox Christians  बताते हैं. उनका मानना है कि क्रिसमस मनाये जाने के लिए २५ दिसम्बर की तिथि का निर्धारण सन ३२५  में रोमन चर्च ने किया था जबकि उनके यहाँ क्रिसमस की परंपरा उसके पूर्व से ही रही  है.  अतः उस परिपाटी को जस का तस बनाए रखा है. दूसरी तरफ रूस के आर्थोडक्स  चर्च द्वारा क्रिसमस ७ जनवरी को मनाया जाता है.

 ७ वीं सदी में पल्लवों के द्वारा निर्मित चेन्नई के कपालीश्वर का मूल मंदिर पहले समुद्र के किनारे था जिसे पुर्तगालियों ने १६ वीं सदी में ध्वस्त कर “सेनथोम” नामसे विख्यात चर्च (बेसिलिका) निर्मित किया. इसके लिए आर्मेनियायियों को उत्तरदायी माना जाता है. कहा जाता है कि मद्रास के अर्मेनियायियों ने ही उस इलाके में कहीं सेंट थोमस के दफ़न होने की सुनी सुनाई बात पुर्तगालियों को बतायी थी. इस पर कभी और…