Archive for अप्रैल, 2012

सफलता के लिए उद्यम – सम्राट अशोक उवाच

अप्रैल 18, 2012

आज विश्व धरोहर दिवस है. अपने आसपास बिखरे धरोहरों को संरक्षित रखने में सहायता करें.

सदियों पहले से विभिन्न राजाओं के द्वारा अपनी शौर्य गाथा के प्रचार के लिए शिलालेखों  का प्रयोग होता रहा है. ऐसे लेखों को हम प्रशश्ति लेख कहते हैं. सम्राट अशोक के लेख कुछ लीक से हटकर हैं. थके हारे राजा और मकड़ी क़ी कहानी पढ़कर मुझे अशोक के ऐसे एक लेख क़ी याद आ गयी जिसमे प्रेरणा निहित है. जबलपुर से चलकर कटनी क़ी ओर जाने पर सलीमनाबाद के निकट रूपनाथ का शिलालेख जो संदेश दे रहा है, वह आज के परिवर्तित परिस्थितियों में भी मायने रखती है. शिलालेख का  हिन्दी में रूपांतर रायपुर स्थित संग्रहालय द्वारा प्रकाशित “उत्कीर्ण लेख” से उद्धृत किया गया है.

“देवताओं के प्रिय ऐसा कहते हैं – ढाई बरस से अधिक हुआ क़ि मैं उपासक हुआ पर मैने अधिक उद्योग नहीं किया. किंतु एक बरस से अधिक हुआ जब से मैं संघ में आया हूँ तब से मैने अच्छी तरह उद्योग किया है. इस बीच जम्बूद्वीप में जो देवता अमिश्र थे वे मिश्र कर दिए गये हैं (?!). यह उद्योग का फल है. यह (फल) केवल बड़े ही लोग पा सकें ऐसी बात नहीं है क्योंकि छोटे लोग भी उद्योग करें तो महान स्वर्ग का सुख प्राप्त कर सकते हैं. इसलिए यह शासन लिखा

गया क़ि छोटे और बड़े (सभी) उद्योग करें. मेरे पड़ोसी राजा भी इस शासन को जाने और मेरा उद्योग चिर स्थित रहे. इस बात का विस्तार होगा और अच्छा विस्तार होगा; कम से कम डेढ़ गुना विस्तार होगा. यह शासन यहाँ और दूर के प्रांतों में पर्वतों क़ी शिलाओं पर लिखा जावे. जहाँ कहीं शिलास्तंभ हों वहाँ यह शिलास्तंभ पर भी लिखा जावे. इस शासन के अनुसार जहाँ तक आप लोगों का अधिकार है वहाँ आप लोग सर्वत्र इसका प्रचार करें. यह शासन उस समय लिखा जब (मैं) प्रवास कर रहा था और अपने प्रवास के २५६ वें पड़ाव में था.”

रूपनाथ  क़ी जबलपुर से  दूरी लगभग ८० किलोमीटर  है और अपने प्राचीन शिवलिंग के लिए अधिक जाना जाता है. संभवतः अशोक के प्रवास के समय भी वहाँ कोई हिंदू धार्मिक स्थल (शिव मंदिर) रहा होगा.

 यह आलेख चार वर्ष पूर्व भी प्रकाशित किया था परन्तु सौभाग्य से किसी ने भी नहीं पढ़ा.

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कामाक्षी कांची वाली

अप्रैल 10, 2012

मेरे भाई के घर बहू का चचेरा भाई कहलाने वाला एक भद्र पुरुष आया हुआ था. कर्मकांडी प्रवृत्ति का और अपने शहर के समाज में कर्ता धर्ता.   उन्हें कांचीपुरम के मठाधीश (शंकराचार्य) से मिलने और सलाह मशविरा करने  जाना था जिसके लिए व्यवस्था कर दी गयी थी. बहू ने मुझसे कहा, आप भी चले जाओ, भाई तो अकेला ही जा रहा है. हमने पूछा कब जाना है और कब तक आना है तो बताया गया कि सुबह ९ बजे निकलेंगे और दुपहर खाने तक वापस आ जायेंगे क्योंकि वो भैय्या बाहर नहीं खाता. हमने उत्तर दिया हम चलने को तो तैयार हैं परन्तु रात तक ही लौट पायेंगे. भैय्या मोटा है न, एक दिन भूखा रह लेगा. बात भैय्या तक पहुंची और भद्र पुरुष ने बाहर खाने पर सहमती दे दी. हमने भी वार्तालाप में उन्हें बता दिया कि हमारी प्राथमिकता  वहां के मंदिरों में जो आसीन हैं उनसे मिलने की होगी.  उन्हें वहां छोड़ कर हम निकल पड़ेंगे और दुपहर भोजन के लिए उन्हें ले लेंगे. उन्होंने एक बात कही, हाँ आरती के बाद तो वे निकल ही सकते हैं. अब हमें थोड़े ही मालूम था कि वहां आरती दुपहर को होती है.

चेन्नई से कांचीपुरम की दूरी लगभग ८० किलोमीटर है. बंगलूरु जाने वाले राजमार्ग एन एच 4 पर लगभग ७० किलोमीटर चलने के बाद बायीं तरफ कांचीपुरम के लिए रास्ता कटता है.  हम लोग अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुबह नाश्ता कर ९ बजे निकल पड़े थे. करीब ४५ किलोमीटर चलने पर ही अपने भूत पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गाँधी की स्मृति में बनाए गए बड़े बड़े खम्बे दिखे. यही श्रीपेरुम्बदूर था. लगभग १५ किलोमीटर और आगे चलने पर एक विशाल परन्तु सुन्दर शिव जी की प्रतिमा नंदी सहित शोभायमान थी. जगह का नाम पूछा तो था परन्तु अब याद नहीं रहा.

वहां पांच मिनट रुकते हुए आगे बढ़ लिए. इस बीच संक्षेप में  कांचीपुरम के बारे में भी बताता चलूँ . वैसे साल भर में भी वहां के किस्से कहानियों को बता पाना मुश्किल है.क्योंकि यह नगर वाराणसी के बाद भारत का बहुत बड़ा शैक्षणिक केंद्र रहा. पतंजलि के २ री सदी ईसा पूर्व के महाभाष्य में “नगरेशु कांची” का  उल्लेख हुआ है. सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य के परामर्शदाता चाणक्य यहीं का माना गया है. बहुत सारे बौद्ध विद्वान् जैसे बुद्धघोष, धर्मपाल और चीन में जाकर ध्यान आधारित बौद्ध सम्प्रदाय का   झंडा गाड़ने वाले ‘बोधिधर्म’ की भी कांची ही जन्मस्थली थी. कांचीपुरम ९ वीं शताब्दी तक तो पल्लवों की राजधानी रही. १० वीं से १३ वीं तक चोल साम्राज्य का हिस्सा बना फिर १७ वीं शताब्दी तक विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत था.  

आगे चलकर कांचीपुरम का मोड़ आ गया और १०.४० तक हम कांची के कामकोटि मठ के सामने थे. वहां हमने भद्र पुरुष को उतार दिया और उनसे उनका मोबाइल नंबर लेकर सीधे कांचीपुरम के कामाक्षी अम्मन  (माता पार्वती) के दरबार में पहुँच गए. हालाकि मैं स्वयं यहाँ पहले भी एक बार आ चुका हूँ परन्तु यहाँ के कामाक्षी माता के दर्शन नहीं कर पाए थे. गाडी खडी करने की सुविधा के अनुरूप  दक्षिणी प्रवेश द्वार से  अन्दर गए थे.

मुख्य प्रवेश तो पूरब की ओर से हैं. अन्दर घुसने पर हमें मंदिर का पवित्र कहलाने वाला जल कुंड दिखा. वैसे मंदिर ५ एकड़ के भूभाग में फैला है.  दर्शनार्थियों के कतार में हम भी शामिल हो गए और चक्कर लगाते हुए मंदिर  के अन्दर थे. देवी के दर्शन भी भरपूर कर पाए और फिर वहां से खिसकना हुआ. अन्दर रौशनी की कमी थी और गर्भ गृह के बाहर चारों तरफ का निर्माण कुछ अटपटा लगा संभवतः इसलिए कि मंदिर का विस्तार कई चरणों में अनेकों राजवंशों के द्वारा करवाया जाता रहा. एक प्रकार से भूल भुलैय्या ही थी. हम तो बस दूसरे श्रद्धालुओं का अनुगमन करते चले गए. अन्दर के शिल्पकला  का रसास्वादन भी नहीं हो पाया. ऊपर से केमरे का प्रयोग तो वर्जित ही था. इस मंदिर की गणना सिद्ध पीठों में होती है और आदि शंकराचार्य से सम्बंधित बताया जाता है. परन्तु वास्तव में बौद्ध धर्म के तारा देवी का यह स्थल है जिसे शनै शनै लगभग ११/१२ वीं सदी में अपने मूल तांत्रिक स्वरुप से सौम्य रूप में परिवर्तित किया गया. 

बाहर आने के बाद एक चक्कर लगा देखा. प्रांगण में ही एक सुन्दर मंडप बना है. यहाँ चित्र लिए जा सकते थे. खम्बों में नाना प्रकार के किस्से कहानियों को उकेरा गया था. यह कुछ विशिष्ठ लगी. 

६३ विख्यात शिव भक्तों में जिन्हें नायनार कहा जाता है (जिनकी कतारबद्ध मूर्तियाँ शिव मंदिर के गलियारों में पायी जाती हैं)   एक कन्नप्पा नायनार भी हुआ है. कन्नप्पा मूलतः एक नीची जाति का शिकारी था परन्तु जंगल से  एक शिव लिंग की प्राप्ति के बाद वह उसकी आराधना अपने तरीके से किया करता. भगवान् शिव ने उसकी परीक्षा लेनी चाही. एक दिन कन्नप्पा ने  देखा कि शिव लिंग की एक आँख से खून और पानी टपक रहा है. उसने तत्काल अपने तीर से अपनी एक आँख निकाल कर शिव लिंग में चिपका दी. खून का रिसाव तो बंद हो गया परन्तु अब दूसरी आँख की भी वही स्थिति हो गयी. कन्नप्पा ने अपनी दूसरी आँख भी निकालनी चाही परन्तु उसे भान था कि यदि वैसा करेगा तो खुद अँधा हो जावेगा और फिर अपनी आँख को सही जगह नहीं लगा सकेगा. इसलिए उसने पैर के एक अंगूठे को  शिव लिंग की बहती दूसरी आँख पर रखा ताकि अपनी खुद की दूसरी आँख निकालने के बाद सही जगह रखा जा सके. खैर भगवान् तो परीक्षा ले रहे थे. कन्नप्पा पास हो गया और भगवान् उसके समक्ष प्रकट हो गए थे. आगे क्या हुआ नहीं मालूम. उपरोक्त चित्र जो मंडप के एक खम्बे में खुदा है, इसी कहानी को बता रहा है.वास्तव में कांचीपुरम का मूल कामाक्षी का मंदिर यह नहीं है. जिस मंदिर में आदि शंकराचार्य ने श्रीचक्र की स्थापना की थी वह तो पीछे है और वर्त्तमान मंदिर से कुछ ही दूर. इन्हें यहाँ आदि पीठेश्वरी  कहा जाता है. हम वहां भी पहुँच  गए थे परन्तु बाहर से दरवाज़ा बंद हो चला था.

वहां से सीधे वरदराज पेरूमल (महाविष्णु) मंदिर होते हुए शंकराचार्य जी के मठ पहुँच गए. वहां भी तस्वीर लेना प्रतिबंधित था. एक चक्कर लगा कर देखा. पीछे गौशाला थी. एक गौमाता ने हमें पोस दे दिया और हमने भी सोचा तेरा ही सही. फिर मुख्य हाल में भद्र पुरुष दिखे और वहां आरती का समय हो चला था. हम भी शरीक हुए और उसके बाद खाना खाने उनके कहे एक भोजनालय चले गए. 

नोट: सनद रहे तामिलनाडू में कहीं भी “होटल सरवन भवन” में  खान पान करना जेब पर भारी पड़ेगा. एक घी में बना  सादा दोसा के ९२.०६ रुपये लगे थे.