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सामान्य ज्ञान

मई 25, 2012

आज एक वाकया हो गया. वैसे घर में तो तीन स्नानगृह/शौचालय है, मुझे ऊपर की मंजिल में एकदम बड़े वाले में जाना अच्छा लगता है. एक तसल्ली होती है क्योंकि मुंबई वाले जब यहाँ आते हैं तो उनका कहना होता था कि यह तो हमारे कमरे से बड़ा है. ऊपर से बाथ टब भी है जिसका प्रयोग हमने कभी नहीं किया. पानी कहाँ से लायें. कभी कभार जब परिवार के बच्चे आ जाते थे तो उनके मन बहलाव के लिए बचा बचा कर पहले से टब को भर लिया करते. लगता है हम भटक गए. मामला यह था कि अन्दर घुसने के बाद जब दरवाजे की सिटकिनी बंद करनी चाही तब उसका ढुचू  (नोब) नीचे गिर गयी. उसे उठाकर उसके  लिए बने हुए छेद में लगा तो दिया लेकिन मामला नहीं जमा. वह फिर निकल जाता. मुझे लगा कि अब इसे बदलना ही होगा. वैसे कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि घर   में उस समय मैं अकेला ही था. निवृत्त होने के बाद याद आया कि मेरे पास अरलडाईट है. मैं पुनः उस नोब को अपनी जगह स्थापित कर सकता हूँ. मैंने मिश्रण बनाया और लेप लगाकर नोब को अपनी जगह फिक्स कर दी. शाम को देखता हूँ कि  वह  इस कदर फिक्स हो गया  कि उसे हिलाया ही नहीं जा सकता. पेंचकस का इस्तेमाल कर हमने उसे अनुशाषित किया. देखते हैं कब तक चलता है.

जब बाथ रूम की बात चली तो मुझे याद आया कि यह तो कुछ भी नहीं है. एक भाई साहब के घर रुकना  हुआ था. कमरे से  लगा हुआ बाथ रूम   भी था परन्तु मुझे आगाह कर दिया गया कि गरम पानी चाहिए तो दूसरे बाथ रूम में जाएँ. हमने देखा था उस बाथ रूम में भी गीसर लगा है. हमने पूछा समस्या क्या है तो बताया गया कि उसे ऑन करने पर शाक मारता   है और नोब को खोलें तो पानी टपकता है. साधारणतया मेरी आदत रही है कि जब भी किसी के घर जाकर रहूँ तो प्रतिफल  स्वरुप अपनी भी  कुछ  सेवायें उन्हें दे जाऊं जिससे  आत्मीयता बनी रहे. मैंने समस्या को समझने की कोशिश की और शीघ्र ही बात समझ में आ गई. वैसे मैं कला पक्ष का ही रहा हूँ और तकनीकी  शिक्षा से वंचित ही रहा.
उस गीसर को समानांतर लगाना था. चित्रों को देख कर ही समझ सकते हैं. क्या ऐसी बातों के लिए कोई अतिरिक्त तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता है. कभी कभी लगता है हम समझना ही नहीं चाहते.
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