Archive for जुलाई, 2012

गुलमर्ग (कश्मीर)

जुलाई 25, 2012

हरे घांस की चादर ओढ़ी हुई पहाड़ी ढलानों में जब गुल खिला हुआ होता है तो वह स्थानीय भाषा में गुलमर्ग कहलाता है. कहते हैं पूर्व में इस स्थल का नाम गौरीमर्ग था परन्तु १६ वीं सदी में सुलतान यूसुफ़ चाक नें इसे गुलमर्ग कह कर संबोधित किया था. तब से यही नाम चला आ रहा है. यहाँ मुग़ल बादशाह जहाँगीर भी नियमित रूप से आया करता था और  यहाँ के विभिन्न प्रजातियों के पुष्पों को संग्रहीत किया करता. हिमालय के पीर पंजल पर्वत श्रृंखला से लगा हुआ और श्रीनगर से पश्चिम की तरफ ५६ किलोमीटर की दूरी पर, समुद्री सतह से लगभग ९००० फीट की ऊँचाई पर स्थित बड़ा ही खूबसूरत सैरगाह है गुलमर्ग . इसकी ख्याति इतनी अधिक है कि कश्मीर जाने का  अर्थ ही गुलमर्ग जाना मान लिया जाता है. सबसे अधिक पर्यटक भी यहीं आते हैं और यहाँ के अतिसुन्दर वादियों के आगोष के हवाले हो लेते हैं.  ८७०० फीट की ऊँचाई पर विश्व में सबसे ऊंचा गोल्फ का मैदान यहीं पर है और १२००० फीट से अधिक ऊँचाई पर स्कीइंग के लिए उपयुक्त ढलाने भी यहीं हैं जिसका  विस्तार ५ किलोमीटर से अधिक है. यहाँ आने वाले अधिकतर विदेशी पर्यटक  स्कीइंग के शौकीन होते हैं. यह बात और है कि जब हम लोग वहां गए थे उस समय वहां एक भी विदेशी नहीं था. बताया गया कि वे लोग दिसंबर/जनवरी में आना पसंद करते हैं. हम लोगों के लिए इस बार का मौसम भी अनुकूल नहीं था. गर्मियों में वहां लगातार बारिश ही हो रही थी.

हम लोगों को श्रीनगर से निकलने में कुछ देर हुई क्योंकि एक दिन पूर्व सोनमर्ग जाकर आने से सभी थके हुए थे और देर से ही उठना हुआ था. सुबह १० बजे के लगभग ही निकल पाए जबकि हमारे ड्राइवर ने सलाह दी थी कि गुलमर्ग में हम यदि ९ बजे तक पहुँच सकें तो बहुत अच्छा रहेगा. वहां एक गाइड की व्यवस्था की जा चुकी थी और  ड्राइवर महोदय उससे सतत संपर्क बनाए हुए थे. रास्ता सीधा ही था और लगभग ४० किलोमीटर चलने पर तंगमर्ग नामके एक कस्बे में पहुंचे. यहाँ से पहाड़ी का तंग रास्ता प्रारंभ हो जाता है. यहीं हमें गम बूट, दस्ताने, कोट आदि सुलभ कराये गए. पिछले अनुभव के आधार पर हम लोगोने बरसाती भी ले लेना उचित समझा. हमें बताया गया कि आगे का रास्ता सर्दियों में बर्फ से ढंका रहता है.  १५ किलोमीटर के बचे हुए मार्ग पर टायरों पर चेन लगी हुई गाड़ियाँ ही जा पाती हैं जिसके लिए अतिरिक्त शुल्क देनी पड़ती है.

पहाड़ी की चढ़ाई पूरी कर हमारी गाडी एक गेट के पास रोक दी गयी.   बगल में एक घांस का मैदान था और किनारे पर्यटकों के लिए काटेज बने थे.  गेट के अन्दर से एक पक्की सड़क गयी हुई थी. यहाँ से बर्फीली पहाड़ियों तक पहुँचने के लिए कई विकल्प थे. आपकी गाडी तो गेट के अन्दर जा ही नहीं सकती. घोड़ों पर बैठ कर बर्फीली पहाड़ के एक हिस्से तक जाया जा सकता है या फिर घोड़ों पे बैठकर या पैदल चल कर हम उस जगह तक पहुँच सकते हैं जहाँ “गोंडोला” (उड़नखटोला) का अड्डा था. गोंडोले का मजा लेना ही था और बताया गया था कि नजदीक ही है. कई अन्य  पर्यटक भी पैदल ही जा रहे थे इसलिए हम लोगोंने भी घोड़ों पर लदने   की जगह दूसरे पर्यटकों का अनुसरण करना उचित समझा. दूरी तो हमारे आंकलन के अनुसार लगभग २ किलोमीटर रही होगी लेकिन बात करते करते वहां तक पहुँच ही गए.  गोंडोला में चढ़ने वालों की खासी भीड़ थी. कतार का छोर नहीं देख पा रहे थे. हम लोगों को आश्वस्त कर गाइड, जो हमारे साथ हो लिया था, खुद टिकट कटवा लाया. शायद यही उसकी उपयोगिता रही. गाइड लगवाने की बात जब कही गयी थी तो हमारी समझ में ही नहीं आ रहा था कि ऐसी जगह गाइड का क्या काम. अब समझ में आया कि वह  प्रशिक्षित था!

टिकट दर था ३०० रुपये प्रति व्यक्ति वह भी केवल खिलनमर्ग (कुंगदूरी) नामके प्रथम पडाव तक ही.  टिकट हाथ में आते ही, हम लोग गोंडोला में सवार होने चले गए. कुछ प्रतीक्षा के बाद हम लोगों का भी नंबर लग गया. ६ लोगों के बैठने योग्य गोंडोला चारों तरफ से बंद एक डिब्बा था लेकिन बाहर के दृश्य देखे जा सकते थे. तस्वीर खींचने पर एक प्रकार से बंदिश ही लग गयी. दृश्य  मनोरम था और नीचे कुछ सपाट छत वाले आयताकार छोटे  छोटे घर भी दिख रहे थे. खूबी यह थी कि घरों के ऊपर मिटटी डाल कर  कृषि कार्य होता भी दिखा. पहले पड़ाव पर पहुँचने में बमुश्किल दस मिनट लगे होंगे. यहाँ नीचे उतर कर आना था. दुबारा टिकट  खरीदनी थी दूसरे चरण के लिए जो हमें ले जाती है “अप्परवाथ”.

इसके लिए टिकट दर है ५०० रुपये प्रति व्यक्ति. तीन वर्ष से कम उम्र के बच्चों के टिकट नहीं लगते परन्तु उससे ऊपर तो पूरे लगते हैं. यहाँ भी टिकट की मारा मारी दिखी. हमें चिंता नहीं थी क्योंकि प्रशिक्षित गाइड जो साथ था. बीच बीच में टिकट खिड़की बंद कर दी जाती थी और ध्वनि विस्तारक से बताया जाता रहा कि ऊपर का मौसम खराब हो जाने की वजह से टिकट बिक्री स्थगित की जा रही है.

ऐसे ही ऊहा पोह की स्थिति बनी रही और समय का सदुपयोग करने के लिए वहां की व्यवस्थाओं का जायजा लेते रहे. पता चला कि यहाँ से “मेरी शोल्डर” नाम से प्रसिद्द स्कीइंग करने योग्य पहाड़ियों तक एक अलग से उड़न खटोला चलता है. जिसे चेयर लिफ्ट कहते हैं. यह  खुला बेंच नुमा होता है जिसमें चार लोग बैठ सकते हैं (यह दस साल से छोटे बच्चों के लिए नहीं है).  मेरी शोल्डर तक का किराया २०० रुपये था परन्तु उस समय बंद था. वहां पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं.

डेढ़ एक घंटे के बाद हमें भी आगे जाने का टिकट मिल गया और गोल्डोला पर सवार हो गए. कुछ दूर जाने के बाद गोंडोला रुक गयी. तभी बारिश भी होने लगी और समझ में आया कि मामला कुछ गड़बड़ है. फिर चल पड़ी परन्तु अपने अंतिम पडाव “अप्परवाथ” में रुकने की बजाय वापस घूम गयी. मौसम ख़राब था नीचे कोहरे के बीच से सफ़ेद बर्फ कुछ कुछ दिखाई पड़ रहा था. इस प्रकार आधे घंटे हवा में बने रहने के बाद वापस खिलनमर्ग (कुंगदूरी) में हमें उतार दिया गया.

एक तरफ अंतिम पडाव में नहीं उतर पाने का अफ़सोस था तो यह भी लगा कि अच्छा ही हुआ. १३५०० फीट से अधिक की उस ऊँचाई पर सांस लेने में कुछ कुछ तकलीफ तो हो ही रही थी. इस बात कि संतुष्टि थी कि एशिया  के सबसे ऊंचे और बड़े गोंडोला मार्ग पर एक बार जाना तो हुआ.

आजकल गोंडोला में सफ़र करने के लिए ऑन लाईन टिकट पहले से खरीदी जा सकती है. वहां जाकर E – टिकट  कौंटर से बोर्डिंग पास लेना होता है.

http://www.gulmarggondola.com

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सोनमर्ग (कश्मीर)

जुलाई 21, 2012

सोनमर्ग के बारे में सोचता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. कारण आगे जान ही जायेंगे. वैसे यह जगह श्रीनगर से उत्तर पूर्व ८७ किलोमीटर दूर लेह (लद्दाख) जाने वाले राजमार्ग पर ही स्थित है. उसी मार्ग पर ९  किलोमीटर और चल पड़ें  तो  ‘ज़ोजि’ ला (दर्रा)  पहुँच जायेंगे जो कश्मीर और लद्दाख के बीच में एक महत्वपूर्ण कड़ी है. खैर हमें तो वहां जाना ही नहीं है तो फिर  ज़ोजि को भूल जाएँ.  जिस जगह को सोनमर्ग कहा जाता है वहां से दाहिनी तरफ  ८ किलोमीटर की दूरी पर एक महत्वपूर्ण ग्लेसिअर है मचोई . यहीं से सिंध नामकी एक नदी  निकलती है जो १०८ किलोमीटर बह कर अंततः झेलम नदी की सहायक बनती है. सोनमर्ग जाते समय यह नदी सड़क के किनारे दिखाई देती रहती है और हम बड़े प्रसन्न हुए थे कि चलो सिन्धु नदी के दर्शन कर लिए. लेकिन यह भ्रम था. सिन्धु (इंडस) तो पाकिस्तान की सबसे प्रमुख नदी है जो  तिब्बत  से निकल कर लद्दाख होते हुए पाकिस्तान में प्रवेश करती है.

श्रीनगर से सोनमर्ग जाने वाली सड़क (राजमार्ग NH 1D)  भले अधिक चौड़ी न हो परन्तु बेहद खूबसूरत वादियों से गुजरती  है. देवदार के पेड़ों से आच्छादित पर्वत श्रेणियां और कल कल बहती सिंध नदी बेहद मनमोहक लगते हैं.

हम लोग सुबह ही नाश्ता कर निकल पड़े थे. १२ बजे के लगभग सोनमर्ग पहुंचना हुआ. वहां बायीं तरफ कई आस्थाई दूकानें/टपरियां थी जहाँ ओवरकोट, दस्ताने, टोपी, गम बूट आदि किराये पर मिलती थीं. सामने का मैदान दलदली था जहाँ  सैकड़ों घोड़े/टट्टू  ग्राहकों के इंतज़ार में खड़े थे. वहीँ का दूकानदार पूरे इंतज़ाम करता था. प्रति व्यक्ति दर, मांग और पूर्ती के आर्थिक सिद्धांत द्वारा ही तय होती थी. कुछ बूंदाबांदी हो रही थी परन्तु कुछ ही देर में मौसम साफ़ हो गया था. हम लोगों ने भी वहां से उपलब्ध कराये गए ओवरकोट, टोपी, गमबूट आदि पहन लिए और घोड़ों पर सवार हो ८ किलोमीटर की  चढ़ाई के लिए निकल पड़े. आधी दूर जाना ही हुआ था कि बारिश होने लगी. ग्लेसिअर के तलहटी में पहुँचते  पहुँचते पूरी तरह भीग चुके थे. समूह में किसी को भी घोड़े पर जाने का  अनुभव नहीं था. जहाँ हम पहुंचे वहां की ऊँचाई १३५०० फीट बताई गयी थी. एकदम सामने ही पहाड़ी ढलान बर्फ से ढंका हुआ  था. ठण्ड के मारे बुरा हाल था क्योंकि पूरे कपडे गीले हो चुके थे. वहां कुछ गुमटियां थी जहाँ आग तापने की व्यवस्द्था थी जिसके बदले वहां से २५ रुपये कप की चाय पीनी पड़ी. परन्तु मजबूरी थी. जो भी जोश था वह ठंडा हुआ जा रहा था. आगे बरफ पर स्लेद्ज गाड़ियों पर जाना था.  स्लेद्ज  क्या थी, महज पटिये थे जिनपर बिठा कर और खींच कर ऊपर की तरफ ले जाते थे. उस ग्लेसिअर की ढलान पर कुछ काल्पनिक बिन्दुएँ थीं जैसे ६, १२, २४ आदि. हम लोगोंने २४ तक जाने के लिए बात कर ली.  स्लेद्ज को खींच कर कुछ दूर ले जाया गया. इस बीच हम दो बार लुढ़क कर गिर पड़े थे. ठण्ड बर्दाश्त से बाहर होती जा रही थी. एक जगह  कहा गया कि अब आगे पैदल ही जाना है. काफी दूर तक (ऊपर) पैदल गए भी लेकिन एक स्थिति ऐसी आई कि फिर आगे चलते नहीं बना. वहीँ बैठ गए और दम भरने लगे. शायद ऊँचाई के अभ्यस्त न होने के कारण सांस लेने में भी बहुत तकलीफ हो रही थी. उस समय हमने जाना थकान की पराकाष्टा. ऐसी यातना हमने कभी नहीं भोगी थी.  सबके साथ यही हाल था. साथ में आई एक बच्ची जोर जोर से रो रही थी. हम उसे धीरज बंधाने  की स्थति में भी नहीं थे. तत्काल बरफ से पिंड छुड़ाने का निर्णय लिया और नीचे आ गए. नीचे आते आते भी दो तीन बार लुढ़क पड़े थे. नीचे आकर गुमटियों में कुछ हाथ पैर की सिंकाई करी और चाय भी पी. फिर घोड़ों को तलाशा गया जो वहीँ कहीं खड़े थे. ग्लेसिअर के पास नज़ारे तो बेहद खूबसूरत ही थे परन्तु शारीरिक और मानसिक स्थितियां ऐसी नहीं थीं कि हम उन वादियों का लुत्फ़ उठा सकें.

दुबारा घोड़ों पर बैठ कर वापसी यात्रा प्रारंभ हुई. कई जगह तीखी ढलानें थीं जहाँ घोड़ा फिसल पड़ता परन्तु संभल भी जाता. परन्तु हमारी तो जान निकली जा रही थी. ढलानों के कारण अपने आपको घोड़े की पीठ पर ९० अंश बनाकर बने रहने के लिए काफी परिश्रम करना पड़ रहा था. ले देकर वापस पहुंचे और गम बूट्स उतारे. अन्दर पानी भरा था और बरफ के टुकड़े भी निकले. पैर सुन्न हो चला था. हमारा ड्राइवर बड़ा भला आदमी था. उसने सब उतार फेंकने कहा और गाड़ी में बिठा दिया. चड्डी बनियान को छोड़ सब कपडे उतार लिए. तत्काल गाडी का हीटर चालू कर दिया  और कुछ देर में कुछ अच्छा लगने लगा. वहां भुगतान आदि करने के बाद वापस श्रीनगर की और कूच कर गए.

रास्ते में सिंध नदी के किनारे ही एक अच्छा सा ढाबा था जहाँ गाडी रोकी गयी और गरमागरम  आलू परांठे खाने को मिले. उसके बाद ही कुछ सामान्य होते लगे. शाम ढलते ढलते श्रीनगर पहुँच गए और होटल में निढाल होकर २ घंटे बिस्तर पर पड़े रहे. रात १० बजे सब ने खाना खाया और पुनः बिस्तर की शरण में.

सोनमर्ग  से  ग्लेसिअर तक जाने के लिए एक पक्की सड़क भी गयी है जो बहुत करीब तक जाती है. वहां के कुछ स्थानीय वाहनों को उस सड़क पे जाते हुए भी देखा था परन्तु पर्यटकों को घोड़ों पर जाने की विविशता थी. लगता है यह उपक्रम जानबूझ कर स्थानीय लोगों को रोजी रोटी मुहैय्या कराने के दृष्टिकोण से  कार्यशील है.

हमसे जो बड़ी भूल हुई वह ये कि ऐसे पहाड़ों में मौसम का कोई भरोसा नहीं होता. हमें सर से पैर तक ओढने वाली लम्बी बरसाती रखनी चाहिए थी जो वहां मिल भी रही थी परन्तु उन लोगोंने केवल ओवरकोट ही दिए जो भीग गए और समस्या बन गयी.

सोनमर्ग अविस्मर्णीय रहेगा.