हज़रतबल (श्रीनगर)

खाना वाना खा कर झील के किनारे कुछ मटरगश्ती हुई. पान वान के चक्कर में कुछ लोग भटकते रहे परन्तु उसे तो मिलना ही नहीं था. यहाँ के लोगों में यह गन्दी आदत नहीं है. गिने चुने दूकानों में  गुटका अलबत्ता जरूर मिल रहा था. शायद सैलानियों के खातिर. खैर काफिला आगे बढ़ा.

श्रीनगर में निशात बाग़ के करीब ही एक मशहूर जगह है हज़रत बल. यह एक गाँव था जो अब श्रीनगर का एक मोहल्ला बन गया है.    बल का मतलब स्थल से है न की बाल से. लेकिन यह जगह मशहूर इसलिए है कि कश्मीर के मुस्लिम सम्प्रदाय के विश्वास के अनुसार  यहाँ पर हज़रत मोहम्मद के दाढ़ी के पवित्र बाल को बड़े जतन से रक्खा गया है. आतंकवादियोंने  इस दरगाह में प्रवेश कर पवित्र बाल को चुरा ले जाने का भी प्रयास किया था और उस समय हुई गोली बारी में लगभग दो दर्ज़न आतंकवादी मारे गए थे. बाद में भी छुटपुट घटनाएं होती रही हैं. परन्तु अब लगता है अंततोगत्वा शांति स्थापित हो रही है. यहाँ कबूतरों की भारी तादाद है और लोगों का कहना है कि इनमें शान्ति के प्रतीक सफ़ेद कबूतरों की संख्या काफी बढ़ गयी है.  संवेदनशील होने के कारण  यहाँ सुरक्षा बल तैनात हैं.

इस पवित्र बाल को ईद-ए-मिलाद तथा मेराज-उन-नबी के अवसरों पर दिन में पांच बार एक सप्ताह तक दर्शन कराया जाता है  और लाखों की भीड़ उमड़ पड़ती है. कहा जाता है कि  १७ वीं सदी के प्रारंभ में मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के सूबेदार सादिक खान नें यहाँ एक आलीशान इमारत (इशरत महल)  और बागीचा  बनवाया था. उन दिनों यहाँ के इर्द गिर्द का  इलाका सादिकाबाद कहलाता था. १६३४ में जब शाहजहाँ वहां आया तो उसने उस इमारत को ज़ियारतगाह  में तब्दील करने का   हुक्म  दे दिया.

१९२० में ली गयी तस्वीर 

कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, हज़रत मुहम्मद के पवित्र बाल को  पैगम्बर के वंशज सैय्यद अब्दुल्ला नामके व्यक्ति द्वारा मदीना से  भारत लाया गया था जो वर्तमान कर्णाटक के बीजापुर शहर में बस गया था. सैय्यद अब्दुल्ला के मरणोपरांत उसके बेटे  सैय्यद हमीद को वह बाल विरासत में मिली. दक्खन में मुगलों के आक्रमण एवं अधिपत्य के कारण सैय्यद हमीद की पारिवारिक संपत्ति जाती रही. अब क्योंकि वह उस पवित्र बाल की देख रेख नहीं कर पा रहा था इसलिए उसने उसे एक अमीर कश्मीरी व्यापारी नूर-उद-दीन एशाई को  बेच दी. जब औरंगजेब को इस बात की भनक लगी तो उसने पवित्र बाल को जब्त करवा कर अजमेर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के दरगाह में रखवा दिया. नूर-उद-दीन एशाई को लाहोर के जेल में डलवा दिया परन्तु कुछ समय बाद औरंगजेब को अपने किये पर पछतावा हुआ और पवित्र बाल को उस कश्मीरी व्यापारी को लौटाने का निर्णय ले लिया. तब तक  नूर-उद-दीन एशाई जेल में रहते हुए ही दीन दुनिया से जा चुका था.

सन १६९९ में  ख्वाजा नूर-उद-दीन एशाई का मृत शरीर तथा हज़रत मोहम्मद का पवित्र बाल दोनों ही कश्मीर लाये गए और एशाई की बेटी इनायत  बेगम ने इस जगह अपने पिता को दफ़न कर पवित्र बाल को अपने संरक्षण में  ले लिया. यही वो दरगाह शरीफ है जो हज़रतबल के नाम से जाना जाता  है. वर्तमान में दिखाई देने वाली संगमरमर से बनी ईमारत शेख अब्दुल्ला द्वारा संचालित मुस्लिम औकाफ ट्रस्ट द्वारा निर्मित है. काम १९६८ में चालू किया गया था और १९७९ में पूरा हुआ. यह दरगाह धार्मिक गतिविधियों के अतिरिक्त राजनैतिक गतिविधियों के लिए भी मशहूर रहा है. शेख अब्दुल्ला यहीं से जनता को संबोधित करते थे और आम जनों के चहेता बने.  उनके मरणोपरांत उनके पुत्र डा. फारूक अब्दुल्ला ने भी दरगाह की गतिविधियों को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश की परन्तु १९९० में आतंकी हावी हो गए थे और उनकी गतिविधियों के लिए यह दरगाह एक मह्फूस जगह साबित हुई थी.

हम लोगोंने दरगाह के आसपास के रिहायशी इलाकों में कुछ तफरी की और जायज़ा लिया इसके बाद बायीं तरफ जहाँ कुछ ढलान सा था निकल पड़े. उधर से भी अन्दर जाने का रास्ता था. सुन्दर सा एक बाग़ था परन्तु फूलों के पौधे नहीं थे. दरगाह की गुम्बद पर कुछ रख रखाव का काम हो रहा था.  वहीँ लान पर महिलाओं का एक समूह गाने बजाने में लगा था. विशुद्ध पारंपरिक शैली में वहां के अजीबो गरीब ढोलक के साथ गाने गाये जा रहे थे. वहीँ दूर एक पढ़ा लिखा स्थानीय व्यक्ति मिल गया और वह उन्ही लोगों के साथ आया हुआ था. उसने बताया कि एक महिला को बच्चा नहीं हो रहा था. परिवार ने दरगाह में आकर मन्नत मांगी थी. अब जब बच्चा हो गया तो उसे लेकर यहाँ आये हुए हैं और अपनी ख़ुशी जाहिर कर रहे हैं. हमने उनसे पूरे समूह की तस्वीर लेने की इजाजत मांगी और उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी कहा इसमें क्या परेशानी है. हमने दूर से ही एक दो शोट्स लिए और आगे बढ़ गए. इस जगह पर्यटकों की आवाजाही बहुत ही कम दिखी.  ज्यादातर स्थानीय महिलायें ही थीं जो उनके लिए बने कक्ष में जाकर इबादत कर कर रही थीं. हमने खिड़की से झांक कर देखा था.  आगे सामने की ओर जाते हुए सुरक्षा बालों से सामना हुआ और हमने भी उनसे तस्वीर लेने की इजाजत ले ली. अन्दर की तस्वीरें नहीं लेने की हिदायत भी मिली. मुख्य  गुम्बद को जोड़ता हुआ एक भव्य हाल बना है और हाल के बाहर भी एक पंडाल है. फिर वहां से अन्दर भी देखकर कमानीदार  मुख्य दरवाजे से बाहर आना हुआ.

संभवतः  आजकल सैलानी यहाँ आने से कतराते हैं.

नोट: कश्मीरी महिलाओं द्वारा दरगाह के लान पर गायन की एक झलक नीचे के वीडिओ में है:

http://youtu.be/0XNjsPONVkU

17 Responses to “हज़रतबल (श्रीनगर)”

  1. प्रवीण पाण्डेय Says:

    आतंकियों के सायों से मुक्त हो काश्मीर की धरोहर..

  2. mahendra mishra Says:

    श्रीनगर के हजरतबल के बारे में फोटो सहित बढ़िया जानकारी दी है … आभार …

  3. S K TYAGI Says:

    आपने वाकई ‘बल’ के सारे बल निकाल दिये… सदा की तरह रोचक सैर सपाटा आप की बदौलत!

  4. भारत भूषण Says:

    लगता है हज़रत बल आतंकी साए से पूरी तरह मुक्त नहीं है. यह देख कर खुशी होती है कि अब रास्ते खुलने लगे हैं. बढ़िया पोस्ट, तस्वीरें और वीडियो- गाते हुए कश्मीर बहुत देर के बाद देखे :))

  5. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत ही अमूल्य जानकारी मिली, शुभकामनाएं.

    रामराम.

  6. विष्‍णु बैरागी Says:

    आपकी यह पोस्‍ट पढकर जी करता है, एक बार तो काश्‍मीर देखना ही चाहिए।

  7. arvind mishra Says:

    पर्यटन के साथ इतिहास और चित्रांकन का लुत्फ़ भी :आपने तो नहीं देखा वह पवित्र बाल ?

  8. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    डा. अरविन्द मिश्र:
    आभार. तयशुदा समय में वहां उपस्थिति से ही संभव हो सकता है.

  9. सतीश सक्सेना Says:

    बढ़िया और नवीन जानकारी के लिए आभार !

  10. राहुल सिंह Says:

    पाक और मुबारक.

  11. अली सैयद Says:

    कई बार लगता है कि आपका कैमरा छीन लूं और सारे फोटोग्राफ्स पे कब्ज़ा जमा लूं फिर सोचता हूं कि कम्प्यूटर भी छीनना पड़ेगा लेकि उसके आगे लगता है कि ये सब तो मैं कर भी लूंगा पर आपकी जैसी जुबान / भाषा कहां से लाऊंगा🙂

  12. ramakant singh Says:

    ज़िन्दगी ने साथ दिया और साँसों का भी साथ रहा तो यहाँ जरुर घुमने जाना है .खुबसूरत

  13. sanjay @ mo sam kaun.....? Says:

    @ अली साहब:
    ये सब हमने भी सोचा था और ये भी सोचा था कि पीएन सर से आमने सामने मिलकर उनके दिल पर कब्जा कर लेंगे लेकिन पुराने खिलाड़ी है सुब्रमनियन सर, छह महीने में दूसरी बार ऐसा हुआ कि भोपाल जाना हुआ और इन्हें जैसे पहले ही भनक लग जाती है और पोस्ट के जरिये जाहिर कर देते हैं कि भोपाल से बाहर हैं:(

    इस बार भी हम बैरंग लौट आये लेकिन इरादे कायम हैं ‘अब नहीं तो तब सही, कब तक छुपेंगे’🙂

  14. sanjay @ mo sam kaun.....? Says:

    एल्लो, पोस्ट पर कुछ कहना तो रह ही गया| वैसे कहने लायक कुछ छोड़ा ही नहीं है हजरतबल का इतिहास, वर्तमान, भविष्य, तस्वीरें, मन्नत – नि:शब्द ..

  15. Rakesh Kumar Says:

    बहुत ही सुन्दर जानकारी दी है आपने हजरतबल के बारे में.
    सन १९८८ में हमें भी हजरत बल जाने का मौका मिला था.
    पर इतनी ऐतिहासिक जानकारी नही हुई थी.

    बहुत बहुत आभार.

  16. Rakesh Kumar Says:

    वीडियो देखा,बहुत ही अच्छा लगा.

  17. Alpana Says:

    तस्वीरें बता रही हैं कि सैलानी फिर भी काफी हैं.हमें तो अंदाज़ा ही नहीं था कि कश्मीर में इतने भी लोग खुले में घूम सकते भी होंगे और गाना- बजाना भी चल रहा था !
    इसके लिए हमारी डिफेंस फोर्सेस और वहाँ की सरकार को बधाई देनी चाहिए कि अब कम से कम वहाँ जाने की पर्यटक सोच सकते हैं.यह बड़ी बात है.

    तस्वीरें अच्छी लगीं .

    हजरतबल मसजिद के बारे में मैं ने पहले भी पढ़ा है,लेकिन इतने विस्तार से आप की बताई कहानी रोचक लगी.
    कैसे दाढ़ी के एक बाल को संभाले रखा है उनके चाहने वालों ने अब तक! मानना पड़ेगा.एक बाल की बहुत ही रोचक और रोमांचक यात्रा रही .

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