सोनमर्ग (कश्मीर)

सोनमर्ग के बारे में सोचता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. कारण आगे जान ही जायेंगे. वैसे यह जगह श्रीनगर से उत्तर पूर्व ८७ किलोमीटर दूर लेह (लद्दाख) जाने वाले राजमार्ग पर ही स्थित है. उसी मार्ग पर ९  किलोमीटर और चल पड़ें  तो  ‘ज़ोजि’ ला (दर्रा)  पहुँच जायेंगे जो कश्मीर और लद्दाख के बीच में एक महत्वपूर्ण कड़ी है. खैर हमें तो वहां जाना ही नहीं है तो फिर  ज़ोजि को भूल जाएँ.  जिस जगह को सोनमर्ग कहा जाता है वहां से दाहिनी तरफ  ८ किलोमीटर की दूरी पर एक महत्वपूर्ण ग्लेसिअर है मचोई . यहीं से सिंध नामकी एक नदी  निकलती है जो १०८ किलोमीटर बह कर अंततः झेलम नदी की सहायक बनती है. सोनमर्ग जाते समय यह नदी सड़क के किनारे दिखाई देती रहती है और हम बड़े प्रसन्न हुए थे कि चलो सिन्धु नदी के दर्शन कर लिए. लेकिन यह भ्रम था. सिन्धु (इंडस) तो पाकिस्तान की सबसे प्रमुख नदी है जो  तिब्बत  से निकल कर लद्दाख होते हुए पाकिस्तान में प्रवेश करती है.

श्रीनगर से सोनमर्ग जाने वाली सड़क (राजमार्ग NH 1D)  भले अधिक चौड़ी न हो परन्तु बेहद खूबसूरत वादियों से गुजरती  है. देवदार के पेड़ों से आच्छादित पर्वत श्रेणियां और कल कल बहती सिंध नदी बेहद मनमोहक लगते हैं.

हम लोग सुबह ही नाश्ता कर निकल पड़े थे. १२ बजे के लगभग सोनमर्ग पहुंचना हुआ. वहां बायीं तरफ कई आस्थाई दूकानें/टपरियां थी जहाँ ओवरकोट, दस्ताने, टोपी, गम बूट आदि किराये पर मिलती थीं. सामने का मैदान दलदली था जहाँ  सैकड़ों घोड़े/टट्टू  ग्राहकों के इंतज़ार में खड़े थे. वहीँ का दूकानदार पूरे इंतज़ाम करता था. प्रति व्यक्ति दर, मांग और पूर्ती के आर्थिक सिद्धांत द्वारा ही तय होती थी. कुछ बूंदाबांदी हो रही थी परन्तु कुछ ही देर में मौसम साफ़ हो गया था. हम लोगों ने भी वहां से उपलब्ध कराये गए ओवरकोट, टोपी, गमबूट आदि पहन लिए और घोड़ों पर सवार हो ८ किलोमीटर की  चढ़ाई के लिए निकल पड़े. आधी दूर जाना ही हुआ था कि बारिश होने लगी. ग्लेसिअर के तलहटी में पहुँचते  पहुँचते पूरी तरह भीग चुके थे. समूह में किसी को भी घोड़े पर जाने का  अनुभव नहीं था. जहाँ हम पहुंचे वहां की ऊँचाई १३५०० फीट बताई गयी थी. एकदम सामने ही पहाड़ी ढलान बर्फ से ढंका हुआ  था. ठण्ड के मारे बुरा हाल था क्योंकि पूरे कपडे गीले हो चुके थे. वहां कुछ गुमटियां थी जहाँ आग तापने की व्यवस्द्था थी जिसके बदले वहां से २५ रुपये कप की चाय पीनी पड़ी. परन्तु मजबूरी थी. जो भी जोश था वह ठंडा हुआ जा रहा था. आगे बरफ पर स्लेद्ज गाड़ियों पर जाना था.  स्लेद्ज  क्या थी, महज पटिये थे जिनपर बिठा कर और खींच कर ऊपर की तरफ ले जाते थे. उस ग्लेसिअर की ढलान पर कुछ काल्पनिक बिन्दुएँ थीं जैसे ६, १२, २४ आदि. हम लोगोंने २४ तक जाने के लिए बात कर ली.  स्लेद्ज को खींच कर कुछ दूर ले जाया गया. इस बीच हम दो बार लुढ़क कर गिर पड़े थे. ठण्ड बर्दाश्त से बाहर होती जा रही थी. एक जगह  कहा गया कि अब आगे पैदल ही जाना है. काफी दूर तक (ऊपर) पैदल गए भी लेकिन एक स्थिति ऐसी आई कि फिर आगे चलते नहीं बना. वहीँ बैठ गए और दम भरने लगे. शायद ऊँचाई के अभ्यस्त न होने के कारण सांस लेने में भी बहुत तकलीफ हो रही थी. उस समय हमने जाना थकान की पराकाष्टा. ऐसी यातना हमने कभी नहीं भोगी थी.  सबके साथ यही हाल था. साथ में आई एक बच्ची जोर जोर से रो रही थी. हम उसे धीरज बंधाने  की स्थति में भी नहीं थे. तत्काल बरफ से पिंड छुड़ाने का निर्णय लिया और नीचे आ गए. नीचे आते आते भी दो तीन बार लुढ़क पड़े थे. नीचे आकर गुमटियों में कुछ हाथ पैर की सिंकाई करी और चाय भी पी. फिर घोड़ों को तलाशा गया जो वहीँ कहीं खड़े थे. ग्लेसिअर के पास नज़ारे तो बेहद खूबसूरत ही थे परन्तु शारीरिक और मानसिक स्थितियां ऐसी नहीं थीं कि हम उन वादियों का लुत्फ़ उठा सकें.

दुबारा घोड़ों पर बैठ कर वापसी यात्रा प्रारंभ हुई. कई जगह तीखी ढलानें थीं जहाँ घोड़ा फिसल पड़ता परन्तु संभल भी जाता. परन्तु हमारी तो जान निकली जा रही थी. ढलानों के कारण अपने आपको घोड़े की पीठ पर ९० अंश बनाकर बने रहने के लिए काफी परिश्रम करना पड़ रहा था. ले देकर वापस पहुंचे और गम बूट्स उतारे. अन्दर पानी भरा था और बरफ के टुकड़े भी निकले. पैर सुन्न हो चला था. हमारा ड्राइवर बड़ा भला आदमी था. उसने सब उतार फेंकने कहा और गाड़ी में बिठा दिया. चड्डी बनियान को छोड़ सब कपडे उतार लिए. तत्काल गाडी का हीटर चालू कर दिया  और कुछ देर में कुछ अच्छा लगने लगा. वहां भुगतान आदि करने के बाद वापस श्रीनगर की और कूच कर गए.

रास्ते में सिंध नदी के किनारे ही एक अच्छा सा ढाबा था जहाँ गाडी रोकी गयी और गरमागरम  आलू परांठे खाने को मिले. उसके बाद ही कुछ सामान्य होते लगे. शाम ढलते ढलते श्रीनगर पहुँच गए और होटल में निढाल होकर २ घंटे बिस्तर पर पड़े रहे. रात १० बजे सब ने खाना खाया और पुनः बिस्तर की शरण में.

सोनमर्ग  से  ग्लेसिअर तक जाने के लिए एक पक्की सड़क भी गयी है जो बहुत करीब तक जाती है. वहां के कुछ स्थानीय वाहनों को उस सड़क पे जाते हुए भी देखा था परन्तु पर्यटकों को घोड़ों पर जाने की विविशता थी. लगता है यह उपक्रम जानबूझ कर स्थानीय लोगों को रोजी रोटी मुहैय्या कराने के दृष्टिकोण से  कार्यशील है.

हमसे जो बड़ी भूल हुई वह ये कि ऐसे पहाड़ों में मौसम का कोई भरोसा नहीं होता. हमें सर से पैर तक ओढने वाली लम्बी बरसाती रखनी चाहिए थी जो वहां मिल भी रही थी परन्तु उन लोगोंने केवल ओवरकोट ही दिए जो भीग गए और समस्या बन गयी.

सोनमर्ग अविस्मर्णीय रहेगा.

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22 Responses to “सोनमर्ग (कश्मीर)”

  1. arvind mishra Says:

    शुरू हुआ और एक सांस में पढ़ डाला ….देखीं खूबसूरत तस्वीरें
    आपकी नज़रों से देख लिया मैंने भी कश्मीर
    कभी जा पायें या न जा पायें!

  2. अली सैयद Says:

    मनभावन चित्र , अदभुत विवरण और मजेदार किस्सा , खास कर २५ रुपये वाली एक कप चाय ,ग्लेशियर पे दम फूलने और भीगने वाला मुद्दा , क्योंकि आपकी घुमक्कड़ी से हम तो वैसे ही खुन्नस खाये बैठे हैं 🙂

  3. sanjay @ mo sam kaun.....? Says:

    कुछ समय बीतने के बाद ये भूल आपको अच्छी लगने लगे शायद, ऐसे अनुभव रोज रोज नहीं मिलते| कई बरस पहले हम भी गए थे, वो सब याद दिला दिया अपने|

  4. विष्‍णु बैरागी Says:

    चित्र देख-देख कर मन खुश होता रहा और विवरण पढ-पढकर आत्‍मा कॉंपती रही।

  5. सतीश सक्सेना Says:

    अपने साथ कश्मीर यात्रा कराने के लिए धन्यवाद आपका ! बढ़िया श्रंखला ..

  6. meghnet Says:

    यह तो अच्छे खासे जीवट की कहानी हो गई सुब्रमणियन भाई साहब. लेकिन मज़ा आया क्योंकि आपने वर्णन ही ऐसा किया है. सुंदर चित्र चुराने के लायक हैं :))

  7. udantashtari Says:

    प्रसन्न चित्त हो लिए सर जी..पढ़ देख कर….

  8. S K TYAGI Says:

    वाह! वादियों की खूबसूरती देखते ही बनती है!! इनकी कुछ तो कीमत (शारीरिक कष्टों के रूप में) चुकानी ही पड़ती न?

  9. Vivek Rastogi (@vivekrastogi) Says:

    वाह कश्मीर इतना सुँदर है, आपके द्वारा प्रदत्त चित्रों ने मन मोह लिया

  10. प्रवीण पाण्डेय Says:

    सुन्दरता के न जाने कितने ऐसे ही ठिकाने हैं हिन्दुस्तान में, बहुत ही रोचक प्रस्तुति..

  11. Prakash Says:

    “सोनमर्ग से ग्लेसिअर तक जाने के लिए एक पक्की सड़क भी गयी है जो बहुत करीब तक जाती है. वहां के कुछ स्थानीय वाहनों को उस सड़क पे जाते हुए भी देखा था परन्तु पर्यटकों को घोड़ों पर जाने की विविशता थी. लगता है यह उपक्रम जानबूझ कर स्थानीय लोगों को रोजी रोटी मुहैय्या कराने के दृष्टिकोण से कार्यशील है.”
    येही कुछ विवशता पर्यटकों के साथ शिमला के निकट कुफरी में भी है. घोड़े खच्चर वाले पुरे रास्ते को कीचड़ से सरोबार किये रहते है. आप चाह कर भी पैदल नहीं जा सकते…

  12. नीरज जाट Says:

    सोनमर्ग है ही ऐसा कि वहां एक रात रुकना था। लाजवाब जगह। अचानक पहाडों की ऊंचाई पर पहुंच जाने और ऊपर से भीग जाने के कारण सफर कभी कभी यातना भी बन जाता है लेकिन यही सफर का आनन्द है।

  13. Rekha Srivastava Says:

    प्रकृति की सुन्दरता को दिखाने वाले खूबसूरत चित्रों से सजी आपकी सोनमर्ग की यात्रा ने हमें भी घुमा दिया वैसे हम जैसे कमजोर दिल वाले वहाँ नहीं पहुंच सकते . बस के बार पहाड़ी यात्रा की थी तो बस से खिड़की से नीचे देखा तो काँप गए और रास्ते भर आँखें बन किये बैठी रही.
    इस यात्रा के लिए आपकी कलम और कैमरे को धन्यवाद !

  14. ताऊ रामपुरिया Says:

    अत्यंत सुंदर और रोचक यात्रा वृतांत, लगता है आप काश्मीर एक बार फ़िर भिजवाकर ही मानेंगें.:)

    रामराम.

  15. Asha Joglekar Says:

    इतने खूबसूरत फोटो और उतना ही रोचक वृतांत । हम 1983 मे गये थे सोनमर्ग जाहिर है कि अब जाने की हिम्मत नही जुटेगी । हमने बर्फ की वो गुफा भी देखी थी जिसकी छत, दीवारें, जमीन सब कुछ हिममय था । सोनमर्ग जाने का रास्ता कितना संकरा है टट्टू सिर्फ एक एक पांव रख कर ही आगे बढ सकता है । तब तो कोई पक्की सडक नही थी । वैष्णोदेवी के लिये भी नही थी ।

  16. राहुल सिंह Says:

    चित्र देखते-पढ़ते रोमांच हो रहा है, कंपकंपी होने लगी.

  17. ajaykumarjha Says:

    हमने आपकी पोस्ट का एक कतरा सहेज़ लिया है , आज ब्लॉग बुलेटिन के पन्ने को खूबसूरत बनाने के लिए । देखिए कि मित्र ब्लॉगरों की पोस्टों के बीच हमने उसे पिरो कर अन्य पाठकों के लिए उपलब्ध कराने का प्रयास किया है । आप टिप्पणी को क्लिक करके हमारे प्रयास को देखने के अलावा , अन्य खूबसूरत पोस्टों के सूत्र तक पहुंच सकते हैं । शुक्रिया और आभार

  18. Surinder Singh Says:

    Well captured and conveyed, congrats!

  19. Raj Sinh Says:

    Kayee bar visit kiya par comment na de saka .har yatra me main hamesha aap ke saath raha aur hamesha kee tarah lutf uthata raha .aapka dhanyvaad !

  20. Gyandutt Pandey Says:

    वाह! आप सोनमर्ग भी हो आये। बहुत बधाई जी।

  21. Pratibha Saksena Says:

    बहुत सुन्दर चित्रांकन ,और यात्रा बड़ी साहसिक – हमारी सोनमर्ग की स्मृतियों को जीवंत कर दिया !

  22. Alpana Says:

    रोमांचक सफ़र!
    बारिश से भीगी सड़क देख कर ही डर लग रहा है .
    बड़ी हिम्मत वाला सफ़र रहा यह.
    वादियों का लुत्फ़ उठाने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार होना भी ज़रुरी है ..बहुत सही कहा.मौसम के हिसाब से तैयारी भी ज़रुरी है,
    वाकई न भूलने वाली यात्रा रही यह तो!
    चित्र मनोहारी हैं.

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