Archive for अगस्त, 2012

पहलगाम के आसपास

अगस्त 15, 2012

११ जून २०१२:

सुबह हमें बस्ती में ही मुख्य मार्ग के होटल में स्थानांतरित कर दिया गया और वहीँ सुबह का नाश्ता भी मिल गया. अब भ्रमण के लिए निकलना था. पहलगाम से आगे जहाँ कहीं भी जाना हो तो वहीँ की स्थानीय टेक्सियाँ लेनी पड़ती हैं. मुख्य मुख्य पर्यटन स्थलों के लिए टेक्सी स्टेंड में सैकड़ों गाड़ियाँ अपना नंबर लगाए खड़ी रहती हैं और उनका किराया भी पूर्व निर्धारित है. वहीँ सूचना फलक, स्थानीय प्रशासन  की तरफ से, लगा हुआ है. पर्यटकों को पूरा निचोड़ने का इंतज़ाम किया धरा है. पहलगाम के आसपास के मुख्य आकर्षण बेताब घाटी, चंदनवाड़ी और आरू घाटी हैं. ये सब लगभग १६ किलोमीटर की परिधि में ही है. इन सब जगहों में घुमा लाने  का न्यूनतम टेक्सी किराया १५०० रुपये है.  एक चक्कर  लगभग चार साढ़े  चार घंटों में पूरी हो जाती है. १५०० रुपयों में टेक्सी करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था. नंबर के मुताबिक  टेक्सी वाले आ खड़े हुए और हमें ले चले.

इन दिनों  यहाँ अमरनाथ यात्रा के लिए तैय्यारियाँ पूरी जोरों पर थीं. पहलगाम ही इसके लिए बेस केम्प होता है. कुछ जगहों पर यात्रियों के ठहरने के लिए तम्बुयें बनी थी/तानी जा रही थीं. आगे रास्ता लिद्दर (Liddar) (मूलतः लम्बोदरी) नदी के किनारे  से चलता है. दूर दूर तक नदी के किनारे कई परिवार पिकनिक मनाते दिखे, उनकी गाड़ियाँ या तो सड़क के किनारे खड़ी थीं या फिर नीचे उतार दी गयीं थीं. ज्यों ज्यों आगे बढ़ते गए, कलकल करती नदी का तेज प्रवाह और दूसरी तरफ देवदार से आच्छादित पहाड़ियां जो कहीं कहीं बर्फ से ढकी भी थीं, पहाड़ी झरने कहीं  जमी हुई और कहीं प्रवाह्वान   सब मिलकर एकदम तिलस्मी वातावरण निर्मित कर रही थीं.

पहलगाम से ६/७ किलोमीटर की दूरी पर ही एक बहुत ही प्यारी घाटी दिखी और काफी नीचे नदी थी. यहाँ नदी के किनारे को, कटाव से बचाने के लिए.  सीमेंट कोंक्रिट से बाँध रखा है और उसीके आगे पैदल चलने का पक्का रास्ता भी बना दिया गया है. पूरे इलाके को एक सुन्दर पिकनिक स्पाट के रूप में विकसित  किया गया है. हमें बताया गया था कि हिंदी फिल्म बेताब की शूटिंग यहीं पर हुई थी. ख़ास कर यह गाना  “जब हम जवाँ होंगे, जाने कहाँ होंगे” तो सभी को याद होगा ही. तब से ही यह बेताब घाटी कहलाने लगी जबकि इसका वास्तविक नाम हजन घाटी था.

वैसे नीचे तक गाडी के जाने के लिए रास्ता बना था परन्तु ड्राइवर वहां ले जाने के मूड में नहीं था. कहा, यहाँ से जितना अच्छा दिख रहा है उतना पास से नहीं देख पायेंगे. फिर प्रति व्यक्ति १५० रुपये भी देने पड़ेंगे. हम लोगोंने वहां उतर कर दृश्यों को आँखों और केमरे  में भर लिया और आगे बढ़ गए.

आगे का रास्ता भी  नैसर्गिक सौन्दर्य से भरा पूरा था. चंदनवाड़ी पहुँच कर कुछ पैदल चलना पड़ा. लगा हम फिर सोनमर्ग पहुँच गए हैं. यहाँ भी सोनमर्ग की ही तर्ज पर आँखों के देख पाने की  हद तक बर्फ फैली हुई थी. काफी पर्यटक और उनके बच्चे बर्फ का आनंद ले रहे थे. यहाँ बर्फ सफ़ेद नहीं थी, मिटटी से सनी हुई  कुछ कुछ मट मैला क्योंकि पुरानी हो चली थी. बायीं तरफ से एक रास्ता जाता है जो सीधे अमरनाथ ले जाता है. यहाँ से केवल ३० किलोमीटर ही दूर है. चंदनवाड़ी से ही अमरनाथ की वास्तविक यात्रा प्रारंभ होती है.

चंदनवाड़ी में लगभग एक घंटे बरफ में खेल कूद कर वापस हो लिए. अब आरू घाटी जा रहे थे. यह रास्ता कुछ तंग था और पहाड़ियों से गुजरता था. जब आरू पहुंचे तो बारिश होने लगी. वहां छाते किराए पे मिल रहे थे. पहले तो प्रति छाते के लिए १०० रुपये की मांग की गयी. हम लोगों को बारिश से बचने के लिए अच्छी जगह मिल गयी थी. छाते वाला पीछे पड़ा हुआ था. आखिरकार ३० रुपये प्रति नग के हिसाब से मामला तय हुआ. दूसरों का अनुसरण करते हुए हम लोग भी चल पड़े. छोटी सी बस्ती थी जो पर्यटकों पर ही आश्रित थी. खाने पीने के लिए कतार से धबनुमा होटलें थीं. उन सब को पार कर एक मैदान दिखा. घोड़े/खच्चर भी वहां उपलब्ध थे लेकिन पैदल घूमने की ही सलाह मिली थी. लम्बे चौड़े घांस के मैदान, पहाड़ियां, झरने आदि का समागम रहा. एक जगह लेवेंडर फार्म लिखा था और क्यारियों में एक रोपनी थी. इसे फार्म का नाम दिया जाना बेतुका सा लगा था. दूर एक पर्यटन विभाग का होटल दिख रहा था और नाम लिखा था अल्पाइन होटल. बस यों ही मटर गस्ती करते रहे. वैसे वहां देखने समझने के लिए कुछ था भी नहीं. हाँ यहाँ से कई स्थानों के लिए ट्रेक्किंग में लोग जाया करते हैं. कोलाहोई  ग्लेसियर उनमे प्रमुख है. अब भूक लगने लगी थी और बारिश भी बंद हो चुकी थी. छाते वाला वहीँ मैदान में ही अपना हिसाब चुकता करवा लिया. एक होटल तलाशा गया जहाँ मन पसंद खाना मिल गया. पता चला कि वहां का कारीगर उत्तर प्रदेश का था. उसे धन्यवाद दे पहलगाम वापस   आ गए.

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पहलगाम की ओर कूच – श्रीनगर को अलविदा

अगस्त 7, 2012

१० जून २०१२:

हमारे शिकारे के खिवैय्या शफी भाई के परिवार से सुबह मिलना एक बड़ा ही सुखद अनुभव रहा. आज हम लोगों को  ९४ किलोमीटर दूर पहलगाम के लिए निकलना है. हमारे कश्मीर यात्रा के पहले पडाव श्रीनगर को अलविदा कहते हुए इंतज़ार करती गाड़ियों में अपने सामान लदवा दिए. श्रीनगर में शहर से लगी  हुए कई अन्य महत्वपूर्ण जगहें हैं जो समयाभाव के कारण छूट रहीं थीं.  जैसे शंकराचार्य का मंदिर (तख़्त-ए-सुलेमान), ट्यूलिप उद्यान, शालीमार बाग़ (इसे तो जान बूझ कर हमारे लोगोंने ही छोड़ दिया था), परीमहल, झेलम नदी में नौका विहार करते हुए श्रीनगर के नज़ारे, हरि परबत पर बना किला और उसी के अन्दर शारिका भगवती (जगदम्बा) का मंदिर  (खीर भवानी जो कश्मीरी पंडितों की कुल देवी स्वरुप है), हम्ज़ा मखदूम का दरगाह और गुरुद्वारा जिसे छट्टी पादशाही के नाम से जाना जाता है वगैरह वगैरह . इन सबके लिए कम से कम २ और दिन चाहिए थी.

 पहलगाम के लिए निकलना हुआ तो ड्राइवर महोदय से निवेदन किया कि कम से कम हरि परबत के नीचे बने दरवाज़े को दिखलाते चले . वैसे जाना भी उधर से ही था. यह इलाका रैनावारी कहलाता है. दरवाजे के सामने गाडी रुकी तो बगैर समय गँवाए हम अन्दर ताक झाँक करने चले गए. पर्वत के ऊपर किला है और नीचे परकोटा है. यहीं से रास्ता जाता है. अकबर ने कभी यहाँ एक “नगर नागोर” बसाने की सोची थी परन्तु यहाँ तो अपने आप बसी हुई है. हमारे ड्राइवर जी का कहना था कि यह बसावट “अनआथोरायिस्ड” है.

एक बहुत ही पुरानी तस्वीर – काठी दरवाज़ा

बस हमें केवाल इतने से ही संतुष्टि कर लेनी पड़ी जब कि ऊपर जाने के लिए रास्ता था जो मुझे ललचा रहा था. अपनी पसंद को दूसरों पर थोपना भी अच्छा नहीं लगा. शहर के तंग रास्तों को छोड़ चौड़े रास्तों से निकलते हुए कुछ दूकाने दिखी जहाँ वहीँ की रीड/Reed (एकदम पतली बेंत जैसी) से बनी प्यारी प्यारी टोकरियाँ  और अन्य घरेलु उपयोग की वस्तुएं सजी हुई थी. कुछ आगे चलने पर पत्थर को तराश कर बनाये गए बर्तन और अन्य सामग्रियां दिखीं. अब हम शहर से बाहर आ गए थे और गाडी पूरी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी. टक-टकी निगाहों से हम देखे जा रहे थे, तलाश थी अवन्तिपुरा की जो श्रीनगर से ३० किलोमीटर  दक्षिण-पूर्व में है. वहां रोकने के लिए कह रक्खा था. एक कस्बे  से जब गाडी गुजर रही थी तो कुछ खंडहर दिखे. हमने कहा रोको रोको. ड्राइवर ने गाडी रोकते हुए कहा सर मैं तो रोक ही रहा था. यही अवन्तिपुरा  था. एक अत्यंत भव्य विष्णु मंदिर यहाँ ९ वीं शताब्दी में अवन्तिवर्मन के द्वारा बनवाया गया था. काफिरों ने  इसे ध्वस्त कर दिया. अरे! यह क्या कह और  कर रहा हूँ. इस मंदिर के बारे में तो अलग पोस्ट बननी ही है.

रास्ते में बहुत से पारंपरिक मकान दिखे जिनको देखकर लगा कि लोग इनका रख रखाव नहीं कर रहे हैं. मेरी पुत्री ने कहा देखिये इनमें कोई  नहीं रहता. हमने इतना ध्यान नहीं दिया था. बात सही थी. पर क्यों? हम कश्मीर के सौन्दर्य को हृदयंगम करने में लगे थे  कि उन कश्मीरी पंडितों का ख्याल ही नहीं रहा जिन्हें अपना घर बार छोड़ कर १९९० में पलायन करना पड़ा था. मन खट्टा हुआ जा रहा था. हमने अपना ध्यान यात्रा पर ही केन्द्रित करना उचित समझा. पहलगाम अभी दूर है. हमने ड्राइवर साहब से अनुरोध किया कि वे हमें उनके ग्रामीण इलाकों से भी रूबरू करवाते चलें. इतने में ही एक मोड़ आई जहाँ लिखा था “एपिल वेली”, यहीं से गाड़ी मुख्य मार्ग छोड़ आगे बढ़ने लगी. रास्ते में भेड़ों को हांकते चरवाहे दिखे तभी ड्राइवर साहब ने बताया कि पहलगाम का नाम इन्हीं चरवाहों की वजह से पड़ा है. पहलगाम का मतलब होता है चरवाहों की घाटी या बस्ती. कश्मीरी में चरवाहे के लिए शायद पोहल कहा जाता है.

एक जगह हमें बताया गया  कि  ये अखरोट के पेड़ हैं.  आगे चल कर सेव और चेरी के भी बगान थे परन्तु या तो फल नहीं लगे थे या फिर बहुत ही छोटे छोटे थे. एक बात और पता चली. अब कश्मीर में सेव की खेती कम होती जा रही है. सेव का स्थान   चेरी और किवी (न्यूज़ीलैण्ड वाली) ने ले लिया है.  तस्वीरें चलती गाडी से ही ले रहे थे. इस इलाके में चावल की खेती खूब होती है. महिलायें धान की रोपाई में लगे हुए दिख रहे थे बिलकुल उसी तरह जैसे हम देश के अन्यत्र भागों में भी देखते हैं. फिर एक गाँव आया. यहाँ के मकान सभी अच्छे थे और ऐसा लग रहा था मानो उनका जीवन स्तर काफी ऊंचा हो. कुछ शुद्ध लकड़ी के बने दो मंजिला छोटे मकान भी दिखे

जिनका उपयोग संभवतः नहीं हो रहा था. उसी तरह की लकड़ी की दूकाने भी कहीं कहीं दिखीं थी. बताया गया था कि नीचे दूकान लगती है और ऊपर  का हिस्सा रहने के लिए प्रयुक्त होता है. बस यही एक झलक थी. इसके बाद हम लोग पहलगाम जाने वाले मुख्य मार्ग से जुड़ गए.

अब हम लोग पहलगाम के कुछ करीब थे. सामने एक नदी दिख रही थी जिसे लिद्दर (Liddar) (मूलतः लम्बोदरी)  कहा जाता है. यहाँ का माहौल बहुत ही खुशनुमा था. रमणीयता से अभिभूत हो एक  फोटो सेशन के लिए गाडी रुकवाई. इस नदी में रेफ्टिंग का आयोजन भी  होता है.

कुछ देर में हम लोग पहलगाम के बाज़ार में थे. अब तक बड़ा खुला मौसम था. अचानक से बारिश शुरू हो गयी. वहां एक नामी गिरामी होटल है “नत्थू की रसोई” जहाँ हम लोगोंने बढ़िया खाना खाया और हम लोगों के लिए निर्धारित होटल में पहुँच गए. होटल बहुत दूर ऊँचाई पर ऐसी जगह (लाडिपुरा)  थी जहाँ से बस्ती में आना जाना बहुत कठिन था क्योंकि  गाँव   की सड़क  कीचड से भरी थी. था परन्तु चारों तरफ दृश्य नयनाभिराम रहा. यहाँ एक रात ही रुकना हुआ. सुबह वहां से एक दूसरे होटल में चले गए थे.

पिता पुत्र