नगीन (नागिन) झील और हाउस बोट (श्रीनगर)

गुलमर्ग से वापसी पर  हम लोगों को सर्वसुविधायुक्त हाउस बोट्स में रुकवाया गया. एक बोट का नाम ही था “पीस ऑफ़ माइंड” परन्तु यह डल झील न होकर नगीन (नागिन) झील में थी. हमें बताया गया था कि  डल झील में बोट्स मिल तो जायेंगे परन्तु वहां अधिक भीड़ भाड़ है और विभिन्न चलते फिरते दूकानदारों से परेशानी बनी रहेगी. नगीन कुछ दूरी पर है और प्राकृतिक सौन्दर्य का शांति पूर्वक रसास्वादन किया जा सकता है. हमें भी समझौता कर लेना पड़ा. रात का खाना दूसरे हाउस बोट में बने रेस्तोरां  में करवाया गया क्योंकि हमारे हाउस बोट का रसोईया किसी अन्य पार्टी (२५/३०)  के लिए खाना बनाने में लगा हुआ था. नगीन या नागिन झील वास्तव में डल झील का ही एक हिस्सा है और दोनों को एक मेड ही अलग करती है परन्तु कुछ लोग इसे अलग झील भी मानते हैं.

सुबह सुबह झक मार रहा है 

यह फूल बेचने वाला हमारी तरफ आ ही रहा था कि उसके मोबाइल की घंटी बज गयी 

हाउस बोट से सुबह का नज़ारा वास्तव में तबीयत तर करने वाला था. नाश्ते के बाद शिकारे में २ घंटे घूमने का कार्यक्रम था. नियत समय पर शफी भाई अपने शिकारे के साथ उपस्थित थे. हाउस बोट्स में रुकते समय ही हम लोग   दो भागों में बंट गए थे. हमारा ग्रुप शफी  भाई के साथ हो लिया. हमारे साथ पांच सवारियां शिकारे में बैठ गयीं. शिकारे का खिवैय्या शफी भाई किस्से कहानियाँ सुनाने लगे.

इसी बीच एक नाव पर बैठकर एक व्यक्ति पेपर मेश से बनी वस्तुओं को ले हमारे शिकारे के बगल आ गया. सुन्दर कारीगरी से युक्त विभिन्न चीजें थीं. पहले भी श्रीनगर में देखे ही थे और कीमतों से कुछ कुछ वाकिफ भी. कुछ लोगोंने उसे उपकृत भी कर दिया. शफी  भाई ने कहा “गनीमत है यहाँ तो बहुत कम ही लोग आयेंगे, यदि डल झील में होते तो परेशान हो जाते”. शफी   भाई से हमने उनकी जीवनी के बारे में पूछ ताछ की तो उन्होंने बताया कि वे पहले ओर्केस्ट्रा में गाया करते थे और शुरू हो गए. उन्हें कई भाषाओँ का ज्ञान है परन्तु लिखना पढना नहीं आता. स्कूल कभी गए ही नहीं परन्तु अपने बच्चों को अच्छी  तालीम दे रहे हैं. वैसे आजकल कश्मीर में शिक्षितों का प्रतिशत काफी ज्यादा है और यहाँ कन्याओं को भी शिक्षित किया जाता है. उन्होंने बताया कि उनका घर इसी झील के उस पार है. झील के अन्दर ही एक टापूनुमा इलाका. यह ‘अबी खयारबल नागी मोहल्ला’ कहलाता है और श्रीनगर के पुरानी बस्ती से लगा हुआ है परन्तु कोई पहुँच मार्ग नहीं है इसलिए बस्ती वालोंने ही लकड़ी के पुल बना लिए हैं. यह भी कहा कि सरकार अपनी तरफ से तो पुल नहीं बनाएगी क्योंकि जो भी मकानात बने हैं सभी गैर कानूनी हैं. हमने उन्हें टटोला कि क्या हम लोगों को अपना घर दिखा सकेंगे. वे बड़े उत्साहित होकर बोले “मुझे बड़ी ख़ुशी होगी” और फिर उनके घर की तरफ शिकारे को मोड़ दिया.

इसे लन्दन ब्रिड्ज कहा जाता है  

दूर से ही लगा हम शायद एक और जन्नत में जा रहे हैं. झील के उस कोने में कमल (वाटर लिली) की खेती हो रही थी और कुछ जगह जलीय वनस्पति पर मिटटी डाल कर शाक सब्जी भी उगाई जा रही थी. इस तरह छोटे छोटे तैरने वाले बागान भी हैं.  जब तक वह बताते और हम समझ पाते वह इलाका हमारे केमरे की रेंज से दूर हो गया. बहुत जल्द शिकारे को किनारे बने लकड़ी के मचान के बगल खड़ा कर दिया और हम सब उतर पड़े. मुश्किल से २०० कदम पर उनका घर था.

वह इलाका भी साफ़ सुथरा और सुन्दर लगा. वहां उनके घर के बरामदे में ही उनकी अम्मी, बहन और बहू से मुलाकात हो गयी और बड़ी आत्मीयता से हम लोगों का स्वागत हुआ. हम सबको ऊपर की मंजिल में बने बड़े हाल में ले जाया गया जहाँ कालीने बिछी थी और केवल एक सोफा नुमा कुर्सी रखी थी इसलिए सभी कालीन पर ही दीवार से टिक कर बैठ गए. बातों का दौर फिर शुरू हुआ. हमने उनसे पूछ लिया कि इतने बड़े हाल का कैसे इस्तेमाल करते हैं तो उन्होंने बताया कि शादी वादी में लोग यहीं सोने आते हैं. आतंकवाद पर बात चली. हमें बताया गया कि कश्मीरी लोग आर्मी से बहुत नफरत करते हैं क्योंकि वे घर घर घुसकर बहुत परेशान करते हैं. कई बार तो बेगुनाह नौजवानों को उठा ले जाते हैं. इसी लिए कुछ लड़कों ने सीमा पार करके बंदूकें उठा लीं लेकिन अब हालात बदल गए हैं. पहले हम सब भी उन लड़कों (जवानों) का साथ देते थे लेकिन वही हमारे लड़के हमारे दुश्मन बन गए क्योंकि बन्दूक हाथ में होने से उनके हौसले बुलंद हो गए और गर्दन पर बन्दूक तान हमसे ही पैसे उगलवाने लगे.

हदीसा और पार्श्व में उसके अब्बा हुजूर शफी भाई  

बातों का सिलसिला  चल ही रहा था जब उनकी एक बिटिया हम सब के लिए चाय और बिस्कुट लेकर आई और कपों में चाय भरने लगी. हमने उसका नाम पता किया,  वह हदीसा है और १० वीं पास कर लिया है. आगे पढाई जारी है. हम सबने चाय पी और हदीसा  आग्रह पूर्वक कपों में और चाय ढालती गयी.

इतने में शफी भाई की पत्नी और दो और लड़कियां आयीं. बिना किसी संकोच के वे अपनी तस्वीरें खिंचवाने  के लिए खड़ी हो गयीं. उनमें से दूसरे नंबर पर रेशमा है जो लद्दाख की रहने वाली है और डलहौसी में पढ़ाई कर रही है. उसने लद्दाख आने और उनके यहाँ रुकने का निमंत्रण भी दे दिया.

कुछ देर रहकर हम लोग अपनी वापासी यात्रा पर निकल पड़े. हमें घाट तक छोड़ने शफी भाई के परिवार वाले आये हुए थे. शफी भाई ने हम सब को हमारे बोट हाउस वाले किनारे जहाँ शिकारों की पार्किंग है, छोड़ दिया. वहीँ से पैदल ही हम अपने रस्ते चल पड़े थे.

जैसा अक्सर होता है, हलाकि शिकारे में सैर हमारे पैकेज का एक हिस्सा था परन्तु फिर भी शिकारे वाले को कुछ बक्शीश देने की परिपाटी  है. हमने सोचा था १००/२०० उन्हें टिप  दे देंगे परन्तु उनके घर परिवार और उनकी सम्पन्नता को देखकर लज्जावश हमने अपने हाथ खींच लिए. शिकारा चलाने के अतिरिक्त शफी भाई पहाड़ियों में ट्रेक्किंग और झेलम आदि के तेज धाराओं में  राफ्टिंग भी करवाते हैं.  हमने केवल पूरी विनम्रता से उनसे विदा ले ली. अगली बार आने पर शफी भाई हमें अपने घर पर ही रखेंगे ऐसा उनका प्रस्ताव भी रहा. कश्मीर का यह अनुभव  अविस्मरणीय  रहेगा.  

19 Responses to “नगीन (नागिन) झील और हाउस बोट (श्रीनगर)”

  1. राहुल सिंह Says:

    शफी भाई से मिला कर आपने इसे सचमुच अविस्‍मरणीय कर दिया.

  2. ramakant singh Says:

    खुबसूरत नज़ारों के साथ बेहतरीन पोस्ट मन ललचा गया घुमने को

  3. सुज्ञ Says:

    खूबसूरत नजारे और शफी भाई से मुलाकात, आनन्ददायक!!

  4. ali syed Says:

    घुमक्कड़ी के साथ पारिवारिक मिलन मजेदार लगा ! फोटोग्राफ्स हमेशा की तरह खूबसूरत ! लकड़ी के पुल के उस पार की ज़िन्दगी आकर्षित करती है ! काश ज़न्नत में कुछ लम्हे हमारे भी गुज़रते …पर घूम फिर कर वही , बंदूकों का भय , सारा नशा हिरन हो जाता है !

  5. विष्‍णु बैरागी Says:

    सैर का विरण और मनोरम चित्रों के मुकाबले इस बार शफी भाई सेमुलाकात अधिक आनन्‍ददायक रही।

  6. arvind mishra Says:

    सचमुच अविस्मरनीय रहेगा यह -नयनाभिराम -पहले तो हम डरे कि वहां भी कोई नागिन मिल गयी क्या ?🙂

  7. सतीश चंद्र सत्यार्थी Says:

    इन ख़ूबसूरत जगहों की तस्वीरें देख कर लगता है हम कैसे अभागे हैं जो अभी तक नहीं जा पाये.. फालतू का झक मार रहे हैं🙂

  8. sanjay @ mo sam kaun.....? Says:

    आप ही के लिए नहीं, हम सबके लिए आपका यह कश्मीर प्रवास अविस्मरणीय रहा| आभार पी.एन. सर|

  9. प्रवीण पाण्डेय Says:

    वाह, बहुत ही सुन्दर दृश्य, स्वर्ग ही है यह..

  10. Lalit Sharma Says:

    Badhiya post, Shafi bhai jaise sahriday log bhi milte hain sfar me.

  11. Alpana Says:

    Really beautiful pics !
    ऐसा लगा ही नहीं जैसे अपने ही देश के किसी हिस्से में आप यात्रा कर के आये हैं.फ़िल्मी गानों में ही ऐसे दृश्य दिखाई देते रहे हैं.
    वास्तव में इन्हें देखना अपने आप में कितना सुखद होगा यह अनुभवी ही बता सकता है.वाकई यह तो अविस्मरणीय यात्रा रही .शायद यह यात्रा वृतांत अन्य पर्यटकों के डर को भी कम करे और लोग उस ओर भी घूमने जाया करें.

    लद्दाख भी ज़रूर जा कर आयें.कहते हैं वह भी बड़ी सुन्दर जगह है.

  12. nirmla.kapila Says:

    इतनी खूबसू0रती??? वाह अपना भी मन जाने का हो आया। धन्यवाद विस्तार से जानकारी देने के लिये।

  13. Rekha Srivastava Says:

    वहाँ के जीवन के बारे और वहाँ के दृश्य इतने मनोरम है तो लगता है कि कभी शिकारे में तो रह कर देखना ही पड़ेगा. वैसे शिकारे में सैर की तमन्ना तो तभी से है जब हम तीसरी क्लास में पढ़ रहे थे. हमारी किताब में कश्मीर का पाठ था और उसमें था शिकारे का सचित्र वर्णन बस तभी से मन में बसा है और आपने तो उसे वर्णित करके इच्छा को और बढ़ा दिया है. हम आपके संस्मरण से सबसे अधिक labh ले रहे हें.

  14. Bharat Bhushan Says:

    वाकई में पूरा आलेख पढ़ कर शफ़ी भाई की तस्वीर मन पर रह जाती है. यह पढ़ कर उस जानकारी को भूल गया हूँ जिसके अनुसार घाटी के लोग (कश्मीरी पंडितों सहित) कभी वितृष्णापूर्वक कहा करते थे, ‘चल…चल…आगे चल हिंदुस्तानी .’ आलेख बहुत सुंदर बन पडा है.

  15. AVCr8teur Says:

    I have not seen this part of the world. The wooden bridge looks scary.

  16. yashodadigvijay4 Says:

    शनिवार 04/08/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

  17. eden Says:

    Beautiful photos. Love the lily pad in the water.

  18. shiana Says:

    Excellent write-up…
    saadepunjab.com

  19. Smart Indian - अनुराग शर्मा Says:

    @ लोग आर्मी से बहुत नफरत करते हैं क्योंकि वे घर घर घुसकर बहुत परेशान करते हैं. कई बार तो बेगुनाह नौजवानों को उठा ले जाते हैं. इसी लिए कुछ लड़कों ने सीमा पार करके बंदूकें उठा लीं

    – पहले बन्दूकें उठाई गई थीं फिर उन बन्दूकों से निकलती मौत पर शिकंजा कसने के लिये दूसरों की रक्षा के लिये ही सेना को अपनी जान पर खेलकर घर-घर घुसना पड़ा था। जो बदनसीब अपने हितैषी और शत्रु का भेद नहीं समझ सकते उनका मुस्तक़बिल कैसा होगा, समझना कठिन नहीं।

    इस शृंखला और चित्रों से स्वर्ग के दर्शन कराने के लिये आभार!

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