वैपिन द्वीप में पल्लिपुरम का किला

दुपहर खा पी लेने के बाद दो विकल्प थे. या तो आराम किया जाए या फिर घूमने निकल चलें. रविवार का दिन था इसलिए भाई को कोई परेशानी नहीं थी. अलबत्ता काले काले मेघ जरूर कैमरे के उपयोग की संभावनाओं को धूमिल करते लगे. भाई ने कहा बारिश शुरू होने के पहले निकल पड़ते हैं. हमने भी हामी भर दी और निकल पड़े. गंतव्य तो निश्चित नहीं था. सीधे कोच्ची के मरीन ड्राईव की तरफ बढ़ चले. प्रधान मंत्री जी के आगमन के पूर्व की तैय्यारियाँ चल रही थीं. आगे बढ़ते गए और बेक वाटर्स को पार कर गए. हमने कहा चलो वैपीन द्वीप चलते हैं. उसने एक जगह लाकर गाडी खड़ी कर दी और कहा यही तो है. सामने फिर बेक वाटर्स था और दाहिनी तरफ अरब सागर.  हमारे इन इलाकों में आये ५० वर्ष से अधिक हो चले थे. दिमाग पर जोर डाला और पूछा वह जो सामने भूमि दिख रही है वह तो फोर्ट कोच्ची  ही हैं न. भाई ने हामी भरी. हमने कहा यह जगह  वैपीन द्वीप का दक्षिणी छोर है, हमें सीधे इसके विपरीत दिशा में उत्तरी छोर तक जाना होगा. खैर यहाँ गाडी रोकी गयी और आस पास के इलाकों का जायजा लिया गया.

पश्चिमी घाट पर्वत श्रंखला से निकल  कर सात प्रमुख नदिया कोच्ची के पास समुद्र में मिलती हैं और इससे बनने वाली डेल्टाओं ने ही सात द्वीपों की रचना की होगी. आठवां द्वीप मानव निर्मित है जिसे वेल्लिंगटन  कहते हैं.  सभी द्वीपों में आबादी है और जल मार्ग ही आवागमन का प्रमुख साधन रहा है. अब द्वीपों को पुलों द्वारा भी जोड़ दिया गया है.

सैकड़ों वर्ष पूर्व चीन के संपर्क में आकर यहाँ उनके तकनीक पर आधारित मत्स्य आखेट के लिए विशेष प्रकार के जाल का प्रयोग होता रहा  है. इन्हें चाइनीस फिशिंग नेट्स कहते हैं. इस प्रकार के जाल यहाँ बहुतायत से लगे दिखे. वे स्थिर होते हैं और उनका जलक्षेत्र भी बड़ा सीमित होता है. फोर्ट कोच्ची से  वैपीन के लिए स्थल मार्ग से दूरी बहुत ज्यादा होने के कारण अधिकतम यातायात जलमार्ग से ही होता है. दो पहिये और चार पहिये वाली गाड़ियाँ भी नाव की ही सवारी करती है. इन सब के अवलोकन के बाद अब निकलने की बारी थी. भाई ने पूछा अब चलना कहाँ है. मैंने अंदाज से कहा पल्लिपुरम. तब भाई के समझ में आया और कहा “अच्छा अच्छा वहां एक किला है न. मैंने उसके बारे में पढ़ा है कि वह बहुत पुराना है और अब तक मुझे नहीं मिला”.

इसके बाद उसने कुछ लोगोंसे पल्लिपुरम की दिशा जानने के लिए बातचीत की. हमने बीच में  दखल देते हुए कहा यह मालूम करों कि वहां कोई किला विला है क्या. जैसा मैंने सोचा था लोगोंने सीधे उत्तर की तरफ जाने के लिए कह दिया. हम लोग फिर निकल पड़े. वैपिन, भारतीय समुद्र तट से पृथक  उत्तर से दक्षिण की तरफ लगभग २५ किलोमीटर लम्बा भूभाग है. पूरब से पश्चिमी   तट को जोड़ते हुए  द्वीप में अनेकों नहरें बनी हुई हैं जिनकी हालत भी अच्छी ही हैं. उनका प्रयोग पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए किया जा  सकता है.  द्वीप में कई सुन्दर बीच (समुद्र तट) भी हैं जहाँ कुछ आवाजाही जरूर है. इसी द्वीप में कोच्ची बंदरगाह का मुख्य दीप स्तम्भ (लाइट हाउस) भी है.

वैपिन के अंतिम छोर में पहुँचते  पहुँचते  सड़क के दाहिनी तरफ पल्लिपुरम फोर्ट लिखा सूचना फलक भी दिख गया. गाडी वहीँ किनारे रोक कर भाई ने एक भद्र महिला से पूछ कर किले तक जाने के मार्ग के बारे में आश्वस्त होना चाहा. महिला ने कहा टीपू का किला है. यदि ताला लगा हो तो नजदीक ही पुलिसवाले होंगे जो  ताला  खोल देंगे. एक सकरी घुमावदार गली से अन्दर चले गए और सामने ही पेड़ों की झुरमुट में वह तथाकथित किले का पिछवाडा  दिख पड़ा. जब हम सालों पहले आये थे तो सड़क से ही दृष्टिगोचर होता था. अब वहां एक स्कूल का निर्माण हो चला है इस लिए वह वृष्टिछाया में है.

भारत में फिरंगियों  (यूरोपियनों)  द्वारा निर्मित भवनों में यह सबसे पुराना बताया जाता है. हमारी नज़र में यह किला न होकर एक विशाल बुर्ज है जिसका उपयोग तीनों तरफ से समुद्री यातायात को सुरक्षित/नियंत्रित करने के लिए किया जाता रहा होगा. छै कोणों वाला यह  बुर्ज  सन १५०३ में  पुर्तगालियों द्वारा भारत में किया गया पहला निर्माण था. डच लोगोंने १६६१ में पुर्तगालियों  को परास्त कर उस बुर्ज पर अपना कब्ज़ा जमा लिया और सन १७८९ में त्रावनकोर रियासत ने इसे खरीद लिया था.

यह ईमारत लेटराईट पत्थरों से बनी है और दीवारें ६ फीट की चौडाई लिए है. इसके हर एक बाजू की लम्बाई ३२ फीट है और ऊँचाई ३४ फीट.  अन्दर घुसने के लिए पूर्व दिशा में एक लोहे का गेट है और सीढियां ऊपर की और गयी है. वह भी केवल पांच फीट फिर  समतल भाग है. सीढ़ी की दाई बगल से अन्दर घुसने के लिए मार्ग है. नीचे का वह कक्ष (तलघर) गोला बारूद रखने के लिए प्रयुक्त होता था. कहने के लिए तो भूतल के अरिरिक्त दो और तल हैं परन्तु अभी तो केवल आसमान ही दिख रहा है. बीचों बीच  एक गोल प्लास्टर युक्त जगह है और अनुमान है कि वहां कोई लकड़ी का मोटा खम्बा लगा रहा होगा और उसी के सहारे दोनों तल  भी लकड़ी के बने हों. सबसे ऊपर सभी दिशाओं की तरफ मुह किये तोप लगे थे अतः उन तक जाने के लिए व्यवस्था तो रही ही होगी. अब क्योंकि ऊपर चढ़ पाना संभव नहीं है, अनुमान ही  है कि तीनों तरफ से समुद्र (बेक वाटर्स) दिखता ही होगा. पूर्व की ओर कुछ ही दूरी पर जल क्षेत्र लगा हुआ है.

कहने के लिए तो यह किला राज्य शासन द्वारा संरक्षित है परन्तु विभाग की लापरवाही स्पष्ट दिखाई दे जाती है. उस स्मारक के मुख्य द्वार पर एक टूटा हुआ ताला लटका हुआ था. आस पास कोई चौकीदारी करता भी नहीं दिखा. दीवारों में नाना प्रकार की वनस्पतियों ने कब्ज़ा जमा लिया है. भवन के इर्दगिर्द नाना प्रकार के पेड़ पौधे उग आये हैं. यदि यही स्थितियां बनी रहीं तो इस किले के जमींदोज होने में अधिक समय नहीं लगेगा.

16 Responses to “वैपिन द्वीप में पल्लिपुरम का किला”

  1. arvind mishra Says:

    आप भी एक खोजी हैं निकाल ही लिया पल्लिपुरम किले को !
    वे नदियाँ कौन कौन हैं ?

  2. विष्‍णु बैरागी Says:

    आपका विस्‍तृत विवरण और नयनाभिराम चित्र, प्रत्‍येक स्‍थान को देखने का लालच पैदा करते हैं।

  3. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    डा.अरविन्द मिश्र:
    आभार. अचंकोविल, मनिमला, मीनांचिल, मुव्वातुपुज्हा, पम्बा तथा पेरियार नदियों कोच्ची से लगे हुए वेम्बनाड नामके झील में समा जाती हैं जो समुद्र से जुड़ा दीखता है.

  4. akaltara Says:

    रोचक जानकारी, किन्‍तु चिंताजनक स्थिति.

  5. प्रवीण पाण्डेय Says:

    ५०० वर्ष तो हो ही गये हैं इस किले के। संरक्षित कर के रख लें।

  6. sanjay @ mo sam kaun.....? Says:

    मस्त सैलानी हैं आप भी, ऐसी ऐसी जगहें दिखा दीं जो हम जीवन में कभी न देख पायें।

  7. यशवन्त माथुर Says:

    कल 13/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  8. ghughutibasuti Says:

    पल्लिपुरम का किला दिखाने के लिए आभार.

  9. ishwar karun Says:

    yah kila dekhane ka awasar mujhe bhi mila hai,kintu aapki reporting se smritiyon ka aanand aur badh gaya .Abhar.
    ishwar karun ,chennai.

  10. sangeeta swarup Says:

    बढ़िया यात्रावृतांत …बहुत सारी जानकारी मिली …. आभार

  11. Asha Joglekar Says:

    पल्लीपुरम किले के बारे में जानकर खुशी हुई । कितनी ऐसी जगहें हैं जिनके बारे में हमने आपके माध्यम से ही जाना है । पुरातत्व विभाग के पास पैसा नही है तो रखरखाव मुश्किल ही है । देश में तो पैसा बहुत है पर मंत्लोरी संत्गोंरियों से बचे तो विभागों को मिले । आप घूमें और हमें भी सैर करायें ।

  12. Asha Joglekar Says:

    कृपया मंत्री और संत्री पढें ।

  13. Bharat Bhushan Says:

    आपकी खोजी प्रवृत्ति खोज ही लेती है. हम अपनी धरोहरों को संभाल कर रखने के आदि नहीं है. भवनों के प्रति शायद त्यागी और वैरागी हैं.

  14. Gyandutt Pandey Says:

    ये चाइनीज़ फिशिंग नेट्स वाला चित्र बहुत मोहक है!

  15. Vinay Prajapati Says:

    बहुत सुन्दर

  16. RN Gupta Says:

    I understand that Lords of vegetarian hotels are Sarswat Brahmans ,not Shiwali Brahamans.

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