मसाला दोसा

पी.एन. संपत कुमार 

कोचीन शिपयार्ड

के आलेख का रूपांतर 

सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला नाश्ता क्या है. एक पत्रिका के साथ वितरित प्रश्नावली में पूछे गए इस सवाल का मेरा जवाब था “दोसा”.

चावल, उड़द और थोड़ी सी मेथी के खमीरीकृत   गीले आटे को तवे पे गोलाई में फैलाकर बनाया गया यह पकवान दक्षिण भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग है.  इस क्षेत्र के गृहणियों  में ऐसे बिरले ही होंगे जिन्होंने दोसा बनाने की कला में दक्षता हासिल न की हो. यहाँ के बच्चे भी नियमित रूप से नाश्ते में दोसा खाने से बचे नहीं होंगे. आश्चर्य नहीं है कि क्षेत्र की लोरियों में भी चाँद से दोसे की घुसपैंठ हो चली है.

इसके चचेरे भाई मसाला दोसा का आविष्कार किसी रचनात्मक होटल व्यवसायी द्वारा अधिक से अधिक एक शतक पूर्व ही किया गया होगा. बीच में आलू की सब्जी से भरा हुआ अर्ध चंद्राकर दोसा गरमा गरम साम्बार  और नारियल की चटनी के साथ, खावुओं की पहली पसंद रहती है. साधारण दोसे की तरह मसाला दोसा साधारणतया घरों में नहीं बनाया जाता. मुझे यकीन है कि दुनिया की किसी भी गृहणी ने कम से कम  मसाला दोसा बनाने की कला में दक्षता   तो हासिल नहीं की होगी. होटलों में मसाला दोसे की अत्यधिक मांग इस बात को प्रमाणित करता है.

मैसूर का नाम किसी न किसी तरह मसाला दोसा से जुड़ा हुआ है (मैसूर मसाला दोसा) और अपनी विशिष्टता की बखान करता लगता है. इससे ऐसा आभास होता है मानो कर्णाटक ही मसाला दोसे की जन्मस्थली रही हो. यही बात मैसूर रसम और मैसूर बोंडे (बोंडा = आलू बड़ा) के साथ भी लागू होती है. मैसूर राज्य ने, जो रसिक राजाओं की एक शक्तिशाली रियासत थी, बुद्धि जीवियों, कलाकारों, संगीतज्ञों के अतिरिक्त पाक शास्त्र में निपुण रसोईयों को भी आकृष्ट किया.  दुनिया भर में शाकाहारी होटलों के अधिपति उडुपी (कर्णाटक) के मूल निवासी शिवाली ब्राह्मणों नें ही कदाचित मसाला दोसे का प्रचार प्रसार किया हो. पूरे उत्तर भारत में मसाला दोसे को लोकप्रिय बनाने का श्रेय तो इंडियन काफी हाउस द्वारा संचालित होटल श्रंखला को ही देना होगा.

बचपन में तो मसाला दोसा के नाम से ही मुह में पानी भर आता था. उन दिनों होटलों में जाकर कुछ खाना हमारे लिए विलासिता की बात हुआ करती थी. किसी होटल में जाकर मसाला दोसा खाने का साहसिक कार्य मैंने ८ वीं कक्षा में पढ़ते समय किया था.मेरा एक मित्र हुआ करता था जो अपने ट्यूशन से बचने के लिए मुझे साथ ले लेता था और मैं भी अपने आखिरी पीरियड में स्कूल से कन्नी काट कर उसके साथ हो लेता. इस उपकार के एवज में वह मुझे स्कूल के नजदीक के कृष्ण भवन रेस्तोरां में मसाला दोसा खिलाया करता. उतना स्वादिष्ट मसाला दोसा मैंने जीवन में कभी और नहीं खाया है. उसकी सुगंध ही कुछ दिव्य हुआ करती थी. मेरे घर पहुँचने में हमेशा ही देर हो जाया करती थी.

दोसा खाने की शुरूआत एक किनारे से टुकड़ा तोड़ चटनी में डुबा  कर करनी होती है. जैसे जैसे हम बीच में भरे हुए मसालेदार आलू की तरफ बढ़ते जाते है परमानन्द की प्राप्ति होने लगती है. फिर आलू की सब्जी पर निशाना साधते हैं. बचे खुचे साम्बार या चटनी के साथ आखिरी कौर को उदरस्थ करना एवरेस्ट फतह या फिर किसी अच्छे नात या कव्वाली के अंतिम चरणों में पहुँचने का अहसास देता है.   दोसे के मसाले , साम्बार और चटनी की खुशबू मेरे हाथों में लम्बे समय तक बनी रहती थी और अक्सर ही मैं उस खुशबू को बनाये रखने के लिए  संध्या के उबाऊ खाने से परहेज करता. मसाला दोसे के लिए मैंने अपनी यारी बनाए रखी और डर बना रहता था कि घर में पोल न खुल जाए. अंततः मसाला दोसे की जीत हुई और पढाई में मैं फेल हुआ.

दक्षिण भारतीय होटल के मिस्त्रियों द्वारा मसाला दोसे के भौतिक एवं रासायनिक स्वरुप  पर अलिखित शोध प्रबंधनों का समुचित आदर सुनिश्चित किया जाता रहा है. उसे १५ से १८ इंच गोलाई लिए कुरमुरा होना चाहिए. सादा दोसे की तरह मसाला दोसे को पकाते  समय पलटा नहीं जाता.   जहाँ तक रासायनिक गुण धर्म की बात है,    घी में तले दोसे और अन्दर उपस्थित आलू मसाले की महक  दोसे के महीन छिद्रों से निकलकर  कुछ दूर से ही मिलने लगती है. स्थानीय छोटे छोटे तेज प्याज और हलकी हींग डाल कर बनायी गयी साम्बार, मसाला दोसे के जायके में सुहागे का काम करती है. मसाला दोसा के लिए निर्धारित अन्य गुणों में  उसे सुनहरा तो होना ही चाहिए और वृत्त के मध्य का भाग कुछ गहरा सुनहरा.

इसके बनाने में अच्छे कौशल की आवश्यकता होती है. हलके खमीर उठे गीले आटे को कटोरी में भरकर तवे में डाला जाता है और कटोरी के पेंदे से ही फैला कर गोलाई दी जाती है.  साधारण रोटी बनाने की तवा में बनाया तो जा सकता है परन्तु होटलों में प्रयुक्त होने वाला तवा लगभग ६/७ फीट लम्बा और २.५ फीट चौड़ा होता है. उस तवे पर एक ही बार में  ६ से १० दोसे बनाये जा सकते हैं. जब अंतिम दोसे को तवे पर फैलाया जा रहा होता है, पहला वाला, मसाला (आलू का मिश्रण) डाले जाने के लिए तैयार हो जाता है. उबले  आलू में  प्याज, अदरख, हरी मिर्च, हल्दी तथा करी पत्ता (मीठे नीम का पत्ता) आदि  मिलकर तेल में भूना जाता है. . मसालेदार आलू बनाए जाने की विधि गोपनीय रखी जाती है. जब तक आलू मसाला  तवे पर पड़े अंतिम दोसे पर पहुँचता है, पहला दोसा मोड़े जाने के लिए तैयार रहता है. इस तरह उन्हें अर्ध वृत्ताकार या  बेलनाकार मोड़ कर साम्बार और चटनी के साथ परोसा जाता है. आजकल कुछ जगहों में मसाला दोसे को नाना प्रकार के रूप में पेश कर कुछ रचनात्मकता लायी जा रही है.

कुछ बड़े हो जाने के बाद, जब भी शहर (त्रिचूर/त्रिशूर) जाना होता मैं हमेशा किसी ऐसे  होटल में जाया करता जहां मसाला दोसा अच्छी मिलती हो.  उनमें से प्रमुख होटल “पथन”, “अम्बाडी”, “द्वारका” और “भारत” हुआ करते थे. होटल भारत तो अब भी अस्तित्व में है और ख्याति  प्राप्त है परन्तु दूसरे सभी विलुप्त हो गए और  नए नए खुल गए हैं. मेरे वरिष्ट मित्र एक ‘मॉडर्न स्वामीस केफे’  के बारे में बात किया करते थे जो मसाला दोसा प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय था. लेकिन जब तक मैं कालेज में पहुंचा, वह होटल बंद हो चली थी.

राजकपूर और खुशवंत सिंह जैसे नामी गिरामी लोग भी इस अपेक्षाकृत सस्ती और स्वास्थ्य के लिए अहितकारी व्यंजन के  प्रशंसक रहे हैं. हमारे भूतपूर्व सेनाध्यक्ष सुंदरजी अपने संस्मरण में लिखते हैं कि युवा अवस्था में जब वे कश्मीर में थे तो सड़क किनारे के ठेलों/दूकानों से मटन करी से युक्त  मसाला दोसा नियमित खाया करते थे. इस अद्भुत डिश का ऐसा रूपांतरण पिछले कई वर्षों में हो चला है. मसाला दोसे ने विश्व भर की यात्रा कर ली है. अमरीका के व्हाईट हाउस में भी मेहमानों को विशेष अवसरों पर मसाला दोसा परोसे जाने की खबर है. मुझे विश्वास है कि दुनिया के हर शहर के होटलों में मसाला दोसा किसी न किसी रूप में अवश्य ही मिलती होगी.

परन्तु जब एक बार मैंने अपने बेटे से पूछा कि खाने के लिए क्या मंगाया जावे,  उसका तत्काल जवाब था “पिज्जा”. मैं गलत था जब मैंने प्रारंभ में  सबसे अधिक पसंद किये जाने वाले नाश्ते के लिए ‘दोसा’ चुना था. प्रचुर मात्रा में बहते हुए  चिप चिपे चीज़ पर शिमला मिर्च और टमाटर के बारीक टुकड़ों को फैला कर सजाई गयी  पिज्जा पर नमक तथा काली मिर्च का छिडकाव कर    एक टुकड़े  को काटने के विचार से ही उसके स्वाद तंत्र तांडव करने लगते हैं. उसके मन में अपने देसी मसाला दोसे के लिए ऐसी भावना कभी उत्पन्न नहीं हुई.

लेकिन मैं निराश नहीं हूँ. मेरे शहर कोच्ची में दोसे की  कोई बड़ी परंपरा तो नहीं रही है लेकिन ऐसी कुछ जगहें हैं जहाँ केवल दोसा ही मिलता है. “पई दोसा सेण्टर” में जो महात्मा गाँधी रोड पर है, ३६ प्रकार की दोसा मिलती है. मेरे घर के पास ही त्रिपुनितरा में एक “दोसा कॉर्नर” है  जिनकी विशिष्टता ही दोसा है जो ५०  प्रकार के हैं. यहाँ तो चोकोलेट दोसा भी उपलब्ध है. मुंबई के वाशी में तो यह संख्या सौ से ऊपर है. एक सर्वेक्षण के आधार पर अखबारों में भी आ चुका है कि भारत में ग्रहण करने के लिए सर्वोत्तम १० पकवानों में मसाला दोसा भी एक है.

अंतरजाल पर मसाला दोसा घर पर बनाए जाने हेतु विभिन्न रेसिपी उपलब्ध हैं लेकिन मैं कोई सुझाव नहीं दूंगा क्योंकि मैं नहीं  चाहता कि आप लोगों में से कोई भी घर पर मसाला दोसा बनाने का यत्न करे. इसका आनंद तो बाहर जाकर खाने में ही है.

तस्वीरें: अंतरजाल जिंदाबाद  (कुछ अपनी भी है)

19 Responses to “मसाला दोसा”

  1. राहुल सिंह Says:

    आपके घर पर विधि-विधानपूर्वक पाए-खाए दोसे, जिसे नजाकत के साथ दोशा जैसा उच्‍चारित किया जाता है, का स्‍वाद पोस्‍ट पढ़कर घुलने लगा, सचमुच रससिद्ध.

  2. हरि जोशी Says:

    या तो बनाने की विधि भी बताईए या फिर पैक करा भेज दीजिए…और हां, यदि प्‍याज डलता हो तो नवरात्र के बाद..जय हो

  3. Bharat Bhushan Says:

    जीवन में 7 वर्ष इडली डोसा खाया है. तस्वीरें देख कर यादें ताज़ा हो आईं और मुँह में स्वाद भर आया. बहुत खूब.

  4. सतीश चंद्र सत्यार्थी Says:

    स्वादिष्ट पोस्ट…. ^^ मुंह में पानी आ गया…

  5. ramakant singh Says:

    BAHUT SUNDAR DOSHA PURAN KE LIYE DHANYAWAD.

  6. udantashtari Says:

    बहुत रोचक!!

  7. सतीश सक्सेना Says:

    आज सुबह सुबह दोसे का मूड बना दिया , बढ़िया पोस्ट !

  8. Gyandutt Pandey Says:

    यहां एक दोसा प्वाइण्ट खुला है इलाहाबाद में। एक सौ चार प्रकार के दोसा हैं उसके मीनू में। पैसे अच्छे खर्च हो जाते हैं वहां पर खा कर वैसा ही आनन्द आ जाता है जैसा आपकी पोस्ट पर आया!🙂

  9. Lavanya Shah Says:

    dosa zindabaad …even i am a great fan ..good article

  10. GUDDO Says:

    सुंदर लेख
    चिकागो दीवान एवनुऊ महात्मा गाँधी मार्ग पर उडीपी मसाला डोसा खाया संकल्प में भी पर जो स्वाद खाने भारत के मद्रास होटल या दासा प्रकाशम में हैं विदेशों में नहीं

  11. arvind mishra Says:

    दोसा या डोसा? क्या सही है ?
    इस पोस्ट को पढ़कर आनन्द आ गया .पी एन संपत कुमार जी और आपका बहुत बहुत आभार ..मगर इस पोस्ट ने एक तात्कालिक लाचारी भी उत्पन्न की -तुरंत कहाँ से मिले डोसा भकोसने के लिए!
    डोसा को लेकर मेरे बहुत संस्मरण है =पूरी पोस्ट की सीमा तक -कभी शेयर करेगें -अब तो कितने तरह के डोसे हो गए हैं -पहले तो बस मसाला डोसा का नाम याद था -मेरा घर एक डोसा प्रोन घर है -बच्चों ,पत्नी और मुझे भी प्रिय -आप मेरे यहाँ कभी डोसा खाने का सौभाग्य प्रदान करे हमें ….मुझे बंगलौर में खाए डोसे का स्वाद नहीं भूलता और चेन्नई में खाए सबसे बेस्वाद डोसे का ..

    मुझे यकीन है कि दुनिया की किसी भी गृहणी ने कम से कम मसाला दोसा बनाने की कला में दक्षता तो हासिल नहीं की होगी-‘नहीं की होगी ‘ को कृपया की ही होगी कर दीजिये -पत्नी का कहना है !

  12. प्रवीण पाण्डेय Says:

    पिज्जा तो बहुत पीछे आता है, पहली पसन्द तो डोसा ही है…

  13. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    वास्तव में यह दोशा या दोशै है (आम और अमुवा की तरह). डोसा तो कतई नहीं. तामिलनाडू में तोशै कहते सुना जा सकता है. तमिल लिपि में अक्षरों की कमी (न की उच्चारण) के कारण “द” के लिए भी “त” प्रयुक्त होता है. जनसाधारण में व्याकरण के अल्पज्ञान के कारण “त” का विभेदीकृत उच्चारण नहीं हो रहा है. मिश्राइन जी को नमन , उनकी उपलब्धि के लिए.

  14. arvind mishra Says:

    @उच्चारण दोष ठीक करने के लिए शुक्रिया

  15. yashodadigvijay4 Says:

    आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 20/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  16. Gagan Sharma Says:

    वाह जवाब नहीं। अब तो इस सुपाच्य, हल्के, स्वादिष्ट (बनाने वाले पर निर्भर) खाद्य ने दक्षिण की सीमाएं लांघ सुदूर पहाडों में भी जगह बना ली है। है ही इसी लायक। याद आता है सत्तर का शुरुआती समय जब कलकत्ता में इक्का-दुक्का मद्रासी टिफिन या कैफे होते थे वहां जा कर इसका लुत्फ़ लेना पडता था। अब तो पंजाब में भी जहां थोडा भारी खाना पसंद किया जाता है वहां भी इसने धाक जमा ली है। ये और बात है कि वहां एकाधिक से ही संतोष आ पाता है🙂

  17. indian citizen Says:

    बहुत अच्छा लगता है, हम लोग तो महीने में एक बार खा ही लेते हैं.

  18. sanjaybengani Says:

    तस्वीर में कथई हो चुके दोसे देख रहा हूँ, यहाँ इतनी सिकाई नहीं होती बेचारों की🙂 सुन्दर आलेख. दोसा खाने का मन हो आया. घर पर फरमाईस करनी पड़ेगी🙂

  19. Sushil Kumar Says:

    ओह! मुँह में पानी आ गया
    लज़ीज़ पोस्ट

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