जैव विविधता – बरसात के बाद

इस बार के ओणम के लिए मैं गाँव में था. कभी बारिश तो कभी धूप. मौसम वैसे सुहाना ही था परन्तु कभी कभी लगातार होने वाली बारिश से उबासी भी होने लगती थी.मौसम की अनुकूलता के कारण भूमि में दबे पड़े कई प्रजातियों के पौधों के बीज आदि अंकुरित हो उठते हैं और एक प्रकार से जंगल सा दिखने लगता है. चारों तरफ पेड़ पौधे फूलों से लदे रहते हैं. यही कारण भी है कि हर घर के आँगन में  ओणम के दिनों में फूलों की पंखुड़ियों का प्रयोग  कर रंगोलियाँ सजती हैं. उसके लिए सूर्योदय के पूर्व ही फूलों को बीनने बच्चे निकल पड़ते हैं. हमारा घर गाँव के एक छोर पर है. घर से निकलते ही दायें तरफ से एक गलीनुमा सड़क जाती है जो गाँव का चक्कर लगाते हुए राजमार्ग से जुडती है.

खाली समय, अपने ही घर के बाड़े में उग आये वनस्पतियों से रूबरू हो लेने का अवसर होता है और ऐसे अवसर दिन में कई बार आते हैं. नाना प्रकार के फूलों के अतिरिक्त  रंग बिरंगे कीट पतंगों की भी कोई कमी नहीं रहती. उनमेंसे कुछ जाने पहचाने तो कुछ अनजाने भी होते हैं. कभी कभी सोचता हूँ काश वनस्पति शास्त्र एवं कीट विज्ञानं  का भी अध्ययन कर लिया होता.

Jewel Beetle – Curis Viridicyanea?

ऐसे ही एक दिन हरी भरी झाड़ियों में एक सुन्दर हरे रंग का ही भंवरा दिखा, प्रकृति ने उस निरीह प्राणी की आत्म रक्षा के लिए ही तो ऐसा रंग दिया होगा. माँ कह रही थी कि हरे टिड्डे (grass  hoppers) अब नहीं दीखते. लेकिन यहाँ तो भरपूर हैं. माँ शायद घर के  अन्दर की बात कर रही थी.  दो कामुक  टिड्डे गुत्थम गुत्थी हो रहे थे. हमारी भनक से वे अलग हो गए. रंग बिरंगे पेट वाले ऐसे टिड्डे देखे नहीं थे. उन्हें पकड़ कर बारीकी से जांच करने की इच्छा भी हुई परन्तु न जाने क्या सोच कर आगे बढ़ गए थे.

इतने सारे झाड झंकाड़ में नाना रंग  रूप लिए तितलियाँ भी हमारे जैसे ही मटरगस्ती कर रहीं थी सोचा था कहीं कोई दुर्लभ प्रकार की तितली दिख जाए परन्तु  केमरा को फोकास करने के पहले ही उड़ जातीं. हाँ कुछ लार्वा दिखे. क्या मालूम यही कोई ख़ास हो.

दो पग आगे बढ़ते ही एक पौधे पर लाल रंग के कुछ कीट दिखे. पहले सोचा ये भौरे ही होंगे परन्तु बारीकी से देखने पर चींटों जैसे ही थे. हाँ शारीरिक बनावट में थोड़ी बद्लावट थी. अब इन चींटों को इतना भड़कीला लाल रंग देकर प्रकृति ने अच्छा नहीं किया. ये तो पक्षियों द्वारा आसानी से पकड़ा जायेंगे. यह विचार भी आया फिर सोचा ये यहाँ कर क्या रहे होंगे. शायाद इंतज़ार, मधुशाला के खुलने का एक फूल के खिलने का. यही तो मैंने जाना कुछ देर में.

Passion Flower (Passiflora incarnata)

घर के बाहर निकल कर बगल में ताऊजी के फेंसिंग में वह बेल दिखी जिसमे कली, फूल तथा फल तीनों ही लगे थे. फूल छोटे होते हुए भी अति आकर्षक थे. पहले कली निकलती है फिर फूल खिलती है, फूल झडती है और फल को उत्पन्न करती  है,  हाँ यही तो क्रम है. मन  ही मन  बुदबुदा लिया. लेकिन इस फल को तो पहले भी देखा था.  बेर के बराबर हो गए थे. अब भी एक दो थे जो छोटे बैगन की तरह रंग रूप लिए हुए थे. एक तोड़ लिया, माताजी को दिखाने. आखिर वही तो बतायेंगी और बचपन से ही उन्होंने ही तो बताया भी है. घर पर उनके हाथ में रख दिया. माँ के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव स्पष्ट दिख रहे थे. तुरंत बताया गया कि इसे हम लोग नहीं खाते. लेकिन पकने पर गरीबों के बच्चे खाते हैं. मलयालम में नाम भी बता दिया “रेमठ फल” (अनुवादित नाम). नाक से बहने वाले तरल पदार्थ सा स्वाद. गाँव के उन गरीब बच्चों की तस्वीर खिंच सी गयी जिनकी नाक बहती रहती है और जीभ ऊपर फिराकर चाट लेते हैं.

हमारे घर के दाहिनी तरफ एक कटहल के पेड़ के नीचे बड़े बड़े लम्बे पत्तों वाले पौधे उग आये थे जिनकी ऊँचाई ५/६ फीट रही होगी. उनमें बहुत ही सुन्दर सफ़ेद फूल लगे थे. पत्ते देखने में हल्दी  या अदरक जैसे थे. माताजी से पूछने पर कुछ अजीब सा नाम बताया और यह भी कहा कि १५/२० दिन में आयुर्वेदिक अस्पताल से लोग आकर उसकी जड़ें उखाड़ ले जायेंगे क्योंकि उनमें औषधीय गुण हैं. ऐसे ही लाल रंग के फूल वाले भी होते हैं. एक और कोने में हमें लाल वाली भी मिल गयी. ढूँढने  पर सफ़ेद वाले का अंग्रेजी नाम Crepe  Ginger और लाल वाले का Pink Cone Ginger मिला और यह भी पता चला कि ये दोनों अदरक के दूर के रिश्तेदार हैं.

17 Responses to “जैव विविधता – बरसात के बाद”

  1. भारतीय नागरिक Says:

    बहुत सुन्दर लग रहे हैं सभी चित्र. प्रकृति के रंग अनोखे.

  2. Bharat Bhushan Says:

    बहुत सुंदर प्रकृति की छटाएँ बिखेरती पोस्ट.

  3. गुड्डोदादी Says:

    बहुत सुंदर लेख प्राकृति
    धन्यवाद

  4. rajesh komar singh Says:

    सुन्दर और ज्ञानवर्धक अपने घर के आस-पास की कई वनस्पतियों और कीटों की याद ताज़ा करा दी आपने

  5. प्रवीण पाण्डेय Says:

    प्रकृति बड़ी मनोहारी है..

  6. लालित शर्मा Says:

    ज्ञानवर्धक पोस्ट पढ़कर लगा कि बचपन के दिन लौट आए………….. आभार

  7. arvind mishra Says:

    अद्भुत नयनाभिराम -लोकल लैंग्वेज में कटहल को क्या कहते हैं?
    सबसे ऊपर के कीट को यहाँ गाँव में तेली कहते हैं -यह तेल जैसा पदार्थ छोड़ता है -बाकी कीट भी जाने पहचाने हैं ०मतलब स्पष्ट है इनका फैलाव बहुत व्यापक है –
    एक कीट का तेल भी बनता है -कैंथार्डीन आयल -कहीं ऊपर वाला कीट वही न हो !
    आप फिकर न करें आपका प्रकृति प्रेम और सामान्य जानकारी कई नामचीन ब्लागरों से भी कई गुना अधिक है -कई तो हैं जो फ्राग और टोड में भी फर्क नहीं कर पाते !

  8. s k tyagi Says:

    वाकई विविध प्राणी…. तरह तरह के पेड़ पौधे के संग!!

  9. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    डा. अरविन्द:
    आपका आभार. कटहल को मलयालम में “चक्का” और तमिल में पके को प्लापज्हम और कच्चे को प्लाकाई कहते हैं. तेली चींटी यहाँ हलके पीले रंग की होती है और बहुतायत से पायी जाती है. इस लाल वाली को मैंने पहले नहीं देखा था. यह गोल मटोल है जबकि तेली स्लीक होती है. तेली को चोंच में दबाकर अपने पंखों को ब्रश करते स्थानीय मैना को पाया गया है. बस्तर के बाजारों में यह चींटी बिकने आती है. इसकी चटनी बनती है. कहते हैं खट्टी होती है.

  10. arvind mishra Says:

    वाह देखिये न प्रकृति के चतुर चितेरे हैं आप -मैना के तेल फुलेल वाली बात तो अद्भुत है,ऐसा जरुर मादा करती होगी ! चेक किया कभी ? कामन मैना में तो लिंग विभेद बहुत मुशिकल है -काफी बारीक निरीक्षण है आपका -मान गए उस्ताद!

  11. sanjay @ mo sam kaun.....? Says:

    टिड्डे आपके निकल जाने के बाद फ़िर से गुत्थमगुत्था हुये होंगे:)

  12. udantashtari Says:

    मनमोहक!!

  13. राहुल सिंह Says:

    प्रकृति का सौंदर्य अक्‍सर इर्द-गिर्द लेकिन हमारी बेख्‍याली से ओझल सा रहता है, खूबसूरत.

  14. ramakant singh Says:

    सुंदर प्रकृति की छटाएँ बिखेरती पोस्ट.

  15. sanjaybengani Says:

    प्रकृतिक लेख. आप प्रकृति की गोद का आनन्द ले पाए, भाग्यशाली हैं.

  16. arvind chandraker Says:

    bahot achcha laga sir aisa lag raha tha jaise ma kuchh kahana chah raha tha par wo aaj aapke shabdo me vyakt hua dhanyawad sir dil se

  17. प्रवीण पाण्डेय Says:

    प्रकृति यहाँ एकान्त बैठ निज रूप सँवारति

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s


%d bloggers like this: