Archive for नवम्बर, 2012

टपिओका (Tapioca) से साबूदाना

नवम्बर 27, 2012

हमारे मोहल्ले के शोपिंग कोम्प्लेक्स में एक बड़ी दूकान किराने की भी है, पहले माले में. जैसे कई दूकानदारों की आदत होती है, उनके भी बहुत सारे सामान बाहर की ओर बरामदे में सजे रखे थे. उसी के बगल में एक ए.टी.एम् भी लगी है. हमारे एक मित्र एक दूसरे मित्र के साथ पैसे निकालने गए थे. वापसी में किराने की दूकान के सामने से गुजरना हुआ.  मशीन से निकली पर्ची पर ध्यान था इस कारण सामने रखे बोरे से भिड गए. बोरे पर लिखा था “सच्चा मोती”. दूकानदार को कोसते हुए उन्होंने पूछ लिया “क्या रखा है यार इसमें, अन्दर क्यों नहीं रख लेते” जवाब मिला साहब, साबूदाना है, अभी व्रत त्योहारों का सीसन है इसलिए बाहर रख दिया. यह  सुनते ही मित्र को याद आई की उन्हें भी घर के लिए साबूदाना खरीदना है. संवाद आगे जारी रहा. “सबसे अच्छा वाला कौनसा होता है”. जवाब मिला “यही है”  “क्या भाव लगा रहे हो” “२५० के १५ रुपये”. “बहुत महंगा लगा रहे हो”  “साब ए वन है”. “ठीक है फिर दे दो २५० ग्राम”.

दोनों मित्र नीचे आकर एक दूसरी दूकान के सामने रखी बेंच पर बैठ गए. उस दिन चर्चा साबूदाने पर केन्द्रित रही. जिस मित्र ने खरीदा था, उनका कहना था कि इसका पेड़ अपने यहाँ तो नहीं होता. दूसरे ने कहा यह पेड़ पर नहीं  होता, बनाया जाता है. नहीं यार यह पेड़ का बीज है. बहश यों ही चलती रही.

                                                         लिए यह चित्र विकिमिडिया कोमंस से है

उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में ख़ास कर दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में ताड़ जैसे कई पेड़ हैं जिनके तने का गूदा गरीबों का भोज्य पदार्थ होता है. इनमे “सागू पाम” (Metroxylon Palms) के तनों के गूदे से प्राप्त होने वाला स्टार्च (श्वेतसार) साबूदाना बनाने के लिए प्रयुक्त होता है. एक और सागो पाम  है जो cycads Palms के अंतर्गत वर्गीकृत है परन्तु इस पौधे का हर हिस्सा जहरीला होता है. यह घर के अन्दर या बागीचे में अलंकरण के लिए रखा जाने वाला “सैकस” है.

भारत में साबूदाना मुख्यतः  “टपिओका” (Manihot esculenta) नामके कंद से प्राप्त होने वाले स्टार्च  से बनाया जाता है. टपिओका को कसावा भी कहते हैं. बल्कि शायद यह कहना बेहतर होगा कि कसावा के पौधे से  टपिओका उत्पन्न होता है. यह दक्षिण अमरीकी मूल का है और पश्चिम द्वीप समूहों  के अतिरिक्त भारत तथा अन्य देशों में  भी बहुतायत से पैदा किया जाता है. वास्तव में टपिओका करोड़ों लोगों के लिए भोजन का प्राथमिक स्रोत है क्योंकि इसके पौधे अनुपजाऊ भूमि में तथा अल्प वर्षा वाले जगहों में भी आसानी से पनपते हैं. अभी अभी सुनने में आया है कि तंज़ानिया में वहां टपिओका की फसल कीटग्रस्त हो गयी थी परन्तु इसे अपवाद ही माना जाना चाहिए. टपियोका ही एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसकी प्रति इकाई भूमि में उत्पादकता सबसे  अधिक  है और  इस  मायने  में यह विश्व में गरीबों  के  लिए  वरदान  है. माइक्रोसोफ्ट कारपोरेशन के  भूतपूर्व  अध्यक्ष  श्री  बिल गेट्स ने  भी  कुपोषण  को  दूर  करने  में  टपिओका  के  महत्त्व  को  रेखांकित  किया है.  इसके   पोषक   तत्वों  में  अभिवृद्धि के लिए और अधिक सक्रियता से शोध किये जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया है.   इस हेतु उन्होंने अपने न्यासों के माध्यम से एक बड़ी राशि भी उपलब्ध कराने की पेशकस की है.

टपिओका के  पौधे तैयार करने हेतु तने के ही कई टुकड़े कर दिए जाते हैं और मिटटी में निश्चित दूरी पर रोप दिया जाता है. इसकी   कुछ प्रजातियों में हानिकारक तत्व भी होते हैं परन्तु सफाई की प्रक्रिया से उन्हें दूर कर लिया जाता है.

                                                          चेन्नई के बाज़ार में ठेले पर बिक रहा है

भारत में टपिओका का प्रदार्पण १९ वीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था और इसकी सबसे अधिक खेती केरल, तामिलनाडू और आन्ध्र प्रदेश में होती है.  जैसा पूर्व में कहा जा चूका है, यह केरल में भी कई  लोगों के दैनिक भोजन का एक प्रमुख हिस्सा है. इसे यों ही उबाल कर भी खाया जा सकता है  या फिर सब्जियों के अतिरिक्त पकवान आदि भी बनाए जा सकते हैं. एक प्रकार से यह आलू का विकल्प है. मछली की करी के साथ टपिओका का बहुत चलन है. टपिओका के चिप्स बड़े स्वादिष्ट होते हैं और इसके आटे से पापड़ भी बनता है.  इसमें प्रोटीन का अभाव है परन्तु कर्बोहैड्रेट्स की भरमार है. दूसरे पौष्टिक तत्व भी समुचित मात्रा में पाए जाते हैं.

तकनीकी रूप में साबूदाना किसी भी स्टार्च युक्त पेड़ पौधों के गूदे से बनाया जा सकता है. चूंकि टपिओका में स्टार्च की भारी मात्रा होती है, उसे साबूदाने के उत्पादन के लिए उपयुक्त पाया गया. भारत में इसका उत्पादन १९४० के दशक में ही प्रारंभ हो चला था.यह पहले तो कुटीर उद्योग था परन्तु अब तामिलनाडू का एक महत्वपूर्ण लघु उद्योग है. संक्षेप में कहा जाए तो पहले कंद के छिलके की मोटी  परत को उतारकर धो लिया जाता है. धुलने के बाद उन्हें कुचला  जाता है.  निचोड़कर इकठ्ठा हुए  गाढे द्रव को छलनियों में डालकर छोटी छोटी मोतियों सा आकार दिया जाता है. धूप में सुखा लिया जाता है या एक अलग प्रक्रिया के तहत भाप में पकाते हुए एक और गरम कक्ष से गुजारा जाता है. सूखने पर साबूदाना  तैयार.

यह आलेख रायपुर से प्रकशित उदंती (मासिक) पत्रिका के अक्टूबर अंक से साभार।

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बचनाग या ग्लोरी लिली Gloriosa Superba

नवम्बर 16, 2012

बरसात के बाद बाड़ियों  (फेंसिंग) में अचानक प्रकट  होने वाला एक असाधारणसा   फ़ूल है बचनाग या ग्लोरी लिली (ग्लोरियोसा सुपरबा). कलिहारी, अग्निशिखा आदि नाम भी मिलते हैं.   इससे हमारी मुलाकात बहुत ही पुरानी है, जब हम  छोटे हुआ करते थे. उसकी चटक रंगों और मकड़ी जैसी बनावट के कारण हमें बहुत ही ज्यादा प्यारी लगी थी और जब नहीं रहा गया तो हम तोड़ लाये थे. माँ  ने अच्छी  डांट  पिलाई और बहुत दूर फेंक आने को कहा. आने के बाद साबुन से हाथ धुलाये गए थे. बताया गया था कि वह बहुत ही जहरीला है और हिदायत दी गयी थी कि आगे से कभी उसके पास भी मत जाना. पिछले कुछ वर्षों से कही देखा भी नहीं, अपने घर में भी नहीं.  भारतीय डाक द्वारा फूलों पर भी डाक टिकटों की एक सेट निकाली गयी थी जिसमे ग्लोरी लिली को भी दर्शाया गया था. हमने तो पूरी सेट ही मंगवा ली थी. पढने को मिला था कि विगत कुछ वर्षों में इस फूल के पौधे का औषधीय प्रयोग के लिए बड़े पैमाने पर दोहन किया जा रहा है  इसलिए वे लुप्त प्रायः हो चले हैं. साथ में यह भी जाना था कि तमिलनाडु में २००० एकड़ में इसकी खेती  हो रही है. इसके बीजों का निर्यात होता है और किसान खूब कमा रहे हैं. संदर्भवश यह ज़िम्बाब्वे का राष्ट्रीय पुष्प है. तामिलनाडू ने भी इसे प्रादेशिक पुष्प बनाकर सम्मानित किया हुआ है.

इस बार अपने ही घर की झाड़ियों में वही  फूल खिला दिखा जिसे देख कर मन प्रसन्न हो गया. वह एक बेल पर लगी थी.  अगल बगल के पेड़ पौधों का सहारा लेते हुए वह ऊपर उठती है. इसके लिए उसकी नोकदार पत्तियां (with tendrils) ही सहायक होती हैं. क्योंकि उसके बेल को पहचान गया था इसलिए एक दूसरी जगह भी उसके पौधे को पहचान गया था. उसपर एक कली लगी थी एकदम हरी. डंठल से नीचे की तरफ लटके हुये. वह जब खिलता है तो उसकी पंखुड़िया हलके पीले रंग लिए हुये हरी होती हैं. शनै शनै पंखुड़ियों का रंग बदलता जाता है. वे पीली हो जाती है और सिरे लालिमा लेने लगते हैं. जब फूल विकसित हो जाता है तो  डंठल को घेरते हुये  पंखुडियां ऊपर की तरफ उठ जाती हैं.  तीन चार दिनों में ही पूरा का पूरा फूल लाल हो जाता है. दो तीन दिन बाद पंखुडियां झड जाती हैं. इस तरह एक फूल लगभग आठ दिनों तक रंग बदलते हुये बना रहता है. 

इसकी बेल में फल्लियाँ लगती हैं जिसमें लाल रंग के बीज होते हैं. इस अवस्था को हम नहीं देख पाए. इन बीजों से पौधे उगाये जा सकते हैं. इसकी जड़ें  गांठदार (tuberous) होती हैं और पौधे उगाने के लिए ट्युबर्स का भी प्रयोग किया जा सकता है. जैसे मेरी माँ ने बताया था इस पौधे का हर भाग अत्यधिक जहरीला है. बेल या पत्तियों का शरीर से संपर्क मात्र से समस्या हो सकती है. कोल्शिसाइन (Colchicines) नामक तत्व इसका कारक है. कुछ जगह तो लिखा है कि इसके रस का मात्र ६ माइक्रोग्राम का सेवन आत्मघाती हो सकता है. कुछ जगह ६ के बदले ६० माइक्रोग्राम की बात कही गयी है. कहते हैं आत्महत्या के लिए इसकी जड़ों को चूस लिया करते थे. 

जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, इस पौधे और उसकी जड़ों के रस का प्रयोग सर्पदंश सहित विभिन्न रोगों के उपचार में  किया जाता है.