जापानी दम्पति मेहमान बने

हमारे लिए फरवरी का प्रथम सप्ताह कुछ ख़ास रहा. मुंबई से मेरे एक दूर् की साली का फोन आया था और वे अपने जापानी मेहमान को लेकर भोपाल आना चाह रही थीं. वैसे मेरी तरफ़ से उन्हें पहले ही निमंत्रण था लेकिन मुझे थोड़ी सी दुविधा थी. ठैरने के लिए तो घर पर ही बेहतरीन  सुविधा उपलब्ध करायी जा सकती थी  और वाहन भी उपलब्ध था परन्तु चिंता उनके खान पान की थी. मैंने बग़ैर झिझके अपनी बात रख दी थी तिस पर साली ने कहा जीजाजी मै हूँ ना. चौका मैं संभाल लूँगी. बस मुझे तो यही चाहिए भी था.

उन्हें हवाई अड्डे से लिवा लाने के लिए पुत्र से आग्रह किया था और वह् खुशी खुशी राजी हो गया था. अब चूँकि मेरी गाड़ी 5 लोगोंको झेल नहीं सकती थी इसलिए एक लंबी गाड़ी “तवेरा” का इंतजाम भी कर लिया गया. नियत समय पर वे पहुँच गए और घर पर उनके नहाने धोने के लिए गर्म पानी का इंतजाम तो था ही परन्तु पता चला वे सब कुछ कर के ही निकले थे.

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केंजी ताजीमा 80 वर्ष के हैं और एक कलाकार भी. उन्हें अँगरेजी बिलकुल भी नहीं आती परन्तु उनकी पत्नी मिचिको जो 70 वर्ष की हैं, अँगरेजी में वार्तालाप करने में सक्षम हैं. हर एक दो साल में इनका भारत आना होता है और वे अपनी कलाकृतियों को मुंबई के जहाँगीर आर्ट गेलेरी में प्रदर्शित भी करते आए हैं. इस बार भोपाल आने का मकसद केवल एक ही था और वह् था भीमबेटका के शैल चित्रों का अवलोकन.

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चूँकि वे तीन दिन रहने वाले थे, हमने उन्हें साँची, विदिशा, उदयगिरि, भोजपुर आदि जगहों के भ्रमण का सुझाव दिया और वे मान गए. तदनुसार रोज़ आराम से सभी जगहों को देख् भी आए. हाँ मेरा पुत्र भी उनके साथ ही था.

घर पर रहते हुए केंजी सुबह शाम अकेले ही बाहर निकल पड़ते और साथ होता उनका एक स्केच बुक जिस में वे रेखा चित्र बना लाते. उन्हें ही वे बड़े कैनवास पर फुरसत से घर वापसी के बाद अभिव्यक्त करेंगे.

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मंगलवार के दिन हमारे मुहल्ले में हाट भरता है और सब के सब हाट देखने गए थे. मटर उन्हें सस्ती लगी सो दो किलो खरीद भी लाये. मुझे दोनों पति पत्नी बड़े सरल स्वभाव के लगे. खान पान के लिए कोई विशेष व्यवस्था की जरूरत नहीं पड़ी. रोटी,सब्जी, दाल, चावल, साम्बार से पूरी तरह संतुष्ट थे.

जाते जाते केंजी ने हिन्दी में कहा “मुझे बड़ी खुशी हुई”

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18 Responses to “जापानी दम्पति मेहमान बने”

  1. ali syed Says:

    इसे पढ़कर मुझे भी खुशी हुई 🙂

  2. विष्णु बैरागी Says:

    मुझे भी। केंजी को आपके यहॉं आकर खुशी हुई। यह जानकर और पूरा विवरण पढकर मुझे भी खुशी हुई।

  3. arvind mishra Says:

    संस्कृति की बारीकियों को पकड़ता एक अद्भुत चितेरा

  4. udantashtari Says:

    काश!! कभी हम कनैडियन दम्पति आपकी मेहमान नवाज़ी का लुत्फ उठायें और आप छापें… 🙂

  5. भारतीय नागरिक Says:

    बड़े सुन्दर बन पड़े हैं चित्र.

  6. राहुल सिंह Says:

    सौहार्द रसपूर्ण.

  7. प्रवीण पाण्डेय Says:

    वाह, पढ़कर सांस्कृतिक आनन्द आ गया..ऐसा ही संबंध दो देशों को और पास ला सकता है।

  8. Kajal Kumar Says:

    वाह. अच्‍छा लगा यह परि‍चय पा कर.केंजी ताजीमा तो वास्‍तव में बहुत अच्‍छे चित्रकार हैं.

  9. Alpana Says:

    ८० वर्ष की आयु में भी इतनी जीवटता कि भ्रमण के लिए भारत तक आए !आश्चर्य है.
    उनके बारे में जानकर आनंद की अनुभूति हुई,आपके आतिथ्य की सुखद यादें लेकर वे अब तक अपने देश पहुँच चुके होंगे.

  10. सतीश सक्सेना Says:

    बधाई इस मेहमान नवाजी के लिए ..

  11. sanjay bengani Says:

    सुन्दर. आने वाले समय में जापानी कलाकार ही नहीं व्यवसायी भी खुब आने वाले है. उन्होने हिन्दी न सीखी हो हमें जापानी सीख लेनी चाहिए 🙂

  12. yashoda agrawal Says:

    आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 09/03/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  13. manuprakashtyagi Says:

    बढिया रहा

  14. Gagan Sharma Says:

    खुशी देता बहुत ही सुंदर विवरण। जापानी तो सदा ही विनम्र और मिलनसार जाने जाते हैं। अपने देश की ऐसी ही छवि वहां तक पहुंचाने के लिए आपका आभार।

  15. shikhaGupta Says:

    पूरे विवरण में दो बातें बहुत प्रभावित कर गयीं ….
    – अधिक उम्र के बावजूद जापानी दम्पति का स्वतंत्र-भ्रमण
    – उनकी सरलता …जैसे इसी परिवेश के सदस्य हों ….मटर खरीदने की बात पर पिताजी याद आ गये

  16. Onkar Kedia Says:

    सहज सरल भाषा में सुन्दर प्रस्तुति

  17. ताऊ रामपुरिया Says:

    मेहमान और मेजबान दोनों ही दिल को छू गये, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  18. पथिक Says:

    अतिथि देवो भव:

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