Archive for अप्रैल, 2013

एकाम्बरेश्वर मन्दिर, काँचीपुरम

अप्रैल 21, 2013

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काँचीपुरम के सैकड़ों मंदिरों में से सबसे वृहद  एकाम्बरेश्वर का शिव मन्दिर है जो शहर के उत्तर दिशा में स्थित है. बस्ती में स्थित 108 शिव मंदिरों में भी यह अग्रणी है.  कई जगह इसे एकाम्बरनाथ(र) भी कहा गया है. यह मन्दिर 23 एकड़ में फैला हुआ है तथा इसके गोपुरम की ऊँचाई 194 फीट है. इस कारण यह गोपुरम एक अलग श्रेणी में रखा जाता है.  दक्षिण भारत में पंच तत्वों यथा अग्नि रुप में, जल रुप में, आकाश का बोध कराती, वायु का एहसास दिलाती और पृथ्वी को इंगित करती शिव लिंगों की अवधारणा अलग अलग पाँच जगहों में मिलती हैं. एकाम्बरेश्वर में पृथ्वी तत्व मिट्‍टी से बने लिंग से परिलक्षित होता है. अतः यह मन्दिर यहाँ अपूर्व श्रद्धा का केन्द्र है.  प्राचीन 63 शैव भक्तों (नायनार) ने भी इस मन्दिर की गौरव गाथा अपनी रचनाओं में की है.

मन्दिर की प्राचीनता के बारे में पूछ्ने पर आपको इसके कम से कम 3000 वर्ष या उससे भी पुराना होने का दंभ भरा जायेगा.  वेदों से भी पुराना बता दें तब भी मुझे आश्चर्य नहीं होता. अपने इष्ट के प्रति अनुराग लोगों के दिलो दिमाग पर हावी रहता है. इस मन्दिर से जुड़ी कई कहानियाँ हैं. पार्वती जी द्वारा शिव को प्राप्त करने के लिए वहाँ एक आम के पेड़ के नीचे मिट्टी/रेत से ही शिव लिंग बनाकर घोर तपस्या किए जाने  की बात कही जाती है. शिवजी जान बूझ कर पार्वती जी के तप में व्यवधान उत्पन्न करते हैं परन्तु पार्वती जी अडिग रहती है. प्रसन्न होकर शिव जी पार्वती जी से विवाह कर लेते हैं. पार्वती जी के द्वारा तप किए जाने की कहानी कई जगह प्रचलित है.

अपने अल्प समय के भ्रमण में  यहाँ 7 वीं सदी के पल्लवों की विशिष्ठ स्थापत्य शैली  देखने को नहीं मिली. उनके द्वारा बनवाये गए खम्बों पर सिंह की आकृति उकेरी रहती हैं और ऐसे शिल्पांकन को पल्लवों की पहचान के रुप में देखा जाता है. प्राचीन ‍तमिल सहित्य में मन्दिर के गुण गान को मद्दे नजर  यह धारणा बनायी जा सकती है कि सर्व प्रथम  मन्दिर को पल्लवों ने ही बनवाया होगा. 10 वीं सदी में चोल राजाओं द्वारा  मन्दिर का नवर्निर्माण कराया गया और 15 वीं सदी में विजयनगर के सम्राटों द्वारा राजगोपुरम सहित बड़े पैमाने पे विस्तार कार्य संपादित किये गये. तंजावूर के नायकों का भी काफी योगदान रहा है.

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मन्दिर के अहाते में ही 5 अलग अलग दालान/आँगन हैं जिनमें से एक में गणेश जी का छोटा मन्दिर और एक तालाब भी है. दूसरों में कई छोटे छोटे मन्दिर बने हैं.  मुख्य मन्दिर के सामने तो एक बड़ा सा मंडप है. मंडप के अन्दर भी नंदी जी विराजमान हैं और बाहर भी.  विदेशियों के मन्दिर प्रवेश पर कोई रोक टोक नहीं है परन्तु गर्भ गृह से उन्हें एक निश्चित दूरी बनायी रखनी होती है. तदाशय की सूचना एक पटल पर लिखी भी गयी है. सबसे अच्छी बात यह रही कि फोटोग्राफी पर प्रतिबंध नहीं है परन्तु गर्भ गृह के सामने कैमरा निकालने पर भृकुटियां तन जाती हैं. . परिक्रमा पथ के रुप में बहुत ही चौड़ा गलियारा विजयनगर राजाओं द्वारा बनवा दिया गया था. इसके लिए लगभग 1000 दैत्याकार खम्बे बने हैं.  दीवार के बगल से ही 1008 शिव लिंगों की कतार है. मन्दिर के पीछे एक जगह एक चबूतरा और मन्दिर बना है जहाँ  एक आम का पेड़ है.  इस पेड़ की  शाखाओं में अलग अलग स्वाद के फल लगते हैं.  इस पेड़ को भी बाबा आदम के समय का बताया जाता है. मन्दिर के अहाते में ही मंडप युक्त तालाब है जिसे शिव गंगा तीर्थम कहते हैं. एक दूसरा तालाब भी है परन्तु वह् मन्दिर के उस हिस्से में था जो पर्यटकों  के लिए बंद कर दिया गया था. शायद कुछ काम चल रहा था.

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Mango Tree

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नव ग्रहों के मंडप में सभी गृह अपने अपने वाहनों पर आरूढ़ हैं. ऐसा अन्यत्र अल्प ज्ञात है. अन्दर ही एक विष्णु का मन्दिर भी है जिसे वैष्णव आचार्यों ने महत्वपूर्ण माना है और यह मन्दिर वैष्णवों के 108 दिव्य स्थलों में एक है.  बताया गया कि यहाँ माघ माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली सप्तमी (रथ सप्तमी) के दिन गर्भ गृह में स्थित शिव लिंग पर सूर्य की किरणें सीधी पड़़ती है.

Buddha

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बाहरी दीवार के अन्दर की तरफ़ जिन पत्थरों का प्रयोग हुआ है उनमें बुद्ध की मूर्तियां दिखाई देती हैं. इससे ऐसा प्रतीत होता है मानो  किन्हीं बौद्ध विहार/केन्द्र के खंडहरों से प्राप्त पत्थरों का यहाँ प्रयोग किया गया है. यह भी संभव है कि वे जैन तीर्थंकर हों. वैसे यह निर्माण काफी बाद का है. राज गोपुरम का लकड़ी का द्वार काफी ऊँचा है और मज़बूत भी. उसे रोके रखने के लिए एक पत्थर के गोले का प्रयोग हो रहा था.  अब क्योंकि बाहर निकल ही रहे थे, एक बार पुनः पूरे मन्दिर को मन में बसा लेने की कोशिश की तब परकोटे की ऊँची दीवार पर नजर स्थिर हुई. ऐसा एहसास हुआ मानो मन्दिर का प्रयोग भूत काल में शत्रु द्वारा आक्रमण किये जाने पर नागरिकों को पनाह देने के लिए भी किया जाता रहा हो.

हमने जो समय मन्दिर में बिताया वह् शायद पर्याप्त नहीं था. इतने विशाल परिसर को भली भांति देखने के लिए कम से कं 3/4 घंटे तो चाहिए ही.

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गढ़ कुंडार

अप्रैल 17, 2013

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बुन्देलखण्ड में कुछ वर्षों के प्रवास से मुझे कुछ ऐसा एहसास हुआ कि यहाँ हर 10 वां व्यक्ति अपने आपको राजा काहलवाना  पसंद करता है.  नाम भी वैसे ही हैं.  बंदूकों से लोगों का बड़ा लगाव है.  बाज़ारों में अधिकतर लोगों को कंधों पर बंदूक लटकाये  देखा जां सकता है. कभी कभी तो दो दो बंदूकें लटकाये रहते हैं.  लैसेंसी बंदूक ना मिलें तो फिर देसी ही सही.  लुगासी जैसे जगहों में तो बड़े सस्ते में मिल जाता है.  बुन्देलखण्ड में “किलों” की भी भरमार है. “जिते देखो उते किलो है”  यह अतिशयोक्ति नहीं है.  गाँव में संपन्न लोग भी किले नुमा माकानों में रहते हैं.  इसके विपरीत गरीबी और अशिक्षा का बोलबाला भी है. मुझे लगा कि यहाँ लोग अपने आपको कितना असुरक्षित महसूस करते हैं.  इतने अधिक किलों/गढ़ों की जरूरत भी शायद इसी लिए पड़ीं होगी.

एक बार सोचा था कि यहाँ के किलों का सर्वेक्षण किया  जावे परन्तु उन दिनों हम फुर्सतिया नहीं थे फिर भी यदा कदा समय चुरा ही लिया करते थे.  टीकमगढ़ से 80 किलोमीटर दूर् निवाड़ी नाम की एक जगह है. यहाँ से झाँसी की तरफ़ थोड़ा जाकर दाहिनी तरफ़ एक पक्की (अब) सड़क सेंदरी नामके गाँव को जाती है. इसी मार्ग पर 20/22  किलोमीटर की दूरी पर एक उजाड से पहाड़ी पर एक किला अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए संघर्षरत है.  शायद संघर्षरत रहना उसकी नियति रही है.    यही गढ़ कुंडार है जिसे संभवतः डा. व्रिंदावन लाल वर्मा जी ने इसी नाम से लिखित उपन्यास के द्वारा गुमनामी से मुक्ति दिलायी.  लगभग 10/12 किलोमीटर चलने के बाद ही हमें वह् गढ़ दिखने लगा था. रास्ता एक प्रकार से चंबल के बीहड़ों जैसा ही था. बेशुमार टीले और खाइयों के बीच से गुजर रहे थे. हरियाली का नामों निशान नहीं था. एकदम बंजर भूमि. कुछ ही देर में गढ़ अचानक अंतर्ध्यान हो गया . ज्यों ज्यों आगे बढ़ते जाते, गढ़ की लुका छुपी चलती रहती थी.  एकदम क़रीब पहुँचने के बाद भी गढ़ ओझल ही रहता. जब कि वह् एक पहाड़ी पर बना है.

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आखिरकार हम लोग पहुँच ही गए. पथरीले ढलान को चढ़ कर मुखय द्वार से प्रवेश कर गए.  गढ़ बड़ी ही जर्जर अवस्था में थी. चारों तरफ़ मलवा बिखरा हुआ.  वैसे तो भवन सात मंजिला है परन्तु वहाँ के कक्षों का अवलोकन दुष्कर लगा. बीचों बीच एक बड़ा दालान है और वहाँ भी कुंड जैसा कुछ बना है जिसमें कुछ गुप्त द्वार जैसे हैं. शायद पानी संग्रहीत करने के उद्देश्य से बना हो. एक बड़ा हवन कुंड जैसा भी कुछ था. गलियारे में भी ईंट पत्थर बिखरे पड़े थे.  नीचे चारों तरफ़ छोटे छोटे कमरे बने हैं जिन्हें “कोटर” कहा गया जिनकी छतों में छिद्र बने हैं जिनसे छन छन कर प्रकाश आता रहता है. बताया गया कि यहाँ सैकड़ों तल घर भी बने हैं. कुछ छोटे कमरों में तो छोटी छोटी सीढ़ियाँ भी दिख रही थीं. ऐसे निर्माण का मकसद समझ में नहीं आया.  हालाँकि यह करतूत किसी “बौना चोर” की बतायी गयी थी, अनुमान है कि वे अन्न संग्रह कर रखने हेतु कोठार रहे हों. यहाँ आकर ऐसा लगा मानों किसी  भूल भुलैय्ये में आ गए हैं.  ऊपर से सन्नाटा. ऊपरी मंजिलों में  जाकर देखने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. ऊपर का निर्माण ईंटों का है और कई चरणों में पूरा किया गया है. गढ़ चारों तरफ़ से परकोटे से घिरा है परन्तु जगह जगह खंडहर में तबदील हो चुका है. ऊपर चारों तरफ़ कोनों पर मीनारों का अस्तित्व अभी शेष है. बाहर से गढ़ चारों तरफ़ एक जैसा ही दिखता है.

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इस किले का इतिहास भी कुछ कुछ अनबूझ पहेली जैसा लगता है. यहाँ चंदेलो का पह्ले से ही एक किला था जिसे जिनागढ के नाम से जाना जाता था. खंगार वंशीय खेत सिंह बनारस से 1180 के लगभग  बुंदेलखंड आया और जिनागढ पर कब्जा कर लिया. उसने एक नए राज्य की स्थापना की.  उसके पोते ने किले का नव निर्माण कराया और गढ़ कुंडार नाम रखा. खंगार राजवंश के ही अन्तिम राजा मानसिंह की एक सुंदर कन्या थी जिसका नाम केसर दे था. उसका सौंदर्य दिल्ली तक ख्याति प्राप्त था. दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद तुगलक ने उस कन्या से शादी करने का प्रस्ताव भेजा परन्तु यह मान्य नहीं था. अतः सन् 1347 में मोहम्मद तुगलक की सेना ने गढ़ कुंडार पर आक्रमण कर किले को अपने कब्जे में ले लिया. किले में स्थित केसर दे और अन्य महिलाओं ने अपनी अस्मिता को बनाए रखने के लिए किले के अन्दर बने कुवें  में कूद कर अपनी जान दे दी थी.  केसर दे के जौहर की गाथा लोक गीतों में भी पायी जाती है.  मोहम्मद तुगलक ने किले और  विजित भूभाग को बुंदेलों  को सौंप दिया. सन् 1531 में राजा रुद्र प्रताप ने बुंदेलों की राजधानी गढ़ कुंडार से ओरछा स्थानांतरित कर दी थी. बुंदेला शासक वीर सिंह जूदेव ने गढ़ कुंडार की मरम्मत भी करवाई थी. एक दूसरी कहानी भी है जिसमे मोहम्मद तुगलक के आक्रमण का ज़िक्र नहीं है बल्कि सन् 1257 में सोहनपाल  बुंदेला द्वारा छल कपट से खंगारों के कत्ले आम का उल्लेख मिलता है.

वापस लौटते समय गिद्ध वाहिनी मन्दिर में भी जाना हुआ था परन्तु वह् कुछ आजकल के छोटे मंदिरों जैसा था जहाँ कुछ मूर्तियों को कहीं से संग्रहीत कर दीवार पर चुन दिया गया है.

एक बुंदेली कवि अशोक सूर्यवेदी ने गढ़ कुडार (कुंडार) की प्रतिष्ठा में लिखा है:

ओ गौरव के महा महल तुम , किस कारण बदनाम हुए !
इतिहासों के पन्नों में भी , किस कारण गुमनाम हुए !
मैंने ढूंढा इतिहासों में , मुझे न तेरा नाम मिला !
और देख कर लगता तुझको , मुझको मेरा धाम मिला !

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