विक्टोरिया पब्लिक हाल, चेन्नै

चेन्नई के सेंट्रल स्टेशन पर उतरकर जब टैक्सी/कार पार्किंग की तरफ़ बढ़ते हैं तो सामने ही एक भव्य परन्तु पुरानी इमारत पर नजर अनायास पड़ जाती है. बचपन से ही यह इमारत मुझे आकृष्ट करती रही है परन्तु स्टेशन से अपने अड्डे की तरफ़ चल पड़ने की जल्दबाजी  के कारण कभी फुर्सत ही नहीं मिली.  अब क्योंकि चेन्नई में लंबे समय तक रहने का मौका मिला है तो दो तीन बार प्रयास किया कि अन्दर के हालात से वाकिफ हो जाऊँ.  वहाँ जाने पर पाया कि चेन्नई मेट्रो रेल योजना के तहत उस इमारत के सामने ही सुरंग खोदी जां रही है और  टीन की चादरें  पूरे इलाके को घेर रखी हैं.  चौकीदार भी बिठा रखे हैं ताकि कोई ताक झांक भी ना कर सके.  बाहर से ही कुछ तस्वीरें ले लीं.  यह भवन ही विस्टोरिया पब्लिक हाल के नाम से जाना जाता है.

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सन् 1880 के दशक में चेन्नई में एक सार्वजनिक सभा भवन की जरूरत महसूस की गयी जहाँ सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रम किए जा सकें.  गणमान्य नागरिकों की एक बैठक सन् 1882 में आयोजित की गयी थी और उस समय सभा में उपस्थित सज्जनों से एक भवन के निर्माण हेतु लगभग 20,000 रुपये इकट्ठा किए गए थे.   योजना को क्रियान्वित करने के लिए एक न्यास का भी गठन किया गया और नगर निगम ने भी 99 वर्ष के पट्टे पर  3.14 एकड़ की भूमि उपलब्ध करा दी थी.  दिसंबर 1883 में भवन का शिलान्यास हुआ और 1888 के लगभग निर्माण कार्य पूरा हुआ. भवन के वास्तुकार ‘रॉबर्ट फेल्लोस चिशोम’ थे. यह भवन भी तत्कालीन इंडो सरसेनिक स्थापत्य पर आधारित रहा. महारानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक के स्वर्ण जयंती के उपलक्ष में भवन का नामकरण विक्टोरिया पब्लिक हाल रखा गया था.

मुख्य भवन में दो तल हैं. भूतल से ही प्रथम तल के लिए चार सुंदर लकड़ी की सीढ़ियाँ बनी है. दोनों तलों का विस्तार लगभग 26000 वर्ग फीट का है. प्रत्येक तल में 600 व्यक्तियों के बैठने की क्षमता है. इस भवन के बनते ही विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के द्वारा अपने कार्यक्रम संपन्न करने की मानों होड़ सी लग गयी थी. प्रति दिन शाम नाटकों का मंचन नियमित रुप से होने लगा था. स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी, गोपाल कृष्ण गोखले, सुब्रमनिय भारती, सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि कुछ भारतीय महान आत्माओं ने यहीं पर जनता को संबोधित किया था. चेन्नई में सबसे पहले मद्रास फोटोग्राफिक स्टोर के मालिक श्री टी. स्टीवेंसन के द्वारा सन् 1892 में दस लघु फिल्मों का प्रदर्शन इसी  सभा भवन में किया गया था हालाँकि भारत में उन दिनों फिल्मों का निर्माण प्रारंभ नहीं हुआ था.  संदर्भवश ‍तमिल की पहली बेज़ुबान फ़िल्म (मुक्का) “कीचक वधम” 1918 में जाकर ही प्रदर्शित हुई थी.

समय के साथ साथ भवन वृद्धावस्था में पदार्पण कर गया और 20 वीं सदी के उत्तरार्ध तक तो दुर्गति के कगार पर खड़ा हो गया और उपेक्षा का शिकार बना.  एक दो बार कुछ सतही तौर पर ठीक ठाक करने की कोशिश भी हुई परन्तु वे प्रयास पर्याप्त नहीं थे. यह भवन  पिछले 45 वर्ष से बंद ही पड़ा हुआ है.  इस बीच न्यास ने कुछ भूमि अन्य प्रयोजनों के लिए भी आबंटित कर दी.  कुछ मौका परस्तों ने बेजा कब्जा कर अहाते में अपनी दुकानें खोल लीं. नगर निगम के द्वारा प्रदत्त 99 वर्ष के पट्टे की अवधि समाप्त होने पर विवाद भी बना रहा परन्तु अंततोगत्वा निगम अतिक्रमणों को हटाने में सफल रहा.  विस्टोरिया पब्लिक हाल के पुनरुद्धार हेतु विभिन्न पक्षों द्वारा किए गए प्रयास के फलस्वरूप नगर निगम ने सन् 2009 में 3.39 करोड़ रुपयों की धन राशि भवन को मूल स्वरूप में लाने हेतु स्वीकृत की और काम भी प्रारंभ हुआ. इस बीच चेन्नई में मेट्रो रेल योजना प्रारंभ हुई जिसकी वजह से निगम द्वारा संचालित पुनरुद्धार का कार्य प्रभावित हुआ.   अभी अभी निगम परिषद की बैठक में घोषणा की गयी है कि इस वर्ष जुलाई के अंत तक भवन अपने मूल रुप में पुनः अवतरित हो जायेगी.

Renovation

मेट्रो रेल योजना के अंतर्गत लायिने आधी खम्बों पर और आधी भूमिगत होंगी.  जैसा प्रारंभ में ही कहा जा चुका है, विस्टोरिया पब्लिक हाल के सामने भूमिगत रेलमार्ग हेतु सुरंगों का निर्माण हो रहा है. इसके लिए कंपनी ने भवन (हाल) के सामने के एक बड़े भूभाग को कब्जे में ले लिया है.  इस ऐतिहासिक भवन के सामने एक सुंदर फव्वारा बना था जिसे मेट्रो रेल वालों ने वहाँ से हटाकर भवन के बाज़ू में स्थानांतरित कर दिया है. इस प्रक्रिया में कुछ कुछ अलंकरण नष्ट भी हो गए.  इस फव्वारे का भी अपना महत्व है.

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अँगरेजों की शाही राजधानी कलकत्ता में पहली बार सन् 1860 में  सरकार का बजट प्रस्ताव जेम्स विल्सन के द्वारा पेश किया गया था. सन् 1857 के गदर में सरकार को हुई हानि की पूर्ति के लिए नागरिकों की आय पर कराधान का प्रस्ताव भी था. प्रत्येक नागरिक जिसकी  आय 200 रुपयों से अधिक थी,  प्रस्तावित कर के घेरे में आ गए. जनता में खलबली मच गयी और इस कर का विरोध हुआ. चार्ल्स ट्रेवेल्यान जो उस वक्त मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर थे, ने जनता का समर्थन किया और तार भेजकर अपना विरोध जताया. परिणाम स्वरूप उन्हें अपना पद भी खोना पडा. यही चार्ल्स ट्रेवेल्यान कभी मद्रास नगर निगम के अध्यक्ष भी रहे और उन्होंने अपने कार्यकाल में जनता के लिए पेय जल तथा नगर के बीचों बीच बड़े से  उद्यान की व्यवस्था की थी. उन्हीं की स्मृति में  विक्टोरिया पब्लिक हाल के सामने फव्वारा  बनवाया गया था.

13 Responses to “विक्टोरिया पब्लिक हाल, चेन्नै”

  1. sanjaybengani Says:

    सुन्दर प्रस्तुति

  2. arvind mishra Says:

    फॉण्ट साईज बड़ा कीजिये तब पढ़ते हैं

  3. PN Subramanian Says:

    @डा: अरविन्द मिश्रा:
    जी, बड़ा कर दिया.

  4. sanjay @ mo sam kaun Says:

    जुलाई का इंतज़ार करते हैं, फ़िर आप भी तसल्ली से ताकाझाँकी कर सकेंगे।

  5. राहुल सिंह Says:

    सुंदर, आकर्षक भवन का गरिमामय इतिहास.

  6. समीर लाल "टिप्पणीकार" Says:

    बहुत आभार पढ़वाने का…अरविन्द जी का यूँ है कि अब अगली बार फॉण्ट छोटा करवायेंगे 🙂 लाइम लाईट न चमके मेरे भाई के चेहरे पर तो चैन नहीं आता….:) हा हा!!

  7. काजल कुमार Says:

    मेट्रो वाले कम से कम चीजें गंवा नहीं रहे

  8. Gagan Sharma Says:

    ज्ञानवर्धक जानकारी। चेन्नैइ जाना तो हुआ था पर जानकारी ना होने की वजह से इधर ध्यान ही नहीं गया।

  9. Alpana Says:

    इस पोस्ट से इस स्थान के बारे में अच्छी जानकारी मिली.
    चार्ल्स ट्रेवेल्यान जैसे अच्छे लोग [ अंग्रेज़] भी हुए थे , जो भारतीय जनता के दुःख दर्द को समझते थे .

  10. Asha Joglekar Says:

    Jab jab yahan aana hota hai hamesha kuch alag sa naya padhne aur janan ko milata hai. Victoria Public hall chennai ke bare men jankar achcha laga.

  11. arvind mishra Says:

    इस विंटेज भवन का पुनरुद्धार जरुरी था -!

  12. ghughutibasuti Says:

    रोचक जानकारी. आभार.
    घुघूतीबासूती

  13. पथिक Says:

    चेन्नै का हाल भी गजब है, एक बार रेल्वे स्टेशन से बस स्टैंड जाने के लिए आटो वाले ने 100 रुपए ले लिए। जब पाँडिचेरी से लौटकर आया तो 15 बी की बस ने 3 रुपए में चेन्नै सेंट्रल पहुंचा दिया। एयरपोर्ट से पाँडिचेरी जाने के लिए टैक्सी वाले ने 3600 रुपए लिए और पाँडिचेरी से नान स्टॉप लो फ़्लोर बस में 140 रुपए में लौट आया। नए शहर में कभी बुद्धु बनना पड़ता है। 🙂

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