Archive for मई, 2013

बेकल का किला

मई 24, 2013

Pallikere

कन्नूर (Cannanore) में रुकना हुआ था और वहीं से आगे कोंकण के कुछ क्षेत्रों को देख् आने का कार्यक्रम बना. लंबी दूरी के कारण किराये के वाहन से निकल पडे थे.  मौसम बड़ा सुहाना था क्योंकि मानसून-पूर्व की बारिश हो चुकी थी. इस तटीय क्षेत्र में वैसे तो हरियाली हमेशा ही रह्ती है, इस बार कुछ ज्यादा ही भा रही थी.  रास्ते में एक बेकल नामका किला पड्ता है.  हमें दूरी का अंदाजा नहीं था.  ड्राइवर से कह  दिया था कि बेकल में रुकते हुए चलेंगे.  काफी चलने के बाद हमने ड्राइवर महोदय से पूछा कि कहीं बेकल छूट तो नहीं गया परन्तु उसने बताया कि अभी बहुत दूर् है.  हम बीच बीच में उसे याद दिलाते भी रहे, कहीं ऐसा ना हो कि झोंक में सीधे निकल जाए.   लगभग 75 किलोमीटर चलने के बाद एक सूचना फ़लक दिखा “पल्लिक्करा बीच”. और हमें खुशी हुई क्योंकि मेरे गाँव का नाम पालियकरा से बड़ा साम्य है.  ड्राइवर ने स्व्यं बताया कि बेकल का किला कुछ आगे ही है.  मन तो किया था कि उस “बीच” को भी देखा जाए क्योंकि वह् एक अंजाना नाम था इसलिए लोगों की नजर में नहीं चढ़ा होगा. लहरों से एकांत में जी खोल के बातचीत भी हो सकतीं थी. गाड़ी तो आगे बढ़ गई थी और हमने भी समझौता कर लिया. 5/6 किलोमीटर चलने पर हम बेकल के प्रवेश द्वार पर थे.

03090_489085

यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के आधीन है और एक खँडहर हो चले इस पुराने किले को उसके मूल स्वरुप में लाने के लिए सराहनीय कार्य किया है.  40 एकड़  में फैला इस इलाके में  यह सबसे सुन्दर और अनुरक्षित किला है. यहाँ प्रवेश के लिए 5 रुपये की टिकट लगती है  वहीँ केमरा ले जाने पर 30 रुपयों का अतिरिक्त शुल्क लिया जाता है. प्रवेश द्वार के पास ही एक तरफ हनुमान जी का मंदिर है तो दूसरी तरफ किसी एक संत का मज़ार है – सह अस्तित्व के प्रतीक!   आड़े  तिरछे रास्ते से किले के अन्दर जाना पड़ता है. यह किले की सुरक्षा के निमित्त ही रहा होगा. सामरिक दृष्टि से यह किला महत्त्वपूर्ण  रहा है क्योंकि एक भूभाग जो समुद्र के अन्दर तक घुस हुआ है उस पर ही किला बना है. इस कारण किले के तीनों तरफ समुद्र है और समुद्री आवागमन पर पूरी नज़र रखी जा सकती  है. सुरक्षा के लिए   खन्दक (MOT) भी बना है जिसके दो मुहाने समुद्र में खुलते हैं इस कारण समुद्र का पानी खन्दक में घुस आता है.

पूरा निर्माण स्थानीय लेटराइट पत्थरों का  है. बडी संख्या (14) में बुर्ज भी हैं. जगह जगह तोपों को रखे जाने के लिए व्यवस्था तीन स्तरों  पर बनी है परन्तु एक भी तोप  देखने नहीं मिला.  किले के अन्दर गोला बारूद रखे जाने की सुन्दर व्यवस्था है और किले की घेराबन्दी होने पर  भूमिगत कक्ष एवं सुरंगें हैं.   अन्दर से एक सुरंग  दक्षिण दिशा में किले के बाहर निकलती है. पानी को संग्रहीत रखने के लिए एक बडी टंकी है जिसमें सीढ़ियों से उतरा जा सकता है.  किले के बीच में एक बुर्जनुमा निर्माण है जिसे बनवाने का श्रेय टीपू सुलतान को दिया जाता है. इसपर चढ़ने के लिए ढलान दार रपटा बना है. ऊपर से पूरे इलाके पर पैनी नज़र रखी जा सकती  है. वहां से चारों  तरफ  का विहंगम दृश्य आपको बांधे रख सकता है . किले के दोनों  तरफ बेहद रमणीय बीच है और यहाँ समुद्र उथला  है जिसके कारण  मस्ती की जा सकती है.  किनारे चट्टानों पे  बैठकर लहरों से गुफ्तगू भी हो सकती है.

03090_48907716 वीं सदी के प्रारंभ में “इक्केरि” नायक नामके राजवंश का इस क्षेत्र पर अधिकार रहा है और उनके द्वारा कोंकण क्षेत्र में अन्य किलों (चन्द्रगिरि और होसदुर्ग) का निर्माण कराये जाने के प्रमाण कनारा मैन्युअल और तत्कालीन साहित्य में मिलते हैं.  मान्यता है कि बेकल का यह किला एक शिवप्पा नायक द्वारा बनवाया गया था. 1763 में हैदर अली नें इस किले को अपने अधिकार में ले लिया.  मालाबार को हस्तगत करने के लिए टीपू सुलतान द्वारा चलाये गए अभियान के समय बेकल का किला उसके लिए एक महत्वपूर्ण सैनिक अड्डा बन गया था.  हैदर अली ने मैसूर में तो एक निरंकुश  परन्तु  धर्मं सहिष्णु शासक के रूप में अपनी  छवि बनायी थी परन्तु अपने विजय अभियान में  उसका अमानवीय घिनौना चेहरा ही सामने आता है. टीपू सुलतान तो अपने बाप से भी आगे था.  जालियाँवाला बाग़ जैसा ही  बेकल किले के अन्दर एक  कुँवाँ  चीत्कार कर रहा है.

Bakel_ratnu

Bekalfortbeach

सन 1799  में टीपू सुलतान अंग्रेजों के हाथों मारा  गया और उसके राज्य के साथ साथ बेकल का किला भी अंग्रेजों के आधीन आ गया. उन्होंने इस किले को और मजबूत किया और उसे एक सैनिक छावनी के रूप में इस्तेमाल किया.  विगत कुछ वर्षों में किले के अन्दर हुए उत्खनन से पता चलता है मध्य युग में वहां एक मंदिर परिसर, एक राज प्रसाद, कुछ नायकों और टीपू के भवन आदि का अस्तित्व रहा है.  एक टकसाल भी मिली है. कुछ सिक्के जो मिले हैं वे सभी टीपू और मैसूर सल्तनत के हैं.double-paisa-of-tipu-sultan_l

पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बेकल विकास प्राधिकरण गठित हुई है और पर्यटकों के लिए  आवास सुविधा निर्मित की जा चुकी है.  किले में आने वालों के लिए खान पान की भी व्यवस्था है. उत्तर दिशा से आने वालों के लिए नजदीकी शहर ” कासरकोड़” है यहाँ ठैरने  की अच्छी व्यवस्था है और बेकल मात्र 15 किलोमीटर दूर पड़ेगा.

सभी चित्र अंतरजाल से 

यह उपासक कौन है

मई 19, 2013

संग्रहालय में घूमते  समय एक शिल्प दिखा,  शिव और पार्वती अगल बगल बैठे हुए हैं और किसी  साधू या ऋषि को उनके सामने उलटे पाँव हाथ के बल खडे दर्शाया गया था.  उपासना की  इस विधि को देख मुझे हट योगियों  का ख़याल आया.  कोई सूचना फलक भी नहीं था जिससे पता चले कि वह ऋषि जैसा दिखने वाला आखिर कौन है.  तस्वीर खींच कर घर आ गए.   कुछ मित्रों से भी जानकारी चाही परन्तु वे भी कुछ बता सकने में असमर्थ रहे.  इतना ही पता चला था कि शिव पुराण में उपासना की ऐसी किसी पद्धति का उल्लेख नहीं दिखा.  बात आयी गयी हो गई.

IMG_1722

कुछ पुरानी तस्वीरों के लिए कंप्यूटर के भेजे को खंगाल रहा था और पुनः एक बार वही तस्वीर प्रकट हो गयी.  मंथन फिर शुरू हुआ और अंत में थक हार कर एक अमरीकी महिला मित्र को भी मेल द्वारा तस्वीर भेज दी.  एक घंटे में ही जवाब आ गया कि शिव के परम भक्तों (६३  नायनार) में एक महिला थी जिसने हिमालय में कैलाश तक ऐसा करतब किया था. यह जानकारी पर्याप्त थी और गुत्थी सुलझ ही गयी .  खेद है कि अब आप सब को भी झेलना पड़ेगा.

चेन्नई से ३०० किलोमीटर दक्षिण में पूर्वी समुद्र तट पर एक प्रमुख बंदरगाह है “कारैकल” जो कभी फ्रांसीसियों का उपनिवेश हुआ करता था। आज यह केंद्र शासित पुदुस्सेरी (पोंडिचेरी) के अंतर्गत आता  है. यहाँ अब भी फ्रांसीसी संस्कृति का एहसास किया जा सकता है.  यहाँ ९९ मंदिर हैं  परन्तु  इस नगर की प्रसिद्धि  दक्षिण के  एक मात्र शनि के देवालय के लिए है जहाँ शनि देव की प्रतिमा अभय मुद्रा में है. यह एक महत्वपूर्ण पहलू है. इस नगर में संत मस्तान सय्यद दावूद का दरगाह भी  है जिसकी  बड़ी  ख्याति है.  सन १८२८ में पुनः निर्मित  अवर लेडी ऑफ़ एंजिल्स का चर्च भी सुकून देता है.

संगम काल में भी कारैकल एक फलता फूलता बंदरगाह एवं व्यापारिक केंद्र रहा है.  इसी नगर में ६ वीं सदी में एक धनी परन्तु धर्मं परायण  व्यापारी हुआ करता था “दनादत्त”. उसकी  पत्नी धनलक्ष्मी बडी आज्ञाकारी थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। दोनों ने मिलकर ईश्वर से संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थनाएं की और ईश्वरीय  कृपा  से संतान के रूप में एक कन्या  ने जन्म लिया जिसका नाम था “पुनीतवती”. बालकाल से ही पुनीतवती में भगवान् शिव के प्रति  अपार श्रद्धा उत्पन्न हो गयी थी जो शनै शनै प्रगाढ आसक्ति में परिणित हुई. वह शिव भक्तों की भी सेवा करना अपना कर्तव्य मानती थी. सदैव ही उसकी  ओंठों से “ॐ नमः शिवाय” निकलता रहता था. जब वह बडी हुई तो उसका विवाह एक धनी वैश्य (संभवतः चेट्टियार) “परमदत्त” से हो गई.  पति पत्नी दोनों सुखी थे और  एक आदर्श गृहस्थ जीवन जी रहे थे.

karaikal 2

एक दिन पुनीतवती के पति ने दो आम भिजवाये जिन्हें उसने संभाल कर रख दिया ताकि  दुपहर भोजन के साथ अपने पति को खिला  सके. थोडी देर में एक भूका शिव योगी आ टपका जिसकी पुनीतवती ने यथोचित आवभगत की और भिक्षा भी दिया. भोजन करवाने में वह असमर्थ थी क्योंकि तब तक तैय्यार नहीं हो पाया था इसलिए पति द्वारा भिजवाये गए आमों में एक योगी महाराज को देकर विदा कर दिया.  दुपहर  पति के आने पर भोजन के साथ बचे हुए आम को भी काट कर परोस दिया.  परमदत्त को आम अच्छी लगी तो उसने दूसरे आम की भी मांग की.  पुनीतवती दुविधा में पड गई और चौके में जाकर ईश्वर की मदद   मांगी.  प्रार्थना के पूरे होते ही उसकी  हथेली में आश्चर्यजनक रूप से एक आम आ गिरा. वह चकित रह गयी और ईश्वर का आभार मानते हुए उस आम को ले जाकर अपने पति को दे दिया. परमदत्त आम चख कर विस्मित था  बडी लज्ज़त दार थी और ऐसा आम उस ने कभी नहीं खाया था उसे पक्का विश्वास था कि वह आम उसके द्वारा भेजी हुई तो कतई  नहीं थी वह पत्नी से पूछ बैठा  कि वो आम कहाँ की है.   पुनीतवती के पास सत्य को जाहिर करने  के अलावा कोई चारा नहीं था सो  उसने पूरी घटना बता दी.  परमदत्त को विश्वास नहीं हुआ और उसने इसी प्रकार एक और आम प्राप्त करने की चुनौती दे दी. पुनीतवती दुखी मन से अन्दर गई और एक बार फिर प्रार्थना की. परिणाम स्वरुप आम उसके हथेली में आ पहुंचा जिसे उसने अपने पति को दे दिया. उसके पति ने आम को हथेली पर रख निरीक्षण किया ही था कि   अचानक  वह आम गायब हो गयी. परमदत्त हक्का बक्का रह गया. उसे अपने पत्नी की महानता समझ में आ गई. असाधारण दैवीय गुणों से संपन्न पुनीतवती के साथ पति के रूप में रहना महापाप होगा ऐसा मानते हुए जल्द ही  परमदत्त व्यापार के बहाने एक बडे नाव में माल भर कर किसी अज्ञात देश के लिए समुद्री यात्रा पर निकल पड़ा .  कुछ वर्षों बाद वापसी पर पांड्य राज्य के किसी नगर में जा बसा और व्यवसाय  में लग गया.  एक वैश्य कन्या से  विवाह भी कर ली . उसके घर एक कन्या जन्म लेती है। अपने पूर्व पत्नी की याद में अपनी  पुत्री का नाम  “पुनीतवती”  रखता है. पुनीतवती के घर वालों को जब दूसरे  नगर में परमदत्त के उपस्थिति की जानकारी मिलती है तो वे पुनीतवती को डोली में बिठा कर ले चलते हैं.  भनक लगते ही परमदत्त स्वयं अपनी दूसरी पत्नी और बच्चे सहित अगुवानी करने निकल पड़ता है और जाकर  पैरों पर गिर पड़ता है.  लोगों द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने पर  बताता है कि वह पुनीतवती को एक पत्नी नहीं अपितु देवी मानता है.

पुनीतवती अपने पती की मनोदशा को समझते हुये भगवान् शिव से निवेदन करती है कि एक आकर्षक शरीर की जगह उसे राक्षसी जैसा कुरूप बना दिया जाए.  तथास्तु तो होना ही था और उसका शरीर एक  हड्डी का ढांचा बन कर रह गया, कुछ चामुंडा की तरह, निर्बल देह वाली.

karaikal ammaiyar

कुछ समय पश्चात वह  कैलाश की यात्रा पर निकल पडी. यह सोच कर कि उस पवित्र भूमि में पैर रखना गुनाह होगा, उसने अपनी  यात्रा सर के बल पूरी की और शिव जी के समक्ष उपासनारत  रही.  शिवजी ने स्नेह और सम्मान के साथ पुनीतवती का स्वागत किया और वर देने के लिए तत्पर हो गए.  पार्वती जी भी पुनीतवती को देख चकित थीं. तब शिवजी ने अपने उस भक्त को माता के रूप मे परिचय कराया.  पुनीतवती ने  कुछ भी नहीं माँगा.  केवल इतना कि वह सदैव शिवजी का ही गुणगान करती रहे और शिवजी द्वारा जब भी नृत्य किया जाता हो तो वह  भी चरणों में बैठकर असक्त हो सके. इस वजह से अक्सर  नृत्य करते नटराज के  पास भी पुनीतवती दृष्टिगोचर होती है.

Gangaikondacholapuram_natarajar

इसी पुनीतवती को  “कारैकल अम्मयार”  (शब्दार्थ कारैकल की माता) कहते हैं। उन्हें “पुनीतवाद्यार” भी संबोधित किया जाता है. प्राचीन तामिल साहित्य में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है.  उनके दोहों के अंत में अपने लिए  “कारैकल की पिशाच”  शब्दों का प्रयोग देखा गया है. इसलिए कदाचित कई  शिल्पियों/कलाकारों ने उन्हें पिशाच जैसा भी  चित्रित किया  है.