वरदराज पेरुमाल मन्दिर, काँचीपुरम

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काँचीपुरम में एकाम्बरनाथ के शिव मन्दिर के बाद जो दूसरा सबसे बड़ा मन्दिर है वह् है विष्णु का जिसे वरदराज पेरुमाल कहते हैं.  एकाम्बरनाथ के मन्दिर के अन्दर ही एक और छोटा सा मन्दिर विष्णु के लिए बनाया गया था लेकिन यह तो नाइंसाफी थी इसलिए लाज़मी था कि विष्णु के लिए भी एक भव्य मन्दिर बने.  द्वैत और अद्वैत  का चक्कर कोई नया थोड़े ही है.  यह मन्दिर एकबारगी नहीं बनाया गया था वरन्‌ इसका विकास कई सदियों में हुआ है.  मूलतः यह मन्दिर चोल राजाओं द्वारा सन् 1053 में बनवाया गया था.  सन् 1316 से कुछ समय के लिए काँचीपुरम काकतीय वंश के प्रताप रुद्र देव (वारंगल) के आधीन भी रहा. तथाकथित 1000  खम्बे से युक्त मंडप (दोमंजिला) उनकी दैन है.  (इसी के भाई अन्नम देव ने बस्तर राजवंश की स्थापना की थी).  कुलोतुंगा चोला और विक्रम चोला के शासनकाल में मन्दिर का विस्तार हुआ.  14 वीं शताब्दी में एक दीवार और गोपुरम का निर्माण हुआ.  विजयनगर राजाओं का भी मन्दिर के विस्तार में बड़ा योगदान रहा है. परन्तु लोगों का मानना है कि इस मन्दिर को सर्वप्रथम पल्लव नरेश नंदिवर्मन (द्वितीय) ने बनवाया था. एक बात रोचक लगती है. एकाम्बरेश्वर (शिव) तथा वरदराज पेरूमल (विष्णु) मन्दिर दोनों ही 23 एकड़ की जगह घेरे हुए हैं. लगता है बँटवारा बराबरी का हुआ था. सन् 1532 (अच्युतराय, विजयनगर) का एक शिलालेख इन दोनों ही मंदिरों में पाया जाता है.  अच्युतराय ने दोनों मंदिरों को अतिरिक्त भूमि प्रदान करने का आदेश दिया था. वीर नरसिंह राय जिसके संरक्षण में काँचीपुरम को रखा गया था, ने एकाम्बरेश्वर (शिव) मन्दिर को अधिक भूमि प्रदान कर दी थी.  शिकायत मिलने पर अच्युतराय ने भूमि के बँटवारे को संतुलित किया था. यह मन्दिर भी वैष्णवों के 108 दिव्य स्थलों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

(संदर्भवश वरदराजा पेरुमाल नामका एक प्रभावशाली व्यक्ति श्रीलंका के उत्तर पूर्वी राज्य का मुख्य मंत्री भी हुआ करता था. लिट्टे उसके जान की दुश्मन बन गयी थी अतः 1990 में भारतीय शान्ति सेना के वापसी के समय वह् भी  स्वनिर्वासित  हो सपरिवार भारत चला आया . भारत सरकार ने उसे सुरक्षा मुहय्या करायी थी तथा वह् चंदेरी (मध्य प्रदेश) के किले में रहने लगा था. यहाँ से उसे अजमेर ले जाया गया था जहाँ वह् लगभग एक दशक तक रहा.)

जैसे हम शिव के विभिन्न नामों के साथ “ईश्वर” (पातालेश्वर, महाकालेश्वर) का प्रयोग करते हैं लगभग वही “पेरुमाल” का भी आशय है परन्तु ऐसा प्रयोग दक्षिण में वैष्णव पंथ से जुड़ा है.  इसी प्रकार शैव, देवी माता के लिए “अम्मान” का प्रयोग करते हैं और वैष्णव “थायार” का.

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???????????????????????????????यह दूसरा गोपुरम है. सामने है ध्वज स्थम्भ और ऊँचा मंडप

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पश्चिम की तरफ़ से (मुख्य द्वार) मन्दिर के अन्दर जाने पर एक विशाल क्षेत्र में 100 खम्बे वाला मंडप है जिसमें एक से एक कलात्मक प्रतिमाओं की भरमार है. इसके छत के चारों कोने पर एक ही शिला को तराश कर बनायी गयीं जंजीरें लटकी हुई है. ऐसी ही जंजीरें कुछ छोटे परन्तु ऊँचे मंडपों में भी kanchiलगी हैं. यह भी अपने आपमें अद्भुत है. इस मंडप के पीछे एक तालाब है. विष्णु की मूल प्रतिमा गूलर की लकड़ी से बनी थी जो इस तालाब में दबाकर रखी गयी है.  40 वर्ष में एक बार उसे बाहर निकाला जाता है. मुख्य मन्दिर/गर्भगृह एक टीले पर बना है जिसे हस्तगिरि कहा जाता है.  गर्भ गृह के दो तल हैं.  भूतल  में नरसिंह हैं और ऊपर प्रथम तल में विष्णु की खड़ी प्रतिमा है. उनके चेहरे की मुस्कुराहट देख् भक्त गण अभिभूत हो उठते है. एक अलग खंड के छत पर दो छिपकलियाँ बनी हैं. एक रजत की और दूसरी स्वर्ण की.  लोग इन्हें छूते हैं और मान्यता है कि ऐसा करने पर उनके दुखों का निवारण होता है. इनके पीछे भी कई मिथक हैं.  नजदीक ही लक्ष्मी जी (जिन्हें “पेरुन देवी थायार” संबोधित किया जाता है) एक अलग प्रकोष्ठ में विराजमान हैं.  अँगरेजों के शासनकाल में मेजर जनरल लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव के द्वारा इस मन्दिर के लिए बहुमूल्य आभूषण भेंट किए गए थे जिनका प्रयोग विशेष अवसरों पर किया जाता है.

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हमने इस मन्दिर का अवलोकन पूर्व  में भी किया था तब बहुत भीड़ थी. इस बार भरी दुपहरी में जाना हुआ था यह सोच कर कि आराम से घूम फिर सकेंगे परन्तु मन्दिर के पट तो बंद थे इसलिए इधर उधर देख् दाख  कर संतुष्ट हो लिए. इस्कान के द्वारा अपने कुछ अनुयायियों को यहाँ लाया गया था. अधिकांश भारतीय वेश भूषा में विदेशी थे. एक मंडप में बैठकर उनके खाने का कार्यक्रम चल रहा था. उनसे बातचीत तो नहीं हो पायी परन्तु उनके चित्र ले लिए थे और लौट पड़े.

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शाम हमारे ड्राइवर की कुछ आवश्यकता के कारण उस मन्दिर की तरफ़ दुबारा जाना हुआ और देखा कि भगवान गाजे बाजे के साथ अपने सायंकालीन हवाखोरी के लिए निकले थे.  उनकी सवारी के पीछे पीछे मन्दिर के पंडितों का एक समूह मंत्रोच्चार करते हुए चल रहा था.  हमारा ड्राइवर डेनियल उनका रास्ता काटते हुए सड़क को पार कर रहा था  और मैंने देखा कि उनमें से एक दो पंडित बौरा गए थे लेकिन कोई हंगामा नहीं हुआ.

13 Responses to “वरदराज पेरुमाल मन्दिर, काँचीपुरम”

  1. arvind mishra Says:

    ये सिंह सरीखे उत्कीर्ण चित्र किस जानवर के हैं?

  2. राहुल सिंह Says:

    जीवन्‍त मंदिरों में देखने, जानने और महसूस करने को कितना कुछ.

  3. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    डा: अरविन्द मिश्रा :
    सर जी यह पूर्णतः काल्पनिक होते हैं. इनके विडाल, यालि, व्याल आदि नाम मिलते हैं. अलंकरण के लिए प्रयुक्त.

  4. समीर लाल "टिप्पणीकार" Says:

    बिना किसी अरविन्द जी की टिप्पणी के मुझे यह प्रस्तुति कम से कम मेरे लिए चित्र्मयी सारगर्भित एवं जानकारीपूर्ण रही…अतः आभार!!

  5. समीर लाल "टिप्पणीकार" Says:

    वैसे अरविन्द जी की बात का जबाब दें तो मैं जानकारी दुरुस्त करुँ

  6. Swapna Manjusha Says:

    मंदिर की भव्यता अतुलनीय है।
    इन काल्पनिक पशुओ की मूर्तियाँ जीवंत लग रही हैं, उनकी शारीरिक भंगिमा में गज़ब की गति नज़र आ रही है। भक्तों की तसवीरें भी मनोरम हैं।
    आपका हृदय से आभार, इतने सजीव चित्रों और इतनी जानकारी साझा करने के लिए।
    कभी ज़रूर जाऊँगी मैं।

  7. प्रवीण पाण्डेय Says:

    मंदिरों में उकेरी कलाकृति सदा ही चमत्कृत करती है।

  8. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत ही अनुपम जानकारी देती पोस्ट, चित्र पोस्ट को सजीव कर रहे हैं, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  9. Alpana Says:

    कोई १७-१८ साल पहले हम भी कांचीपुरम देखने गए थे.वहाँ इतने गौर से इन स्थानों को नहीं देखा था जितना अब इतिहास जानने के बाद देख रही हूँ .
    वहाँ जगह -जगह दान पात्र लिए पंडों से परेशान हो कर जल्दी बाहर निकल गए थे.टिकट लेलेने के बाद भी दर्शन करते हुए ‘भगवान की मूर्ति की फोटो लिए जाने पर मेरा कैमरा पंडित जी ने छीन लिया था..जिसे बाद में दे दिया गया था विष्णु जी की मूर्ति की वह फोटो आज भी मेरे पास है.[भारत रखी हुई है]..इन चांदी और सोने की छिपकलियों को छूने का सौभाग्य हमने भी प्राप्त किया .पुराने दिनों की याद ताज़ा हो गयी!
    बहुत अच्छे चित्र और रोचक और ज्ञानवर्धक विवरण मिला.आभार.

  10. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ अल्पना:
    भूतकाल में पंडों की परेशानी रही होगी परन्तु अब माहौल पूर्णतः नियंत्रित है. कुछ जगहों पर प्राथमिकता के आधार पर पूजा अर्चना किये जाने के लिए कुछ लालची पंडित जरूर मिल सकते हैं.

  11. shikha varshney Says:

    दक्षिण भारत के मंदिरों की अपनी एक अलग संस्कृति है. वास्तु कला और संस्कृति के अनूठे उदाहरण हैं ये मंदिर हमने भी यह मंदिर देखा हुआ है.
    उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण के मंदिर और पंडों को काफी नियंत्रित पाया है.

  12. विष्‍णु बैरागी Says:

    सदैव की तरह ही विस्‍तृत जानकारियॉं और सुन्‍दर, प्रभावी चित्र।

  13. ramakant singh Says:

    प्रणाम स्वीकारें देव दर्शन करवाने हेतु .संग्रहनीय जानकारी *******

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