Archive for जून, 2013

मांगाडु के मन्दिर

जून 23, 2013

एक दिन सुबह नहा धोकर घर के बैठक में पहुँचा तो पाया कि वहाँ तीन चार महिलाएं आई हुई थीं. सभी उच्चाधिकारियों की पत्नियां.  बहू का उनके साथ किसी मन्दिर दर्शन का कार्यक्रम था. मुझे देखते ही कहने लगीं ,  हम आप का ही इंतज़ार कर रहे हैं.  वे चाहते थे कि मैं भी उनके साथ चलूँ.  मैंने प्रत्युत्तर में पूछा कि इतने लोग एक गाड़ी में कैसे समायेंगे तब मुझे बताया गया कि गाड़ी लंबी है और काफी जगह है. वास्तव में मैं तो टालना चाह रहा था पर जब पता चला कि माँगाडु  में देवी का बहुत पुराना मन्दिर है और नजदीक ही है तो मेरा मन भी जाने के लिए उद्यत हो चला.

चेन्नई से लगभग 20 किलोमीटर दूर् ही “माँगाडु” नामका कस्बा है.  आम्रवन को मांगाडु कहते हैं.   स्थल पुराण के अनुसार शिवजी ने ही एक बार रोष में आकर पार्वती जी को तपस्या करने हेतु प्रिथ्वीलोक जाने के आदेश दिए थे. फलस्वरूप पार्वती जी (यहाँ कामाक्षी) ने पाँच अग्नि कुंडों के बीच इसी वन में एक पाद पर खड़ी हो तपस्या की थी (हट योग का एक रूप)  ताकि उनके क्रोध का शमन हो परंतु शिव जी ने उन्हें काँचीपुरम जाने का निर्देश भिजवा दिया था.  तपस्यारत पार्वती जी शिव जी के संदेश को पाकर काँचीपुरम के लिए तत्काल प्रस्थान कर गयीं लेकिन उस क्षेत्र में प्रज्वलित की गयी अग्नि बनी रही.  असहनीय गर्मी से पूरा इलाका त्रस्त था. शंकराचार्य जी ने वहाँ अर्धमेरु चक्र की स्थापना की और अग्नि को शांत किया.

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srikamakshiammanएक घंटे के अन्दर ही हम लोग माँगाडु  पहुँच गए.  खाली जगह देख् कर गाड़ी पार्क कर ली और एक गली के अन्दर से मन्दिर की ओर बढ़ गए.  यहाँ भी प्रवेश के लिए गोपुरम बना हुआ है.  कोई ख़ास भीड़ भाड भी नहीं थी.  इस मन्दिर में मन्नत माँगने वाले भांति भांति के उपक्रम करते हैं.  लेट कर मन्दिर की परिक्रमा करना, चूड़ियाँ तथा राखियाँ लटका देना, छोटे छोटे पालने लटकाना, घी के दिए जलाना और सबसे जो विचित्र लगी वह् है ताले जड़ देना.  इन सबकी व्यवस्था भी बनी हुई है. कोई भी श्रद्धालु  ताला खोलते नहीं दिखा!  अन्दर गर्भगृह में मुख्यतः पूजा आराधना उस पीठासीन अर्धमेरु चक्र की होती है. यह जड़ी बूटियों से बना है अतः उसका  अभिषेक नहीं होता.  उस पीठिका के पीछे कांची पीठ के शंकराचार्य द्वारा पंच धातु से बनी देवी की एक मूर्ति स्थापित की गयी है. बाहर ही एक टाँग पर खड़ी, उठे हुए हाथ में जप माला लिए, देवी की मूर्ति भी रखी है लेकिन इसकी कोई विधिवत पूजा नहीं होती.  यहाँ मन्नत माँगने की एक और तांत्रिक प्रथा है. एक बड़ी संख्या उन श्रद्धालुओं की भी है जो दूर् दूर् से नियमित रुप से प्रति सप्ताह देवी के दर्शन के लिए जाते हैं.  पह्ली बार जाते समय 2 नीम्बुओं को ले जाना होता है. मन्दिर का पुजारी एक नींबू वापस लाकर देता है.  इस नींबू को घर पर पूजागृह  में एक सप्ताह रखना होता हे.  दूसरे हप्ते फिर 2 नए नींबू और एक पुरानीवाली को ले जाना पड़ता है. पुनः एक नींबू वापस मिलती है. इस प्रकार 6  हप्ते का नींबू व्रत होता है और 7 वें सप्ताह पूजा के बाद  मन्दिर में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को खीर और मीठा दूध वितरित किया जाता है.  कहना न होगा कि यह एक महत्वपूर्ण शक्तिस्थल है.

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है तो यह मन्दिर काफी पुराना परन्तु हाल के वर्षों में किए गए नव निर्माण से आधुनिक लगने लगा है. मन्दिर की बाईं तरफ एक बड़ा सा साफ़ सुथरा  हाल है जिसके अंत में एक मंच पर उत्सव मूर्ति विराजमान है. एक गणेश जी का भी छोटा मन्दिर है. इसके अतिरिक्त  पुराने शिल्प अल्प ही हैं  एक दीवार पर बड़ा सा घंटा लटका हुआ दिखा जिसे बजाने के लिए रस्सी बँधी हुई है, कुछ कुछ चर्च जैसा.

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इस मन्दिर के पीछे ही एक शिव का प्राचीन मन्दिर भी है जिसे “वेल्लीश्वर” के नाम से जाना जाता है.  हिंदी में रूपांतर किया जाए तो यह शुक्रेश्वर कह्लायेगा.  शुक्राचार्य को यहाँ शिव जी ने दर्शन दिए थे. मन्दिर ज्यादा विशाल नहीं है परन्तु स्थापत्य  के दृष्टिकोण से ज्यादा सुंदर और समृद्ध है. यह मन्दिर चोल शासनकाल का ही लगता है परन्तु गर्भगृह के सामने के मूल निर्माण में कुछ परिवर्तन उत्तरवर्ती काल में हुआ प्रतीत होता है.  निश्चित ही यह यहाँ का प्राचीनतम मन्दिर रहा होगा. मन्दिर में प्रवेश गोपुरम के बदले एक बग़ैर कमानी के (आयताकार) सिंह द्वार से होता है. फिर एक कमानीदार पेंडाल से गुजरते हैं. यहाँ सबसे पहले एक बलि पीठिका बनी है जो अभी कुछ वर्षों के अन्दर का निर्माण है.  इसके आगे नंदी जी अपने मंडप में विराजमान हैं परन्तु अपने स्वामी को देख् पाने में असमर्थ. य्ह स्थिति इस लिए बनी क्योंकि गर्भगृह के सामने जो मंडप होता है उसे ही विस्तार देकर सामने से बंद कर दिया गया.  इस प्रकार बने कक्ष में देवी दुर्गा को स्थापित कर दिया गया.  इस कारण गर्भगृह में प्रवेश के लिए उसके बाजू से जाना पड़ता है.

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Dakshinamurthi

गर्भगृह के अगल बगल गणेश और कर्तिकेय की प्रतिमा बनी है. अन्दर विशाल शिव लिंग है जिसका आधार चौकोर है.  मन्दिर के पीछे वीरभद्र तथा परिसर के उत्तर पश्चिम में कर्तिकेय के लिए छोटे मन्दिर बने हैं.  गर्भगृह के बाहरी दीवार में दक्षिण की तरफ़ दक्षिणामूर्ति अपने बाएं पैर को दाहिनी जंघा पर रखे हुए बैठे हैं. उनके चार हाथ हैं. ऊपर दायें हाथ में सर्प,  बाएं में ज्योति (मशाल), नीचे के बाएं हाथ में एक ग्रन्थ (ताड़ के पत्ते) तथा नीचे का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में प्रदर्शित है.  दक्षिणामूर्ति के रुप  में स्व्यं शिव ही हैं जिन्हें एक गुरु के रुप में  देखा जाता है जो असीमित ज्ञान के भण्डार माने जाते हैं . दक्षिण में ऐसी मूर्तियाँ सामन्य हैं.

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गर्भगृह के ठीक पीछे की दीवार पर “लिंगोध्भव” का शिल्पांकन है.  शिवलिंग को ही तराश कर अन्दर शिवजी प्रदर्शित हैं और दायें  बाएं क्रमश: ब्रह्मा और विष्णु को नमन करते हुए दर्शाया गया है. जहाँ शिव लिंग के ऊपरी भाग में ब्रह्मा जी अपने वाहन हंस के साथ लिंग की ऊँचाई का पता चला रहे हैं तो नीचे विष्णु जी वराह बन कर जमीन के अन्दर की गहराई का जायजा ले रहे हैं.

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विदित हो कि इस मन्दिर में कामाक्षी (पार्वती) की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है परन्तु अंबिका (पार्वती) के पद चिन्ह एक पद्म रुपी शिला पर बने हैं. यह पहले कभी शिव लिंग के सामने हुआ करती थी परन्तु अब नंदी के सामने नीचे रखा गया है.

मन्दिर के चारों तरफ़ अच्छी हरियाली है और लोगों का आना जाना भी कम ही है. इस कारण वातावरण सुकून भरा है.

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वैकुंठ पेरुमाल मन्दिर, काँचीपुरम

जून 18, 2013

पूर्व में काँचीपुरम के बारे में बताते  समय शायद हमने इस बात का भी जिक्र किया था कि यहाँ नगर दो भागों में बंटा है, एक शिव कांची दूसरा विष्णु कांची. इन दोनों समुदायों में प्रारंभ से ही होड़ चली आ रही है और अकसर ही आपस में उलझते  रहे हैं. शासकों के लिए भी धर्म संकट की स्थिति बनती थी. तुष्टिकरण की राजनीति तब भी विद्यमान थी. पल्लवों ने कैलाशनाथ का शिव मन्दिर जब 8 वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में बनवाया तब वैष्णवों ने अपने आपको राजा द्वारा उपेक्षित माना होगा.  पल्लव नरेश नंदिवर्मन- II (732 – 796), जो स्वयम एक विष्णु भक्त था,  ने एक विष्णु मन्दिर बनवा कर वैष्णवों के असंतोष का शमन किया. इस मन्दिर को ही आजकल वैकुंठ पेरुमाल मन्दिर कहते हैं. साहित्यिक संदर्भों में इस मन्दिर का उल्लेख “परमेश्वरा विन्नगारम” मिलता है. बनावट में यह कैलाशनाथ शिव मन्दिर से मेल खाता है. पल्लवों के द्वारा प्रारंभ में बनवाये गए किसी भी मन्दिर में प्रवेश के लिए राजगोपुरम की व्यवस्था नहीं थी.

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नंदिवर्मन से जुड़ी एक रोचक पहलू यह भी है कि वह् एक आयातित राजा था.  उसकी कहानी कुछ इस प्रकार है. सन् 730 के लगभग परमेश्वरवरमन – II  की मृत्यु हुई.  वह् निस्संतान था. तकनीकी दृष्टि से पल्लव राज वंश का अंत ही हो गया था. इस स्थिति का साम्राज्य के दुश्मनों द्वारा फायदा उठाया जा सकता था.  इसी भय से तत्कालीन सेनापति उदयचंद्र ने सेना के दीगर प्रमुखों (दंड्नायक), बुद्धि जीवियों, प्रमुख व्यापारियों आदि से सलाह मशविरा किया. आम सहमति से एक मिला जुला प्रतिनिधिमंडल  कंबोज (कम्बोडिया) के लिए रवाना हो गया. उन दिनों कंबोज में कद्वेसा हरि वर्मा नामका राजा राज करता था जो मूलतः भारतीय पल्लव राजवंश के एक दूसरी शाखा से था. उसके चार पुत्र थे.  प्रतिनिधिमंडल ने राजा के पुत्रों में से किसी एक को काँचीपुरम की गद्दी संभालने के लिए आमंत्रित किया. चारों पुत्रों में से तीन ने तो इनकार कर दिया परन्तु चौथे पुत्र पल्लवमल्ल परमेश्वर (जो नंदिवर्मन के नाम से जाना जाता है) ने सहमति दे दी और प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आ पहुँचा था.

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Vaikunta Perumal Temple

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मन्दिर परिसर में प्रवेश के लिए एक द्वार युक्त सीधा सपाट मंडप है. एक और मंडप अन्दर है जिसके आगे मुखय मन्दिर.  अन्दर आप पायेंगे कि चारों तरफ़ पल्लवों के विशिष्ट शैली में बने खम्बों पर टिका गलियारा है.  दीवारों पर सैकड़ों आकृतियाँ द्रिश्टिगोचर होती हैं. ये सब के सब पत्थर के नहीं लगते.  इनमें से कई स्टुक्को (गचकारी से सज्जित) कारिगरि लगती हैं और इसलिए इनका अत्यधिक क्षरण हुआ है.  पल्लवों और चालुक्यो के बीच हुवे युद्धों को दर्शाया गया है और नंदिवर्मन के राज्याभिषेक आदि का भी चित्रण है. अधिक पढ़ें लिखे लोग दीवारों में भागवत तथा वैष्णव धर्म  के गूढ़ भावों को पाते हैं. गर्भ गृह के चारों तरफ़ परिक्रमा पथ है. गर्भ गृह के तीन तल हैं भूतल में बैठे हुए विष्णु की प्रतिमा है. तमिलनाडु पुरातत्व विभाग के  भूतपूर्व निदेशक श्री आर. नागस्वामी के मतानुसार यह मूर्ति वास्तव में श्री राम जी की है क्योंकि गर्भ गृह के प्रवेश द्वार के बाईं तरफ़ के खम्बे में बाली और सुग्रीव को युद्ध करते दर्शाया गया है.  प्रथम तल पर मूर्ति शयन मुद्रा में है और दूसरे तल में खड़ी  प्रतिमा है. प्रथम तल में लेटी हुई प्रतिमा के दर्शन केवल एकादशी के दिन ही सुलभ होती है.  दूसरा तल तो पहुँच के बाहर ही रखा गया है. ऊपर जाने और उतरने के लिए अगल बगल दो सीढ़ियाँ बनी है जो बाहर से दिखाई नहीं देतीं.  वैष्णव पंथियों के लिए यह मन्दिर बहुत ही महत्व रखता है क्योंकि यह भी 108 दिव्य स्थलों में एक है. हालाँकि यह मन्दिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है परन्तु यहाँ नियमित पूजा अर्चना होती है तथा गर्भगृह पंडितों के कब्जे में है.

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इस मन्दिर के साथ एक और अजीबो गरीब बात जुड़ी है. मन्दिर के बगल में एक मस्जिद दिखाई देगी जिसे नवाब सदातुल्लाह (मुहम्मद सय्यद) (1710 – 1732) ने बनवाया था.  मन्दिर के तालाब का ही इस्तेमाल मस्जिद वाले भी करते थे.  इस तरह भाइ चारे की एक मिसाल कायम की गयी थी परन्तु दुर्भाग्य से तालाब सूखा पड़ा है. 

इस मन्दिर के गूढ़ रहस्यों को जानना हो तो यह किताब बड़े काम  की होगी:
Dennis Hudson : The Body of God: An Emperor’s Palace for Krishna in Eighth-Century Kanchipuram , Oxford University Press, 2008