मांगाडु के मन्दिर

एक दिन सुबह नहा धोकर घर के बैठक में पहुँचा तो पाया कि वहाँ तीन चार महिलाएं आई हुई थीं. सभी उच्चाधिकारियों की पत्नियां.  बहू का उनके साथ किसी मन्दिर दर्शन का कार्यक्रम था. मुझे देखते ही कहने लगीं ,  हम आप का ही इंतज़ार कर रहे हैं.  वे चाहते थे कि मैं भी उनके साथ चलूँ.  मैंने प्रत्युत्तर में पूछा कि इतने लोग एक गाड़ी में कैसे समायेंगे तब मुझे बताया गया कि गाड़ी लंबी है और काफी जगह है. वास्तव में मैं तो टालना चाह रहा था पर जब पता चला कि माँगाडु  में देवी का बहुत पुराना मन्दिर है और नजदीक ही है तो मेरा मन भी जाने के लिए उद्यत हो चला.

चेन्नई से लगभग 20 किलोमीटर दूर् ही “माँगाडु” नामका कस्बा है.  आम्रवन को मांगाडु कहते हैं.   स्थल पुराण के अनुसार शिवजी ने ही एक बार रोष में आकर पार्वती जी को तपस्या करने हेतु प्रिथ्वीलोक जाने के आदेश दिए थे. फलस्वरूप पार्वती जी (यहाँ कामाक्षी) ने पाँच अग्नि कुंडों के बीच इसी वन में एक पाद पर खड़ी हो तपस्या की थी (हट योग का एक रूप)  ताकि उनके क्रोध का शमन हो परंतु शिव जी ने उन्हें काँचीपुरम जाने का निर्देश भिजवा दिया था.  तपस्यारत पार्वती जी शिव जी के संदेश को पाकर काँचीपुरम के लिए तत्काल प्रस्थान कर गयीं लेकिन उस क्षेत्र में प्रज्वलित की गयी अग्नि बनी रही.  असहनीय गर्मी से पूरा इलाका त्रस्त था. शंकराचार्य जी ने वहाँ अर्धमेरु चक्र की स्थापना की और अग्नि को शांत किया.

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srikamakshiammanएक घंटे के अन्दर ही हम लोग माँगाडु  पहुँच गए.  खाली जगह देख् कर गाड़ी पार्क कर ली और एक गली के अन्दर से मन्दिर की ओर बढ़ गए.  यहाँ भी प्रवेश के लिए गोपुरम बना हुआ है.  कोई ख़ास भीड़ भाड भी नहीं थी.  इस मन्दिर में मन्नत माँगने वाले भांति भांति के उपक्रम करते हैं.  लेट कर मन्दिर की परिक्रमा करना, चूड़ियाँ तथा राखियाँ लटका देना, छोटे छोटे पालने लटकाना, घी के दिए जलाना और सबसे जो विचित्र लगी वह् है ताले जड़ देना.  इन सबकी व्यवस्था भी बनी हुई है. कोई भी श्रद्धालु  ताला खोलते नहीं दिखा!  अन्दर गर्भगृह में मुख्यतः पूजा आराधना उस पीठासीन अर्धमेरु चक्र की होती है. यह जड़ी बूटियों से बना है अतः उसका  अभिषेक नहीं होता.  उस पीठिका के पीछे कांची पीठ के शंकराचार्य द्वारा पंच धातु से बनी देवी की एक मूर्ति स्थापित की गयी है. बाहर ही एक टाँग पर खड़ी, उठे हुए हाथ में जप माला लिए, देवी की मूर्ति भी रखी है लेकिन इसकी कोई विधिवत पूजा नहीं होती.  यहाँ मन्नत माँगने की एक और तांत्रिक प्रथा है. एक बड़ी संख्या उन श्रद्धालुओं की भी है जो दूर् दूर् से नियमित रुप से प्रति सप्ताह देवी के दर्शन के लिए जाते हैं.  पह्ली बार जाते समय 2 नीम्बुओं को ले जाना होता है. मन्दिर का पुजारी एक नींबू वापस लाकर देता है.  इस नींबू को घर पर पूजागृह  में एक सप्ताह रखना होता हे.  दूसरे हप्ते फिर 2 नए नींबू और एक पुरानीवाली को ले जाना पड़ता है. पुनः एक नींबू वापस मिलती है. इस प्रकार 6  हप्ते का नींबू व्रत होता है और 7 वें सप्ताह पूजा के बाद  मन्दिर में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को खीर और मीठा दूध वितरित किया जाता है.  कहना न होगा कि यह एक महत्वपूर्ण शक्तिस्थल है.

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है तो यह मन्दिर काफी पुराना परन्तु हाल के वर्षों में किए गए नव निर्माण से आधुनिक लगने लगा है. मन्दिर की बाईं तरफ एक बड़ा सा साफ़ सुथरा  हाल है जिसके अंत में एक मंच पर उत्सव मूर्ति विराजमान है. एक गणेश जी का भी छोटा मन्दिर है. इसके अतिरिक्त  पुराने शिल्प अल्प ही हैं  एक दीवार पर बड़ा सा घंटा लटका हुआ दिखा जिसे बजाने के लिए रस्सी बँधी हुई है, कुछ कुछ चर्च जैसा.

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इस मन्दिर के पीछे ही एक शिव का प्राचीन मन्दिर भी है जिसे “वेल्लीश्वर” के नाम से जाना जाता है.  हिंदी में रूपांतर किया जाए तो यह शुक्रेश्वर कह्लायेगा.  शुक्राचार्य को यहाँ शिव जी ने दर्शन दिए थे. मन्दिर ज्यादा विशाल नहीं है परन्तु स्थापत्य  के दृष्टिकोण से ज्यादा सुंदर और समृद्ध है. यह मन्दिर चोल शासनकाल का ही लगता है परन्तु गर्भगृह के सामने के मूल निर्माण में कुछ परिवर्तन उत्तरवर्ती काल में हुआ प्रतीत होता है.  निश्चित ही यह यहाँ का प्राचीनतम मन्दिर रहा होगा. मन्दिर में प्रवेश गोपुरम के बदले एक बग़ैर कमानी के (आयताकार) सिंह द्वार से होता है. फिर एक कमानीदार पेंडाल से गुजरते हैं. यहाँ सबसे पहले एक बलि पीठिका बनी है जो अभी कुछ वर्षों के अन्दर का निर्माण है.  इसके आगे नंदी जी अपने मंडप में विराजमान हैं परन्तु अपने स्वामी को देख् पाने में असमर्थ. य्ह स्थिति इस लिए बनी क्योंकि गर्भगृह के सामने जो मंडप होता है उसे ही विस्तार देकर सामने से बंद कर दिया गया.  इस प्रकार बने कक्ष में देवी दुर्गा को स्थापित कर दिया गया.  इस कारण गर्भगृह में प्रवेश के लिए उसके बाजू से जाना पड़ता है.

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Dakshinamurthi

गर्भगृह के अगल बगल गणेश और कर्तिकेय की प्रतिमा बनी है. अन्दर विशाल शिव लिंग है जिसका आधार चौकोर है.  मन्दिर के पीछे वीरभद्र तथा परिसर के उत्तर पश्चिम में कर्तिकेय के लिए छोटे मन्दिर बने हैं.  गर्भगृह के बाहरी दीवार में दक्षिण की तरफ़ दक्षिणामूर्ति अपने बाएं पैर को दाहिनी जंघा पर रखे हुए बैठे हैं. उनके चार हाथ हैं. ऊपर दायें हाथ में सर्प,  बाएं में ज्योति (मशाल), नीचे के बाएं हाथ में एक ग्रन्थ (ताड़ के पत्ते) तथा नीचे का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में प्रदर्शित है.  दक्षिणामूर्ति के रुप  में स्व्यं शिव ही हैं जिन्हें एक गुरु के रुप में  देखा जाता है जो असीमित ज्ञान के भण्डार माने जाते हैं . दक्षिण में ऐसी मूर्तियाँ सामन्य हैं.

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गर्भगृह के ठीक पीछे की दीवार पर “लिंगोध्भव” का शिल्पांकन है.  शिवलिंग को ही तराश कर अन्दर शिवजी प्रदर्शित हैं और दायें  बाएं क्रमश: ब्रह्मा और विष्णु को नमन करते हुए दर्शाया गया है. जहाँ शिव लिंग के ऊपरी भाग में ब्रह्मा जी अपने वाहन हंस के साथ लिंग की ऊँचाई का पता चला रहे हैं तो नीचे विष्णु जी वराह बन कर जमीन के अन्दर की गहराई का जायजा ले रहे हैं.

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विदित हो कि इस मन्दिर में कामाक्षी (पार्वती) की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है परन्तु अंबिका (पार्वती) के पद चिन्ह एक पद्म रुपी शिला पर बने हैं. यह पहले कभी शिव लिंग के सामने हुआ करती थी परन्तु अब नंदी के सामने नीचे रखा गया है.

मन्दिर के चारों तरफ़ अच्छी हरियाली है और लोगों का आना जाना भी कम ही है. इस कारण वातावरण सुकून भरा है.

19 Responses to “मांगाडु के मन्दिर”

  1. अली सैयद Says:

    हमेशा की तरह सुकून भरी पोस्ट !

    आपने उन भद्र महिलाओं का कोई उल्लेख इस प्रविष्टि में नहीं किया , जिनके आग्रह पर आप वहां गये थे ! पूजा वहां होती नहीं सो उन्होंने की भी नहीं होगी पर …ताले / राखी / पालने , में से क्या ? क्यों ? किसने ? कैसे प्रयुक्त हुए ? मेरा मतलब आपके संरक्षण में मन्नतों का हाल पता ना चला !

  2. ताऊ रामपुरिया Says:

    अत्यंत सुंदर जानकारी, इतने भव्य मंदिर और परंपराओं की जानकारी के लिये आभार.

    रामराम.

  3. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @ अली: वे भद्र महिलायें तो इन्सिडेण्टल थीं उन पर प्रविष्ठि थोड़े ही थी 🙂 पूजा तो होती है. गर्भगृह के अन्दर भी देवी है परन्तू वह बैठी है या खडी पता नहीं चलता और उसके सामने ही एक उठा हुआ पीठ (मेरु). मेरी अभिव्याक्ति शायद सही नहीं थी. एक पैर पर खडी प्रतिमा गर्भगृह के बाहर है और पूजा अन्दर होती है. बाकी ताले, राखी, पालने आदि भक्तों का कमाल है. अपने दिल को सुकून देने के लिए किया जाने वाला उपक्रम. इन सब से कुछ होता जाता हो ऐसा मैं नहीं मानता.

  4. arvind mishra Says:

    मेरी तो दृष्टि अर्जुन की थी इसलिए मैंने पुराकथाओं , मूर्ति -मंदिर स्थापत्य पर ही ध्यान केन्द्रित रखा -आनंद आया !

  5. सतीश सक्सेना Says:

    बेहद सुंदर देवस्थल..

    आपके होते, हमें साऊथ के सारे मंदिरों का भ्रमण हो जाएगा :)..
    आभार आपका

  6. Vivek Rastogi Says:

    मंदिर की स्थापत्य कला कमाल की है ।

  7. प्रवीण पाण्डेय Says:

    शक्ति के मूर्त स्थल..सुन्दर स्थापत्य..

  8. Gagan Sharma Says:

    आपके सौजन्य से ऐसी-ऐसी जगहों के दर्शन हो गये जहां चाहते हुए भी शायद ही कभी जाना हो पाए।

  9. राहुल सिंह Says:

    जितने ताले, उतना पेंन्डिंग, जितना पेंन्डिंग, उतनी कदर.

  10. madansbarc Says:

    बहुत सुन्दर.सच कहा

  11. Kajal Kumar Says:

    नि‍:संदेह भव्‍य

  12. sanjaybengani Says:

    एक और मन्दीर के दर्शन हो गए. 🙂

  13. Prabhat Kumar Singh Says:

    Sir, sthala purana mujhe digbhramit kar raha hi. kripa kar margdarshan den.

  14. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @श्री प्रभात कुमार जी:
    दक्षिण के हर एक पुराने मंदिर के साथ कोई न कोई किंवदंती जुडी होती है और मंदिरों के संचालकों द्वारा अपने मंदिर के गुण गान लिए छोटी पुस्तिका प्रकाशित की जाती है जिसमे मंदिर (स्थल) के अस्तित्व में आने के बारे में किस्से कहानियाँ लिखी रह्ती हैं. इन्हीं किंवदंतियों को स्थल पुराण कहा गया है पुराण का यहाँ आशय हिन्दू धर्म ग्रंथों से नहीं है.

  15. ramakant singh Says:

    भव्य मंदिर और परंपराओं की जानकारी के लिये आभार.

  16. विष्णु बैरागी Says:

    वाह! रोचक, विस्‍तृत जानकारी और सुन्‍दर, नयनाभिराम चित्र। अब तो आपकी ऐसी पोस्‍टों में आपकी शकल नजर आने लगती है।

  17. vishal Says:

    rochak jankari ke liye sadhuwaad!! kafee sukun milata hai aisee jankari padhakar.

  18. Asha Joglekar Says:

    सुंदर और रोचक यात्रा वृतांत चित्र भी सुंदर और जानकारी भी ।

  19. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    अच्‍छा वर्णन है.

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