Archive for जुलाई, 2013

तिरुवन्नामलई

जुलाई 28, 2013

187  किलोमीटर चलकर चेन्नई से तिरुवन्नामलई पहुँच गए.  सुबह 9.30 बजे हम उस होटल के सामने थे जहाँ भाई साहब को एक बैठक में भाग लेना था. वहीँ हम सब के नाश्ते का भी इंतज़ाम था. एक कमरा भी उपलब्ध था जहाँ फ्रेश हुआ जा सकता था. हमारे साथ आये एक रिश्तेदार दम्पति के लिए वह सुविधाजनक रहा.    नाश्ते के बाद भाई को वहीँ छोड हम लोग यहाँ के अन्नामलैयार  (शिव) मंदिर  हेतु निकल पडे. यहाँ के शिव जी को अरुणाचलेश्वर भी कहते हैं.   यहाँ अन्नामलै के आगे “यार” एक आदर सूचक प्रयोग है.  इस मंदिर के प्रति  लोगों में  जबरदस्त विश्वास पाया जाता है और यहाँ के अन्नामलै पहाड़ और उसके चारों  तरफ का पूरा इलाका ही परम सिद्ध क्षेत्र के रूप में विख्यात है.  इस पवित्र  पहाड़ की  भी यहाँ शिव लिंग स्वरुप मान्यता है.  यह वही जगह है जहाँ कुत्तों को भी सिद्धि मिलने की कल्पना हमने कभी की थी.  जैसा मैंने अपने एक पोस्ट में बताया था, पञ्च तत्वों में से अलग अलग तत्व पर केन्द्रित शिव के पांच स्थल हैं जिन्हें पञ्च भूत स्थल के नाम से जाना जाता है.  अन्नामलै में  शिव, अग्नि (तपिश) स्वरुप हैं.

Annamalaiyar Temple

एक बार अपनी  आदत के अनुसार पर्वती जी ने खेल खेल में शिव जी की आँखों को कुछ क्षणों के लिए बंद कर दिया था.  परिणामस्वरूप  पूरा भ्रह्मांड अंधकारमय हो गया. पर्वती जी को तपस्या करनी पडी (न जाने ऐसे कितने बार किया होगा!) तब जाकर शिव जी अन्नामलै के पहाड़  पर एक अग्नि स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए जिससे जगत में रोशनी लौट आई.  इसके पश्चात शिव और पार्वती जी एकीकृत होकर अर्ध नारीश्वर के रूप में प्रकट हुए.

एक ही कहानी का बारम्बार  कई स्थलों के लिए प्रयुक्त किया जाना कुछ अटपटा सा लगने लगा है इस लिए एक दूसरी कहानी का सहारा लेते हैं.  श्रेष्टता को लेकर एक बार ब्रह्मा, विष्णु और शिव के बीच विवाद उठ खडा हुआ.  शिव जी अन्नामलै पहाड की चोटी पर एक अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए.  ब्रह्मा और विष्णु को उस स्तंभ की ऊंचाई और गहराई मापने का दाइत्व बना.  ब्रह्मा ऊपर की तरफ गए और   विष्णु वराह रूप में जमीन खोदते हुए नीचे की ओर  रवाना हुए.  विष्णु जी के भरसक प्रयास करने पर भी उस अग्नि स्तंभ की गहराई ज्ञात नहीं कर पाए और नतमस्तक हो गए परन्तु ब्रह्माजी झूट बोलकर शिव जी के कोपभाजक बने. लिंगोद्भव का यही दृष्टांत भी है.

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इस मंदिर के कुछ भागों में चोल राजाओं के 9  वीं  सदी के उत्कीर्ण लेख प्राप्त हुए हैं. उन्होंने  उस इलाके पर 400 वर्षों तक शासन किया था. परन्तु मंदिर का अस्तित्व संभवतः उससे भी पूर्व का है क्योंकि प्रसिद्द शैव भक्त सम्बन्दर एवं अप्पर ने 7 वीं सदी में यहाँ आराधना की थी और अपने काव्य संग्रह में गुणगान भी किया है. पल्लवों के अन्यत्र प्राप्त होने वाले शिलालेखों में भी तिरुवन्नामलई का उल्लेख मिलता है. मंदिर को भव्यता प्रदान करने में होयशाला एवं विजयनगर राजवंशों का भी बहुत बडा हाथ रहा है.

IMG_4110मंदिर का रास्ता बाज़ार से होकर गुजरता है. जैसा हर जगह होता है यहाँ भी मंदिर के सामने कतार से कई दूकाने हैं जहाँ पूजा सामग्री उपलब्ध होती है. पूरब की तरफ खुले (मुख्य) राजगोपुरम से होते हुए हम लोगों ने एक बड़े  अहाते में प्रवेश किया. अन्दर घुसते ही मंदिर की भव्यता का अनुमान होने लगा. अभी तो मंजिल दूर थी परंतु पश्चिम दिशा से आती तेज हवाओं के झोंकों से पैर लडखडाने लगे थे. मुश्किल से एक दूसरे  गोपुरम को भी पार किया तो जाना कि तीसरा भी है. उसके बाद ही मंदिर का मूल निर्माण प्रकट हुआ. बायीं तरफ से अन्दर जाने के पूर्व एक अति विशाल गणेश जी को नमन कर आगे बढ़े. भक्तों की भीड़ तो लगी थी परन्तु रेलमपेल वाली स्थिति नहीं थी. मंडप के आगे गर्भगृह था और उसी के अन्दर एक अर्धमंडप  भी. क्योंकि हम लोग कुछ विशिष्ठ श्रेणी के भ्रष्टाचारी थे इस लिए अर्धमंडप  में बैठकर शिव जी के सानिध्य में कुछ देर रह पाने का योग बना.    हम ऐसे विशिष्ट देव के समक्ष पहुँच कर आत्मविभोर हो रहे थे. गर्भगृह में विष्णु और सूर्य देव   की  उपस्थिति का उल्लेख देखा था परन्तु हमने तो अपनी  दृष्टि वहां के उस परमेश्वर पर ही केन्द्रित कर रखी थी.   अन्दर का तापमान अत्यधिक होते हुए भी एक सुखद अनुभूति हो रही थी.  प्रार्थना कर सब लोग कुछ मांगते हैं परन्तू हमारी तो शिव जी ने मति भ्रष्ट कर दी थी. थोडी देर बाद बिन कुछ मांगे बेरंग बाहर निकल आये. बगल में ही पर्वती जी का मंदिर है. जिन्हें यहाँ उन्नामलई कहा जाता है.  यहाँ भी पहले गणेश जी को नमन कर ही प्रवेश करना होता है.  एक ना समझ पाने वाली बात यह थी कि यहाँ गणपति और पर्वती दोनों के समक्ष नन्दी की ही प्रतिमा बनी है.

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दर्शनों के पश्चात हम लोग मंदिर के अहातों में चक्कर काट आये. केमरे का प्रयोग वर्जित था लेकिन नजर बचाकर कुछ चित्र तो ले ही लिए. लोगों में ऐसा विश्वास है कि इस नगर में सिद्धों का भी वास है  और इस जानकारी का असर यह पड़ा कि जब भी कोई भिक्षा मांगते सामने आ जाता उसमें हम किसी सिद्ध की छवि पाने लगे. यहीं  एक जगह पातालेश्वर भी हैं जहाँ रमण महर्षि तपस्या किया करते थे. उस जगह को भी देख बाहर  निकल ही रहे थे कि कुछ ईसाई नन्स को मंदिर परिसर में देख थोडा आश्चर्य हुआ. लगता है वे भी शिव के वशीभूत हो चले हैं. 

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अब बच गया अन्नामलै का पवित्र पहाड़ जिसका चक्कर (यह गिरिवलम कहलाता है)  हर पौर्णमी (पुन्नी) के दिन भक्त लोग समूह बनाकर नंगे पाँव काटते  हैं. एक चक्कर मात्र 14 किलोमीटर का पड़ता है.  हम लोगोंने वाहन  से ही एक चक्कर लगाने का मन बना लिया. अब यह रास्ता डामरीकृत है और अच्छी रोशनी की भी व्यवस्था है.रास्ते में श्मशान और यज्ञं स्थल आदि भी दिखे.  पहाड़ के चारों  तरफ अनेकों  मंदिर  बने हैं और  यात्रियों की सुविधा के लिए बावड़ियाँ भी परन्तू वे जीर्ण शीर्ण हैं. 

तमिलों के कार्तिक माह में (नवम्बर – दिसंबर) इस मंदिर में 10 दिनों का एक उत्सव मनाया जाता है और अंतिम दिन कार्तिक दीपं के नाम से अन्नामलै पहाड की चोटी पर 3 टन  घी का प्रयोग करते हुए विशाल दीप प्रज्वलित किया जाता है. उस समय वहां जो भक्तों की भीड़ उमड़ती है  बहुत ही रोमांचित करती है. क्योंकि तिरुवन्नामलई को एक सिद्ध क्षेत्र माना जाता है इसलिए यहाँ बहुत सारे बाबाओं के आश्रम भी हैं. इनमें उल्लेखनीय रमण महर्षि और योगी रामसूरत कुमार जी का है.

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तमिल जैनों की एक विरासत–तिरुमलई

जुलाई 21, 2013

मेरे भाई को चेन्नई से 187 किलोमीटर दूर  तिरुवन्नामलई  जाना था, एक बैठक में भाग लेने. उसने मेरे समक्ष साथ चले चलने का प्रस्ताव रखा.  मैं भी कई महीनों से बाहर नहीं जा पाया था सो इस कठिन शर्त के बावजूद कि  सुबह साढे पांच बजे निकलना होगा, हमने अपनी  स्वीकृति  दे दी. इस बीच हमने विकिपीडिया से कुछ जानकारियाँ एकत्र कर लीं. संयोग से यह भी मालूम पड़ा कि तिरुमलई नामक कोई एक जगह वहीँ कहीं नजदीक ही है जहाँ जैनियों के प्राचीन गुफा मंदिर हैं.  हमने भाई को अपनी  भी शर्त रख दी कि  तिरुमलई के जैन मंदिरों को देखने चलना होगा.  दुसरे दिन सुबह तडके हम उठ बैठे और तैय्यार  भी हो लिए. पांच बजे के पहले ही मुझे तैय्यार देख भाई को आश्चर्य हुआ क्योंकि वह खुद देर से उठा  था. दाद देते हुए यह भी बताया कि घर पर मेहमान बन कर ठैरे एक दंपति भी साथ चलेगी.  खैर इसमें कोई परेशानी तो नहीं थी परन्तु परिणाम स्वरुप हम लोगों की रवानगी 6 बजे ही हो पाई.

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तिरुवन्नामलई के मंदिर आदि के दर्शन कर तीन बजे वापसी यात्रा प्रारंभ हुई इस बीच  तिरुमलई के जैन मंदिरों के बारे में रास्ते आदि की जानकारी स्थानीय लोगों से ले ली. पता चला कि वह रास्ते में ही पड़ेगा.  15/20  किलोमीटर चलने पर सड़क के बायीं तरफ एक रास्ता जा रहा था और एक पट्टिका पर दिगंबर जैन मंदिर ३ किलोमीटर दूर होने की सूचना थी. बडे धर्म संकट की स्थिति थी. आस पास कोई पहाड़ या टीला भी नहीं था. यह सोच कर कि देख आने में हर्ज क्या है, उस रास्ते बढ गए. एक गाँव आया नाम था “कापलूर” और जैन मंदिर भी दिखा जो आधुनिक था. दरवाजे पर तो ताला  पडा था लेकिन मालूम हुआ कि वहां 10 जैन परिवार हैं जो खेती किसानी करते हैं.

Kapalur Jain Temple

सतही तौर  पर देख कर आगे बढ गए. हमारे ड्राइवर ने अपने किसी मित्र से जानकारी मोबाइल पर प्राप्त करी और आगे बढ़ते चले गए.  आसमान पर बादल छा  गए थे.  “पोलूर” (जिसके पास मंदिर होने की सूचना थी) भी निकल गया और हमने जैन मंदिर दर्शन से वंचित हो जाने की कल्पना कर अपने आप को समझा भी लिया था.  ड्राइवर मुख्य मार्ग को छोड सकरे ग्रामीण मार्गों में चल रहा था और अचानक एक जगह “तिरुमलई”  के लिए दिशा निर्देश दिखे.  हम सब प्रसन्न हुए. लगता है हमलोग 40 किलोमीटर का सफ़र तय कर चुके थे.  देर आये दुरुस्त आये.

तमिल विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से भले एक हो परन्तु प्रारंभिक लेखन के लिए मौलिक रूप से ब्राह्मी लिपि का ही प्रयोग हुआ था जैसा कि अनेकों प्राचीन शिलालेखों से ज्ञात होता है. सुविधा के लिए यहाँ दृष्टिगोचर होने वाले उस प्राचीन लिपि को तमिल ब्राह्मी कहा गया है.  जैन धर्म का आगमन ईसापूर्व ही हो चुका  था और प्रतीत होता है कि जैन मुनियों के द्वारा  ही उत्तर पूर्व से अपने साथ अपनी  लिपि भी लाई गई. तमिलनाडु के प्राचीन समृद्ध साहित्य में जैन मुनियों का  योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है.  विश्व प्रसिद्द  “शिल्पधिकारम” के रचयिता “इलांगो अडिगल”  एक जैन भिक्षु थे.  शिल्पधिकारम प्रबुद्ध लोगों में जाना पहचाना नाम है इसलिए इस का नाम ले लिया. वैसे कई अन्य रचनाएं भी हैं

७ वीं/८ वीं सदी तक जैन धर्म को इस क्षेत्र में राजाश्रय प्राप्त हुआ और वे फलते फूलते रहे लेकिन बाद की घटनाओं जैसे शैव भक्ति आन्दोलन,  शंकराचार्य के प्रभाव आदि का जैन धर्म पर प्रतिकूल प्रभाव पडा और जैन धर्म के प्रति लोगों का मोह भंग होने लगा. इतिहास साक्षी है कि राजा के धार्मिक आसक्ति का प्रभाव प्रजा पर पड़ता ही है.  शनै शनै जैन धर्म दक्षिण में तो लुप्त प्रायः हो गया. उनकी धार्मिक विरासत अनेकों  गिरि  कंदराओं में दुबकी पडी है.

Local Jains at Thirumalai Math

लुंगीधारी स्थानीय जैनी – मठ के सामने 

Thirumalai temple Gopuram

Thirumalai Lower temple

Thirumalai - Side view of lower temple

Thirumalai - Mahaveer

उन्हीं में से एक है तिरुमलई  अतिशय क्षेत्र (अनुवाद = श्रीगिरि)   जिसके बहुत करीब पहुँच चुके थे. रास्ते में पहले एक जैन न्यास के द्वारा संचालित शाला  भवन दिखा और कुछ ही आगे बाएं अरहंतगिरि मंदिर और  “मठ” जो आधुनिक हैं . उसी रस्ते आगे गाँव है जिसकी  गलियों से गुजरते उस पवित्र पहाडी के तलहटी में पहुंचे. वहीँ दक्षिण भारतीय शैली में बना प्रवेश द्वार दिखा और अन्दर पहला मंदिर.  इस मंदिर के सामने एक मंडप है फिर गर्भगृह.  गर्भगृह तीन खण्डों में है. पहले कक्ष में कुछ भी नहीं है. गर्भगृह के बाहर के कक्ष के बायीं तरफ एक तीर्थंकर की काले पत्थर से बनी मूर्ति रखी थी और अन्दर संभवतः गौर वर्ण के महावीर  जी (वर्धमान)  विराजे थे. मूर्ति के पीछे की दीवार में भित्ति चित्र बने थे जिनका क्षरण   हो चला है.  मंदिर उजाड सा है और रख रखाव के आभाव में क्षति ग्रस्त हुआ जा रहा है.  इस मंदिर के  अलंकरण विहीन  मंडप  से ऐसा लगता है मानो  संन्यास ले रखा हो.  मंदिर का निर्माण विजयनगर काल का समझा जाता है.

Thirumalai upper temple

Upper_Temple_Complex_Wiki

Thirumalai Inscription of Kundavai

इस मंदिर के दाहिनी तरफ से ऊपर पत्थर को तराश कर बना मार्ग है जो ऊपर एक समतल भूमि पर ले जाता है . यहाँ एक और मंदिर है यह मंदिर नेमिनाथ  की होनी चाहिए क्योंकि राजा राजा चोल की बडी बहन “कुण्डवाइ”  के 10 वीं सदी के, यहीं जमीन में धंसे, एक शिलालेख में उसके द्वारा  एक मंदिर के निर्माण का उल्लेख है.  यही कारण है कि यहाँ के  मंदिर को स्थानीय लोग  कुण्डवाइ जीनालायम कहते हैं.  इस मंदिर का मण्डप कुछ बड़ा  सा है परन्तु शिखर गायब हो चुकी है. गर्भगृह बंद था और पुजारी के लिए बुलावा भेजा  गया परन्तु नहीं मिल सका. मंदिर के सामने कतार से एक मनस्थम्भ और फिर एक बलिपीठ बना है.  बलिपीठ अधिक पुराना जान पड़ता है. साधारणतया बलिपीठ यहाँ के हिन्दू मंदिरों में ही पाया जाता है.

Thirumalai cave temple

Thirumalai - Ambika?

IMG_4157 Kundavai Jeenalayam

IMG_4154 Bahubali (Gomateshwara)

दाहिनी तरफ भीमकाय  चट्टानें हैं  भूतल पर चट्टानों में ही कुछ छोटे कक्ष बने हैं जिनमें मूर्तियाँ रखी है. उनमें कुछ खाली भी पडे  हैं. पहाडी का ऊपरी चट्टान आगे की तरफ निकला हुआ है और बीच वाले हिस्से का प्रयोग करते हुए तीन स्तरों  पर निर्माण हुआ है. ऊपर चढ़ने के लिए पत्थर की सीढ़ी है. ऊपर बड़ा सकरीला  है और यहाँ भी मूर्तियाँ हैं. कुछ कक्षों में मैंने पाया कि एक डेढ़ फीट ऊंची पीठिका तो दिख रही है परन्तु कोई मूर्ति नहीं है. गुफा की दीवार पर मूर्ती के अंशों का होना पाया गया और जब हमने ए एस आई के कर्मी से पूछा  तो उसने बताया, साबजी मूर्ती  गल गई. यह जरूर है कि ऊपर की छत में पानी के कण दिखाई दे रहे थे. तो क्या मूर्ति पत्थर की नहीं बनी थी. इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ मूर्तियों का, जो दिखने में सफ़ेद थीं, निर्माण स्टुको (गचकारी) तकनीक से किया गया रहा होगा.परन्तु उसके लिए बेस या आधार तो चाहिए होता है.

सबसे ऊपर छत और दीवारों पर बहुत ही खूबसूरत भित्ति चित्र बने हैं. नमी के कारण उनका भी क्षरण हो गया है. वैसे भित्ति चित्र नीचे के कक्षों में भी हैं परन्तु अन्दर घुसना और फोटो लेना बेहद कष्टदायक है.

Thirumalai Frescoes

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Thirumalai Fresco

हम लोग  अपनी  खोपड़ी बचाते हुए सकुशल नीचे आ गए हमें बताया गया कि पहाडी के शीर्ष तक जाने के लिए रेलिंग युक्त सीढ़ी कुछ दूरी पर बायीं ओर बनी है.  तीन चौथाई ऊपर एक छोटा सा मैदान जैसा है. यहीं पर नेमिनाथ (श्री कृष्ण के चचेरे भाई)  जी की 16 फीट ऊंची खडी मूर्ति एक शिखर युक्त कक्ष में रखी है. पूरी प्रतिमा का फोटो ले पाना कठिन है क्योंकि वह सलाखों के पीछे है.  यहाँ से और ऊपर जाएँ तो पार्श्वनाथ जी का एक छोटा मंदिर बना है. यहीं भावनगर के एक गुजराती परिवार से भेंट हो गई. पूछने पर उन्होंने बताया कि इस जगह का उल्लेख उनकी ग्रंथों  में है और वे यात्रा पर आये हैं. सबसे ऊपर की चट्टानों में तराशे गए तीन पद चिन्ह भी मिले जो उन जैन मुनियों के हैं जिन्होंने सल्लेखन द्वारा अपने प्राण त्यागे थे. वे  अभिलिखित हैं परन्तु वह लिपि पल्ले नहीं पडी.

IMG_4181                                                                                                                           आ रहे हैं भैय्या थोड़ा  सुस्ता तो  लेने दो 

Thirumalai Neminath

चट्टानों के पीछे है नेमिनाथ जी का शिखर युक्त कक्ष 

IMG_4186 (Gujrati family from Bhavnagar)

Thirumalai Foot prints of Monks

Overview

मंदिर का एक विहंगम दृश्य – पुरानी तस्वीर 

आधे घंटे वहां तेज ठंडी हवाओं का आनंद लेकर लौटना हुआ.  जैनियों के ऐसे प्राचीन  गुफा मंदिर सित्तनवासल, समनमलई आदि जगहों में भी हैं.