छेद वाला दुकान

कुछ आवासीय परिसरों में ठेले में घरेलू आवश्यकताओं की वस्तुयें विक्रय हेतु आती रहती हैं. बहुत सारी गृहणियां अपने दैनिक उपयोग हेतु सब्जी भाजी आदि खरीदती ही हैं भले दाम कुछ अधिक हो. बाज़ार जाने से तो बचे. कुछ परिसर ऐसे भी हैं जहाँ ठेले वालों को छुट्टी के दिन भी फटकने नहीं दिया जाता.  कुछ ऐसे ही एक परिसर में जो दिखा उसे साझा करने की सोची.

यह परिसर बहुत विशाल है. कुल  760  मकान बने हैं . एक छोर से दूस्र्रे छोर की दूरी लगभग 2 किलोमीटर है.  एक छोटी सी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है जहाँ एक डॉक्टर की क्लिनिक, एक जनरल   स्टोर आदि हुआ करती थी . जनरल स्टोर वाला सब्जी आदि भी रखा करता था परन्तु अनाप शनाप दर पर विक्रय करता था.  शनै शनै लोगों ने उसके यहाँ से माल खरीदना बंद कर दिया और दुकान बंद हो गयी.  सहकारी समिति का दुग्ध वितरण केन्द्र की गुमटी अभी अभी खुली है  जहाँ दूध, दही, घी डबल रोटी आदि उचित मूल्य पर उपलब्ध है.  दैनिक उपभोग की दूसरी वस्तुओं के लिए अब बाहर ही जाना होगा जो परिसर के बाहर के मुख्य मार्ग पर उपलब्ध नहीं है. वहां से कमसे कम एक किलोमीटर और जाना पड़ता है.

परिसर के दाहिनी तरफ एक  मध्यम वर्ग की बस्ती है परन्तु पास होते हुए भी बहुत दूर है क्योंकि परिसर के सामने के मुख्य मार्ग से भी कोई रास्ता नहीं बना है. लम्बी दूरी का घुमावदार  रास्ता है. परिसर के रहवासियों के पास या तो अपने स्वयं के कार आदि हैं या फिर सरकारी वाहन उपलब्ध है परन्तु पतियों के साथ वाहन दफ्तर जाया करते हैं. गृहणियों के लिए छुट्टियों के दिन ही वाहन सुख मिल पाता है. परिसर के दाहिनी तरफ के चारदीवारी से लगी हुई वह बस्ती है  परन्तु उसपार जाने में दीवार बाधक है.  उस पार के दूकान और घर भी दीवार से सटकर बने हैं.

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चार दीवारी से सटे हुए उसपार के एक दूकानदार ने एक नायाब तरीका ढून्ढ निकाला.  उसके दूकान के पीछे उसका आवास भी है.  उसके घर के बगल की गलीनुमा बरामदे से परिसर की तरफ एक छेद  बना दिया और इस प्रकार बनी खुली खिड़की में एक घंटी का बटन लटका दिया.  परिसर वासियों को कुछ लेना हो तो बटन दबा देते हैं जिससे दूकान में घंटी बजती है और खिड़की के उसपार एक महिला उपस्थित हो जाती है, बोल मेरे आका की तर्ज पर. इस व्यवस्था में रहवासियों को जो दूकान पे नहीं हो वह भी उपलब्ध होता है. दूकानदार आस पड़ोस की दूसरी दूकानों से खरीद लाता है.  हाँ वह एक दो रुपये अधिक ले लेता है  जिसकी परवाह किसी को नहीं होती.

सामान देते हुए हमने उस महिला की तस्वीर लेनी चाही परन्तु  वह बडी चालाक निकली. केमरा देखते ही नीचे बैठ गयी.

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गर्मियों की छुट्टी में दूकानदार अपने गाँव चला गया और खिड़की बंद हो गई.  कोलोनी के लोग परेशान होने लगे तब एक नई जानकारी मिली कि कोलोनी में काम वाली बाईयां बगल वाली बस्ती से ही आती हैं और वे अक्सर दीवार फांद (चढ) कर आया जाया करती हैं.  अब  कोलोनी की महिलायें ने भी कुछ यही तरीका अपनाया. एक दिन देखा तो दीवार ही टूटी मिली जिसके कारण कोई  भी ऐरा ग़ैरा  अन्दर प्रवेश कर सकता है. गनीमत है कि उस पार किसी सज्जन ने तोड़े गए दीवार से सटाकर लकड़ी जमा दी है जिस के कारण उस छेद  का प्रयोग बाधित हो गया है.  यहाँ का  विकास प्राधिकरण चाहे तो उस जगह एक गेट बना सकता है  जिससे नजदीक के बस्ती से कोलोनी का संपर्क बन जाए.

15 Responses to “छेद वाला दुकान”

  1. प्रवीण पाण्डेय Says:

    समाधान अपना मार्ग ढूढ़ निकालता है, पर समस्या पहले से ही क्यों न समझ कर सुलझा ली जाये।

  2. arvind mishra Says:

    होल इन द वाल आर एल्सेव्हेर सृजन और नवाचार के स्रोत हैं ! किसी महिला का चोरी छिपे फोटो उतारना परेशानी का सबब बन सकता है !]
    छेद वाला दुकान होगा या फिर
    छेद वाली दुकान?

    लगता है आपके मन में विशेषण “छेदवाली दुकानदार” तैर रहा था !

  3. ताऊ रामपुरिया Says:

    सही ही कहा है ” आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है.” यही फ़ार्मुला यहां काम कर रहा है.

    रामराम.

  4. Kajal Kumar Says:

    मेरे ख़्याल से सही तरीका ये है कि‍, दीवार में एक गेट लगाया जाए जि‍सके खुलने और बंद होने का समय नि‍श्‍चि‍त हो और वहां 24 घंटे चौकीदार की व्‍यवस्‍था हो.

  5. sanjay @ mo sam kaun.....? Says:

    ऐसे छेद वाला\वाली दुकान का पहली बार पता हमें ’ड्राई डे’ वाले दिन मिला था।

  6. प्रतिभा सक्सेना Says:

    कोई न कोई तरकीब निकाल ही लेता है इन्सानी दिमाग़!

  7. PN Subramanian Says:

    @ डा. अरविन्द मिश्रा: एक मद्रासी की हिन्दी में वर्तनी की त्रुटियाँ ग्राह्य होनी चाहिए. महिला की तस्वीर तो खैर इस लिए लेने की सोची थी कि उस छेद से दूकानदारी हो रही है ऐसा स्पष्ट हो सके. मैं किसी भी प्रकार के अपराध बोध से ग्रसित नहीं हुआ था.

  8. सतीश सक्सेना Says:

    आप तो जासूस भी निकले..

  9. Bharat Bhushan Says:

    बहुत खूब. मुहल्लों में ऐसी लुका-छिपी रुचिकर होती है.

  10. सुज्ञ Says:

    सुरक्षा अपने साथ दुविधाएं भी पैदा करती है और दुविधाएं कोई कमतर सुविधा मार्ग खोज खोज ही लेती है। अद्भुत प्रेक्षण है आपका…एक मानव व्यवहार पर…

  11. Alpana Says:

    हम भारतीयों को यूँ ही जुगाडू नहीं कहा जाता!
    …ऐसी ही इंडिया में हमारी सोसायटी की दीवार से झांकती एक दुकान है.

  12. shikha varshney Says:

    जुगाड में हमारा कोई सानी नहीं 🙂

  13. आशा जोगळेकर Says:

    आवश्यकता आविष्कार की जननी है तो सुना है अब जुगाढ की भी हो गई ।

  14. राहुल सिंह Says:

    आपने तो पोल ही खोल दी व्‍यवस्‍था की.

  15. Gagan Sharma Says:

    gajab

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