Archive for अगस्त, 2013

गूगल तुझे सलाम – कर्कटेश्वर को ढूंड निकाला

अगस्त 20, 2013

चेन्नई में चार माह बिताने के बाद अपनी माँ को साथ ले गाँव के अपने घर पहुंचा. मेरी एक भतीजी जजकी के लिए गाँव आ गई थी जिस कारण माताराम को भय था कि उसकी  देख रेख में लोगों को असुविधा हो सकती है. इसलिए यहाँ से पलायन कर अपने दूसरे बेटे के साथ रहने चली गई थी. 

भतीजी जो मेरी रुचियों से परिचित थी, ने कुछ तस्वीरें दिखाईं. अपने मियाँ के साथ तंजावूर के आस पास कभी घूमने गई थी और कुछ मंदिरों में भी जाना हुआ था.  दिखाई गई तस्वीरों में से एक हमें अजीब सी लगी.  एक शिव  लिंग दिख रहा था और उसके सामने केकड़े जैसी एक आकृति थी. हमने उससे पूछा कि यह कहाँ की है तो स्पष्ट  कुछ बता सकने में असमर्थ रही. केवल इतनी जानकारी मिली कि कहीं दीवार या खम्बे में बनी  थी. हालाकि तस्वीर कुछ भोंडी सी ही है लेकिन सामने एक चुनौती तो थी ही. हमने घर में सबसे पूछा कि क्या दिख रहा है. किसी को गणेश की सूंड नज़र आ रही थी तो किसी को मकड़ी. मुझे एक केकड़ा दिख रहा था. लेकिन समझ में यह नहीं आ रही थी कि वहां केकड़ा या मकड़ी क्यों बनाई गई होगी. 

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राहुल सिंह जी बार बार याद आ रहे थे. इसके पूर्व कि उन्हें कष्ट दूं, हमने सोचा देखें गूगल बाबा क्या कहते हैं. हमने उनसे पूछा कि क्या मकड़ी ने शिव की पूजा की थी और उत्तर में हमें वह आंध्र  में श्रीकालहस्ति पहुंचा दिया. तब पता चला कि मकड़ी के लिए ही  “श्री” प्रयुक्त हुआ है. अब क्योंकि हमें मालूम था कि भतीजी तो श्रीकालहस्ति गई ही नहीं थी इसलिए दूसरे  विकल्प “केकड़े” का प्रयोग किया. बडी सुखद अनुभूति रही यह जानकार कि तंजावूर के  पास कर्कटेश्वर के नाम से एक शिव मंदिर भी है. साथ लिए गए और कुछ चित्र भी थे जिनसे मिलान करने पर पुष्टि हो गई. कहानी कुछ इस प्रकार है:

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एक बार ऋषि दुर्वासा तपस्यारत थे. उधर से गुजरते हुए एक गन्धर्व ने कोई ऐरागैर समझ कर दुर्वासा के बुढापे का बहुत मजाक उड़ाया परन्तु उन्होंने कोई प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की. दुर्वासा की चुप्पी देख गन्धर्व जोर जोर से ताली बजाने लगा.  अपनी  तपस्या में व्यवधान से त्रस्त होकर दुर्वासा कुपित हुए और उस गन्धर्व को श्राप देकर केकड़ा बना दिया. गन्धर्व को अपनी गलती का जब एहसास हुआ तो दुर्वासा के सामने क्षमा याचना करते हुए  गिडगिडाने लगा. श्राप मुक्ति के लिए दुर्वासा ने केकड़ा बन चुके गन्धर्व को शिव के आराधना की सलाह दी.

कावेरी नदी के उत्तरी किनारे की रेत पर पहले से एक शिव लिंग विद्यमान था. वहीँ असुरों पर विजय प्राप्ति के लिए इंद्र देव शिव की पूजा हेतु फूल इकठ्ठा कर रखता.  केकड़े के रूप में गन्धर्व उन फूलों में से एक उठा लाता और  शिव लिंग पर अर्पित करता. इंद्र के फूलों की संख्या 1008 नहीं हो पाती थी. हर रोज एक फूल कम पड़ जाने के रहस्य का इंद्र को भान हुआ तो गुस्से में आकर केकड़े पर तलवार चला दी. इसके पहले कि केकड़े पर तलवार लग पाती शिव जी ने अपने लिंग में एक छिद्र बना दिया और केकड़े को  छुप जाने के लिए जगह बना दी. तलवार की वार शिव लिंग पर पड़ गई. शिव जी ने प्रकट होकर इंद्र की उद्दंडता  की भर्त्सना की और  विनम्र होने की नसीहत भी दी.

कहते हैं एक बार एक चोल राजा लकवे से ग्रसित हो गया. सभी प्रकार का उपचार प्रभावहीन रहा तब राजा ने शिव की आराधना की.  एक दिन एक वृद्ध  दम्पति उस राजा से मिलने आई और जल में  पवित्र भभूत मिलाकर पीने दिया. वह एक चमत्कार ही था जिससे राजा एकदम ठीक हो गया. राजा ने उस दम्पति को अपने यहाँ राज वैद के रूप में नियुक्त करना चाहा परन्तु  यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ. इसपर राजा ने उन्हें  स्वर्ण, हीरे, जवाहरात आदि देने की कोशिश की और दम्पती ने उन्हें भी ठुकरा दिया. अंततः दम्पति ने राजा से नदी किनारे स्थित शिव लिंग के लिए मंदिर बनाए जाने का आग्रह भर किया. राजाने उन्हें शिव और पर्वती मानते हुए इनकी इच्छानुसार एक मंदिर का निर्माण करवा दिया.

क्योंकि इस जगह केकड़े रुपी गन्धर्व को भगवान् शिव ने मोक्ष प्रदान  किया था इसलिए यहाँ शिव जी “कर्कटेश्वर” कहलाये. ऐसा विश्वास किया जाता है कि यहाँ के  शिव लिंग में बने  छिद्र में ही केकड़ा छुप गया था और इंद्र द्वारा तलवार चलाये जाने से बना निशान भी लिंग पर बना हुआ है. इस मंदिर में गणेश, कार्तिकेय के अतिरिक्त अम्बिका (पार्वती) की  दो मूर्तियाँ हैं. पहले बनी मूर्ति गायब हो गई थी तो दूसरी बनाई  गई, फिर पुरानी भी मिल गई, अतः दोनों की प्रतिष्ठा हो गई थी.

यह मंदिर कावेरी नदी किनारे तंजावूर जिले के वेपतूर के पास है  और सम्बन्दर नामके शिव भक्त (नायनार) ने अपने तेवारम (काव्य संग्रह) में इस मंदिर  का गुणगान  किया हुआ है.  लोगों में ऐसा विश्वास है कि इस मंदिर में जाने से केंसर सहित सभी व्याधियां दूर हो जाती हैं. 

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तीखुर Arrowroot

अगस्त 13, 2013

Arrowroot Plantsघर में तीखुर के पौधे दिखने में ये हल्दी और अदरख से मिलते जुलते हैं

हमारे पुश्तैनी घर पर दिसंबर और जनवरी के बीच  आरद्रा (आरुद्र) नक्षत्र के दिन तिरुवादिरै नामका एक पर्व मनाया जाता है (शैव परंपरा) और उस दिन एक ख़ास पकवान बनता है जिसे  “तिरुवादिरै कली” कहते हैं.“कूवै नामके पौधे की जड़ को पीस पास कर उसके स्टार्च (मंड) में दूध नारियल के बारीक टुकड़े,  काजू, इलाइची, घी शक्कर या गुड मिलाकर हलवा जैसा बनाया जाता है जो बहुत ही स्वादिष्ट भी होता है. क्योंकि यह पकवान मुझे बहुत पसंद था तो पर्व का इंतज़ार किये बगैर जब भी मैं घर पर होता, बनाया जाता था. इसके पौधे तो घर पे ही एक किनारे उगे होते थे और अब भी हैं . घर से वापसी पर एक या  दो किलो कूवै का पाउडर मुझे पकड़ा दिया जाता, यह कह कर कि  गर्मी के दिनों में दूध में एक दो चम्मच मिला कर गरम कर लिया करो और रात में  सेवन करोइसकी तासीर ठंडी है .

तीखुर Arroroot Tubers

बस्तर के बाज़ार हाटों में आदिवासियों के द्वारा डल्ले नुमा एक पीलापन लिए वस्तु बिकने आती थी और उसे वे तीखुर कहते थे. बाद में पता चला कि यही मेरा कूवै  है जिसकी साफ़ सफाई अच्छे  से नहीं की गई होती. यही आरारूट भी है जो वहां की वनोपज है जगदलपुर के व्यापारी गाँव गाँव जाकर बडे सस्ते में खरीदते थे और निर्यात करते थे. आरारूट बनाने के लिए कुछ दूसरे पेड़  पौधों के स्टार्च (श्वेतसार) का भी प्रयोग किया जाता है. परन्तु हम जिस तीखुर की चर्चा कर रहे हैं वह Maranta arundinacea  है. कस्टर्ड पाउडर कहलाने वाली चीज भी तीखुर का ही बंधु  है.

Arrowroot Pounding

हमारी अम्मा को तीखुर की जानकारी थी और कहा करती थी कि वह जंगली है इसलिए कसैला और कुछ कडुवापन लिए होती है. मेरा मानना  है कि जंगल से प्राप्त होने वाले तीखुर की भी जमकर सफाई की जावे तो उसका कसैलापन निकल जाएगा. अपने घर में मैंने वह प्रक्रिया देखी है. पौधों को जमीन से उखाड़े जाने पर नीचे मूली जैसे पतले कंद  (Tuber) होते हैं . उन्हें अलग कर लिया जाता है और पानी में धोया जाता है. इसके बाद उन्हें ओखली में डाल कर  खूब कूटा जाता है. गमछे में उन्हें रख कर एक अलग बर्तन में निचोड़ा जाता है.  दूध जैसा गाढ़ा  तरल पदार्थ इकठ्ठा होता है जिसे  उस बर्तन में ही एक दो घंटे के लिए रख दिया जाता हैउतनी देर में एक सफ़ेद पदार्थ नीचे बैठ जाता है और ऊपर जो  पानी बचा रहता है उसे  निथार कर फेंक देते हैं.  फिर एक बार बर्तन में ताजा पानी ड़ाल कर नीचे बैठे पाउडर को धोया जाता है और  कुछ देर के बाद ऊपर का पानी फेंक दिया जाता है. यह प्रक्रिया जितनी बार दोहराई जायेगी  तीखुर उतना ही परिष्कृत होता जाएगा. अंत में कागज़ बिछाकर तीखुर के गीले पाउडर को धूप में सुखा लिया जाता है.  सूखने पर शुद्ध तीखुर तैयार हो जाता है. आजकल मशीनी युग है. कारखानों में सेंट्रीफ्यूज़  का प्रयोग एवं  ब्लीच कर झका झक तीखुर का पाउडर बन जाता है.

Arrowroot Powder

इस बार घर पर रहते हुए एक नए व्यंजन पर प्रयोग किया गया . कटहल पक गए थे उन्हें पानी में उबाल कर मेश कर लिया, थोडा काजू, इलाईची और तीखुर मिलाकर एक पिण्ड बनाया गया और केले के पत्ते में पोटली बनाकर भाप में पका  लिया. क्या जायका था बस दिव्य!.

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तीखुर के  औषधीय  गुणों के बारे में इतना कह सकता हूँ कि इसके सेवन से पाचन क्रिया दुरुस्त होती है. बच्चों को भी दिया जाता है. ताजे ताजे घाव पर लेप लगा दें तो एंटीबायोटिक  का काम करता है. जंग लगे लोहे से जख्म हो गया हो तो धनुर्वात से भी बचा जा सकता  हैऔर भी गुण होंगे जिन्हें तलाशनी होगी.

बडे बडे क म्पनियों के द्वारा बाज़ार में उपलब्ध कराये जाने वाले अरारूट में  मूल प्राकृतिक स्वाद नहीं पाया जाता.