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अर्मेनियाई

फ़रवरी 20, 2012

३८ लाख की आबादी वाला एक छोटा सा देश आर्मेनिया परन्तु किसी समय उसका भी जलवा था. सोवियत रूस के विघठन के बाद  अब एक स्वतत्र गणराज्य है. भारत से अर्मेनियायियों का सम्बन्ध  बहुत पुराना कहा जा सकता है.  ८/९ वीं सदी में “थोमस ऑफ़ काना” नामके  एक व्यापारी के  भारत आने  की बात कही जाती है. इस बात पर मतभेद है कि क्या वह एक बिशप था या महज व्यापारी. उसके साथ में कई अन्य परिवारों के आने की बात भी कही गयी है. दक्षिण का एक ईसाई समुदाय अपने आप को उनका वंशज भी मानता है. संयोग से विश्व में आर्मेनिया पहला देश था जिसने ४ थी सदी में ही ईसाई धर्म को अपना राज धर्म घोषित किया था.

मध्य युग में, यहूदी या पारसियों की तरह भारत में, अर्मेनियाई पनाह लेने के लिए नहीं आये थे. उनका आना तो कुछ धन प्राप्ति की लालसा लिए रहा. १६ वीं सदी के आसपास अकबर बादशाह ने अर्मेनियायियों (तत्कालीन फारस के) को आगरे में बसने के लिए आमंत्रित किया और धीरे धीरे वहां उनकी एक बड़ी आबादी हो चली थी.  सूरत में भी इनका आगमन हुआ और वहां के बड़े व्यापारियों में शुमार हुए. इसी प्रकार गवालियर सहित अन्य कई नगरों में भी ये बस गए थे.  मुखतः वे हीरे जवाहरात, रेशम, मसाले आदि का व्यापार करते थे.

चेन्नई (मद्रास) से भी अर्मेनियायियों का सम्बन्ध १६ वीं सदी से रहा है. उनके नाम से एक सड़क ही  नहीं वरन उनके द्वारा बनवाया हुआ एक पुल भी है जो क्रमशः आर्मेनियन स्ट्रीट और आर्मेनियन ब्रिड्ज कहलाती हैं परन्तु दुर्भाग्य से अब यहाँ अर्मेनियायियों का नामों निशान नहीं है.  उसी सड़क पर एक प्राचीन चर्च है जो चेन्नई की धरोहरों में गिनी जाती है.  अंग्रेजों द्वारा बनाये गए सेंट जोर्ज के किले के अन्दर सन १६६८ में उन्होंने अपने लिए एक लकड़ी का काम चलाऊ चर्च बना लिया था. १७१२ में उसे पक्का बनाया गया परन्तु इस बीच मद्रास पर कुछ समय के लिए फ्रांसीसियों का अधिकार हो गया जिन्होंने उस चर्च को तुडवा दिया. कुछ दूसरे स्रोतों से पता चलता है कि उस चर्च को अंग्रेजों ने ही गिरवा दिया था.  अंततोगत्वा १७७२ में आर्मेनियन स्ट्रीट पर ही शामियर नामक एक अर्मेनियाई रहीस परिवार के निजी कब्रगाह में पुनः एक चर्च बनाया गया जो आज उस समाज के नगर से जुड़े इतिहास को जीवित रखे हुए है. संदर्भवश पूरे भारत में आज उनकी आबादी लगभग ३५० की  है.

                                                                      यह आर्मेनियन स्ट्रीट है. चेन्नई में अंग्रेजी का एक नमूना – बायीं तरफ के सूचना पटल पर

क्योंकि हमने भी इस चर्च के बारे में सुन रखा था इसलिए देख आने की इच्छा जागृत हुई.  मद्रास उच्च न्यालय से लगी  (उच्च  न्यायालय ने  अपना नाम परिवर्तित नहीं किया है) सड़क पे जाकर ढूँढने  पर चर्च तो नहीं दिखी परन्तु  एक जगह दरवाजे के ऊपर लिखा दिख गया. दरवाजे के सामने हाकरों ने कब्ज़ा जमा रखा है. शाम ४.३० बज चुके थे और दरवाजा बंद ही था. आस पास पूछने पर पता चला कि वह ५ बजे खुलता है. तभी अचानक एक चौकीदार दरवाज़ा खोल  बाहर आया, हम खुश हुए और अन्दर जाने लगे. चौकीदार ने रोकते हुए  अंग्रेजी में बताया की सुबह ९.३० से दुपहर २.३० तक ही पर्यटकों को अन्दर जाने दिया जाता है. मिन्नतों का कोई  असर नहीं हुआ. हम उल्टे पैर वापस लौट आये थे. एक सप्ताह बाद पुनः सुबह १० बजे ही पहुँच गए तब वहां बैठे एक सज्जन ने स्वागत करते हुए अन्दर आने को कहा. उसने बताया कि वह उस चर्च का अभिरक्षक है. अपना नाम उसने टी. अलेक्सांडर बताया और यह भी कि वह एंग्लो इंडियन समाज का है. चर्च से सम्बंधित दीगर जानकारियाँ भी उसी सज्जन से प्राप्त हुईं.

दरवाजे के अन्दर घुसते ही जो सामने दिखाई देता है वह घंटाघर है और आर्मेनियन चर्च के रूप में मैंने इसी की तस्वीर देखी थी. बगल में एक लम्बे बरामदे  से लगा चर्च का प्रार्थना कक्ष है. सामने आले में माता मरियम शिशु ईशु को लिए खड़ी है.  नीचे ईशु के जीवन से संबंधित सुन्दर छोटे छोटे चित्र बने हैं. मोमबत्ती जलाई रखी गयी  थी और असीम शांति का अनुभव भी हो रहा था. घंटाघर रुपी मीनार पर चढ़ने के लिए लकड़ी की सीढ़ी थी परन्तु ऊपर चढ़ना वर्जित था. सीढ़ियों की जर्जर अवस्था एवं दुर्घटना की सम्भावना को मद्दे नज़र यह व्यवस्था बताई गयी.

ऊपर चढ़ने की बड़ी लालसा थी क्योंकि वहां छै बड़ी बड़ी घंटियाँ टंगी हैं. प्रत्येक का वजन १५० से २०० किलो  तक का है. उनका निर्माण लन्दन के बिग बेन को बनाने वाली कम्पनी द्वारा सन १७७५ के आसपास किया गया था. एक इनमें सबसे पुराना सन १७५४ का है जिसे सन १८०८ में मद्रास में ही पुनः ढाला गया था. उस पर तामिल में लेख भी अंकित है.

बाहर की तरफ चारों ओर उद्यान हैं. पूरे क्षेत्र में चंपा (Frangipani/Plumeria) के कई पेड़ लगे हैं जिनमें लगे फूलों का आकार  देखकर प्रसन्नता हुई थी. वे काफी बड़े बड़े थे गोयाकि  परिसर में दफ़न ३७० अर्मेनियायियों के अवशेषों से उन्हें उर्वरकता प्राप्त हो रही है. सभी कब्रें समतल हैं और कब्र होने का एहसास  केवल उनपर बिछी फर्शी पत्थरों के लेखों से ही हो पाती है. अपवाद स्वरुप एक कब्र है जो अलग थलग है. यह कब्र फादर हरुत्युम श्मवोनियाँ (Harutyum Shmavonian) की है जिनका निधन सन १८२४  में हो गया था.

आर्मेनिया के इतिहास में उनकी भाषा में सबसे पहले सन १७९४ में एक मासिक पत्रिका “अज़दरा ” का प्रकाशन इसी शक्शियत के द्वारा किया गया था. पत्रिका का मुद्रण भी इसी चर्च में हुआ था. हमने उस पत्रिका के दर्शन लाभ करवाने के लिए अलेक्सेंडर जी से निवेदन किया था परन्तु उसकी कोई भी प्रति वहां उपलब्ध नहीं थी. अलेक्सेंडर जी का मानना है कि संभवतः उन्हें सुरक्षित रखने की बात सोची भी नहीं गयी. इसी चर्च में  तत्कालीन अर्मेनियायियों ने अपने  एक स्वतंत्र  देश के लिए संविधान की रूपरेखा सन  १७८१  में तैयार की थी. विडम्बना ही कहा जा सकता है कि आर्मेनिया को स्वतंत्रता  १९९१  में सोवियत गणराज्य के विघठन के पश्चात ही मिल पायी.

अर्मेनियायियों के बारे में एक रोचक पहलु यह भी है कि वे क्रिसमस २५ दिसंबर की बजाय ६ जनवरी को मनाते हैं. वे अपने आप को Eastern Orthodox Christians  बताते हैं. उनका मानना है कि क्रिसमस मनाये जाने के लिए २५ दिसम्बर की तिथि का निर्धारण सन ३२५  में रोमन चर्च ने किया था जबकि उनके यहाँ क्रिसमस की परंपरा उसके पूर्व से ही रही  है.  अतः उस परिपाटी को जस का तस बनाए रखा है. दूसरी तरफ रूस के आर्थोडक्स  चर्च द्वारा क्रिसमस ७ जनवरी को मनाया जाता है.

 ७ वीं सदी में पल्लवों के द्वारा निर्मित चेन्नई के कपालीश्वर का मूल मंदिर पहले समुद्र के किनारे था जिसे पुर्तगालियों ने १६ वीं सदी में ध्वस्त कर “सेनथोम” नामसे विख्यात चर्च (बेसिलिका) निर्मित किया. इसके लिए आर्मेनियायियों को उत्तरदायी माना जाता है. कहा जाता है कि मद्रास के अर्मेनियायियों ने ही उस इलाके में कहीं सेंट थोमस के दफ़न होने की सुनी सुनाई बात पुर्तगालियों को बतायी थी. इस पर कभी और… 

 

चेन्नई की संगीत संध्याएँ

फ़रवरी 11, 2012

“मार्कज्ही”  का तामिल माह जो  उत्तर में मार्गशीर्ष या अगहन कहलाता है, दक्षिण में  अति महत्वपूर्ण माह होता है. प्रातः पौ फटने के पूर्व ही मंदिरों के पट खुल पड़ते हैं और दर्शनार्थियों  का तांता लग जाया करता है. मंदिरों की घंटियों की आवाज और संगीत लहरी पूरे वातावरण  को एक प्रकार से आध्यात्मिक बना देती है. महानगरों में कोलाहल के कारण  इस बात की अनुभूति उतनी तीव्र नहीं होती है परन्तु अन्य कस्बों और ग्रामीण अंचलों में तो एक अलग ही जज्बा होता है. चेन्नई में दिसंबर – जनवरी के बीच की यह अवधि पूर्णतः संगीतमय हो जाती है.  आलेख के शीर्षक में “संगीत संध्याओं” का उल्लेख किया है जबकि वास्तविकता तो यह है कि यह “संगीत” और “संध्या” तक सीमित नहीं हैं.  विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम यथा  गायन, वादन, नृत्य, नाटक आदि प्रातःकाल से ही प्रारंभ हो जाते हैं और दिनभर चलते रहते हैं. संगीत/नृत्य का यह वृहद् समारोह विश्व भर में सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है.

एक ही गायक/वादक  द्वारा ढाई से से तीन घंटे  तक   चलने  वाला शाश्त्रीय गायन/वादन कार्यक्रम यहाँ कचेरी (कचहरी का पर्याय) कहलाता है. मेरे भाई के पास  इस संगीत के मौसम में हो रहे कई “कचेरियों” के “पास” पड़े थे. आखिर क्यों न हो.  अपनी संस्था से कार्यक्रमों को  प्रायोजित करवाने में उसकी अहम् भूमिका जो रही होगी. हमने कह दिया ठीक है, चले चलेंगे. थोड़ी बहुत गोताखोरी  हम भी कर ही लेते हैं. बातों ही बातों में हमने पूछ डाला “भैय्या यह तो बताओ कि संगीत के कार्यक्रम को यहाँ कचेरी क्यों कहते हैं, कचेरी तो कोर्ट को कहते हैं” इसपर उसका  कहना था “कोर्ट तो कई प्रकार के हो सकते हैं. जैसे बेडमिन्टन  का कोर्ट, टेनिस का कोर्ट, या  ला कोर्ट, वैसे ही यहाँ “कचेरी” का प्रयोग संगीत के  कोर्ट के लिए हो रहा है”. कुछ कुछ तर्क संगत बातें थीं इसलिए हमने हथियार डाल दिए.

                                                 प्रिया बहनों द्वारा प्रस्तुति

जैसा सभी जानते ही हैं, दक्षिण में “कर्णाटक संगीत” का प्रचलन है जबकि उत्तर के शाश्त्रीय गायन शैली को “हिंदुस्थानी” कहा जाता है. हमारी स्थिति तो  बीन के आगे भैंस की है. मजबूरी में सुन लेते हैं. ऐसा नहीं है कि संगीत से हमने “खिट्टी” कर ली हो, “बुल्ले शाह” जैसे सूफियाना किस्म की गायकी हमें बड़ी प्रिय है. यहाँ के संगीत प्रेमियों में  हिंदुस्थानी पद्धति के प्रति कोई दुर्भावना नहीं दिखती क्योंकि राग रागिनियों में बहुत सारी समानताओं को वे स्वीकार करते हैं. उनसे पूछा जाए तो यही कहते हैं कि हिंदुस्थानी गायन की परंपरा “राज दरबार”, “कोठों” आदि को समर्पित रही और मूलतः मन बहलाने के लिए हुआ करती थी जबकि कर्णाटक संगीत  आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है. उत्तर वाले एक ही स्वर भाव में घंटों  गाते रहते हैं जबकि यहाँ  स्वरों के बीच डोलते रहते हैं. एक संगीत प्रेमी का कहना है कि हिंदुस्थानी संगीत भी कभी निर्मल और शुद्धता से परिपूर्ण रही परन्तु मुगलों के आगमन के पश्चात उसका कौमार्य जाता रहा. पंडित जसराज जी की यहाँ वाले बड़ी सराहना करते हैं यह कह कर कि वे ही हैं जिन्होंने हिंदुस्थानी संगीत की गरिमा को पुनर्स्थापित किया.

                                              अभिशेख रघुराम द्वारा प्रस्तुति                                                 संजय सुब्रमण्यम की प्रस्तुति

चेन्नई की कुछ पत्रिकाओं आदि से ज्ञात हुआ कि यहाँ संगीत प्रेमियों की बहुत बड़ी संख्या है और संगीत की गहराईओं में जाने की क्षमता भी. यहाँ ४० से ऊपर सभा गृह (आडिटोरियम) हैं जहाँ १४० से अधिक संघठनों द्वारा उनके चयनित सभा गृहों में ख्याति प्राप्त और अल्प ख्याति वाले कलाकारों की प्रस्तुतियां आयोजित की जाती हैं. इन सभी आयोजनों के बारे में विस्तृत जानकारी युक्त पुस्तकों का प्रकाशन भी कई संघठनों द्वारा किया जाता है और संगीत रसिकों के बीच वितरित होती हैं. सभा गृह में लोगों के हाथों में इन पुस्तिकाओं को देख कर लगा कि कार्यक्रम को  “कचेरी” इस लिए कहते हैं क्योंकि जानकारों के सम्मुख बेचारे कलाकार को शायद यह प्रमाणित करना पड़ता है कि उसकी प्रस्तुति दोष रहित है.

                                            नित्यश्री महादेवन द्वारा प्रस्तुति

कर्णाटक संगीत में  संत त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर, श्यामा शास्त्री, स्वाति तिरुनाल, पुरंदर दास, जयदेव, मीराबाई, कबीरदास,  सुब्रमनिया भारती आदि की रचनाओं/कृतियों की निर्दिष्ट रागों में गायन/वादन होता है. भाषा का कोई बंधन नहीं है. मसलन त्यागराज की रचनाएं तेलुगु में हैं (उनके पूर्वज आन्ध्र से तामिलनाडू आ बसे थे), पुरंदर दास जी ने कन्नड़ में लिखा है, सुब्रमनिया भारती की तामिल में, स्वाति तिरुनाल, जयदेव, कबीर  आदि की संस्कृत और हिंदी में हैं. हरेक कचेरी में गायकों  के द्वारा गायन के लिए चयनित सूची में उपरोक्त रचनाकारों की कृतियों का समावेश रहता है. संत त्यागराज जी सबके इष्ट हैं.  सन १७६७ में तामिलनाडू के तिरुवारुर में जन्मे संत त्यागराज ने लगभग २४००० कृतियों (गीतों) की रचना की थी जिनमे से अब ७०० कृतियाँ उपलब्ध हैं. गायकों को संगत देने के लिए मृदंगम, वायोलिन, घटम (मटका), ढपली  तथा तानपुरा का प्रयोग साधारणतया होता है परन्तु हारमोनियम कर्णाटक संगीत में निषिद्ध है.

अब तक इस वर्ष के कई सायंकालीन कचेरियों में सम्मिलित होने  और उस माहौल के रसास्वादन का अवसर मिला.  कचेरी अधिकतर ढाई से तीन घंटे की रहती है और शाम ६.०० या फिर ६.३० को प्रारंभ होती है. किसी भी  हाल में रात ९.३० बजे तक समाप्त हो ही जाती है. यहाँ देर रात (अपवादों को छोड़ कर) तक कार्यक्रम चलाने की परंपरा नहीं है. आयोजकों द्वारा समय की पाबन्दी का कठोरता से पालन होता है. कचेरी के प्रारंभ होने के पूर्व ही सभी अपना अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं और उनमें से बहुत सारे अपनी अपनी किताबें भी खोल लेते हैं. स्टेज के परदे खुलते हैं और तालियों की  गडगडाहट फिर एकदम शांति. सुई पटक सन्नाटा. गायन अलापना से प्रारंभ होता  है. सामने स्टेज  पर गाने वाले, गाने के अलावा ताल को बनाए रखने के लिए, अपनी हथेली का कई प्रकार से प्रयोग करते हैं. कभी हवा में हथेलियाँ हिलाई जाती हैं तो कभी अपने ही हाथों में थाप देते हैं और कभी अपनी जंघा पर प्रहार. कुछ अपनी आँखें बंद कर लेते हैं तो कभी एक कान को  उँगलियों से बंद कर लेते हैं. कभी कभी इतने ज्यादा हिलते डुलते हैं कि  उनके आवेश को देख उनके उठ खड़े हो जाने की आशंका हो जाती  है. रसिक श्रोताओं का भी कुछ कुछ ऐसा ही हाल रहता है. हम भी लोगों का अनुकरण करते हुए अपने सर को ताल के अनुसार हिलाते हुए झटके भी दे देते थे. एक बार तो नींद ही आ गयी परन्तु तालियाँ की गडगडाहट ने खलल डाल दिया. तत्काल हमने भी ताली बजा दी और सोचा कि शायद कचेरी समाप्त हो गयी है. परन्तु ये न हुआ. तालियाँ तो केवल एक अलापना के लिए बजाई गयी थी. फिर शुरू हुआ वायोलिन वादक द्वारा पूरे आलाप को दोहराया जाना. अभी उसने  अपना वादन बंद ही किया था तो मृदगम बज उठा वह भी उतनी ही देर फिर घटम (मटका).  मैंने इस आलेख को लिखे जाने तक कुल सात कचेरियों को झेल लिया है और तीन कचेरियों में मृदंगम वादक एक श्री पत्री सतीशकुमार ही थे. लगता है वे काफी प्रतिष्ठित हैं इसलिए उन्हें ही बुलाया जाता है. वैसे हुनरमंद लगे. तिरुपति के बालाजी मंदिर के कुछ पर्वों को विषय बनाकर भरतनाट्यम शैली में  १८ कन्यायों द्वारा एक न्रित्य नाटिका भी देखने का अवसर मिला जो चित्ताकर्षक रहा.

सुश्री चारुलता मणि  का गायन सुनकर मन बड़ा प्रफुल्लित हो गया क्योंकि ऐसा  लग रहा था मानो कोल्हापुर में बैठ कर संगीत का आनंद ले रहे हों. हाल में स्थान ग्रहण करने के बाद  स्टेज पर देखा तो तबला और हारमोनियम वादक दिखे थे, कुछ अन्य वाद्य भी थे, जो यहाँ के आयोजनों में आम नहीं है. कर्नाटक संगीत में भी उन वाद्यों का  प्रयोग हुआ परन्तु बात बाद में समझ आई जब अभंग गाये गए. संत तुकाराम की रचना “सांवरी सुन्दर रूप मनोहर” के  गायन से तो गदगदायमान हो गए. पंडित भीमसेन जी को सुना है परन्तु यहाँ की प्रस्तुति बेहद प्यारी लगी.

                          एक कार्यक्रम की समाप्ति पर श्रोताओं द्वारा तालिओं से गायक का सम्मान                                                       सभा विसर्जन

स्त्रियाँ (यहाँ उन्हें आदर से  “मामी” कह कर संबोधित किये जाने की परंपरा है) कांजीवरम (रेशमी) परिधान में सज धज कर आती हैं मानो किसी शादी/विवाह में आ रही हों. इस प्रकार के आयोजनों का एक सामाजिक पहलू यह भी है कि नए लोगों से मुलाक़ात/पहचान हो जाती है और कभी कभी रिश्ते बनाने में भी सहायक रहती है. लगभग सभी सभा गृहों के परिसर में केन्टीन भी होते हैं जहाँ                                        चित्र डेकन क्रोनिकल से साभार

अपेक्षित गुणवत्ता के पारंपरिक व्यंजन उपलब्ध रहते हैं. संगीत सभाओं में नियमित जाने वालों को इस बात का पता रहता है कि किस सभा भवन में कौन सी चीज लज़ीज़  होती है.  यहाँ तक कहा जाता है कि बहुत सारी मामियां तो केंटीनों के सहारे रहकर महीने भर अपना चौका बंद रखती हैं.

                                                                      हाल के बाहर सीडियों (CDs) की खरीददारी                                                                                                अब सब घर चले

चलते चलते एक बात और बताना होगा. इस आलेख में जिन कचेरियों के बारे में कहा गया है, वे सब तथाकथित अभिजात्य वर्ग के लिए ही आयोजित किया गया प्रतीत होता है. बताया गया है कि सुबह और दिन के आयोजन निःशुल्क होते हैं. परन्तु इन आयोजनों में उदयीमान कलाकारों की प्रस्तुतियां ही रहती हैं.  नामी गिरामी कलाकारों द्वारा आम आदमी के लिए विशेष आयोजन खुले में, मंदिरों के प्रांगण, बागीचों और क्रिकेट मैदान आदि में होते हैं.