Archive for the ‘Ecology’ Category

बचनाग या ग्लोरी लिली Gloriosa Superba

नवम्बर 16, 2012

बरसात के बाद बाड़ियों  (फेंसिंग) में अचानक प्रकट  होने वाला एक असाधारणसा   फ़ूल है बचनाग या ग्लोरी लिली (ग्लोरियोसा सुपरबा). कलिहारी, अग्निशिखा आदि नाम भी मिलते हैं.   इससे हमारी मुलाकात बहुत ही पुरानी है, जब हम  छोटे हुआ करते थे. उसकी चटक रंगों और मकड़ी जैसी बनावट के कारण हमें बहुत ही ज्यादा प्यारी लगी थी और जब नहीं रहा गया तो हम तोड़ लाये थे. माँ  ने अच्छी  डांट  पिलाई और बहुत दूर फेंक आने को कहा. आने के बाद साबुन से हाथ धुलाये गए थे. बताया गया था कि वह बहुत ही जहरीला है और हिदायत दी गयी थी कि आगे से कभी उसके पास भी मत जाना. पिछले कुछ वर्षों से कही देखा भी नहीं, अपने घर में भी नहीं.  भारतीय डाक द्वारा फूलों पर भी डाक टिकटों की एक सेट निकाली गयी थी जिसमे ग्लोरी लिली को भी दर्शाया गया था. हमने तो पूरी सेट ही मंगवा ली थी. पढने को मिला था कि विगत कुछ वर्षों में इस फूल के पौधे का औषधीय प्रयोग के लिए बड़े पैमाने पर दोहन किया जा रहा है  इसलिए वे लुप्त प्रायः हो चले हैं. साथ में यह भी जाना था कि तमिलनाडु में २००० एकड़ में इसकी खेती  हो रही है. इसके बीजों का निर्यात होता है और किसान खूब कमा रहे हैं. संदर्भवश यह ज़िम्बाब्वे का राष्ट्रीय पुष्प है. तामिलनाडू ने भी इसे प्रादेशिक पुष्प बनाकर सम्मानित किया हुआ है.

इस बार अपने ही घर की झाड़ियों में वही  फूल खिला दिखा जिसे देख कर मन प्रसन्न हो गया. वह एक बेल पर लगी थी.  अगल बगल के पेड़ पौधों का सहारा लेते हुए वह ऊपर उठती है. इसके लिए उसकी नोकदार पत्तियां (with tendrils) ही सहायक होती हैं. क्योंकि उसके बेल को पहचान गया था इसलिए एक दूसरी जगह भी उसके पौधे को पहचान गया था. उसपर एक कली लगी थी एकदम हरी. डंठल से नीचे की तरफ लटके हुये. वह जब खिलता है तो उसकी पंखुड़िया हलके पीले रंग लिए हुये हरी होती हैं. शनै शनै पंखुड़ियों का रंग बदलता जाता है. वे पीली हो जाती है और सिरे लालिमा लेने लगते हैं. जब फूल विकसित हो जाता है तो  डंठल को घेरते हुये  पंखुडियां ऊपर की तरफ उठ जाती हैं.  तीन चार दिनों में ही पूरा का पूरा फूल लाल हो जाता है. दो तीन दिन बाद पंखुडियां झड जाती हैं. इस तरह एक फूल लगभग आठ दिनों तक रंग बदलते हुये बना रहता है. 

इसकी बेल में फल्लियाँ लगती हैं जिसमें लाल रंग के बीज होते हैं. इस अवस्था को हम नहीं देख पाए. इन बीजों से पौधे उगाये जा सकते हैं. इसकी जड़ें  गांठदार (tuberous) होती हैं और पौधे उगाने के लिए ट्युबर्स का भी प्रयोग किया जा सकता है. जैसे मेरी माँ ने बताया था इस पौधे का हर भाग अत्यधिक जहरीला है. बेल या पत्तियों का शरीर से संपर्क मात्र से समस्या हो सकती है. कोल्शिसाइन (Colchicines) नामक तत्व इसका कारक है. कुछ जगह तो लिखा है कि इसके रस का मात्र ६ माइक्रोग्राम का सेवन आत्मघाती हो सकता है. कुछ जगह ६ के बदले ६० माइक्रोग्राम की बात कही गयी है. कहते हैं आत्महत्या के लिए इसकी जड़ों को चूस लिया करते थे. 

जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, इस पौधे और उसकी जड़ों के रस का प्रयोग सर्पदंश सहित विभिन्न रोगों के उपचार में  किया जाता है.

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जैव विविधता – बरसात के बाद

अक्टूबर 22, 2012

इस बार के ओणम के लिए मैं गाँव में था. कभी बारिश तो कभी धूप. मौसम वैसे सुहाना ही था परन्तु कभी कभी लगातार होने वाली बारिश से उबासी भी होने लगती थी.मौसम की अनुकूलता के कारण भूमि में दबे पड़े कई प्रजातियों के पौधों के बीज आदि अंकुरित हो उठते हैं और एक प्रकार से जंगल सा दिखने लगता है. चारों तरफ पेड़ पौधे फूलों से लदे रहते हैं. यही कारण भी है कि हर घर के आँगन में  ओणम के दिनों में फूलों की पंखुड़ियों का प्रयोग  कर रंगोलियाँ सजती हैं. उसके लिए सूर्योदय के पूर्व ही फूलों को बीनने बच्चे निकल पड़ते हैं. हमारा घर गाँव के एक छोर पर है. घर से निकलते ही दायें तरफ से एक गलीनुमा सड़क जाती है जो गाँव का चक्कर लगाते हुए राजमार्ग से जुडती है.

खाली समय, अपने ही घर के बाड़े में उग आये वनस्पतियों से रूबरू हो लेने का अवसर होता है और ऐसे अवसर दिन में कई बार आते हैं. नाना प्रकार के फूलों के अतिरिक्त  रंग बिरंगे कीट पतंगों की भी कोई कमी नहीं रहती. उनमेंसे कुछ जाने पहचाने तो कुछ अनजाने भी होते हैं. कभी कभी सोचता हूँ काश वनस्पति शास्त्र एवं कीट विज्ञानं  का भी अध्ययन कर लिया होता.

Jewel Beetle – Curis Viridicyanea?

ऐसे ही एक दिन हरी भरी झाड़ियों में एक सुन्दर हरे रंग का ही भंवरा दिखा, प्रकृति ने उस निरीह प्राणी की आत्म रक्षा के लिए ही तो ऐसा रंग दिया होगा. माँ कह रही थी कि हरे टिड्डे (grass  hoppers) अब नहीं दीखते. लेकिन यहाँ तो भरपूर हैं. माँ शायद घर के  अन्दर की बात कर रही थी.  दो कामुक  टिड्डे गुत्थम गुत्थी हो रहे थे. हमारी भनक से वे अलग हो गए. रंग बिरंगे पेट वाले ऐसे टिड्डे देखे नहीं थे. उन्हें पकड़ कर बारीकी से जांच करने की इच्छा भी हुई परन्तु न जाने क्या सोच कर आगे बढ़ गए थे.

इतने सारे झाड झंकाड़ में नाना रंग  रूप लिए तितलियाँ भी हमारे जैसे ही मटरगस्ती कर रहीं थी सोचा था कहीं कोई दुर्लभ प्रकार की तितली दिख जाए परन्तु  केमरा को फोकास करने के पहले ही उड़ जातीं. हाँ कुछ लार्वा दिखे. क्या मालूम यही कोई ख़ास हो.

दो पग आगे बढ़ते ही एक पौधे पर लाल रंग के कुछ कीट दिखे. पहले सोचा ये भौरे ही होंगे परन्तु बारीकी से देखने पर चींटों जैसे ही थे. हाँ शारीरिक बनावट में थोड़ी बद्लावट थी. अब इन चींटों को इतना भड़कीला लाल रंग देकर प्रकृति ने अच्छा नहीं किया. ये तो पक्षियों द्वारा आसानी से पकड़ा जायेंगे. यह विचार भी आया फिर सोचा ये यहाँ कर क्या रहे होंगे. शायाद इंतज़ार, मधुशाला के खुलने का एक फूल के खिलने का. यही तो मैंने जाना कुछ देर में.

Passion Flower (Passiflora incarnata)

घर के बाहर निकल कर बगल में ताऊजी के फेंसिंग में वह बेल दिखी जिसमे कली, फूल तथा फल तीनों ही लगे थे. फूल छोटे होते हुए भी अति आकर्षक थे. पहले कली निकलती है फिर फूल खिलती है, फूल झडती है और फल को उत्पन्न करती  है,  हाँ यही तो क्रम है. मन  ही मन  बुदबुदा लिया. लेकिन इस फल को तो पहले भी देखा था.  बेर के बराबर हो गए थे. अब भी एक दो थे जो छोटे बैगन की तरह रंग रूप लिए हुए थे. एक तोड़ लिया, माताजी को दिखाने. आखिर वही तो बतायेंगी और बचपन से ही उन्होंने ही तो बताया भी है. घर पर उनके हाथ में रख दिया. माँ के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव स्पष्ट दिख रहे थे. तुरंत बताया गया कि इसे हम लोग नहीं खाते. लेकिन पकने पर गरीबों के बच्चे खाते हैं. मलयालम में नाम भी बता दिया “रेमठ फल” (अनुवादित नाम). नाक से बहने वाले तरल पदार्थ सा स्वाद. गाँव के उन गरीब बच्चों की तस्वीर खिंच सी गयी जिनकी नाक बहती रहती है और जीभ ऊपर फिराकर चाट लेते हैं.

हमारे घर के दाहिनी तरफ एक कटहल के पेड़ के नीचे बड़े बड़े लम्बे पत्तों वाले पौधे उग आये थे जिनकी ऊँचाई ५/६ फीट रही होगी. उनमें बहुत ही सुन्दर सफ़ेद फूल लगे थे. पत्ते देखने में हल्दी  या अदरक जैसे थे. माताजी से पूछने पर कुछ अजीब सा नाम बताया और यह भी कहा कि १५/२० दिन में आयुर्वेदिक अस्पताल से लोग आकर उसकी जड़ें उखाड़ ले जायेंगे क्योंकि उनमें औषधीय गुण हैं. ऐसे ही लाल रंग के फूल वाले भी होते हैं. एक और कोने में हमें लाल वाली भी मिल गयी. ढूँढने  पर सफ़ेद वाले का अंग्रेजी नाम Crepe  Ginger और लाल वाले का Pink Cone Ginger मिला और यह भी पता चला कि ये दोनों अदरक के दूर के रिश्तेदार हैं.