Archive for the ‘History’ Category

मुरुद जंजीरा

जुलाई 13, 2013

भारत का पश्चिमी हिस्सा  जिसे कोंकण भी कहते हैं अपने खूबसूरत समुद्री तट (“बीचों”) के अतिरिक्त ढ़ेर  सारे किलों/दुर्गों के लिए भी जाना जाता है.  समुद्र के अन्दर बने जलदुर्गों में “मुरुद जंजीरा” अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है. “मुरुद” समुद्र के तट से लगे कस्बे का नाम है जब कि “जंजीरा”  समुद्र के अन्दर टापू पर बने किले को कहा जाता है. जंजीरा अरबी के  الجزيرة‎  “अल जज़ीरा” का अपभ्रंश है जिसका तात्पर्य “द्वीप”  है.  यही एक दुर्ग है  जो  अब तक अजेय रहा है.  अरब सागर में एक  22  एकड़ का छोटा अण्डाकार टापू है जिस पर यह किला बना है.  मूलतः 15 वीं सदी के उत्तरार्ध  में मुरुद के एक स्थानीय मछुवारों के सरदार राम पाटिल ने काष्ट से वहां किलेबंदी की थी. अहमदनगर निजामशाही  से सम्बद्ध  पीरम  खान ने उस टापू पर कब्ज़ा कर लिया. पीरम  खान के उत्तराधिकारी बुरहान खान ने काष्ट दुर्ग को नष्ट कर 1567  – 1571 के दरमियान एक अभेद्य वृहद् किले का निर्माण करवाया. किसी एक “सिद्दी” अम्बरसतक को वहां का किलेदार बनाया गया था. ऐसा भी पढने को मिलता है कि एबीसीनिया (इथोपिया) के समुद्री लुटेरों ने, जिन्हें “सिद्दी” भी कहा गया है, वहां बने काष्ट किले पर हमला कर हथिया लिया था. इस बात का भी उल्लेख है कि अहमदनगर सल्तनत में कई सिद्दी सेवारत रहे हैं जो मूलतः गुलाम थे. उल्लेखनीय है कि पुर्तगालियों के व्यवसाय में पूर्वी अफ्रीका से पकड़ कर लाये गए हब्शियों (अल हबश, al-Ḥabašah الحبشة ‎) के विक्रय की परंपरा रही है।  बहुधा इन सिद्दियों को सेना में अथवा पहरेदारी के लिए रख लिया जाता था.

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बीजापुर के सुलतान एवं मुग़ल सल्तनत के आधीन मुरुद जंजीरा के सिद्दियों की अपनी स्वतंत्र सत्ता थी. यहाँ के राजवंश का प्रारंभ 1605 में सिद्दी सुरूर खान से होता है. शासक प्रारंभ में  “वज़ीर” कहलाये और 1885 के लगभग “नवाब”  कहलाने लगे.  पूरे पश्चिमी समुद्र तट पर उन लोगों ने आतंक मचा  रखा था.  पुर्तगालियों, अंग्रेजों और  मराठों के द्वारा जंजीरा के किले पर कब्ज़ा करने के कई प्रयास हुए परन्तु वे सब विफल रहे. शिवाजी ने तो 13 बार उस किले पर धावा किया था लेकिन कुछ हाथ नहीं आया.  शिवाजी के पुत्र ने भी एक कोशिश की थी जिसके लिए समुद्र तट से पानी के नीचे किले तक सुरंग खोदी गयी परन्तु नाकामी ही हाथ लगी. कालान्तर में  अंग्रेजों ने मुरुद जंजीरा को, अपने सिक्के जारी करने के अधिकार सहित,  देसी रियासत का दर्जा दे दिया. सिद्दियों की सत्ता भारत के आजादी तक जंजीरा पर बनी रही. गुजरात से लेकर कर्णाटक तक उनके अपने गाँव हैं और अनुमान है कि उनकी कुल आबादी 50,000 से अधिक है. अब वे वर्ण शंकर भी हो चले हैं. उनमें   हिन्दू भी है, मुसलमान भी हैं और ईसाई भी परन्तु रोटी बेटी के लिए ये सभी दीवारें उनके लिए बेमानी हैं. अमरीकी राष्ट्रपति  बरक ओबामा को कर्णाटक के सिद्दी अपना वंशज मानते हैं.DSCN2646

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बहुत हो गया इतिहास अब  किले की तरफ रुख करते हैं.  अलीबाग (कोलाबा) के किले  जैसे जंजीरा के लिए  समुद्र में पैदल या घोडा गाडी से नहीं जाया जा सकता. राजपुरी नामका एक घाट  है जहाँ से पतवार वाली नौकाएं चलती हैं और प्रति व्यक्ति जाने आने का 30  रुपये लेते हैं. नाव वाला आपको इतिहास भी बताता चलता है.  किला राजपुरी की तरफ मुँह किये हुए है, अर्थात तट का सामना करते हुए, परन्तु यह दूर से नहीं दीखता ठीक किले के पीछे की ओर  (अरब सागर की तरफ) एक छोटा चोर दरवाज़ा भी है जो संकट के समय बच  निकलने के लिए बनाया गया है.   चहार दीवारी लगभग 40  फीट ऊंची  ग्रेनाईट पत्थरों से बनी हैं. कोल्हापुर के पास पन्हाला किले जैसा ही यहाँ भी चुनाई के लिए शीशे (lead) का प्रयोग कहीं कहीं दिखायी देता है.

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मुख्य दरवाजे के अन्दर घुसते ही सामने की दीवार पर एक शेर बना है जो हाथियों के पीठ  पर अपने पंजे  रखे है.  एक हाथी को अपने पूँछ में जकड़े है और एक हाथी की पूँछ को मुह में लिए है. काफ़ी प्रयास किया यह जानने का कि यह किस बात का प्रतीक है.  निश्चित ही इसका सम्बन्ध सीधे सिद्दियों से नहीं है क्योंकि महाराष्ट्र के कुछ अन्य किलों में भी इसी चिन्ह के होने की बात कही गयी है. इस किले के कुछ अन्य भागों में शेर और  हाथियों को खेलते कूदते दिखाया गया है.  सुरक्षा के लिए गोलाई लिए हुवे 22 बुर्ज बने हैं जिनपर तोप रखे हुए  हैं .  इस किले में सैकड़ों की तादाद में तोप हुआ  करते थे परन्तु अब कुछ ही बचे हैं. इनमें विदेशी भी हैं और जंग खा रहे हैं.

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अन्दर 22 एकड के भूभाग में राजमहल, अफसरों आदि के रिहायिशी मकानात, मकबरे, मस्ज़िद आदि  के खँडहर फैले पडे हैं. कुछ भवन तो ठीक ठाक लगते हैं. पीने के पानी के लिए दो बडे तालाब भी हैं. यह सब  उस किले की वैभव के मात्र प्रतीक रह गए हैं. मुरुद में नवाब की आलीशान  कोठी है और  राजपुरी में उनका कब्रगाह.??????????

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इस किले को देखना हो तो  कोंकण रेल मार्ग पर मुंबई (लोकमान्य तिलक टर्मिनस) से रोहा तक जाना होगा और फिर बस या कार से 37 किलोमीटर चल कर मुरुद जंजीरा. सड़क मार्ग से मुंबई से पनवेल, पेण, रोहा होते हुए मुरुद जंजीरा पहुंचा जा सकता है और यह दूरी कुछ 155 किलोमीटर के लगभग पडेगी.  मुंबई से अलीबाग होते हुए भी वहां पहुँच सकते हैं.  इस रास्ते से दूरी में कोई विशेष अंतर नहीं पड़ेगा. 

  

वैकुंठ पेरुमाल मन्दिर, काँचीपुरम

जून 18, 2013

पूर्व में काँचीपुरम के बारे में बताते  समय शायद हमने इस बात का भी जिक्र किया था कि यहाँ नगर दो भागों में बंटा है, एक शिव कांची दूसरा विष्णु कांची. इन दोनों समुदायों में प्रारंभ से ही होड़ चली आ रही है और अकसर ही आपस में उलझते  रहे हैं. शासकों के लिए भी धर्म संकट की स्थिति बनती थी. तुष्टिकरण की राजनीति तब भी विद्यमान थी. पल्लवों ने कैलाशनाथ का शिव मन्दिर जब 8 वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में बनवाया तब वैष्णवों ने अपने आपको राजा द्वारा उपेक्षित माना होगा.  पल्लव नरेश नंदिवर्मन- II (732 – 796), जो स्वयम एक विष्णु भक्त था,  ने एक विष्णु मन्दिर बनवा कर वैष्णवों के असंतोष का शमन किया. इस मन्दिर को ही आजकल वैकुंठ पेरुमाल मन्दिर कहते हैं. साहित्यिक संदर्भों में इस मन्दिर का उल्लेख “परमेश्वरा विन्नगारम” मिलता है. बनावट में यह कैलाशनाथ शिव मन्दिर से मेल खाता है. पल्लवों के द्वारा प्रारंभ में बनवाये गए किसी भी मन्दिर में प्रवेश के लिए राजगोपुरम की व्यवस्था नहीं थी.

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नंदिवर्मन से जुड़ी एक रोचक पहलू यह भी है कि वह् एक आयातित राजा था.  उसकी कहानी कुछ इस प्रकार है. सन् 730 के लगभग परमेश्वरवरमन – II  की मृत्यु हुई.  वह् निस्संतान था. तकनीकी दृष्टि से पल्लव राज वंश का अंत ही हो गया था. इस स्थिति का साम्राज्य के दुश्मनों द्वारा फायदा उठाया जा सकता था.  इसी भय से तत्कालीन सेनापति उदयचंद्र ने सेना के दीगर प्रमुखों (दंड्नायक), बुद्धि जीवियों, प्रमुख व्यापारियों आदि से सलाह मशविरा किया. आम सहमति से एक मिला जुला प्रतिनिधिमंडल  कंबोज (कम्बोडिया) के लिए रवाना हो गया. उन दिनों कंबोज में कद्वेसा हरि वर्मा नामका राजा राज करता था जो मूलतः भारतीय पल्लव राजवंश के एक दूसरी शाखा से था. उसके चार पुत्र थे.  प्रतिनिधिमंडल ने राजा के पुत्रों में से किसी एक को काँचीपुरम की गद्दी संभालने के लिए आमंत्रित किया. चारों पुत्रों में से तीन ने तो इनकार कर दिया परन्तु चौथे पुत्र पल्लवमल्ल परमेश्वर (जो नंदिवर्मन के नाम से जाना जाता है) ने सहमति दे दी और प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आ पहुँचा था.

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Vaikunta Perumal Temple

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मन्दिर परिसर में प्रवेश के लिए एक द्वार युक्त सीधा सपाट मंडप है. एक और मंडप अन्दर है जिसके आगे मुखय मन्दिर.  अन्दर आप पायेंगे कि चारों तरफ़ पल्लवों के विशिष्ट शैली में बने खम्बों पर टिका गलियारा है.  दीवारों पर सैकड़ों आकृतियाँ द्रिश्टिगोचर होती हैं. ये सब के सब पत्थर के नहीं लगते.  इनमें से कई स्टुक्को (गचकारी से सज्जित) कारिगरि लगती हैं और इसलिए इनका अत्यधिक क्षरण हुआ है.  पल्लवों और चालुक्यो के बीच हुवे युद्धों को दर्शाया गया है और नंदिवर्मन के राज्याभिषेक आदि का भी चित्रण है. अधिक पढ़ें लिखे लोग दीवारों में भागवत तथा वैष्णव धर्म  के गूढ़ भावों को पाते हैं. गर्भ गृह के चारों तरफ़ परिक्रमा पथ है. गर्भ गृह के तीन तल हैं भूतल में बैठे हुए विष्णु की प्रतिमा है. तमिलनाडु पुरातत्व विभाग के  भूतपूर्व निदेशक श्री आर. नागस्वामी के मतानुसार यह मूर्ति वास्तव में श्री राम जी की है क्योंकि गर्भ गृह के प्रवेश द्वार के बाईं तरफ़ के खम्बे में बाली और सुग्रीव को युद्ध करते दर्शाया गया है.  प्रथम तल पर मूर्ति शयन मुद्रा में है और दूसरे तल में खड़ी  प्रतिमा है. प्रथम तल में लेटी हुई प्रतिमा के दर्शन केवल एकादशी के दिन ही सुलभ होती है.  दूसरा तल तो पहुँच के बाहर ही रखा गया है. ऊपर जाने और उतरने के लिए अगल बगल दो सीढ़ियाँ बनी है जो बाहर से दिखाई नहीं देतीं.  वैष्णव पंथियों के लिए यह मन्दिर बहुत ही महत्व रखता है क्योंकि यह भी 108 दिव्य स्थलों में एक है. हालाँकि यह मन्दिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है परन्तु यहाँ नियमित पूजा अर्चना होती है तथा गर्भगृह पंडितों के कब्जे में है.

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इस मन्दिर के साथ एक और अजीबो गरीब बात जुड़ी है. मन्दिर के बगल में एक मस्जिद दिखाई देगी जिसे नवाब सदातुल्लाह (मुहम्मद सय्यद) (1710 – 1732) ने बनवाया था.  मन्दिर के तालाब का ही इस्तेमाल मस्जिद वाले भी करते थे.  इस तरह भाइ चारे की एक मिसाल कायम की गयी थी परन्तु दुर्भाग्य से तालाब सूखा पड़ा है. 

इस मन्दिर के गूढ़ रहस्यों को जानना हो तो यह किताब बड़े काम  की होगी:
Dennis Hudson : The Body of God: An Emperor’s Palace for Krishna in Eighth-Century Kanchipuram , Oxford University Press, 2008