Archive for the ‘Kanchipuram’ Category

वैकुंठ पेरुमाल मन्दिर, काँचीपुरम

जून 18, 2013

पूर्व में काँचीपुरम के बारे में बताते  समय शायद हमने इस बात का भी जिक्र किया था कि यहाँ नगर दो भागों में बंटा है, एक शिव कांची दूसरा विष्णु कांची. इन दोनों समुदायों में प्रारंभ से ही होड़ चली आ रही है और अकसर ही आपस में उलझते  रहे हैं. शासकों के लिए भी धर्म संकट की स्थिति बनती थी. तुष्टिकरण की राजनीति तब भी विद्यमान थी. पल्लवों ने कैलाशनाथ का शिव मन्दिर जब 8 वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में बनवाया तब वैष्णवों ने अपने आपको राजा द्वारा उपेक्षित माना होगा.  पल्लव नरेश नंदिवर्मन- II (732 – 796), जो स्वयम एक विष्णु भक्त था,  ने एक विष्णु मन्दिर बनवा कर वैष्णवों के असंतोष का शमन किया. इस मन्दिर को ही आजकल वैकुंठ पेरुमाल मन्दिर कहते हैं. साहित्यिक संदर्भों में इस मन्दिर का उल्लेख “परमेश्वरा विन्नगारम” मिलता है. बनावट में यह कैलाशनाथ शिव मन्दिर से मेल खाता है. पल्लवों के द्वारा प्रारंभ में बनवाये गए किसी भी मन्दिर में प्रवेश के लिए राजगोपुरम की व्यवस्था नहीं थी.

IMG_2152

???????????????????????????????

???????????????????????????????

नंदिवर्मन से जुड़ी एक रोचक पहलू यह भी है कि वह् एक आयातित राजा था.  उसकी कहानी कुछ इस प्रकार है. सन् 730 के लगभग परमेश्वरवरमन – II  की मृत्यु हुई.  वह् निस्संतान था. तकनीकी दृष्टि से पल्लव राज वंश का अंत ही हो गया था. इस स्थिति का साम्राज्य के दुश्मनों द्वारा फायदा उठाया जा सकता था.  इसी भय से तत्कालीन सेनापति उदयचंद्र ने सेना के दीगर प्रमुखों (दंड्नायक), बुद्धि जीवियों, प्रमुख व्यापारियों आदि से सलाह मशविरा किया. आम सहमति से एक मिला जुला प्रतिनिधिमंडल  कंबोज (कम्बोडिया) के लिए रवाना हो गया. उन दिनों कंबोज में कद्वेसा हरि वर्मा नामका राजा राज करता था जो मूलतः भारतीय पल्लव राजवंश के एक दूसरी शाखा से था. उसके चार पुत्र थे.  प्रतिनिधिमंडल ने राजा के पुत्रों में से किसी एक को काँचीपुरम की गद्दी संभालने के लिए आमंत्रित किया. चारों पुत्रों में से तीन ने तो इनकार कर दिया परन्तु चौथे पुत्र पल्लवमल्ल परमेश्वर (जो नंदिवर्मन के नाम से जाना जाता है) ने सहमति दे दी और प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आ पहुँचा था.

IMG_2160

IMG_2163

Vaikunta Perumal Temple

IMG_2162

मन्दिर परिसर में प्रवेश के लिए एक द्वार युक्त सीधा सपाट मंडप है. एक और मंडप अन्दर है जिसके आगे मुखय मन्दिर.  अन्दर आप पायेंगे कि चारों तरफ़ पल्लवों के विशिष्ट शैली में बने खम्बों पर टिका गलियारा है.  दीवारों पर सैकड़ों आकृतियाँ द्रिश्टिगोचर होती हैं. ये सब के सब पत्थर के नहीं लगते.  इनमें से कई स्टुक्को (गचकारी से सज्जित) कारिगरि लगती हैं और इसलिए इनका अत्यधिक क्षरण हुआ है.  पल्लवों और चालुक्यो के बीच हुवे युद्धों को दर्शाया गया है और नंदिवर्मन के राज्याभिषेक आदि का भी चित्रण है. अधिक पढ़ें लिखे लोग दीवारों में भागवत तथा वैष्णव धर्म  के गूढ़ भावों को पाते हैं. गर्भ गृह के चारों तरफ़ परिक्रमा पथ है. गर्भ गृह के तीन तल हैं भूतल में बैठे हुए विष्णु की प्रतिमा है. तमिलनाडु पुरातत्व विभाग के  भूतपूर्व निदेशक श्री आर. नागस्वामी के मतानुसार यह मूर्ति वास्तव में श्री राम जी की है क्योंकि गर्भ गृह के प्रवेश द्वार के बाईं तरफ़ के खम्बे में बाली और सुग्रीव को युद्ध करते दर्शाया गया है.  प्रथम तल पर मूर्ति शयन मुद्रा में है और दूसरे तल में खड़ी  प्रतिमा है. प्रथम तल में लेटी हुई प्रतिमा के दर्शन केवल एकादशी के दिन ही सुलभ होती है.  दूसरा तल तो पहुँच के बाहर ही रखा गया है. ऊपर जाने और उतरने के लिए अगल बगल दो सीढ़ियाँ बनी है जो बाहर से दिखाई नहीं देतीं.  वैष्णव पंथियों के लिए यह मन्दिर बहुत ही महत्व रखता है क्योंकि यह भी 108 दिव्य स्थलों में एक है. हालाँकि यह मन्दिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है परन्तु यहाँ नियमित पूजा अर्चना होती है तथा गर्भगृह पंडितों के कब्जे में है.

???????????????????????????????

इस मन्दिर के साथ एक और अजीबो गरीब बात जुड़ी है. मन्दिर के बगल में एक मस्जिद दिखाई देगी जिसे नवाब सदातुल्लाह (मुहम्मद सय्यद) (1710 – 1732) ने बनवाया था.  मन्दिर के तालाब का ही इस्तेमाल मस्जिद वाले भी करते थे.  इस तरह भाइ चारे की एक मिसाल कायम की गयी थी परन्तु दुर्भाग्य से तालाब सूखा पड़ा है. 

इस मन्दिर के गूढ़ रहस्यों को जानना हो तो यह किताब बड़े काम  की होगी:
Dennis Hudson : The Body of God: An Emperor’s Palace for Krishna in Eighth-Century Kanchipuram , Oxford University Press, 2008

वरदराज पेरुमाल मन्दिर, काँचीपुरम

मई 3, 2013

IMG_2123

काँचीपुरम में एकाम्बरनाथ के शिव मन्दिर के बाद जो दूसरा सबसे बड़ा मन्दिर है वह् है विष्णु का जिसे वरदराज पेरुमाल कहते हैं.  एकाम्बरनाथ के मन्दिर के अन्दर ही एक और छोटा सा मन्दिर विष्णु के लिए बनाया गया था लेकिन यह तो नाइंसाफी थी इसलिए लाज़मी था कि विष्णु के लिए भी एक भव्य मन्दिर बने.  द्वैत और अद्वैत  का चक्कर कोई नया थोड़े ही है.  यह मन्दिर एकबारगी नहीं बनाया गया था वरन्‌ इसका विकास कई सदियों में हुआ है.  मूलतः यह मन्दिर चोल राजाओं द्वारा सन् 1053 में बनवाया गया था.  सन् 1316 से कुछ समय के लिए काँचीपुरम काकतीय वंश के प्रताप रुद्र देव (वारंगल) के आधीन भी रहा. तथाकथित 1000  खम्बे से युक्त मंडप (दोमंजिला) उनकी दैन है.  (इसी के भाई अन्नम देव ने बस्तर राजवंश की स्थापना की थी).  कुलोतुंगा चोला और विक्रम चोला के शासनकाल में मन्दिर का विस्तार हुआ.  14 वीं शताब्दी में एक दीवार और गोपुरम का निर्माण हुआ.  विजयनगर राजाओं का भी मन्दिर के विस्तार में बड़ा योगदान रहा है. परन्तु लोगों का मानना है कि इस मन्दिर को सर्वप्रथम पल्लव नरेश नंदिवर्मन (द्वितीय) ने बनवाया था. एक बात रोचक लगती है. एकाम्बरेश्वर (शिव) तथा वरदराज पेरूमल (विष्णु) मन्दिर दोनों ही 23 एकड़ की जगह घेरे हुए हैं. लगता है बँटवारा बराबरी का हुआ था. सन् 1532 (अच्युतराय, विजयनगर) का एक शिलालेख इन दोनों ही मंदिरों में पाया जाता है.  अच्युतराय ने दोनों मंदिरों को अतिरिक्त भूमि प्रदान करने का आदेश दिया था. वीर नरसिंह राय जिसके संरक्षण में काँचीपुरम को रखा गया था, ने एकाम्बरेश्वर (शिव) मन्दिर को अधिक भूमि प्रदान कर दी थी.  शिकायत मिलने पर अच्युतराय ने भूमि के बँटवारे को संतुलित किया था. यह मन्दिर भी वैष्णवों के 108 दिव्य स्थलों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

(संदर्भवश वरदराजा पेरुमाल नामका एक प्रभावशाली व्यक्ति श्रीलंका के उत्तर पूर्वी राज्य का मुख्य मंत्री भी हुआ करता था. लिट्टे उसके जान की दुश्मन बन गयी थी अतः 1990 में भारतीय शान्ति सेना के वापसी के समय वह् भी  स्वनिर्वासित  हो सपरिवार भारत चला आया . भारत सरकार ने उसे सुरक्षा मुहय्या करायी थी तथा वह् चंदेरी (मध्य प्रदेश) के किले में रहने लगा था. यहाँ से उसे अजमेर ले जाया गया था जहाँ वह् लगभग एक दशक तक रहा.)

जैसे हम शिव के विभिन्न नामों के साथ “ईश्वर” (पातालेश्वर, महाकालेश्वर) का प्रयोग करते हैं लगभग वही “पेरुमाल” का भी आशय है परन्तु ऐसा प्रयोग दक्षिण में वैष्णव पंथ से जुड़ा है.  इसी प्रकार शैव, देवी माता के लिए “अम्मान” का प्रयोग करते हैं और वैष्णव “थायार” का.

???????????????????????????????

???????????????????????????????

???????????????????????????????

???????????????????????????????

???????????????????????????????

???????????????????????????????यह दूसरा गोपुरम है. सामने है ध्वज स्थम्भ और ऊँचा मंडप

???????????????????????????????

पश्चिम की तरफ़ से (मुख्य द्वार) मन्दिर के अन्दर जाने पर एक विशाल क्षेत्र में 100 खम्बे वाला मंडप है जिसमें एक से एक कलात्मक प्रतिमाओं की भरमार है. इसके छत के चारों कोने पर एक ही शिला को तराश कर बनायी गयीं जंजीरें लटकी हुई है. ऐसी ही जंजीरें कुछ छोटे परन्तु ऊँचे मंडपों में भी kanchiलगी हैं. यह भी अपने आपमें अद्भुत है. इस मंडप के पीछे एक तालाब है. विष्णु की मूल प्रतिमा गूलर की लकड़ी से बनी थी जो इस तालाब में दबाकर रखी गयी है.  40 वर्ष में एक बार उसे बाहर निकाला जाता है. मुख्य मन्दिर/गर्भगृह एक टीले पर बना है जिसे हस्तगिरि कहा जाता है.  गर्भ गृह के दो तल हैं.  भूतल  में नरसिंह हैं और ऊपर प्रथम तल में विष्णु की खड़ी प्रतिमा है. उनके चेहरे की मुस्कुराहट देख् भक्त गण अभिभूत हो उठते है. एक अलग खंड के छत पर दो छिपकलियाँ बनी हैं. एक रजत की और दूसरी स्वर्ण की.  लोग इन्हें छूते हैं और मान्यता है कि ऐसा करने पर उनके दुखों का निवारण होता है. इनके पीछे भी कई मिथक हैं.  नजदीक ही लक्ष्मी जी (जिन्हें “पेरुन देवी थायार” संबोधित किया जाता है) एक अलग प्रकोष्ठ में विराजमान हैं.  अँगरेजों के शासनकाल में मेजर जनरल लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव के द्वारा इस मन्दिर के लिए बहुमूल्य आभूषण भेंट किए गए थे जिनका प्रयोग विशेष अवसरों पर किया जाता है.

???????????????????????????????

हमने इस मन्दिर का अवलोकन पूर्व  में भी किया था तब बहुत भीड़ थी. इस बार भरी दुपहरी में जाना हुआ था यह सोच कर कि आराम से घूम फिर सकेंगे परन्तु मन्दिर के पट तो बंद थे इसलिए इधर उधर देख् दाख  कर संतुष्ट हो लिए. इस्कान के द्वारा अपने कुछ अनुयायियों को यहाँ लाया गया था. अधिकांश भारतीय वेश भूषा में विदेशी थे. एक मंडप में बैठकर उनके खाने का कार्यक्रम चल रहा था. उनसे बातचीत तो नहीं हो पायी परन्तु उनके चित्र ले लिए थे और लौट पड़े.

???????????????????????????????

???????????????????????????????

???????????????????????????????

शाम हमारे ड्राइवर की कुछ आवश्यकता के कारण उस मन्दिर की तरफ़ दुबारा जाना हुआ और देखा कि भगवान गाजे बाजे के साथ अपने सायंकालीन हवाखोरी के लिए निकले थे.  उनकी सवारी के पीछे पीछे मन्दिर के पंडितों का एक समूह मंत्रोच्चार करते हुए चल रहा था.  हमारा ड्राइवर डेनियल उनका रास्ता काटते हुए सड़क को पार कर रहा था  और मैंने देखा कि उनमें से एक दो पंडित बौरा गए थे लेकिन कोई हंगामा नहीं हुआ.