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मसाला दोसा

अक्टूबर 16, 2012

पी.एन. संपत कुमार 

कोचीन शिपयार्ड

के आलेख का रूपांतर 

सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला नाश्ता क्या है. एक पत्रिका के साथ वितरित प्रश्नावली में पूछे गए इस सवाल का मेरा जवाब था “दोसा”.

चावल, उड़द और थोड़ी सी मेथी के खमीरीकृत   गीले आटे को तवे पे गोलाई में फैलाकर बनाया गया यह पकवान दक्षिण भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग है.  इस क्षेत्र के गृहणियों  में ऐसे बिरले ही होंगे जिन्होंने दोसा बनाने की कला में दक्षता हासिल न की हो. यहाँ के बच्चे भी नियमित रूप से नाश्ते में दोसा खाने से बचे नहीं होंगे. आश्चर्य नहीं है कि क्षेत्र की लोरियों में भी चाँद से दोसे की घुसपैंठ हो चली है.

इसके चचेरे भाई मसाला दोसा का आविष्कार किसी रचनात्मक होटल व्यवसायी द्वारा अधिक से अधिक एक शतक पूर्व ही किया गया होगा. बीच में आलू की सब्जी से भरा हुआ अर्ध चंद्राकर दोसा गरमा गरम साम्बार  और नारियल की चटनी के साथ, खावुओं की पहली पसंद रहती है. साधारण दोसे की तरह मसाला दोसा साधारणतया घरों में नहीं बनाया जाता. मुझे यकीन है कि दुनिया की किसी भी गृहणी ने कम से कम  मसाला दोसा बनाने की कला में दक्षता   तो हासिल नहीं की होगी. होटलों में मसाला दोसे की अत्यधिक मांग इस बात को प्रमाणित करता है.

मैसूर का नाम किसी न किसी तरह मसाला दोसा से जुड़ा हुआ है (मैसूर मसाला दोसा) और अपनी विशिष्टता की बखान करता लगता है. इससे ऐसा आभास होता है मानो कर्णाटक ही मसाला दोसे की जन्मस्थली रही हो. यही बात मैसूर रसम और मैसूर बोंडे (बोंडा = आलू बड़ा) के साथ भी लागू होती है. मैसूर राज्य ने, जो रसिक राजाओं की एक शक्तिशाली रियासत थी, बुद्धि जीवियों, कलाकारों, संगीतज्ञों के अतिरिक्त पाक शास्त्र में निपुण रसोईयों को भी आकृष्ट किया.  दुनिया भर में शाकाहारी होटलों के अधिपति उडुपी (कर्णाटक) के मूल निवासी शिवाली ब्राह्मणों नें ही कदाचित मसाला दोसे का प्रचार प्रसार किया हो. पूरे उत्तर भारत में मसाला दोसे को लोकप्रिय बनाने का श्रेय तो इंडियन काफी हाउस द्वारा संचालित होटल श्रंखला को ही देना होगा.

बचपन में तो मसाला दोसा के नाम से ही मुह में पानी भर आता था. उन दिनों होटलों में जाकर कुछ खाना हमारे लिए विलासिता की बात हुआ करती थी. किसी होटल में जाकर मसाला दोसा खाने का साहसिक कार्य मैंने ८ वीं कक्षा में पढ़ते समय किया था.मेरा एक मित्र हुआ करता था जो अपने ट्यूशन से बचने के लिए मुझे साथ ले लेता था और मैं भी अपने आखिरी पीरियड में स्कूल से कन्नी काट कर उसके साथ हो लेता. इस उपकार के एवज में वह मुझे स्कूल के नजदीक के कृष्ण भवन रेस्तोरां में मसाला दोसा खिलाया करता. उतना स्वादिष्ट मसाला दोसा मैंने जीवन में कभी और नहीं खाया है. उसकी सुगंध ही कुछ दिव्य हुआ करती थी. मेरे घर पहुँचने में हमेशा ही देर हो जाया करती थी.

दोसा खाने की शुरूआत एक किनारे से टुकड़ा तोड़ चटनी में डुबा  कर करनी होती है. जैसे जैसे हम बीच में भरे हुए मसालेदार आलू की तरफ बढ़ते जाते है परमानन्द की प्राप्ति होने लगती है. फिर आलू की सब्जी पर निशाना साधते हैं. बचे खुचे साम्बार या चटनी के साथ आखिरी कौर को उदरस्थ करना एवरेस्ट फतह या फिर किसी अच्छे नात या कव्वाली के अंतिम चरणों में पहुँचने का अहसास देता है.   दोसे के मसाले , साम्बार और चटनी की खुशबू मेरे हाथों में लम्बे समय तक बनी रहती थी और अक्सर ही मैं उस खुशबू को बनाये रखने के लिए  संध्या के उबाऊ खाने से परहेज करता. मसाला दोसे के लिए मैंने अपनी यारी बनाए रखी और डर बना रहता था कि घर में पोल न खुल जाए. अंततः मसाला दोसे की जीत हुई और पढाई में मैं फेल हुआ.

दक्षिण भारतीय होटल के मिस्त्रियों द्वारा मसाला दोसे के भौतिक एवं रासायनिक स्वरुप  पर अलिखित शोध प्रबंधनों का समुचित आदर सुनिश्चित किया जाता रहा है. उसे १५ से १८ इंच गोलाई लिए कुरमुरा होना चाहिए. सादा दोसे की तरह मसाला दोसे को पकाते  समय पलटा नहीं जाता.   जहाँ तक रासायनिक गुण धर्म की बात है,    घी में तले दोसे और अन्दर उपस्थित आलू मसाले की महक  दोसे के महीन छिद्रों से निकलकर  कुछ दूर से ही मिलने लगती है. स्थानीय छोटे छोटे तेज प्याज और हलकी हींग डाल कर बनायी गयी साम्बार, मसाला दोसे के जायके में सुहागे का काम करती है. मसाला दोसा के लिए निर्धारित अन्य गुणों में  उसे सुनहरा तो होना ही चाहिए और वृत्त के मध्य का भाग कुछ गहरा सुनहरा.

इसके बनाने में अच्छे कौशल की आवश्यकता होती है. हलके खमीर उठे गीले आटे को कटोरी में भरकर तवे में डाला जाता है और कटोरी के पेंदे से ही फैला कर गोलाई दी जाती है.  साधारण रोटी बनाने की तवा में बनाया तो जा सकता है परन्तु होटलों में प्रयुक्त होने वाला तवा लगभग ६/७ फीट लम्बा और २.५ फीट चौड़ा होता है. उस तवे पर एक ही बार में  ६ से १० दोसे बनाये जा सकते हैं. जब अंतिम दोसे को तवे पर फैलाया जा रहा होता है, पहला वाला, मसाला (आलू का मिश्रण) डाले जाने के लिए तैयार हो जाता है. उबले  आलू में  प्याज, अदरख, हरी मिर्च, हल्दी तथा करी पत्ता (मीठे नीम का पत्ता) आदि  मिलकर तेल में भूना जाता है. . मसालेदार आलू बनाए जाने की विधि गोपनीय रखी जाती है. जब तक आलू मसाला  तवे पर पड़े अंतिम दोसे पर पहुँचता है, पहला दोसा मोड़े जाने के लिए तैयार रहता है. इस तरह उन्हें अर्ध वृत्ताकार या  बेलनाकार मोड़ कर साम्बार और चटनी के साथ परोसा जाता है. आजकल कुछ जगहों में मसाला दोसे को नाना प्रकार के रूप में पेश कर कुछ रचनात्मकता लायी जा रही है.

कुछ बड़े हो जाने के बाद, जब भी शहर (त्रिचूर/त्रिशूर) जाना होता मैं हमेशा किसी ऐसे  होटल में जाया करता जहां मसाला दोसा अच्छी मिलती हो.  उनमें से प्रमुख होटल “पथन”, “अम्बाडी”, “द्वारका” और “भारत” हुआ करते थे. होटल भारत तो अब भी अस्तित्व में है और ख्याति  प्राप्त है परन्तु दूसरे सभी विलुप्त हो गए और  नए नए खुल गए हैं. मेरे वरिष्ट मित्र एक ‘मॉडर्न स्वामीस केफे’  के बारे में बात किया करते थे जो मसाला दोसा प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय था. लेकिन जब तक मैं कालेज में पहुंचा, वह होटल बंद हो चली थी.

राजकपूर और खुशवंत सिंह जैसे नामी गिरामी लोग भी इस अपेक्षाकृत सस्ती और स्वास्थ्य के लिए अहितकारी व्यंजन के  प्रशंसक रहे हैं. हमारे भूतपूर्व सेनाध्यक्ष सुंदरजी अपने संस्मरण में लिखते हैं कि युवा अवस्था में जब वे कश्मीर में थे तो सड़क किनारे के ठेलों/दूकानों से मटन करी से युक्त  मसाला दोसा नियमित खाया करते थे. इस अद्भुत डिश का ऐसा रूपांतरण पिछले कई वर्षों में हो चला है. मसाला दोसे ने विश्व भर की यात्रा कर ली है. अमरीका के व्हाईट हाउस में भी मेहमानों को विशेष अवसरों पर मसाला दोसा परोसे जाने की खबर है. मुझे विश्वास है कि दुनिया के हर शहर के होटलों में मसाला दोसा किसी न किसी रूप में अवश्य ही मिलती होगी.

परन्तु जब एक बार मैंने अपने बेटे से पूछा कि खाने के लिए क्या मंगाया जावे,  उसका तत्काल जवाब था “पिज्जा”. मैं गलत था जब मैंने प्रारंभ में  सबसे अधिक पसंद किये जाने वाले नाश्ते के लिए ‘दोसा’ चुना था. प्रचुर मात्रा में बहते हुए  चिप चिपे चीज़ पर शिमला मिर्च और टमाटर के बारीक टुकड़ों को फैला कर सजाई गयी  पिज्जा पर नमक तथा काली मिर्च का छिडकाव कर    एक टुकड़े  को काटने के विचार से ही उसके स्वाद तंत्र तांडव करने लगते हैं. उसके मन में अपने देसी मसाला दोसे के लिए ऐसी भावना कभी उत्पन्न नहीं हुई.

लेकिन मैं निराश नहीं हूँ. मेरे शहर कोच्ची में दोसे की  कोई बड़ी परंपरा तो नहीं रही है लेकिन ऐसी कुछ जगहें हैं जहाँ केवल दोसा ही मिलता है. “पई दोसा सेण्टर” में जो महात्मा गाँधी रोड पर है, ३६ प्रकार की दोसा मिलती है. मेरे घर के पास ही त्रिपुनितरा में एक “दोसा कॉर्नर” है  जिनकी विशिष्टता ही दोसा है जो ५०  प्रकार के हैं. यहाँ तो चोकोलेट दोसा भी उपलब्ध है. मुंबई के वाशी में तो यह संख्या सौ से ऊपर है. एक सर्वेक्षण के आधार पर अखबारों में भी आ चुका है कि भारत में ग्रहण करने के लिए सर्वोत्तम १० पकवानों में मसाला दोसा भी एक है.

अंतरजाल पर मसाला दोसा घर पर बनाए जाने हेतु विभिन्न रेसिपी उपलब्ध हैं लेकिन मैं कोई सुझाव नहीं दूंगा क्योंकि मैं नहीं  चाहता कि आप लोगों में से कोई भी घर पर मसाला दोसा बनाने का यत्न करे. इसका आनंद तो बाहर जाकर खाने में ही है.

तस्वीरें: अंतरजाल जिंदाबाद  (कुछ अपनी भी है)

चेन्नई की संगीत संध्याएँ

फ़रवरी 11, 2012

“मार्कज्ही”  का तामिल माह जो  उत्तर में मार्गशीर्ष या अगहन कहलाता है, दक्षिण में  अति महत्वपूर्ण माह होता है. प्रातः पौ फटने के पूर्व ही मंदिरों के पट खुल पड़ते हैं और दर्शनार्थियों  का तांता लग जाया करता है. मंदिरों की घंटियों की आवाज और संगीत लहरी पूरे वातावरण  को एक प्रकार से आध्यात्मिक बना देती है. महानगरों में कोलाहल के कारण  इस बात की अनुभूति उतनी तीव्र नहीं होती है परन्तु अन्य कस्बों और ग्रामीण अंचलों में तो एक अलग ही जज्बा होता है. चेन्नई में दिसंबर – जनवरी के बीच की यह अवधि पूर्णतः संगीतमय हो जाती है.  आलेख के शीर्षक में “संगीत संध्याओं” का उल्लेख किया है जबकि वास्तविकता तो यह है कि यह “संगीत” और “संध्या” तक सीमित नहीं हैं.  विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम यथा  गायन, वादन, नृत्य, नाटक आदि प्रातःकाल से ही प्रारंभ हो जाते हैं और दिनभर चलते रहते हैं. संगीत/नृत्य का यह वृहद् समारोह विश्व भर में सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है.

एक ही गायक/वादक  द्वारा ढाई से से तीन घंटे  तक   चलने  वाला शाश्त्रीय गायन/वादन कार्यक्रम यहाँ कचेरी (कचहरी का पर्याय) कहलाता है. मेरे भाई के पास  इस संगीत के मौसम में हो रहे कई “कचेरियों” के “पास” पड़े थे. आखिर क्यों न हो.  अपनी संस्था से कार्यक्रमों को  प्रायोजित करवाने में उसकी अहम् भूमिका जो रही होगी. हमने कह दिया ठीक है, चले चलेंगे. थोड़ी बहुत गोताखोरी  हम भी कर ही लेते हैं. बातों ही बातों में हमने पूछ डाला “भैय्या यह तो बताओ कि संगीत के कार्यक्रम को यहाँ कचेरी क्यों कहते हैं, कचेरी तो कोर्ट को कहते हैं” इसपर उसका  कहना था “कोर्ट तो कई प्रकार के हो सकते हैं. जैसे बेडमिन्टन  का कोर्ट, टेनिस का कोर्ट, या  ला कोर्ट, वैसे ही यहाँ “कचेरी” का प्रयोग संगीत के  कोर्ट के लिए हो रहा है”. कुछ कुछ तर्क संगत बातें थीं इसलिए हमने हथियार डाल दिए.

                                                 प्रिया बहनों द्वारा प्रस्तुति

जैसा सभी जानते ही हैं, दक्षिण में “कर्णाटक संगीत” का प्रचलन है जबकि उत्तर के शाश्त्रीय गायन शैली को “हिंदुस्थानी” कहा जाता है. हमारी स्थिति तो  बीन के आगे भैंस की है. मजबूरी में सुन लेते हैं. ऐसा नहीं है कि संगीत से हमने “खिट्टी” कर ली हो, “बुल्ले शाह” जैसे सूफियाना किस्म की गायकी हमें बड़ी प्रिय है. यहाँ के संगीत प्रेमियों में  हिंदुस्थानी पद्धति के प्रति कोई दुर्भावना नहीं दिखती क्योंकि राग रागिनियों में बहुत सारी समानताओं को वे स्वीकार करते हैं. उनसे पूछा जाए तो यही कहते हैं कि हिंदुस्थानी गायन की परंपरा “राज दरबार”, “कोठों” आदि को समर्पित रही और मूलतः मन बहलाने के लिए हुआ करती थी जबकि कर्णाटक संगीत  आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है. उत्तर वाले एक ही स्वर भाव में घंटों  गाते रहते हैं जबकि यहाँ  स्वरों के बीच डोलते रहते हैं. एक संगीत प्रेमी का कहना है कि हिंदुस्थानी संगीत भी कभी निर्मल और शुद्धता से परिपूर्ण रही परन्तु मुगलों के आगमन के पश्चात उसका कौमार्य जाता रहा. पंडित जसराज जी की यहाँ वाले बड़ी सराहना करते हैं यह कह कर कि वे ही हैं जिन्होंने हिंदुस्थानी संगीत की गरिमा को पुनर्स्थापित किया.

                                              अभिशेख रघुराम द्वारा प्रस्तुति                                                 संजय सुब्रमण्यम की प्रस्तुति

चेन्नई की कुछ पत्रिकाओं आदि से ज्ञात हुआ कि यहाँ संगीत प्रेमियों की बहुत बड़ी संख्या है और संगीत की गहराईओं में जाने की क्षमता भी. यहाँ ४० से ऊपर सभा गृह (आडिटोरियम) हैं जहाँ १४० से अधिक संघठनों द्वारा उनके चयनित सभा गृहों में ख्याति प्राप्त और अल्प ख्याति वाले कलाकारों की प्रस्तुतियां आयोजित की जाती हैं. इन सभी आयोजनों के बारे में विस्तृत जानकारी युक्त पुस्तकों का प्रकाशन भी कई संघठनों द्वारा किया जाता है और संगीत रसिकों के बीच वितरित होती हैं. सभा गृह में लोगों के हाथों में इन पुस्तिकाओं को देख कर लगा कि कार्यक्रम को  “कचेरी” इस लिए कहते हैं क्योंकि जानकारों के सम्मुख बेचारे कलाकार को शायद यह प्रमाणित करना पड़ता है कि उसकी प्रस्तुति दोष रहित है.

                                            नित्यश्री महादेवन द्वारा प्रस्तुति

कर्णाटक संगीत में  संत त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर, श्यामा शास्त्री, स्वाति तिरुनाल, पुरंदर दास, जयदेव, मीराबाई, कबीरदास,  सुब्रमनिया भारती आदि की रचनाओं/कृतियों की निर्दिष्ट रागों में गायन/वादन होता है. भाषा का कोई बंधन नहीं है. मसलन त्यागराज की रचनाएं तेलुगु में हैं (उनके पूर्वज आन्ध्र से तामिलनाडू आ बसे थे), पुरंदर दास जी ने कन्नड़ में लिखा है, सुब्रमनिया भारती की तामिल में, स्वाति तिरुनाल, जयदेव, कबीर  आदि की संस्कृत और हिंदी में हैं. हरेक कचेरी में गायकों  के द्वारा गायन के लिए चयनित सूची में उपरोक्त रचनाकारों की कृतियों का समावेश रहता है. संत त्यागराज जी सबके इष्ट हैं.  सन १७६७ में तामिलनाडू के तिरुवारुर में जन्मे संत त्यागराज ने लगभग २४००० कृतियों (गीतों) की रचना की थी जिनमे से अब ७०० कृतियाँ उपलब्ध हैं. गायकों को संगत देने के लिए मृदंगम, वायोलिन, घटम (मटका), ढपली  तथा तानपुरा का प्रयोग साधारणतया होता है परन्तु हारमोनियम कर्णाटक संगीत में निषिद्ध है.

अब तक इस वर्ष के कई सायंकालीन कचेरियों में सम्मिलित होने  और उस माहौल के रसास्वादन का अवसर मिला.  कचेरी अधिकतर ढाई से तीन घंटे की रहती है और शाम ६.०० या फिर ६.३० को प्रारंभ होती है. किसी भी  हाल में रात ९.३० बजे तक समाप्त हो ही जाती है. यहाँ देर रात (अपवादों को छोड़ कर) तक कार्यक्रम चलाने की परंपरा नहीं है. आयोजकों द्वारा समय की पाबन्दी का कठोरता से पालन होता है. कचेरी के प्रारंभ होने के पूर्व ही सभी अपना अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं और उनमें से बहुत सारे अपनी अपनी किताबें भी खोल लेते हैं. स्टेज के परदे खुलते हैं और तालियों की  गडगडाहट फिर एकदम शांति. सुई पटक सन्नाटा. गायन अलापना से प्रारंभ होता  है. सामने स्टेज  पर गाने वाले, गाने के अलावा ताल को बनाए रखने के लिए, अपनी हथेली का कई प्रकार से प्रयोग करते हैं. कभी हवा में हथेलियाँ हिलाई जाती हैं तो कभी अपने ही हाथों में थाप देते हैं और कभी अपनी जंघा पर प्रहार. कुछ अपनी आँखें बंद कर लेते हैं तो कभी एक कान को  उँगलियों से बंद कर लेते हैं. कभी कभी इतने ज्यादा हिलते डुलते हैं कि  उनके आवेश को देख उनके उठ खड़े हो जाने की आशंका हो जाती  है. रसिक श्रोताओं का भी कुछ कुछ ऐसा ही हाल रहता है. हम भी लोगों का अनुकरण करते हुए अपने सर को ताल के अनुसार हिलाते हुए झटके भी दे देते थे. एक बार तो नींद ही आ गयी परन्तु तालियाँ की गडगडाहट ने खलल डाल दिया. तत्काल हमने भी ताली बजा दी और सोचा कि शायद कचेरी समाप्त हो गयी है. परन्तु ये न हुआ. तालियाँ तो केवल एक अलापना के लिए बजाई गयी थी. फिर शुरू हुआ वायोलिन वादक द्वारा पूरे आलाप को दोहराया जाना. अभी उसने  अपना वादन बंद ही किया था तो मृदगम बज उठा वह भी उतनी ही देर फिर घटम (मटका).  मैंने इस आलेख को लिखे जाने तक कुल सात कचेरियों को झेल लिया है और तीन कचेरियों में मृदंगम वादक एक श्री पत्री सतीशकुमार ही थे. लगता है वे काफी प्रतिष्ठित हैं इसलिए उन्हें ही बुलाया जाता है. वैसे हुनरमंद लगे. तिरुपति के बालाजी मंदिर के कुछ पर्वों को विषय बनाकर भरतनाट्यम शैली में  १८ कन्यायों द्वारा एक न्रित्य नाटिका भी देखने का अवसर मिला जो चित्ताकर्षक रहा.

सुश्री चारुलता मणि  का गायन सुनकर मन बड़ा प्रफुल्लित हो गया क्योंकि ऐसा  लग रहा था मानो कोल्हापुर में बैठ कर संगीत का आनंद ले रहे हों. हाल में स्थान ग्रहण करने के बाद  स्टेज पर देखा तो तबला और हारमोनियम वादक दिखे थे, कुछ अन्य वाद्य भी थे, जो यहाँ के आयोजनों में आम नहीं है. कर्नाटक संगीत में भी उन वाद्यों का  प्रयोग हुआ परन्तु बात बाद में समझ आई जब अभंग गाये गए. संत तुकाराम की रचना “सांवरी सुन्दर रूप मनोहर” के  गायन से तो गदगदायमान हो गए. पंडित भीमसेन जी को सुना है परन्तु यहाँ की प्रस्तुति बेहद प्यारी लगी.

                          एक कार्यक्रम की समाप्ति पर श्रोताओं द्वारा तालिओं से गायक का सम्मान                                                       सभा विसर्जन

स्त्रियाँ (यहाँ उन्हें आदर से  “मामी” कह कर संबोधित किये जाने की परंपरा है) कांजीवरम (रेशमी) परिधान में सज धज कर आती हैं मानो किसी शादी/विवाह में आ रही हों. इस प्रकार के आयोजनों का एक सामाजिक पहलू यह भी है कि नए लोगों से मुलाक़ात/पहचान हो जाती है और कभी कभी रिश्ते बनाने में भी सहायक रहती है. लगभग सभी सभा गृहों के परिसर में केन्टीन भी होते हैं जहाँ                                        चित्र डेकन क्रोनिकल से साभार

अपेक्षित गुणवत्ता के पारंपरिक व्यंजन उपलब्ध रहते हैं. संगीत सभाओं में नियमित जाने वालों को इस बात का पता रहता है कि किस सभा भवन में कौन सी चीज लज़ीज़  होती है.  यहाँ तक कहा जाता है कि बहुत सारी मामियां तो केंटीनों के सहारे रहकर महीने भर अपना चौका बंद रखती हैं.

                                                                      हाल के बाहर सीडियों (CDs) की खरीददारी                                                                                                अब सब घर चले

चलते चलते एक बात और बताना होगा. इस आलेख में जिन कचेरियों के बारे में कहा गया है, वे सब तथाकथित अभिजात्य वर्ग के लिए ही आयोजित किया गया प्रतीत होता है. बताया गया है कि सुबह और दिन के आयोजन निःशुल्क होते हैं. परन्तु इन आयोजनों में उदयीमान कलाकारों की प्रस्तुतियां ही रहती हैं.  नामी गिरामी कलाकारों द्वारा आम आदमी के लिए विशेष आयोजन खुले में, मंदिरों के प्रांगण, बागीचों और क्रिकेट मैदान आदि में होते हैं.