Archive for the ‘Madhya Pradesh’ Category

गढ़ कुंडार

अप्रैल 17, 2013

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बुन्देलखण्ड में कुछ वर्षों के प्रवास से मुझे कुछ ऐसा एहसास हुआ कि यहाँ हर 10 वां व्यक्ति अपने आपको राजा काहलवाना  पसंद करता है.  नाम भी वैसे ही हैं.  बंदूकों से लोगों का बड़ा लगाव है.  बाज़ारों में अधिकतर लोगों को कंधों पर बंदूक लटकाये  देखा जां सकता है. कभी कभी तो दो दो बंदूकें लटकाये रहते हैं.  लैसेंसी बंदूक ना मिलें तो फिर देसी ही सही.  लुगासी जैसे जगहों में तो बड़े सस्ते में मिल जाता है.  बुन्देलखण्ड में “किलों” की भी भरमार है. “जिते देखो उते किलो है”  यह अतिशयोक्ति नहीं है.  गाँव में संपन्न लोग भी किले नुमा माकानों में रहते हैं.  इसके विपरीत गरीबी और अशिक्षा का बोलबाला भी है. मुझे लगा कि यहाँ लोग अपने आपको कितना असुरक्षित महसूस करते हैं.  इतने अधिक किलों/गढ़ों की जरूरत भी शायद इसी लिए पड़ीं होगी.

एक बार सोचा था कि यहाँ के किलों का सर्वेक्षण किया  जावे परन्तु उन दिनों हम फुर्सतिया नहीं थे फिर भी यदा कदा समय चुरा ही लिया करते थे.  टीकमगढ़ से 80 किलोमीटर दूर् निवाड़ी नाम की एक जगह है. यहाँ से झाँसी की तरफ़ थोड़ा जाकर दाहिनी तरफ़ एक पक्की (अब) सड़क सेंदरी नामके गाँव को जाती है. इसी मार्ग पर 20/22  किलोमीटर की दूरी पर एक उजाड से पहाड़ी पर एक किला अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए संघर्षरत है.  शायद संघर्षरत रहना उसकी नियति रही है.    यही गढ़ कुंडार है जिसे संभवतः डा. व्रिंदावन लाल वर्मा जी ने इसी नाम से लिखित उपन्यास के द्वारा गुमनामी से मुक्ति दिलायी.  लगभग 10/12 किलोमीटर चलने के बाद ही हमें वह् गढ़ दिखने लगा था. रास्ता एक प्रकार से चंबल के बीहड़ों जैसा ही था. बेशुमार टीले और खाइयों के बीच से गुजर रहे थे. हरियाली का नामों निशान नहीं था. एकदम बंजर भूमि. कुछ ही देर में गढ़ अचानक अंतर्ध्यान हो गया . ज्यों ज्यों आगे बढ़ते जाते, गढ़ की लुका छुपी चलती रहती थी.  एकदम क़रीब पहुँचने के बाद भी गढ़ ओझल ही रहता. जब कि वह् एक पहाड़ी पर बना है.

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आखिरकार हम लोग पहुँच ही गए. पथरीले ढलान को चढ़ कर मुखय द्वार से प्रवेश कर गए.  गढ़ बड़ी ही जर्जर अवस्था में थी. चारों तरफ़ मलवा बिखरा हुआ.  वैसे तो भवन सात मंजिला है परन्तु वहाँ के कक्षों का अवलोकन दुष्कर लगा. बीचों बीच एक बड़ा दालान है और वहाँ भी कुंड जैसा कुछ बना है जिसमें कुछ गुप्त द्वार जैसे हैं. शायद पानी संग्रहीत करने के उद्देश्य से बना हो. एक बड़ा हवन कुंड जैसा भी कुछ था. गलियारे में भी ईंट पत्थर बिखरे पड़े थे.  नीचे चारों तरफ़ छोटे छोटे कमरे बने हैं जिन्हें “कोटर” कहा गया जिनकी छतों में छिद्र बने हैं जिनसे छन छन कर प्रकाश आता रहता है. बताया गया कि यहाँ सैकड़ों तल घर भी बने हैं. कुछ छोटे कमरों में तो छोटी छोटी सीढ़ियाँ भी दिख रही थीं. ऐसे निर्माण का मकसद समझ में नहीं आया.  हालाँकि यह करतूत किसी “बौना चोर” की बतायी गयी थी, अनुमान है कि वे अन्न संग्रह कर रखने हेतु कोठार रहे हों. यहाँ आकर ऐसा लगा मानों किसी  भूल भुलैय्ये में आ गए हैं.  ऊपर से सन्नाटा. ऊपरी मंजिलों में  जाकर देखने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. ऊपर का निर्माण ईंटों का है और कई चरणों में पूरा किया गया है. गढ़ चारों तरफ़ से परकोटे से घिरा है परन्तु जगह जगह खंडहर में तबदील हो चुका है. ऊपर चारों तरफ़ कोनों पर मीनारों का अस्तित्व अभी शेष है. बाहर से गढ़ चारों तरफ़ एक जैसा ही दिखता है.

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इस किले का इतिहास भी कुछ कुछ अनबूझ पहेली जैसा लगता है. यहाँ चंदेलो का पह्ले से ही एक किला था जिसे जिनागढ के नाम से जाना जाता था. खंगार वंशीय खेत सिंह बनारस से 1180 के लगभग  बुंदेलखंड आया और जिनागढ पर कब्जा कर लिया. उसने एक नए राज्य की स्थापना की.  उसके पोते ने किले का नव निर्माण कराया और गढ़ कुंडार नाम रखा. खंगार राजवंश के ही अन्तिम राजा मानसिंह की एक सुंदर कन्या थी जिसका नाम केसर दे था. उसका सौंदर्य दिल्ली तक ख्याति प्राप्त था. दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद तुगलक ने उस कन्या से शादी करने का प्रस्ताव भेजा परन्तु यह मान्य नहीं था. अतः सन् 1347 में मोहम्मद तुगलक की सेना ने गढ़ कुंडार पर आक्रमण कर किले को अपने कब्जे में ले लिया. किले में स्थित केसर दे और अन्य महिलाओं ने अपनी अस्मिता को बनाए रखने के लिए किले के अन्दर बने कुवें  में कूद कर अपनी जान दे दी थी.  केसर दे के जौहर की गाथा लोक गीतों में भी पायी जाती है.  मोहम्मद तुगलक ने किले और  विजित भूभाग को बुंदेलों  को सौंप दिया. सन् 1531 में राजा रुद्र प्रताप ने बुंदेलों की राजधानी गढ़ कुंडार से ओरछा स्थानांतरित कर दी थी. बुंदेला शासक वीर सिंह जूदेव ने गढ़ कुंडार की मरम्मत भी करवाई थी. एक दूसरी कहानी भी है जिसमे मोहम्मद तुगलक के आक्रमण का ज़िक्र नहीं है बल्कि सन् 1257 में सोहनपाल  बुंदेला द्वारा छल कपट से खंगारों के कत्ले आम का उल्लेख मिलता है.

वापस लौटते समय गिद्ध वाहिनी मन्दिर में भी जाना हुआ था परन्तु वह् कुछ आजकल के छोटे मंदिरों जैसा था जहाँ कुछ मूर्तियों को कहीं से संग्रहीत कर दीवार पर चुन दिया गया है.

एक बुंदेली कवि अशोक सूर्यवेदी ने गढ़ कुडार (कुंडार) की प्रतिष्ठा में लिखा है:

ओ गौरव के महा महल तुम , किस कारण बदनाम हुए !
इतिहासों के पन्नों में भी , किस कारण गुमनाम हुए !
मैंने ढूंढा इतिहासों में , मुझे न तेरा नाम मिला !
और देख कर लगता तुझको , मुझको मेरा धाम मिला !

सभी चित्र अंतर्जाल से 

सफलता के लिए उद्यम – सम्राट अशोक उवाच

अप्रैल 18, 2012

आज विश्व धरोहर दिवस है. अपने आसपास बिखरे धरोहरों को संरक्षित रखने में सहायता करें.

सदियों पहले से विभिन्न राजाओं के द्वारा अपनी शौर्य गाथा के प्रचार के लिए शिलालेखों  का प्रयोग होता रहा है. ऐसे लेखों को हम प्रशश्ति लेख कहते हैं. सम्राट अशोक के लेख कुछ लीक से हटकर हैं. थके हारे राजा और मकड़ी क़ी कहानी पढ़कर मुझे अशोक के ऐसे एक लेख क़ी याद आ गयी जिसमे प्रेरणा निहित है. जबलपुर से चलकर कटनी क़ी ओर जाने पर सलीमनाबाद के निकट रूपनाथ का शिलालेख जो संदेश दे रहा है, वह आज के परिवर्तित परिस्थितियों में भी मायने रखती है. शिलालेख का  हिन्दी में रूपांतर रायपुर स्थित संग्रहालय द्वारा प्रकाशित “उत्कीर्ण लेख” से उद्धृत किया गया है.

“देवताओं के प्रिय ऐसा कहते हैं – ढाई बरस से अधिक हुआ क़ि मैं उपासक हुआ पर मैने अधिक उद्योग नहीं किया. किंतु एक बरस से अधिक हुआ जब से मैं संघ में आया हूँ तब से मैने अच्छी तरह उद्योग किया है. इस बीच जम्बूद्वीप में जो देवता अमिश्र थे वे मिश्र कर दिए गये हैं (?!). यह उद्योग का फल है. यह (फल) केवल बड़े ही लोग पा सकें ऐसी बात नहीं है क्योंकि छोटे लोग भी उद्योग करें तो महान स्वर्ग का सुख प्राप्त कर सकते हैं. इसलिए यह शासन लिखा

गया क़ि छोटे और बड़े (सभी) उद्योग करें. मेरे पड़ोसी राजा भी इस शासन को जाने और मेरा उद्योग चिर स्थित रहे. इस बात का विस्तार होगा और अच्छा विस्तार होगा; कम से कम डेढ़ गुना विस्तार होगा. यह शासन यहाँ और दूर के प्रांतों में पर्वतों क़ी शिलाओं पर लिखा जावे. जहाँ कहीं शिलास्तंभ हों वहाँ यह शिलास्तंभ पर भी लिखा जावे. इस शासन के अनुसार जहाँ तक आप लोगों का अधिकार है वहाँ आप लोग सर्वत्र इसका प्रचार करें. यह शासन उस समय लिखा जब (मैं) प्रवास कर रहा था और अपने प्रवास के २५६ वें पड़ाव में था.”

रूपनाथ  क़ी जबलपुर से  दूरी लगभग ८० किलोमीटर  है और अपने प्राचीन शिवलिंग के लिए अधिक जाना जाता है. संभवतः अशोक के प्रवास के समय भी वहाँ कोई हिंदू धार्मिक स्थल (शिव मंदिर) रहा होगा.

 यह आलेख चार वर्ष पूर्व भी प्रकाशित किया था परन्तु सौभाग्य से किसी ने भी नहीं पढ़ा.