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ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय पक्षी – एमु

दिसम्बर 28, 2011

२५ दिसंबर ईसाई मतावलंबियों का बड़ा दिन था परन्तु इस बार यह रविवार को पड़ा. नौकरी पेशा वालों की एक छुट्टी गयी. हम कोयम्बतूर में अपने भाई साहब के घर थे. एक छुट्टी के इस तरह बर्बाद होने से हमारा भतीजा दुखी था. हमने सुझाया चलो कुछ आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया जावे. यहाँ से कुछ ३० किलोमीटर की दूरी पर एक बाबाजी ने (सदगुरु) कुछ विशिष्टता लिए एक ध्यान केंद्र बना रखा है. हमारी बात निरर्थक नहीं गयी और वहां के लिए निकल पड़े. उस पर अलग से लिखना होगा. बाद के लिए सुरक्षित कर रखा है.  दुपहर के बाद वहीँ से एक निकटस्थ जलप्रपात को भी देखने गए, इस की भी चर्चा बाद में ही करना चाहूँगा. जलप्रपात की ओर जाते हुए रास्ते में एक सूचना पट्ट दिख गया था जिसमें किसी “एमु” फार्म का उल्लेख था. हमने कह दिया, जलप्रपात को मारो गोली, हम तो एमु फार्म देखना चाहेंगे. तब भाई ने समझाया, समय बहुत है, लौटते में वहां चलेंगे. बात हमें भी जम गयी थी.

वापसी  में “मदमपट्टी” नामके कस्बे में पहुंचे जहाँ के तिगड्डे में  हमने एमु फ़ार्म के बोर्ड को देखा था.  वहां पूछ ताछ करने पर कुछ पता नहीं चला.  एक दूकान जहाँ मुर्गियां आदि बिक रही थी, वहां हमें बड़ी उम्मीद  थी परन्तु वहां के  दूकानदार को एमु के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. अंत में  एक सज्जन जानकार निकले. उन्होंने उस तिगड्डे से निकलने वाली सड़क पकड़ कर ४ किलोमीटर तक बगैर इधर उधर मुड़े सीधे  जाने को कहा और बताया कि एक गाँव “करडीमडई ” आएगा वहां श्री जयराज का घर पूछ लें क्योंकि वे ही हैं जो एमु पाल रखे हैं. हम लोग ख़ुशी ख़ुशी उस नए रास्ते पर चल पड़े और गाडी के मैलोमीटर को भी देख लिया. कुछ दूर चलने के बाद हमारी बहू ने आवाज़ लगाई, गाडी रोको,  सड़क के किनारे एक बड़ा  पक्षी पंख फैलाये हुए है. गाडी रोक दी गए और पैदल ही पीछे चल पड़े. वहां सड़क के किनारे एक रंग बिरंगे परों वाली पक्षी (टर्की) अपने प्रणय निवेदन युक्त नृत्य लीला में व्यस्त था. उसकी माशूका वहीँ बगल के झाड़ियों में दिखी भी. यह कदापि जंगली तो नहीं था क्योंकि वहां आसपास आबादी थी.और कुछ  चलने के बाद “करडीमडई” पहुँच गए. एक सुन्दर सा गाँव जहाँ सभी पक्के मकान थे. एक पीपल के पेड़ युक्त चौपाल भी था. पेड़ के नीचे ढेरों नंदी तथा सर्प मूर्तियाँ ऐसे ही पड़ी थीं. वहीँ हमें श्री जयराज भी मिल गए और हमारा मंतव्य जानकर सम्मान से अपने फ़ार्म को दिखाने ले गए.

“एमु” आस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय पक्षी है. शुतुरमुर्ग के बाद एमु ही विशालतम है और पंखों के होते हुए भी उड़ने में असमर्थ. दौड़ते समय यह ५० किलोमीटर की गति प्राप्त कर सकती है और  ९ फीट तक का छलांग लगा सकती है.   ऊँचाई लगभग ६ फीट की होती है जो उसे डेढ़ साल की अवस्था में  ही प्राप्त हो जाती है. वजन ४० से ६० किलो तक हो सकती है. इसके मांस में वसा  मात्र २ प्रतिशत ही पायी जाती है अतः मांसाहारियों में लोकप्रिय हो चली है. इसके शरीर से जो तेल निकलता है, औशधीय गुणों से युक्त बताया जाता है और दर्द निवारक के रूप में, प्रसाधन सामग्रियों तथा केश तेल आदि में प्रयोग किया जाता है. मानव शरीर पर इस तेल की अनुकूलता अभी भी प्रश्नों के घेरे में है. प्रति एमु से  लगभग ६ वर्ग फीट चमड़ा प्राप्त होता है जिसका प्रयोग वस्त्र निर्माण में किया जाता है.  पैरों का चमड़ा भी मगरमच्छ के चमड़े जैसा दीखता है और विभिन्न आकर्षक वस्तुओं के निर्माण में लिया जाता है. इसके नाखून भी लोकेट की जगह हार में लगाये जाते हैं. एमु का प्रजनन काल भारत में ओक्टूबर से फरवरी के बीच होता है और इस दौरान एक मादा ३० अंडे तक देती है.  एक अंडे का वजन लगभग आधा किलो होता है जो  हरे रंग का होता है. अंडे सेने का काम नर एमु करता है और ५२ दिनों में चूजे निकल आते हैं.

जयराज जी का फार्म उनके घर से लगा हुआ है. एक बाड़े में जो तार की जालियों से फेंसिंग किया हुआ था, कुल २४ एमु रखे गए थे. उनमें से एक की गर्दन में कुछ घाव सा था जिसके कारण उसे एक अलग बाड़े में रखा गया था. हम तो बड़े उत्साहित थे अतः इसके पहले कि कुछ बातचीत हो, हम तस्वीर लेने की जुगाड़ में थे. जाली आड़े आ रही थी. जब उसकी छेद में कैमरे की लेंस लगाकर तस्वीर लेने की कोशिश कर रहा था तब एक दूसरे मनचले एमु ने मेरे केमरे से बंधी डोर को अपनी चोंच से दबोच लिया. जोर आजमाइश के बाद ही मुझे अपना केमेरा मिल सका. इन पक्षियों में अत्यधिक  कौतूहल था  और बड़े मिलनसार भी लगे क्योंकि लगभग पूरे के पूरे हम लोगों से मिलने जाली से सटकर  खड़े हो गए थे.जयराज जी ने बताया कि एमु पक्षियों का पालन अब कोयम्बतूर में भी जोर पकड़ रहा है. एक इकाई ६ पक्षियों की होती है. प्रति इकाई के लिए लगभग एक सेंट (४३६ वर्ग फीट) जगह की जरूरत होती है. उनके पास अभी ६ इकाईयां (२४ पक्षी) हैं. पक्षियों की प्राप्ति ईरोड स्थित एक बड़ी कम्पनी से होती है जिनके पास हेचरी सहित पूरी व्यवस्थाएं हैं. प्रति इकाई के लिए १.५ लाख रुपयों की अमानत राशि जमा करनी होती है एवज में ईरोड की कम्पनी कृषक के फार्म में बाड़ लगा कर ३ माह की आयु वाले एमु छोड़ जाती है. पक्षियों के लिए आहार भी कम्पनी ही प्रदान करती रहती है. पक्षियों का बीमा भी कम्पनी द्वारा ही कराया जाता है. पखवाड़े में एक बार कम्पनी का चिकित्सक आकर  पक्षियों की जांच कर लेता है और आवश्यक हुआ तो दवाईयां भी निःशुल्क प्रदान की जाती हैं. कृषक (संरक्षक) को केवल दाना पानी ही देना होता है और एवज में कम्पनी हर माह ६००० रुपये अदा करती है. वर्ष में बोनस सहित कुल ८४,००० रुपयों की आय होती है. जब एमु बड़े होकर अंडे देने योग्य हो जाते हैं (१४ से १८ महीनों में) तब कम्पनी उन्हें उठा ले जाती है और पुनः उतने ही चूजे छोड़ जाती है. जयराज जी ने बताया कि कम्पनी ले जाए गए एमुओं का वध कर उससे प्राप्त मांस, तेल, पर आदि का निर्यात किया जाता है. कुल मिलाकर जयराज जी  बड़े संतुष्ट लगे और उनका कहना भी था कि यह धंदा उनके लिए बड़ा फायदेमंद साबित हुआ है.

इस आलेख को लिख ही रहा था जब मुझे सूचित किया गया की तामिल अखबार में एक दूसरे कम्पनी का  विज्ञापन आया है और वे ६००० रुपयों की जगह ८००० रुपये प्रति माह एमु पालक (कृषक) को प्रदान कर रहे हैं.

विश्व के कई अन्य देशों में तो एमु पालन हो रहा है परन्तु भारत में सर्वप्रथम १९९८ में आंध्र प्रदेश के एक उद्यमी ने इसे प्रारंभ किया था. आंध्र प्रदेश के अतिरिक्त अब महारष्ट्र, तामिलनाडू तथा कुछ कुछ केरल और कर्नाटक में भी इस व्यवसाय ने अपने पैर पसार लिए हैं.

कन्हेरी की गुफाएं

मार्च 17, 2010

वर्षों पूर्व सतवाहन राजवंश के पदचिन्हों के अध्ययन में हम कन्हेरी, नानेघाट और नासिक (पांडव लेणी) गुफाओं में उपलब्ध शिलालेखों से अवगत हुए थे. तब से ही निरंतर उत्सुक रहे क़ि कब अवसर मिले क़ि हम इन  अति प्राचीन पुण्य स्थलों  का भ्रमण कर सकें और कुछ पल उस युग के अहसास में खो जाएँ.

पिछले वर्ष मुंबई प्रवास में हमने अपना  मन बना लिया क़ि कोई साथ दे न दे हम तो कन्हेरी (कृष्णगिरी) हो आयेंगे. वैसे साथ देने के लिए हमारा पुत्र तो था ही. संयोगवश हमारे छोटे साले साहब भी झट तैयार हो गए. दादर रेलवे स्टेशन से हम लोगों ने बोरिवली के लिए  लोकल (पश्चिम रेलवे) से निकल पड़े. ३० या ४० मिनटों में ही हमलोग बोरिवली में थे. दिन के पौने बारह का समय हो चला था तो सोचा क्यों न पहले पेट पूजा हो जावे. नजदीक के एक भोजनालय में अच्छा खाना भी मिल गया. उसके बाद एक ऑटो वाले से संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान चलने को कहा. मिनटों में हम लोग राष्ट्रीय उद्यान के सामने थे. किराया मात्र १० रुपये. मुख्य द्वार से प्रवेश शुल्क देकर अन्दर हो लिए. प्रसन्नता हुई क़ि कन्हेरी जो वहां से लगभग ६ किलोमीटर अन्दर जंगल में है, की ओर जाने के लिए पर्यटन विभाग की बस खड़ी मिली. मालूम हुआ क़ि हम लोगों को प्रति व्यक्ति २० रुपये देने होंगे. बस के चालक ने बताया क़ि पर्याप्त मात्र में यात्री होने पर ही बस जायेगी. वहां उस समय चार पांच लोग ही थे. प्रतीक्षा करते रहे परन्तु बात नहीं बनी. कुछ देर में एक निजी वाहन आ खड़ा हुआ और उसके चालक ने हम लोगों को ले चलने की पेशकश की. वाहन में पहले से ही कुछ लोग थे. हम तीनों के लिए १०० रुपयों की  मांग की गयी और हम लोग गाडी में सवार हो गए. घन घोर और एकदम हरे भरे जंगल को भेदते हुए हमारी गाडी आगे बढती गयी. मुंबई वासियों के लिए प्रदूषण मुक्त श्वसन के लिए अनुकूल. दस मिनटों में ही हम लोग एक पहाड़ के तलहटी में थे जहाँ पुरातत्व विभाग का सूचना फलक और प्रवेश शुल्क वसूली की  व्यवस्था थी. हम लोगों को लाने वाली  गाडी  वहीँ पार्किंग में चली गयी यह बताते हुए क़ि हम लोगों को  दो घंटे में वापस आना होगा.  हम लोग खरामा खरामा चल पड़े उन सीढ़ियों पर जो चट्टान को तराश कर बनाये गए थे.

कन्हेरी के गुफाओं के समूह को भारत में विशालतम माना जाता है. एक ही पहाड़ को तराश कर लगभग १०९ गुफाओं  का निर्माण अन्यत्र नहीं है. यह बौद्ध धर्म के शिक्षा का एक बड़ा केंद्र रहा है चाहे वह हीनयान का हो या फिर महायान का. पश्चिम भारत में सर्वप्रथम बौद्ध धर्म सोपारा में ही पल्लवित हुआ था जो कभी अपरान्तक (उत्तर कोंकण) की राजधानी रही. उसी समय से कन्हेरी को जो सोपारा के करीब ही है, धार्मिक शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित किया जाता रहा.  इस अध्ययन केंद्र का प्रयोग निरंतर ११ वीं सदी तक किया जाता रहा है. बौद्ध धर्म के उत्थान एवं पतन तक. कन्हेरी की गुफाओं के प्रारंभिक निर्माण  को ३ री सदी ईसापूर्व का माना जाता है. और अंतिम चरण के निर्माण को ९ वीं सदी का. प्राम्भिक चरण हीनयान सम्प्रदाय का रहा जो आडम्बर विहीन है. गुफाओं में प्रतिमाओं को भी नहीं उकेरा गया है. सीधे सादे कक्ष. दूसरी तरफ अलंकरण युक्त गुफाएं महायान सम्प्रदाय की मानी जाती हैं.

प्रथम चरण की सीढ़ियों को चढ़ लेने पर एक समतल भूमि मिली और सामने दृष्टिगोचर  हो रहा था, पहाड़ियों को काट कर बनायीं गयी गुफाएं. चट्टान जहाँ सबसे ऊंची थी वहां पहाड़ को तराश कर बनाया गया भवन हमें कुछ देखा सा लग रहा था. मस्तिष्क पर जोर डाला तो हमें अपने भ्रम का बोध हुआ.जोर्डन का पेट्रा जैसा लग रहा था. वहां भीड़ भी थी. सर्वप्रथम वहीँ चले गए. वाह्य अलंकरण तो लेश मात्र.  परन्तु अन्दर प्रवेश करने पर आँखें चौंधिया गयीं. बायीं तरफ बुद्ध  की वरद मुद्रा में खड़ी प्रतिमा, विशाल मंडप, एक विशालकाय हाल, दोनों तरफ अलंकरण  युक्त खम्बे, छत गोलाई लिए हुए   और हाल के अंत में पत्थर को ही तराश कर बनाया गया एक स्तूप. हमने जोर से कहा, यह तो हमारे लिए अविस्मरणीय  रहेगी. हमारे छोटे साले साहब, जो साथ ही थे, ने कहा  “आप लोनावला के पास कारला नहीं गए हो. वहां का चैत्य गृह इससे भी विशाल है और कारीगिरी उच्चकोटि  की है”. कुछ देर में ही हमें भी लगने लगा की भले ही परिश्रम अत्यधिक रहा हो परन्तु कलात्मकता का आभाव था. दोनों और बने खम्बों में एकरूपता नहीं थी. दाहिनी तरफ के अंतिम  ६ खम्बे तो यों ही चौकोर तराशे गए हैं. खैर तो यह था बौद्ध भिक्षुओं के लिए आराधना स्थल. इसे गुफा क्रमांक ३ कहा गया है और वहां के  सभी गुफाओं में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है. यह २६.३६ मीटर लम्बा, १३.६६ मीटर चौड़ा और १२.९ मीटर ऊंचा है. इसका निर्माण कार्य सतवाहन शासक यज्ञं   श्री सतकरनी के शासनकाल (१७२ – २०१ ईसवी) में प्रारंभ किया गया था. सतवाहन वंश का वह अंतिम प्रतापी राजा था.   यज्ञं  श्री सतकरनी के मरणोपरांत साम्राज्य निरंकुश हाथों में चला गया और वंश का पतन प्रारंभ हुआ. संभवतः अर्थाभाव के कारण कारीगर पलायन कर गए होंगे. अकुशल कर्मियों से शेष बचा कार्य एन केन प्रकारेण कराया गया होगा. यह बौद्ध विहार सतवाहनों के   धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक कहा जा सकता है क्योंकि वे वैदिक धर्म के अनुयायी थे.

कारला का चैत्य गृह – इससे तुलना की गयी थी.

चैत्य गृह   के पास ही  दो संरचनात्मक स्तूपों  का अस्तित्व रहा है.  एक पत्थर का बना था.  इसकी खुदाई जब की गयी तो अन्दर से, दो ताम्बे के भस्मयुक्त कलश मिले,  एक छोटे से सोनेकी डिबिया में  कपड़े का एक टुकड़ा, एक चांदी की डिबिया, माणिक्य ,  मोती, सोने के टुकड़े और  ३२४  ई.के दो ताम्र पत्र. दूसरा स्तूप जो ईंटों से बना था  उसके अन्दर से एक पत्थर का टुकड़ा मिला जिसपर ५-६  वीं शताब्दी में प्रयुक्त लिपि अंकित थी.

हम लोगों ने इस चैत्य गृह में अत्यधिक समय बिता दिया था इसलिए अब जल्दी करनी पड़ी और बगल में एक दूसरे  चैत्य गृह (क्रमांक १) की ओर बढ़ लिए.  मूलतः इसे दुमंजिला बनना था परन्तु अपूर्ण ही रहा. इसमें बने खम्बे भीमकाय हैं. बगल में ही अपेक्षाकृत एक छोटी गुफा थी (क्रमांक २). यहाँ एक स्तूप के अतिरिक्त दीवारों पर बुद्ध की एवं अवलोकितेश्वर की मूर्तियाँ उकेरी गयीं हैं. यहाँ की गुफाएं पहाड़ के अलग अलग धरातल पर हैं और चट्टान को तराश कर ही ऊपर जाने के घुमावदर सीढियां  हैं. हमें आभास होने लगा क़ि कदाचित उपलब्ध समय में सब कुछ देख पाना असंभव होगा. एक सुधी पर्यटक ने कहा क़ि गुफा क्रमांक १, २, और ३ के अतिरिक्त ११, ४१, ६७, ८९ और ९० में मूर्तिकला मिलती है. अतः हमलोग चल पड़े गुफा क्रमांक ११ की तरफ. इसे दरबार हाल कहा जाता है. अन्दर एक स्तूप के अतिरिक्त दोनों तरफ अगल बगल आवासीय कोठरियां बनी हैं. यहाँ बहुत से शिलालेख भी हैं. गुफा क्रमांक ४१ मत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ भी  अवलोकितेश्वर को चार हाथ और ११ सर से युक्त दर्शाया गया है. ऐसी प्रतिमा भारत में अन्यत्र नहीं है.  विदित हो क़ि  अवलोकितेश्वर जी ने सभी प्राणियों की मुक्ति के पूर्व अपने लिए  बुद्धत्व को अस्वीकार कर दिया था. गुफा क्रमांक ६७ में बौद्ध जातक से ली हुई कहानी को दीवारों पर मूर्त रूप दिया गया था. इन सब स्वतंत्र कोठरियों के सामने खम्बे और बरामदे भी हैं. हर कोठरी में बौद्ध भिक्षुओं के शयन के लिए चबूतरे भी बने हुए हैं. इन सभी कोठरियों के सामने  छोटी नाली द्वारा

बौद्ध भिक्षुओं की जगह अब बंदरों ने ले ली है!

ऊपर से जल प्रवाहित होकर पहुँच रहा था. इसके अतिरिक्त ऊपर चढ़ते हुए हमने देखा था क़ि वर्षा का पानी चट्टानों से कल कल करता  नीचे की ओर प्रवाहित हो रहा था. इस पानी को जल कुंडों में संगृहीत किये जाने की व्यवस्था थी.

हमारे लिए निर्धारित समय सीमा  निकट हो चली थी और कुछ हद तक थकान के कारण भी गुफा क्रमांक ६७ से ही लौट पड़े थे. वैसे कान्हेरी में शाम ५ बजे तक रहा जा सकता है. हमें बाद में पता चला था क़ि सबसे ऊपर समतल पठार है जहाँ मृत बौद्ध भिक्षुओं का दाह  संस्कार किया जाता था. वहां कई छोटे बड़े कच्चे पक्के ईंटों से निर्मित स्तूप भी बने हुए हैं. जब हमलोग अपनी गाडी के पार्किंग स्थल में पहुंचे तो पाया क़ि चालक हल्ला कर ही रहा था. पुनः बोरीवली पहुँच कर लोकल ट्रेन द्वारा संध्या होते होते घर वापस पहुँच गए.

नोट: वाटरमार्क युक्त चित्रों को छोड़ बाकी सभी विकीमीडिया से लिए गए हैं.